Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
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(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार)
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अडूसा (वासा) Malabar nut, Adhatoda Vasika
सामान्य परिचय : सारे भारत में अडूसा के झाड़ीदार पौधे आसानी से मिल जाते हैं। ये 120 से 240 सेमी ऊंचे होते हैं। अडूसा के पत्ते 7.5 से 20 सेमी तक लंबे और 4 से साढ़े 6 सेमी चौडे़ अमरूद के पत्तों जैसे होते हैं। ये नोकदार, तेज गंधयुक्त, कुछ खुरदरे, हरे रंग के होते हैं। अडूसा के पत्तों को कपड़ों और पुस्तकों में रखने पर कीड़ों से नुकसान नहीं पहुंचता। इसके फूल सफेद रंग के 5 से 7.5 सेमी लंबे और हमेशा गुच्छों में लगते हैं। लगभग 2.5 सेमी लंबी इसकी फली रोम सहित कुछ चपटी होती है, जिसमें चार बीज होते हैं। तने पर पीले रंग की छाल होती है। अडूसा की लकड़ी में पानी नहीं घुसने के कारण वह सड़ती नहीं है।
परिचय : हिन्दू धर्म शास्त्रों में दूब (घास) को परम पवित्र माना गया है, प्रत्येक शुभ कामों पर पूजन सामग्री के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। देवता, मनुष्य और पशु सभी की प्रिय दूब (घास), खेल के मैदान, मन्दिर परिसर, बाग व बगीचों में विशेष तौर पर उगाई जाती है, जबकि यह यहां-वहां यह अपने आप उग जाती है। इसके तने में अनेक गांठे होती हैं, इसकी छोटी-छोटी शाखाएं भूमि से ऊपर उठी रहती है। हरी दूब 2-4 इंच लम्बी तथा चिकनी होती है तथा इसकी नोकदार पतली पत्तियां निकलती हैं। यह वर्ष भर हरी रहती है, गर्मी के दिनों में सूख जाती है। खासतौर पर हरी और सफेद दूब (घास) देखने को मिलती है, कहीं-कहीं नीली या काली दूब (घास) भी होती है।
परिचय : भारत में नागपुर व झालावाड़ में बड़े पैमाने पर संतरे की खेती होती है। संतरा ठंडा, शक्तिवर्द्धक, अम्ल, मीठा, स्वादिष्ट, खट्टा-मीठा, मूत्रल (पेशाब का बार-बार), क्षुधावर्द्धक (भूख का बढ़ना) है। गर्मी में इसकी खपत सबसे ज्यादा होती है। संतरा लोकप्रिय फल है। संतरे के अंदर विटामिन `ए´, `बी´ और `सी´ तथा कैल्शियम से भरा होता है। यह पाचन में अत्यंत लाभकारी होता हैं। संतरा खून को साफ करता है। संतरे के रस या इससे बनाया गया मार्मेलेड ज्यादा पौष्टिक है। संतरा तन और मन को प्रसन्नता देने वाला फल है। व्रत
जटामांसी (Spikenard)
परिचय : जटामांसी हिमालय में उगने वाली एक मशहूर औषधि है। जटामांसी का पौधा होता है, जिसका तना 10 से 60 सेमी तक लम्बा होता है। जटामांसी के पत्ते 15 से 20 सेमी तक लम्बे होते हैं ये गुच्छे में लगे होते हैं, इसके फूल सफेद व गुलाबी या नीले रंग के एक गुच्छे में लगते हैं। फल सफेद रोमों से भरे छोटे व गोल-गोल होते हैं। इसकी जड़ लंबी, गहरी भूरे रंग की सूत्रों युक्त होती है। जटामांसी कश्मीर, भूटान, सिक्किम और कुमाऊं जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में अपने आप उगती है। इसे 'बालछड़' के नाम से भी जाना जाता है। जटामांसी ठण्डी जलवायु में उत्पन्न होती है। इसलिए यह हर जगह आसानी से नहीं मिलती। इसे जटामांसी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसकी जड़ में बाल जैसे तन्तु लगे होते हैं। एलोपैथिक डांक्टर को इसके सारे गुण ‘वेलेरियन नामक दवा में मिलते हैं।
शलगम
परिचय : चुकन्दर या गाजर की अपेक्षा में शलगम में शर्करा कम मात्रा में पाई जाती है। इसमें कैल्शियम भरपूर मात्रा में होता है। शलगम की सब्जी किसी भी तरह के रोगियों को बिना किसी डर के सेवन कराई जा सकती है।
गुणकारी जीरा : लाभकारी प्रयोग
- जीरा पाचक और सुगंधित मसाला है।
- भोजन में अरुचि, पेट फूलना, अपच आदि को दूर करने में जीरा विश्वसनीय औषधि है।
- भुने हुए जीरे को लगातार सूँघने से जुकाम की छीकें आना बंद हो जाती है।
- प्रसूति के पश्चात जीरे के सेवन से गर्भाशय की सफाई हो जाती है।
- जीरा गरम प्रकृति का होता है अत: इसके अधिक सेवन से उल्टी भी हो सकती है।
- जीरा कृमिनाशक है और ज्वरनिवारक भी।
- जीरे को उबाल कर उस पानी से स्नान करने से खुजली मिटती है।
- बवासीर में मिश्री के साथ सेवन करने से शांति मिलती है।
- जीरे व नमक को पीसकर घी व शहद में मिलाकर थोड़ा गर्म करके बिच्छू के डंक पर लगाने से विष उतर जाता है।
- जीरे का चूर्ण 4 से 6 ग्राम दही में मिलाकर खाने से अतिसार मिटता है।
चिरायता
रंग : चिरायता हरे रंग का होता है।
परिचय : चिरायता आमतौर पर आसानी से उपलब्ध होने वाला पौधा नहीं है। चिरायता का मूल उत्पादक देश होने के कारण नेपाल में यह अधिक मात्रा में पाया जाता है। भारत के हिमायल प्रदेश में कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक काफी ऊंचाई पर इसका पौधा होता है। मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में भी इसे उगाया जाता है। इसका एक 2 वर्षीय पौधा 2 से 4 फुट तक ऊंचा होता है। इसके पत्ते भालाकार, नोकदार, 2-3 इंच लंबे और 3-4 सेंटीमीटर चौड़े, चिकने पांच शिरायुक्त होते हैं। इसका तना मोटा, लंबा और शाखायुक्त होता है। इसका फल 6-7 मिलीमीटर व्यास का अण्डाकार तथा इसके बीज छोटे चिकने, बहुकोणीय और अधिक संख्या में होते हैं। इसके फूल बारिश के मौसम में और फल अगस्त से सितम्बर तक के महीनों में आते हैं। शरद ऋतु में जब फल पक जाते हैं तब इन्हें इकट्ठा किया जाता है।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
| हिन्दी | चिरायता |
| संस्कृत | किरात, किरातिक्त |
| मराठी | किराईत |
| गुजराती | करियातु |
| बंगाली | चिरेता |
| अंग्रेजी | चिरेट्टा |
| लैटिन | स्वेर्टिया चिरायता |
रंग : चिरायता हरे रंग का होता है।
स्वाद : चिरायता का स्वाद कड़वा होता है।
स्वरूप : चिरायता एक प्रकार की घास होती है जो नेपाल में पायी जाती है।
स्वभाव : चिरायता गर्म प्रकृति की होती है।
हानिकारक : चिरायता का अधिक मात्रा में उपयोग कमर के लिए हानिकारक हो सकता है।
दोषों को दूर करने वाला : अनीसून चिरायता के दोषों को दूर करता है।
तुलना : केसर से चिरायता की तुलना की जा सकती है।
मात्रा : चिरायता की मात्रा 6 ग्राम के लगभग लेनी चाहिए तथा इसका काढ़ा 50 से 100 मिलीलीटर तक उपयोग किया जाता है।
गुण :
आयुर्वेद के अनुसार : आयुर्वेद के मतानुसार चिरायता का रस तीखा, गुण में लघु, प्रकृति में गर्म तथा कड़ुवा होता है। यह बुखार, जलन और कृमिनाशक होता है। चिरायता त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को नष्ट करने वाला, प्लीहा यकृत वृद्धि (तिल्ली और जिगर की वृद्धि) को रोकने वाला, आमपाचक, उत्तेजक, अजीर्ण, अम्लपित्त, कब्ज, अतिसार, प्यास, पीलिया, अग्निमान्द्य, संग्रहणी, दिल की कमजोरी, रक्तपित्त, रक्तविकार, त्वचा के रोग, मधुमेह, गठिया, जीवनीशक्तिवर्द्धक, जीवाणुनाशक गुणों से युक्त होने के कारण इन बीमारियों में सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता है।
चिरायता मन को प्रसन्न करता है। इसके सेवन से पेशाब खुलकर आता है। यह सूजनों को पचाता है। दिल को मजबूत व शक्तिशाली बनाता है। चिरायता जलोदर (पेट में पानी भरना), सीने का दर्द, और गर्भाशय के विभिन्न रोगों को नष्ट करता है। यह खून को साफ करता है तथा कितना भी पुराना बुखार क्यों न हो चिरायता उस बुखार को नष्ट कर देता है। इसका कड़वापन ही इस औषधि का विशेष गुण होता है। इसका उपयोग मलेरिया, दमे की बीमारी, बुखार, टायफाइड, संक्रमणरोधक, कमजोरी, जीवाणु कृमिनाशक, कालाजार (जिसमें प्लीहा और यकृत दोनों बढ़ जाते हैं) आदि रोगों को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
वैज्ञानिक मतानुसार : चिरायता का रासायनिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसमें पीले रंग का एक ओफेलिक एसिड, दो प्रकार के तिक्त, चिरायनिन और एमेरोजेण्टिन नामक ग्लाइकोसाइड्स, दो क्रिटलीय फिनॉल जेन्टीयोपीक्रीन, पीले रंग के क्रिस्टल यौगिक, सुअर्चिरिन, नामक जैन्थोन होते हैं। उल्लेखनीय है कि एमेरोजेण्टिन नामक ग्लाइकोसाइड संसार के सबसे अधिक कड़ुवे पदार्थों में से एक होता है।
यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार : यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार चिरायता दूसरे दर्जे का गर्म और रूखा होता है। बुखार की औषधि के रूप में यह सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। चिरायता दिल और जिगर को बलवान बनाता है। यह आमाशय और जिगर की सूजन को दूर करता है। चिरायता पेशाब की रुकावट, गर्भाशय का दर्द, गुर्दे का दर्द, खुजली, त्वचा के रोग, खांसी, कब्ज, आंखों की रोशनी बढ़ाने वाला, पाचन शक्ति तथा भूख को बढ़ाने वाली, तथा बिगड़े हुए बुखार को दूर करने वाली होती है।
स्त्रोत : जे के हेल्थ वर्ल्ड
चिरायता
चिरायता (Swertia chirata Ham) यह जेंशियानेसिई (Gentianaceae) कुल का पौधा है, जिसका प्रेग देशी चिकित्सा पद्धति में प्राचीन काल से होता आया है। यह तिक्त, बल्य (bitter tonic), ज्वरहर, मृदु विरेचक एवं कृमिघ्न है, तथा त्वचा के विकारों में भी प्रयुक्त होता है। इस पौधे के सभी भाग (पंचांग), क्वाथ, फांट या चूर्ण के रूप में, अन्य द्रव्यों के साथ प्रयोग में जाए जाते हैं। इसके मूल को जंशियन के प्रतिनिधि रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
चिरायते का पौधा हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में 11 हजार फुट का ऊँचाई तक प्राप्त होता है। तना प्राय: 75 से 125 सेंमी. ऊँचा, ऊपरी भाग चौपहल तथा सपक्ष, आधार की ओर गोल तथा वर्ण में पीताभ नीलारुण होता है। पत्तियाँ 3.5 8.0 1.5 3.5 सेंमी., अवृंत, विपरीत, चतुष्क (decussate), भालाकार, लंबाग्र (acuminate) एवं पाँच शिराओं से युक्त होती हैं। पौधे के सभी भाग स्वाद में अत्यंत तिक्त होते हैं।
पंसारियों के यहाँ यह भेषज 'पहाड़ी चिरायता' के नाम से उपलब्ध होता है। अधिकांशत: यह नेपाल में पाया जाता है, इसलिये इसे 'नेपाली चिरायता' भी कहते हैं। आयुर्वेद का ''किरात तिक्त'' नाम भी इसकी पहाड़ी, अर्थात् किरातीय प्रदेश में, उत्पत्ति तथा तिक्त रस का द्योतक है। देशी चिरायता के नाम से प्राय: कालमेघ (Andrographis paniculata) या अन्य तिक्त द्रव्य, जैसे नाय या नई (Enicostema littorale), बड़ा चिरायता या उदि चिरायता (Exacum bicol) और असली चिरायते की अन्य जातियाँ (Species) भारत के विभिन्न भागों में काम में लाई जाती हैं। (सत्य प्रकाश.)-चिरायताSubmitted by Hindi on Thu, 08/11/2011 - 14:38, स्त्रोत : हिंदी इंडिया वाटर पोर्टल
गुणकारी है कड़वा चिरायता
अगस्त-सितंबर के माह में रोगाणु अधिक मात्रा में फैलते हैं। इस मौसम में बीमारियों से बचने के लिए महँगी दवाओं के स्थान पर घरेलू नुस्खे आजमाएँ। बरसों से हमारी दादी-नानी कड़वे चिरायते से बीमारियों को दूर भगाती रही है। दरअसल, यह कड़वा चिरायता एक प्रकार की जड़ीबूटी है जो कुनैन की गोली से अधिक प्रभावी होती है। पहले इस चिरायते को घर में सूखा कर बनाया जाता था लेकिन आजकल यह बाजार में कुटकी चिरायते के रूप में उपलब्ध है।
घर में चिरायता चूर्ण बनाने की विधि : 100 ग्राम सूखी तुलसी के पत्ते का चूर्ण, 100 ग्राम नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, 100 ग्राम सूखे चिरायते का चूर्ण लीजिए। इन तीनों को समान मात्रा में मिलाकर एक बड़े डिब्बे में भर कर रख लीजिए। यह तैयार चूर्ण मलेरिया या अन्य बुखार होने की स्थिति में दिन में तीन बार दूध से सेवन करें। मात्र दो दिन में आश्चर्यजनक लाभ होगा। बुखार ना होने की स्थिति में इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें।
यह चूर्ण किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह स्वाइन फ्लू ही क्यों ना हो, उसे शरीर से दूर रखता है। इसके सेवन से शरीर के सारे कीटाणु झर जाते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। इसके सेवन से खून साफ होता है तथा धमनियों में रक्त प्रवाह सुचारू रूप से संचालित होता है।-स्त्रोत : हिंदी वेब दुनिया

(Winter Cherry)Indian Name :- Ashwagandha
Botanical Name :- Withania somniferaसामान्य परिचय : सम्पूर्ण भारतवर्ष में विशेषकर शुष्क प्रदेशों में असगंध के जंगली या कृषिजन्य पौधे 5,500 फुट की ऊंचाई तक पाये जाते हैं। इसके जंगली पौधे की अपेक्षा कृषिजन्य पौधे गुणवत्ता की दृष्टि से उत्तम होते हैं, परंतु तेल आदि के लिए जगंली पौधे ही उपयोगी होते हैं। यह देश भेद से कई प्रकार की कही गई है, परंतु असली असगंध के पौधे को मसलने पर घोड़े के मूत्र जैसी गंध आती है जो इसकी ताजी जड़ में अपेक्षाकृत अधिक होती है।
स्वरूप: असगंध (अश्वगंधा) का झाड़ीदार पौधा 60 से 90 सेमी तक लंबा होता है। इसकी जड़ ही औषधि रूप में प्रयोग की जाती है। इसकी जड़ अन्दर से सफेद, कड़ी, मोटी-पतली और 10 से 15 सेमी के लगभग लंबी होती है। इसकी जड़ को सुखाकर उपयोग में लाया जाता है। इसके पौधे पर 5-5 फूलों के गुच्छे पीले या लाल रंग के होते हैं तथा बीज पीले रंग के छोटे, चिपटे और चिकने होते हैं।
विभिन्न भाषाओं नाम :
| संस्कृत | अश्वगंधा, वराहकर्णी |
| हिंदी | असंगध, अश्वगंधा |
| गुजराती | आसंध, घोड़ा आहन, घोड़ा आकुन |
| मराठी | आसंध, डोरगुंज |
| बंगाली | अश्वगंधा |
| तेलगू | पनेरू |
| अंग्रेजी | वीनटर चेरी |
रासायनिक संघटन : असगंध की जड़ में एक उड़नशील तेल तथा बिथेनिओल नामक तत्व पाया जाता है। इसके अलावा सोम्मीफेरिन नामक क्रिस्टेलाइन एल्केलायड एवं फाइटोस्टेरोल आदि तत्व भी पाये जाते हैं।
गुण-धर्म : यह कफ वातनाशक, बलकारक, रसायन, बाजीकारक, नाड़ी-शक्तिवर्द्धक तथा पाचनशक्ति को बढ़ाने वाला होता है।
हानिकारक : गर्म प्रकृति वालों के लिए अश्वगंधा का अधिक मात्रा में उपयोग हानिकारक होता है।
दोषों को दूर करने वाला : गोंद, कतीरा एवं घी इसके गुणों को सुरक्षित रखते हुए, दोषों को कम करता है।
औषधीय उपयोग :
गंडमाला (Goitre)-असंगध के नये कोमल पत्तों को समान मात्रा में पुराना गुड़ मिलाकर तथा पीसकर झाड़ी के बेर जितनी गोलियां बना लें। इसे सुबह ही एक गोली बासी पानी के साथ निगल लें और असगंधा के पत्तों को पीसकर गंडमाला पर लेप करें।
हृदय शूल-
- वात के कारण उत्पन्न हृदय रोग में असगंध का चूर्ण दो ग्राम गर्म पानी के साथ लेने से लाभ होता है।
- असगंध चूर्ण में बहेड़े का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 5-10 ग्राम की मात्रा गुड़ के साथ लेने से हृदय सम्बंधी वात पीड़ा दूर होती है।
क्षयरोग (टी.बी.)-
- 2 ग्राम असंगध के चूर्ण को असगंध के ही 20 ग्राम काढ़े के साथ सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है।
- 2 ग्राम असगंध की जड़ के चूर्ण में 1 ग्राम बड़ी पीपल का चूर्ण, 5 ग्राम घी और 10 ग्राम शहद मिलाकर सेवन करने से क्षय रोग (टी.बी.) मिटता है।
खांसी-
- असगंध (अश्वगंधा) की 10 ग्राम जड़ को कूट लें, इसमें 10 ग्राम मिश्री मिलाकर 400 ग्राम पानी में पकाएं, जब 8वां हिस्सा रह जाये तो इसे थोड़ा-थोड़ा पिलाने से कुकुर खांसी या वात जन्य खांसी पर विशेष लाभ होता है।
- असगंध के पत्तों का काढ़ा 40 ग्राम, बहेडे़ का चूर्ण 20 ग्राम, कत्था का चूर्ण 10 ग्राम, कालीमिर्च 50 ग्राम, लगभग 3 ग्राम सेंधा नमक को मिलाकर लगभग आधा ग्राम की गोलियां बना लें। इन गोलियों को चूसने से सभी प्रकार की खांसी दूर होती है। टी.बी. खांसी में भी यह लाभदायक है।
- अश्वगंधा की 15 ग्राम कोंपले या कोमल पत्ते लेकर 200 ग्राम पानी में उबालें जब पत्ते गल जाये या नरम हो जायें तो छानकर गर्म-गर्म तीन-चार दिन पीयें, इससे कफ जन्य खांसी भी दूर होती है।
गर्भधारण-
- अश्वगंधा का चूर्ण 20 ग्राम, पानी 1 किलो तथा गाय का दूध 250 ग्राम तीनों को हल्की आंच पर पकाकर जब दूध मात्र शेष रह जाये तब इसमें 6 ग्राम मिश्री और 6 ग्राम गाय का घी मिलाकर मासिक-धर्म की शुद्धिस्नान के 3 दिन बाद 3 दिन तक सेवन करने से स्त्री अवश्यगर्भ धारण करती है।
- अश्वगंधा का चूर्ण, गाय के घी में मिलाकर मासिक-धर्म स्नान के पश्चात् प्रतिदिन गाय के दूध के साथ या ताजे पानी से 4-6 ग्राम की मात्रा में 1 महीने तक निरंतर सेवन करने से स्त्री गर्भधारण अवश्य करती है।
- अश्वगंधा की जड़ के काढ़े और लुगदी में चौगुना घी मिलाकर पकाकर सेवन करने से वात रोग दूर होता है तथा स्त्री गर्भधारण करती है।
गर्भपात-बार-बार गर्भपात होने पर अश्वगंधा और सफेद कटेरी की जड़ इन दोनों का 10-10 ग्राम रस पहले 5 महीने तक सेवन करने से अकाल में गर्भपात नहीं होगा और गर्भपात के समय सेवन करने से गर्भ रुक जाता है।
रक्तप्रदर एवं श्वेतप्रदर-अश्वगंधा के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 1-1 चम्मच गाय के दूध में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।
कृमि रोग (पेट के कीड़े)-इसके चूर्ण में बराबर मात्रा में गिलोय का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ 5-10 ग्राम नियमित सेवन करने से लाभ होता है।
आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए-अश्वगंधा का चूर्ण 2 ग्राम, धात्रि फल चूर्ण 2 ग्राम तथा 1 ग्राम मुलेठी का चूर्ण मिलाकर 1 चम्मच सुबह और शाम पानी के साथ सेवन करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है।
संधिवात (जोड़ों का दर्द) में-
- अश्वगंधा के पंचांग (जड़, पत्ती, तना, फल और फूल) को कूटकर, छानकर 25 से 50 ग्राम तक सेवन करने से जोड़ों का दर्द (गठियावात) दूर होता है।
- गठिया में अश्वगंधा के 30 ग्राम ताजा पत्ते, 250 ग्राम पानी में उबालकर जब पानी आधा रह जाये तो छानकर पी लें। 1 सप्ताह पीने से ही गठिया में जकड़ा और तकलीफ से रोता रोगी बिल्कुल अच्छा हो जाता है तथा इसका लेप भी बहुत लाभदायक है।
- अश्वगंधा के चूर्ण की मात्रा 2 ग्राम सुबह-शाम गर्म दूध तथा पानी के साथ खाने से गठिया के रोगी को आराम हो जाता है।
- अश्वगंधा के तीन ग्राम चूर्ण को तीन ग्राम घी में मिलाकर, एक ग्राम शक्कर मिलाकर सुबह-शाम खाने से संधिवात दूर होता है।
- अश्वगंधा के 2-5 ग्राम चूर्ण को गाय के घी या शक्कर के साथ चाटने से कमरदर्द और नींद में लाभ होता है।
- असगंध और सोंठ बराबर मात्रा में लेकर इनका चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करें। इससे कमर दर्द से आराम मिलता है।
- असंगध और सफेद मूसली को पीसकर बराबर मात्रा में बनाया गया चूर्ण 1 चम्मच भर, रोजाना दूध के साथ सेवन करने से कमजोरी मिट जाती है।
- 1-1 छोटे चम्मच असगंध का चूर्ण शहद में मिलाकर सुबह-शाम खाने और ऊपर से एक गिलास दूध पीने से शरीर की कमजोरी दूर होती है।
नपुंसकता-
- अश्वगंधा का कपड़े से छना हुआ बारीक चूर्ण और चीनी बराबर मिलाकर रखें, इसको 1 चम्मच गाय के ताजे दूध के साथ सुबह भोजन से 3 घंटे पूर्व सेवन करें। इस चूर्ण को चुटकी-चुटकी भर खाते हैं और ऊपर से दूध पीते रहें। रात के समय इसके बारीक चूर्ण को चमेली के तेल में अच्छी तरह घोटकर लगाने से इन्द्रिय की शिथिलता दूर होकर वह कठोर और दृढ़ हो जाती हैं।
- अश्वगंधा, दालचीनी और कडुवा कूठ बराबर मात्रा में कूटकर छान लें और गाय के मक्खन में मिलाकर 5-10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सुपारी छोड़करक शेष लिंग पर मलें, इसको मलने के पूर्व और बाद में लिंग को गर्म पानी से धो लें।
कमजोरी-
- असगंध एक वर्ष तक यथाविधि सेवन करने से शरीर रोग रहित हो जाता है। केवल सर्दियों में ही इसके सेवन से दुर्बल व्यक्ति भी बलवान होता है। वृद्धावस्था दूर होकर नवयौवन प्राप्त होता है।
- असंगध चूर्ण, तिल व घी 10-10 ग्राम लेकर और तीन ग्राम शहद मिलाकर नित्य सर्दी में सेवन करने से कमजोर शरीर वाला बालक मोटा हो जाता है।
- अश्वगंधा का चूर्ण 6 ग्राम, इसमें बराबर की मिश्री और बराबर शहद मिलाकर इसमें 10 ग्राम गाय का घी मिलायें, इस मिश्रण को सुबह शाम शीतकाल में चार महीने तक सेवन करने से बूढ़ा व्यक्ति भी युवक की तरह प्रसन्न रहता है।
- अश्वगंधा की जड़ के महीन चूर्ण को तीन ग्राम की मात्रा में गर्म प्रकृति वाली गाय के ताजे दूध से वात प्रकृति वाला शुद्ध तिल से और कफ प्रकृति का व्यक्ति गर्म पानी के साथ एक वर्ष तक सेवन करे तो निर्बलता दूर होकर सब व्याधियों का नाश होता है और निर्बल व्यक्ति बल प्राप्त करता है।
- अश्वगंधा चूर्ण 20 ग्राम, तिल इससे दुगने, और उड़द आठ गुने अर्थात 140 ग्राम, इन तीनों को महीन पीसकर इसके बड़े बनाकर ताजे-ताजे एक ग्राम तक खायें।
- अश्वगंधा चूर्ण और चिरायता बराबर-बराबर लेकर खरल (कूटकर) कर रखें। इस चूर्ण को 10-10 ग्राम की मात्रा में सुबह ग्राम शाम दूध के साथ खायें।
- एक ग्राम अश्वगंधा चूर्ण में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिश्री डालकर उबालें हुए दूध के साथ सेवन करने से वीर्य पुष्ट होता है, बल बढ़ता है।
खून की खराबी-4 ग्राम चोपचीनी और अश्वगंधा का बारीक पिसा चूर्ण बराबर मात्रा में लें। इसे शहद के साथ नियमित सुबह-शाम चाटने से रक्तविकार मिट जाता है।
ज्वर-इसका चूर्ण पांच ग्राम, गिलोय की छाल का चूर्ण चार ग्राम, दोनों को मिलाकर प्रतिदिन शाम को गर्म पानी से खाने से जीर्णवात ज्वर दूर हो जाता है।
सभी प्रकार के रोगों में-लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग गिलोय का चूर्ण को 5 ग्राम अश्वगंधा के चूर्ण के साथ मिलाकर शहद के साथ चाटने से सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं।
बांझपन दूर करना-
- असगंध, नागकेसर और गोरोचन इन तीनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस-छान लेते हैं। इसे शीतल जल के साथ सेवन करें तो गर्भ ठहर जाता है।
- असगंध तथा नागौरी को 50 ग्राम की मात्रा में लेकर कूटकर कपड़छन कर लेते हैं। जब मासिक-धर्म के बाद स्त्री स्नान करके शुद्ध हो जाए तो 10 ग्राम की मात्रा में इसका सेवन करें। उसके बाद पुरुष के साथ रमण (मैथुन) करें तो इससे बांझपन दूर होकर महिला गर्भवती हो जाएगी।
- असगंध के काढे़ में दूध और घी मिलाकर 7 दिनों तक पिलाने से स्त्री को निश्चित रूप से गर्भधारण होता है।
- असगंध का चूर्ण 3 से 6 ग्राम की मात्रा में मासिक-धर्म के शुरू होने के लगभग 4 दिन पहले से सेवन करना चाहिए। इससे गर्भ ठहरता है।
- असगंध 100 ग्राम दरदरा कूटकर इसकी 20 ग्राम मात्रा को 200 ग्राम पानी में रात को भिगोकर रख देते हैं। सुबह इसे उबालते हैं। एक चौथाई रह जाने पर इसे छानकर 200 ग्राम गुनगुने मीठे दूध में एक चम्मच घी मिलाकर माहवारी के पहले दिन से 5 दिनों तक लगातार प्रयोग करना चाहिए।
दस्त-असगंध, दालचीनी, नागरमोथा, बाराही फल, धाय के फूल और कुड़ा (कोरैया) की छाल को निकालकर काढ़ा बनाकर रख लें, फिर इसी बने काढ़े को 20 ग्राम से 40 ग्राम की मात्रा में पीने से बुखार के दौरान आने वाले दस्त बंद हो जाते हैं और आराम मिलता है।
मासिक-धर्म सम्बंधी विकार-असगंध 35 ग्राम की मात्रा में कूटकर छान लेते हैं। इसमें 35 ग्राम की मात्रा में चीनी मिला देते हैं। इसकी 10 ग्राम मात्रा को पानी से खाली पेट मासिक-धर्म शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले सेवन करना चाहिए। जब मासिक-धर्म शुरू हो जाए तो इसका सेवन बंद कर देना चाहिए। इससे मासिक धर्म के सभी विकार नष्ट हो जाते हैं।
प्रदर-
- असगंध और शतावर का बराबर मात्रा का चूर्ण 3 ग्राम ताजे पानी के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है।
- असगंध का चूर्ण सुबह-शाम दूध के साथ कुछ दिनों तक सेवन करने से श्वेत प्रदर मिट जाता है।
- 25-25 ग्राम की मात्रा में असगंध, बिधारा, लोध्र पठानी को कूट-पीस छानकर 5-5 ग्राम कच्चे दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से प्रदर में आराम मिलता है।
- 5-10 ग्राम असगंध, नागौरी चूर्ण सुबह-शाम घी के साथ सेवन करने से प्रदर में आराम मिलता है।
अल्सर-4 ग्राम असगंध को गौमूत्र (गाय के पेशाब) में पीसकर सेवन करना चाहिए।
हड्डी कमजोर होना-असगंध नागौरी का चूर्ण 1 से 3 ग्राम शहद एवं मिश्री मिले दूध के साथ सुबह-शाम खाने से हड्डी की विकृति आदि दूर होकर शरीर पुष्ट और सबल हो जाता है।
रक्तप्रदर-अश्वगंधा को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसे 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करने से रक्त प्रदर में आराम मिलता है।
स्तनों के आकार में वृद्धि-
- असगंध नागौरी और शतावरी को बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह से पीसकर चूर्ण बनायें, फिर इसी चूर्ण को देशी घी में मिलाकर मिट्टी के बर्तन में रखें, इसी चूर्ण को 10 ग्राम की मात्रा में मिश्री मिले दूध के साथ सेवन करने से स्तनों के आकार में बढ़ोत्तरी होती है।
- असंगध नागौरी, गजपीपल और बच आदि को बराबर लेकर पीसकर चूर्ण बना लें, फिर मक्खन के साथ मिलाकर स्तनों पर लगायें। इससे स्तनों का उभार होता है।
मोटापे के रोग में-असगंध 50 ग्राम, सफ़ेद मूसली 50 ग्राम, काली मूसली 50 ग्राम, की मात्रा में कूटकर छानकर रख लें, इसे 10 ग्राम की मात्रा में सुबह दूध के साथ लेने से मोटापा दूर होता है।
स्तनों को आकर्षक होना-असगंध और शतावरी को बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर लगभग 2-2 ग्राम की मात्रा में शहद के खाकर ऊपर से दूध में मिश्री को मिलाकर पीने से स्तन आकर्षक हो जाते हैं।
वात रोग-
- असगंध के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) को खाने से लाभ प्राप्त होता है।
- असगंध और विधारा 500-500 ग्राम कूट पीसकर रख लें। 10 ग्राम दवा सुबह गाय के दूध के साथ खाने से वात रोग खत्म हो जाते हैं।
- असगंध और मेथी की 100-100 ग्राम मात्रा का बारीक चूर्ण बनाकर, आपस में गुड़ में मिलाकर 10 ग्राम के लड्डू बना लें। 1-1 लड्डू सुबह-शाम खाकर ऊपर से दूध पी लें। यह प्रयोग वात रोगों में अच्छा आराम दिलाता है। जिन्हें डायबिटीज हो, उन्हें गुड़ नहीं मिलाना चाहिए, उन्हें सिर्फ अश्वगंध और मेथी का चूर्ण पानी के साथ लेना चाहिए।
वीर्य रोग में-
- असगंध नागौरी, विधारा, सतावरी 50-50 ग्राम कूट-पीसकर छान लें, फिर इसमें 150 ग्राम चीनी मिला दें। 10-10 ग्राम दूध से सुबह-शाम लें।
- नागौरी असगंध, गोखरू, शतावर तथा मिश्री मिलाकर खायें।
- असगंध, विधारा 25-25 ग्राम को मिलाकर बारीक पीस लें। इसमें 50 ग्राम चीनी मिलाकर 10 ग्राम दवा सोते समय हल्के गर्म दूध से लें। इससे बल वीर्य बढ़ता है।
- 300 ग्राम असगंध को बारीक पीस लें। इसकी 20 ग्राम मात्रा को 250 ग्राम दूध में मिलाकर उबालें, जब यह गाढ़ा हो जाये तो इसमें चीनी मिलाकर पीना चाहिए।
अंगुलियों का कांपना-3 से 6 ग्राम असगंध नागौरी को गाय के घी और उसके चार गुना दूध में उबालकर मिश्री मिलाकर प्रतिदिन पीने से अंगुलियों का कांपना दूर हो जाता है। इससे रोगी को काफी लाभ मिलता है।
योनि रोग-असगंध को दूध में अच्छी तरह पका लें, फिर ऊपर से देशी घी को डालकर एक दिन सुबह और शाम माहवारी के बाद स्नान हुई महिला को पिलाने से योनि के विकार दूर हो जाते हैं और गर्भधारण के योग्य हो जाता है।
दिल की धड़कन-असगंध और बहेड़ा दोनों को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। फिर 3 ग्राम चूर्ण में थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर हल्के गर्म पानी से सेवन करें। इससे दिल की तेज धड़कन और निर्बलता नष्ट होती है।
गठिया रोग-
- असगंध, सुरंजन मीठी, असपन्द और खुलंजन 30-30 ग्राम को कूट-छानकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 5-5 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह-शाम गर्म पानी से लें। इससे गठिया का दर्द दूर हो जाता है।
- 50 ग्राम असगंध और 25 ग्राम सोंठ को कूट-छानकर इसमें 75 ग्राम चीनी को मिला लें। 4-4 ग्राम मिश्रण पानी से सुबह-शाम लेने से गठिया का दर्द दूर हो जाता है।
- 3 ग्राम असगंध का चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 3 ग्राम घी मिलाकर रोजाना सुबह-शाम लेने से गठिया के रोग में आराम मिलता है।
हाई ब्लडप्रेशर-अश्वगंधा चूर्ण 3 ग्राम, सूरजमुखी बीज का चूर्ण 2 ग्राम, मिश्री 5 ग्राम और गिलोय का बारीक चूर्ण (सत्व) 1 ग्राम की मात्रा में लेकर पानी के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) में लाभ होता है।
हृदय की दुर्बलता-असंगध 3-3 ग्राम सुबह-शाम गर्म दूध से लें। इससे दिल दिमाग की कमजोरी ठीक हो जाती है।
हाथ-पैरों की ऐंठन-सुरंजन मीठी, असगंध नागौरी 50-50 ग्राम, 25 ग्राम सोंठ और 120 ग्राम मिश्री को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 4 से 6 ग्राम प्रतिदिन सुबह-शाम ताजे पानी के साथ लेने से पैरों के जोड़ व हाथ-पैरों का दर्द खत्म हो जाता है।
क्रोध-लगभग 3 से 6 ग्राम असगंध नागौरी के चूर्ण को मिश्री और घी में मिलाकर हल्के गर्म दूध के साथ सुबह-शाम को खाने से स्नायुतंत्र अपना कार्य ठीक तरह से करता है, जिससे क्रोध नष्ट हो जाता है।
सदमा-लगभग 3-6 ग्राम असगंध नागौरी के चूर्ण को सुबह-शाम को रोजाना घी और चीनी मिले दूध के साथ खाने से स्नायुविक ऊर्जा प्राप्त होने के कारण बार-बार आने वाले सदमे खत्म हो जाते हैं।
खून का बहना-अश्वगंधा के चूर्ण और चीनी को बराबर मात्रा में मिलाकर खाने से खून निकलना बंद हो जाता है।
लिंग वृद्धि-
- लिंग को बढ़ाने के लिए लोध्र, केशर, असगंधा, पीपल, शालपर्णी को तेल में पकाकर लिंग पर मालिश करने से लिंग में वृद्धि हो जाती है।
- कूटकटेरी, असगंध, बच, शतावरी आदि को तिल में अच्छी तरह से पकायें। सब औषधियों के जल जाने पर ही उसे आग से उतारे और लिंग पर मालिश करें। इससे लिंग का छोटापन दूर हो जाता है।
थकावट होना-
- लगभग 3 से 6 ग्राम असगंध नागौरी के चूर्ण को मिश्री और घी मिले हुए दूध के साथ सुबह-शाम लेने से शरीर में ताजगी और जोश आ जाता है।
- असगंध नागौरी और क्षीर विदारी की जड़ को बराबर भाग में लेकर, हल्के गर्म दूध में 3 से 6 ग्राम मिश्री और घी मिलाकर एक साथ सुबह और शाम को लेने से शरीर की मानसिक और शारीरिक थकावट दूर हो जाती है।
शरीर को शक्तिशाली बनाना-
- असगंध के चूर्ण को दूध में मिलाकर पीने से शरीर शक्तिशाली होता है और वीर्य में वृद्धि होती है।
- बराबर मात्रा में असगंध और विधारा को पीसकर इसका चूर्ण बना लें। इसके चूर्ण को एक शीशी में भरकर रख लें। इस चूर्ण को सुबह और शाम को दूध के साथ लेने से मनुष्य के शरीर की संभोग करने की क्षमता बढ़ती है।
- असगंध के चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ चाटने से शरीर में ताकत बढ़ती है।
- लगभग 100-100 ग्राम की मात्रा में नागौरी असगंध, सफेद मूसली और स्याह मूली को लेकर इसका चूर्ण बना लें। रोजाना लगभग 10-10 ग्राम की मात्रा में इस चूर्ण को 500 ग्राम दूध के साथ सुबह और शाम को खाने से मनुष्य के शरीर में जबरदस्त शक्ति आ जाती है।
- बराबर मात्रा में असगंध या अश्वगंधा, सौंठ, मिश्री और विधारा को लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इसके बाद एक-एक चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम को दूध के साथ इस चूर्ण का सेवन करने से शरीर की कमजोरी दूर हो जाती है, सर्दी कम लगती है और शरीर में वीर्य बल बढ़ता है।
स्त्रोत : जे के हेल्थ वर्ल्ड
http://www.jkhealthworld.com/hindi/%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE
अश्वगंधा पौधा एक फायदे अनेक
अनुराधा गोयल, ओन्ली माई हैल्थ सम्पादकीय विभाग
अश्वगंधा एक झाड़ीदार रोमयुक्त पौधा है। अश्वगंधा कहने को एक पौधा है, लेकिन यह बहुवर्षीय पौधा पौष्टिक जड़ों से युक्त है। अश्वगंधा के बीज, फल एवं छाल का विभिन्न रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। आइए जानें अंश्वगंधा पौधें के अनेक फायदों के बारे में।
अश्वगंधा पौधे की पत्तियां त्वचा रोग, शरीर की सूजन एवं शरीर पर पड़े घाव और जख्म भरने जैसी समस्या से लेकर बहुत सी बीमारियों में भी बहुत उपयोगी है।
अश्वगंधा के पौधे को पीसकर लेप बनाकर लगाने से शरीर की सूजन, शरीर की किसी विकृत ग्रंथि और किसी भी तरह के फुंसी-फोड़े को हटाने में काम आती है।
अश्वगंधा पोधे की पत्तियों को घी, शहद पीपल इत्यादि के साथ मिलाकर सेवन करने से शरीर निरोग रहता है।
यदि किसी को चर्म रोग है तो उसके लिए भी अश्वगंधा जड़ीबूटी बहुत लाभकरी है। इसका चूर्ण बनाकर तेल से साथ लगाने से चर्म रोग से निजात पाई जा सकती है।
उच्चरक्तचाप की समस्या से पीडि़त लोग यदि अश्वगंधा के चूर्ण का दूध के साथ नियमित सेवन करेंगे तो निश्चित तौर पर उनका रक्तचाप सामान्य हो जाएगा।
शरीर में कमजोरी या दुर्बलता को भी अश्वगंधा तेल से मालिश कर दूर किया जा सकता है, इतना ही नहीं गैस संबंधी समस्या में भी ये पौधा अत्यंत लाभदायक होता है।
सांस संबंधी रोगों से निजात पाने के लिए अश्वगंधा के क्षार को शहद को घी के साथ मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ मिलता है।
वृद्धावस्था में होने वाली बीमारियों को दूर करने, तरोताजा रहने और ऊर्जावान बने रहने के लिए अश्वगंघा चूर्ण को प्रतिदिन दूध के साथ लेना चाहिए। इससे मस्तिष्क भी तेज होता है।
इसके अलावा अश्वगंधा पौधे के और भी लाभ हैं। यह खाँसी, क्षयरोग तथा गठिया में भी यह लाभदायक है।
अश्वगंधा पौधे की जड़ पौष्टिक होने के साथ ही पाचक अम्ल और प्लेग जैसी महामारियों से निजात दिलाता है।
औषधि के रूप में इसका उपयोग करके कई रोगों को दूर किया जाता है। वाकई अश्वगंधा पौधे के फायदे अनेक है।-Date of Publishing:2011-09-23 00:00:00.0 स्त्रोत : ओनली माई हेल्थ
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Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
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उपशीर्षक:
अश्वगंधा-Winter Cherry,
गठिया-Arthritis,
श्वेत प्रदर-Leucorrhea,
सेक्स-Sex
Sunday, March 04, 2012
बबूल (ACACIA)
मात्रा : इसकी मात्रा काढ़े के रूप में 50 ग्राम से 100 ग्राम तक, गोंद के रूप में 5 से 10 ग्राम तक तथा चूर्ण के रूप में 3 से 6 ग्राम तक लेनी चाहिए।
परिचय :
बबूल का पेड़ बहुत ही पुराना है, बबूल की छाल एवं गोंद प्रसिद्ध व्यवसायिक द्रव्य है। वास्तव में बबूल रेगिस्तानी प्रदेश का पेड़ है। इसकी पत्तियां बहुत छोटी होती है। यह कांटेदार पेड़ होता है। सम्पूर्ण भारत वर्ष में बबूल के लगाये हुए तथा जंगली पेड़ मिलते हैं। गर्मी के मौसम में इस पर पीले रंग के फूल गोलाकार गुच्छों में लगते है तथा सर्दी के मौसम में फलियां लगती हैं।
बबूल के पेड़ बड़े व घने होते हैं। ये कांटेदार होते हैं। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है। बबूल के पेड़ पानी के निकट तथा काली मिट्टी में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इनमें सफेद कांटे होते हैं। जिनकी लम्बाई 1 सेमी से 3 सेमी तक होती है। इसके कांटे जोड़े के रूप में होते हैं। इसके पत्ते आंवले के पत्ते की अपेक्षा अधिक छोटे और घने होते हैं। बबूल के तने मोटे होते हैं और छाल खुरदरी होती है। इसके फूल गोल, पीले और कम सुगंध वाले होते हैं तथा फलियां सफेद रंग की 7-8 इंच लम्बी होती हैं। इसके बीज गोल धूसर वर्ण (धूल के रंग का) तथा इनकी आकृति चपटी होती है।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
| संस्कृत | बबूल, बर्बर, दीर्घकंटका |
| हिन्दी | बबूर, बबूल, कीकर |
| बंगाली | बबूल गाछ |
| मराठी | माबुल बबूल |
| गुजराती | बाबूल |
| तेलगू | बबूर्रम, नक दुम्मा, नेला, तुम्मा |
| पंजाबी | बाबला |
| अरबी | उम्मूछिलान |
| फारसी | खेरेमुधिलान |
| तमिल | कारुबेल |
| अंग्रेजी | एकेशियाट्री |
| लैटिन | माइमोसा अराबिका |
गुण : बबूल कफ (बलगम), कुष्ठ रोग (सफेद दाग), पेट के कीड़ों-मकोड़ों और शरीर में प्रविष्ट विष का नाश करता है।
गोंद : यह गर्मी के मौसम में एकत्रित किया जाता है। इसके तने में कहीं पर भी काट देने पर जो सफेद रंग का पदार्थ निकलता है। उसे गोंद कहा जाता है।
मात्रा : इसकी मात्रा काढ़े के रूप में 50 ग्राम से 100 ग्राम तक, गोंद के रूप में 5 से 10 ग्राम तक तथा चूर्ण के रूप में 3 से 6 ग्राम तक लेनी चाहिए।
बबूल के औषधीय उपचार:
मुंह के रोग :
- बबूल की छाल, मौलश्री छाल, कचनार की छाल, पियाबांसा की जड़ तथा झरबेरी के पंचांग का काढ़ा बनाकर इसके हल्के गर्म पानी से कुल्ला करें। इससे दांत का हिलना, जीभ का फटना, गले में छाले, मुंह का सूखापन और तालु के रोग दूर हो जाते हैं।
- मुंह के सभी रोग: बबूल, जामुन और फूली हुई फिटकरी का काढ़ा बनाकर उस काढ़े से कुल्ला करने पर मुंह के सभी रोग दूर हो जाते हैं।
- बबूल की छाल को बारीक पीसकर पानी में उबालकर कुल्ला करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
- बबूल की छाल के काढ़े से 2-3 बार गरारे करने से लाभ मिलता है। गोंद के टुकड़े चूसते रहने से भी मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
- बबूल की छाल को सुखाकर और पीसकर चूर्ण बना लें। मुंह के छाले पर इस चूर्ण को लगाने से कुछ दिनों में ही छाले ठीक हो जाते हैं।
- बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर दिन में 2 से 3 बार गरारे करें। इससे मुंह के छाले ठीक होते हैं।
दांत का दर्द :
- बबूल की फली के छिलके और बादाम के छिलके की राख में नमक मिलाकर मंजन करने से दांत का दर्द दूर हो जाता है।
- बबूल की कोमल टहनियों की दातून करने से भी दांतों के रोग दूर होते हैं और दांत मजबूत हो जाते हैं।
- बबूल की छाल, पत्ते, फूल और फलियों को बराबर मात्रा में मिलाकर बनाये गये चूर्ण से मंजन करने से दांतों के रोग दूर हो जाते हैं।
- बबूल की छाल के काढ़े से कुल्ला करने से दांतों का सड़ना मिट जाता है।
- रोजाना सुबह नीम या बबूल की दातुन से मंजन करने से दांत साफ, मजबूत और मसूढे़ मजबूत हो जाते हैं।
- मसूढ़ों से खून आने व दांतों में कीड़े लग जाने पर बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर रोजाना 2 से 3 बार कुल्ला करें। इससे कीड़े मर जाते हैं तथा मसूढ़ों से खून का आना बंद हो जाता है।
- बबूल की कच्ची फली सुखा लें और मिश्री मिलाकर खायें इससे वीर्य रोग में लाभ होता है।
- 10 ग्राम बबूल की मुलायम पत्तियों को 10 ग्राम मिश्री के साथ पीसकर पानी के साथ लेने से वीर्य-रोगों में लाभ होता है। अगर बबूल की हरी पत्तियां न हो तो 30 ग्राम सूखी पत्ती भी ले सकते हैं।
- कीकर (बबूल) की 100 ग्राम गोंद भून लें इसे पीसकर इसमें 50 ग्राम पिसी हुई असगंध मिला दें। इसे 5-5 ग्राम सुबह-शाम हल्के गर्म दूध से लेने से वीर्य के रोग में लाभ होता है।
- 50 ग्राम कीकर के पत्तों को छाया में सुखाकर और पीसकर तथा छानकर इसमें 100 ग्राम चीनी मिलाकर 10-10 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ लेने से वीर्य के रोग में लाभ मिलता है।
- बबूल की फलियों को छाया में सुखा लें और इसमें बराबर की मात्रा मे मिश्री मिलाकर पीस लेते हैं। इसे एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित रूप से पानी के साथ सेवन से करने से वीर्य गाढ़ा होता है और सभी वीर्य के रोग दूर हो जाते हैं।
- बबूल के गोंद को घी में तलकर उसका पाक बनाकर खाने से पुरुषों का वीर्य बढ़ता है और प्रसूत काल स्त्रियों को खिलाने से उनकी शक्ति भी बढ़ती है।
- बबूल का पंचांग लेकर पीस लें और आधी मात्रा में मिश्री मिलाकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित सेवन करने से कुछ ही समय में वीर्य रोग में लाभ मिलता है।
बलवीर्य की वृद्धि : बबूल के गोंद को घी में भूनकर उसका पकवान बनाकर सेवन करने से मनुष्य के सेक्स करने की ताकत बढ़ जाती है।
वीर्य की कमी :
- बबूल के पत्तों को चबाकर उसके ऊपर से गाय का दूध पीने से कुछ ही दिनों में गर्मी के रोग में लाभ होता है।
- बबूल की कच्ची फलियों का रस दूध और मिश्री में मिलाकर खाने से वीर्य की कमी दूर होती है।
धातु पुष्टि के लिए : बबूल की कच्ची फलियों के रस में एक मीटर लंबे और एक मीटर चौडे़ कपड़े को भिगोकर सुखा लेते हैं। एक बार सूख जाने पर उसे दुबारा भिगोकर सुखा लेते है। इसी प्रकार इस प्रक्रिया को 14 बार करते हैं। इसके बाद उस कपड़े को 14 भागों में बांट लेते हैं, और रोजाना एक टुकड़े को 250 ग्राम दूध में उबालकर पीने से धातु की पुष्टि होती है।
स्तन : बबूल की फलियों के चेंप (दूध) से किसी कपड़े को भिगोकर सुखा लें। इस कपड़े को स्तनों पर बांधने से ढीले स्तन कठोर हो जाते हैं।
मासिक-धर्म संबन्धी विकार :
- 4.5 ग्राम बबूल का भूना हुआ गोंद और 4.5 ग्राम गेरू को एकसाथ पीसकर रोजाना सुबह फंकी लेने से मासिक-धर्म में अधिक खून का आना बंद हो जाता है।
- 20 ग्राम बबूल की छाल को 400 ग्राम पानी में उबालकर बचे हुए 100 ग्राम काढ़े को दिन में तीन बार पिलाने से भी मासिक-धर्म में अधिक खून का आना बंद हो जाता है।
- लगभग 250 ग्राम बबूल की छाल को पीसकर 8 गुने पानी में पकाकर काढ़ा बना लेते हैं। जब यह काढ़ा आधा किलो की मात्रा में रह जाए तो इस काढ़े की योनि में पिचकारी देने से मासिक-धर्म जारी हो जाता है और उसका दर्द भी शान्त हो जाता है।
- 100 ग्राम बबूल का गोंद कड़ाही में भूनकर चूर्ण बनाकर रख लेते हैं। इसमें से 10 ग्राम की मात्रा में गोंद, मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से मासिक धर्म की पीड़ा (दर्द) दूर हो जाती है और मासिक धर्म नियमित रूप से समय से आने लगता है।
प्रदर रोग :
- 14 से 28 मिलीलीटर बबूल की छाल का काढ़ा दिन में दो बार पीने से प्रदर रोग में लाभ होता है।
- 40 ग्राम बबूल की छाल और नीम की छाल का काढ़ा रोजाना 2-3 बार पीने से प्रदर रोग में लाभ मिलता है।
- 2-3 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण और 1 ग्राम वंशलोचन दोनों को मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से प्रदर रोग मिट जाता है।
रक्तप्रदर : 5-5 ग्राम बबूल, राल, गोंद और रसौत को लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। इसे 5 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ रोजाना सेवन करने से रक्तप्रदर मिट जाता है।
योनि का संकुचन :
- 10 ग्राम बबूल की छाल को 400 ग्राम पानी में पकायें। जब यह 100 ग्राम की मात्रा में बचे तो इसे 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम पीने से और इस काढे़ में थोड़ी-सी फिटकरी मिलाकर योनि में पिचकारी देने से योनिमार्ग शुद्ध होता है और श्वेतप्रदर ठीक हो जाता है, इसके साथ ही योनि टाईट हो जाती है।
- बबूल की 1 भाग छाल को लेकर उसे 10 भाग पानी में रातभर भिगोकर उस पानी को उबाल लेते हैं। जब पानी आधा रह जाए तो उसे छानकर बोतल में भर लेते हैं। लघुशंका (शौचक्रिया) के बाद इस पानी से योनि को धोने से प्रदर एवं योनि शौथिल्य (ढीलापन) में लाभ मिलता है।
- बबूल की फलियों के चेंप (दूध) से मोटे कपड़े को भिगोकर सुखा लें। सूख जाने फिर भिगोकर सुखायें। इस क्रिया को 7 बार तक करके सुखा लेते हैं। स्त्री-प्रसंग (संभोग) से पहले इस कपड़े के टुकड़ों को दूध या पानी में भिगोकर, दूध और पानी को पी लें तो इससे स्तम्भन (वीर्य का देर से निकलना) होता है। यदि इस कपड़े के टुकड़े को स्त्री अपनी योनि में रख ले तो भी योनि तंग हो जाती है।
- बबूल, बेर, कचनार, अनार, नीलश्री को बराबर मात्रा में लेकर पानी में उबाल लें उसी समय उसमें कपड़ा डालकर भिगो लेते हैं। फिर उसमें पानी के छींटे दें और कपड़े को योनि में रखें इससे योनि सिकुड़ जाती है।
सूतिका रोग: 10 ग्राम बबूल की आन्तरिक छाल का चूर्ण और 3 कालीमिर्च को एक साथ पीसकर, सुबह-शाम खाने से और पथ्य में सिर्फ बाजरे की रोटी और गाय का दूध पीने से भयंकर सूतिका रोग से पीड़ित स्त्रियां भी बच जाती है।
संतान : बबूल के पत्तों का 2-4 ग्राम चूर्ण रोजाना सुबह खिलाने से सुन्दर बालक का जन्म होगा।
अतिसार (दस्त) :
- बबूल के पत्तों के रस में मिश्री और शहद मिलाकर पीने से अतिसार में लाभ मिलता है।
- बबूल के 3-6 ग्राम कोमल पत्तों का चूर्ण दिन में दो बार लेने से अतिसार का रोग ठीक हो जाता है।
- बबूल के 8 से 10 पत्तों का रस रोगी को पिलाने से अतिसार का रोग मिट जाता है।
- बबूल की फलियों और कायफल के बीज का काढ़ा बनाकर पीना चाहिए। इस काढ़े को पीने के बाद आप जितनी बार भी पान खाएंगे उतने बार ही दस्त होंगे। बबूल की 8-10 मुलायम पत्तियों को थोडे़ से जीरे और अनार की कलियों के साथ 100 ग्राम पानी में पीस लें, फिर उस पानी में एक गर्म ईंट के टुकड़े को बुझाकर उस पानी को 2 चम्मच दिन में 2-3 बार रोगी को पिलाने से भयंकर अतिसार का रोग भी मिट जाता है।
- 50 ग्राम गोंद बबूल का, 100 ग्राम हरड़, 50 ग्राम पोस्ते की डोडी को पीसकर देशी घी में भूनकर रख लें, फिर इसमें 250 ग्राम मिश्री को मिलाकर 10 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम पीने से आंव का आना बंद हो जाता है। ध्यान रहें कि छाछ, दूध और चावल का सेवन करें।
- बबूल की पत्तियों के रस को छाछ में मिलाकर रोगी को पिलाने से हर प्रकार के अतिसार में लाभ मिलता है।
- बबूल के पेड़ के कोमल पत्तों को 5 ग्राम मात्रा में लेकर अच्छी तरह से पीसकर 150 ग्राम पानी में मिलाकर एक दिन में 2 से 3 बार सेवन करने से अतिसार (दस्त) में लाभ मिलता है।
- बबूल की गोंद को 3 ग्राम से लेकर 6 की मात्रा में दिन में सुबह और शाम पीने से अतिसार में लाभ होता है।
- बबूल के 2 ग्राम पत्तों को पीसकर चीनी के साथ पीने से आंव (एक प्रकार का सफेद चिकना पदार्थ जो मल के द्वारा बाहर निकलता है) का आना बंद हो जाता है। बबूल के पत्तों को पीसकर पीने से अतिसार यानी दस्त में लाभ होता है।
- बड़े बबूल के पत्तों का रस का सेवन करने से सभी प्रकार के अतिसार खत्म हो जाते हैं।
- बबूल की दो फलियां खाकर ऊपर से छाछ (मट्ठा) पीने से अतिसार में लाभ मिलता है।
आंखों का दर्द एवं सूजन :
- बबूल के नर्म पत्तों को पीसकर, रस निकालकर 1-2 बून्द आंख में टपकाने से अथवा स्त्री के दूध के साथ आंख पर बांधने से आंखों की पीड़ा और सूजन मिट जाती है।
- बबूल के पत्तों को बारीक पीसकर उसकी टिकिया बनाकर रात को सोते समय आंख पर बांधने से आंखों का दर्द और जलन के रोग में लाभ मिलता है।
- बबूल की पत्तियों को पीसकर टिकिया बनाकर रात को सोते समय आंखों पर बांध लें और सुबह खोल उठने पर खोल दें। इससे आंखों का लाल होना और आंखों का दर्द आदि रोग दूर हो जाते हैं।
आंखों से पानी बहना : बबूल के पत्ते को बारीक पीस लेते हैं। इसके बाद उसमें थोड़ा सा शहद मिला लें, फिर इसे काजल के समान आंखों पर लगाने से आंखों से पानी निकलना खत्म हो जाता है।
कंठपेशियों का पक्षाघात : बबूल की छाल के काढ़े से रोजाना दो बार गरारा करने से गले की शिथिलता समाप्त हो जाती है।
गले के रोग :
- बबूल के पत्ते और छाल एवं बड़ की छाल सभी को बराबर मात्रा में मिलाकर 1 गिलास पानी में भिगो देते हैं। इस प्रकार तैयार हिम से कुल्ले करने से गले के रोग मिट जाते हैं।
- बबूल के रस में कली का चूना मिलाकर चने के बराबर गोली बनाकर चूसने से सर्दी के कारण बैठा हुआ गला ठीक हो जाता है।
- बबूल की छाल को पानी में डालकर उबालकर इस पानी से गरारे करने से गले की सूजन दूर हो जाती है।
पेट के सभी रोगों में : बबूल की आन्तरिक छाल का काढ़ा बनाकर, उस काढ़े को 1-2 ग्राम की मात्रा में मट्ठे के साथ पीने से और पथ्य में सिर्फ मट्ठे का आहार लेने से जलोदर सहित सभी प्रकार के पेट के रोग ठीक हो जाते हैं।
पेट में पानी की अधिकता (जलोदर) : बबूल की छाल को पानी में अच्छी तरह से पकायें, फिर उसे उतारकर छान लें, फिर इस पानी को छानकर दूसरे बर्तन में डालकर दोबारा पकाकर गाढ़ा लेप बनाकर उतार लें और ठण्डा हो जाने पर उसे छाछ में मिलाकर पीने से जलोदर (पेट में पानी अधिक होना) के रोग में लाभ होता है। ध्यान रहें कि इसके सेवन के दौरान केवल छाछ (मट्ठे) का ही सेवन करें।
आमाशय का घाव : बबूल की गोंद पानी में घोलकर पीने से आमाशय (पेट) और आंतों के घाव तथा पीड़ा मिट जाती है।
पेट दर्द : बबूल की छाल का रस दही के साथ मिलाकर पीने से पेट के दर्द और दस्त में आराम मिलता है।
नहारू : बबूल के बीजों को पीसकर गाय के पेशाब के साथ मिलाकर पेट पर लेप करने से नहारू रोग में लाभ प्राप्त होता है।
हड्डी टूटने पर :
- 6 ग्राम बबूल की जड़ के चूर्ण को शहद और बकरी के दूध में मिलाकर पीने से तीन दिन में ही टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है।
- 6 ग्राम बबूल के पंचाग का चूर्ण शहद और बकरी के दूध में मिलाकर पीने से तीन दिन में ही टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है।
- बबूल के बीजों को पीसकर तीन दिन तक शहद के साथ लेने से अस्थि भंग दूर हो जाता है और हडि्डयां वज्र के समान मजबूत हो जाती हैं।
- बबूल की फलियों का चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करने से टूटी हड्डी जल्द ही जुड़ जाती है।
उपदंश (सिफलिस) :
- बबूल के फूलों को रात को ठंडे पानी में भिगो दें। सुबह इसे मसलकर छान लें और पी लें। इससे उपदंश का रोग मिट जाता है।
- बबूल की छाल के शर्बत या काढ़े से कुल्ला करने से उपदंश के कारण उत्पन्न मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
- बबूल के बारीक चूर्ण को घाव पर छिड़कने से लाभ होता है।
- बबूल के पत्तों को बारीक पीसकर उसका लेप घावों पर लगाने से लाभ मिलता है।
- बबूल और बेर की जड़ का शर्बत, फांट या काढ़ा में से किसी भी एक चीज से कुल्ला करने से उपदंश द्वारा होने वाले मुंह के छाले दूर होते हैं।
दाद के लिए : सांप की केंचुली में बबूल का गोंद मिलाकर दाद के स्थान पर पट्टी बांधने से लाभ होता है।
अम्लपित्त (एसीडिटी) : बबूल के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसमें 1 ग्राम आम का गोंद मिला देते हैं। इस काढ़े को शाम को बनाते हैं और सुबह पीते हैं। इस प्रकार से इस काढ़े को सात दिन तक लगातार पीने से अम्लपित्त का रोग मिट जाता है।
रक्त बहने पर : बबूल की फलियां, आम के बौर, मोचरस के पेड़ की छाल और लसोढ़े के बीज को एकसाथ पीस लें और इस मिश्रण को दूध के साथ मिलाकर पीने से खून का बहना बंद हो जाता है।
प्रमेह : बबूल के अंकुर को सात दिन तक सुबह-शाम 10-10 ग्राम चीनी के साथ मिलाकर खाने से प्रमेह से पीड़ित रोगियों को लाभ प्राप्त होता है।
कान के बहने पर : बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर तेज और पतली धार से कान में डालें। इसके बाद एक सलाई लेकर उसमें बारीक कपड़ा या रूई लपेटकर धीरे-धीरे कान में इधर-उधर घुमाएं और फूली हुई फिटकरी का थोड़ा-सा पानी कान में डालें। इससे कान का बहना बंद हो जाता है।
शक्तिवर्द्धक : बबूल के गोंद को घी के साथ तलकर उसमें दुगुनी चीनी मिला देते हैं इसे रोजाना 20 ग्राम की मात्रा में लेने से शक्ति में वृद्धि होती है।
कफ अतिसार : बबूल के पत्ते, जीरे और स्याह जीरे को बराबर मात्रा में पीसकर इसकी 10 ग्राम की फंकी रात के समय रोगी को देने से कफ अतिसार मिट जाता है।
रक्तातिसार (खूनी दस्त) :
- बबूल की हरी कोमल पत्तियों के एक चम्मच रस में शहद मिलाकर 2-3 बार रोगी को पिलाने से खूनी दस्त बंद हो जाते हैं।
- 10 ग्राम बबूल के गोंद को 50 ग्राम पानी में भिगोकर मसलकर छानकर पिलाने से अतिसार और रक्तातिसार मिट जाता है।
प्रवाहिका (पेचिश) : बबूल की कोमल पत्तियों के रस में थोड़ी सी हरड़ का चूर्ण मिलाकर सेवन करना चाहिए इसके ऊपर से छाछ पीना चाहिए।
प्यास : प्यास और जलन में इसकी छाल के काढ़े में मिश्री मिलाकर पिलाना चाहिए इससे लाभ होता है।
अरुचि : बबूल की कोमल फलियों के अचार में सेंधानमक मिलाकर खिलाने से भोजन में रुचि बढ़ती है तथा पाचनशक्ति बढ़ जाती है।
कान के रोग : बबूल के फूलों को सरसों के तेल में डालकर आग पर पकाने के लिए रख दें। पकने के बाद इसे आग पर से उतारकर छानकर रख लें। इस तेल की 2 बूंदे कान में डालने से कान में से मवाद का बहना ठीक हो जाता है।
कान का दर्द : रूई की एक लम्बी सी बत्ती बनाकर उसके आगे के सिरे में शहद लगा दें और उसमें लाल फिटकरी को पीसकर उसका चूर्ण लपेट दें। इस बत्ती को कान में डालकर एक दूसरे रूई के फाये से कान को बंद कर दें। ऐसा करने से कान का जख्म, कान का दर्द और कान से मवाद बहना जैसे रोग ठीक हो जाते हैं।
पीलिया :
- बबूल के फूलों को मिश्री के साथ मिलाकर बारीक पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। फिर इस चूर्ण की 10 ग्राम की फंकी रोजाना दिन में देने से ही पीलिया रोग मिट जाता है।
- बबूल के फूलों के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 10 ग्राम रोजाना खाने से पीलिया रोग मिट जाता है।
सुजाक :
- बबूल की 10-20 मुलायम पत्तियों को 1 गिलास पानी में भिगोकर आसमान के नीचे रखें और सुबह उस पानी को छानकर पीयें। इससे सुजाक रोग और पेशाब की जलन में आराम मिलता है।
- 30 ग्राम बबूल की मुलायम पत्तियों को रातभर पानी में भिगोकर सुबह मसलकर और छानकर उसमें गर्म घी मिलाकर रोगी को पिलायें, दूसरे दिन भी ऐसा ही करें, तीसरे दिन घी मिलाना छोड़ दें, और 4-5 दिन इसका हिम रोगी को पिलाने से सुजाक रोग में लाभ मिलता है।
- बबूल के 10 ग्राम गोंद को 1 गिलास पानी में डालकर उसकी पिचकारी देने से मूत्राशय की सूजन, सुजाक की जलन दूर हो जाती है।
- बबूल के 5-10 पत्तों को एक चम्मच शक्कर और चम्मच कालीमिर्च के साथ अथवा 5-6 अनार के पत्तों के साथ पीसकर छानकर पिलाने से सुजाक रोग मिट जाता है।
कमर में दर्द :
- बबूल की छाल, फली और गोंद बराबर मिलाकर पीस लें, एक चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से कमर दर्द में आराम मिलता है।
- बबूल के फूल और सज्जी बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह सूरज उगते समय 1 ग्राम की मात्रा में खाने से कमर दर्द में आराम होता है।
पसीना अधिक आना : बबूल के पत्ते और बाल हरड़ को बराबर-बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक पीस लेते हैं, इस चूर्ण की सारे शरीर पर मालिश करते हैं और कुछ समय बाद रुककर स्नान कर लेते हैं। नियमित रूप से यह प्रयोग करते रहने से कुछ समय बाद पसीने का आना बंद हो जाता है।
घाव : बबूल के पत्तों का लेप घावों को भरता है और गर्मी की सूजन को दूर करता है।
खांसी :
- बबूल का गोंद मुंह में रखकर चूसने से खांसी ठीक हो जाती है।
- बबूल की छाल को पानी के साथ काढ़ा बनाकर पीने से खांसी दूर हो जाती है।
पायरिया : बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर गरारे व कुल्ला करने से पायरिया रोग में लाभ होता है।
कनीनिका प्रदाह : बबूल के पत्तों के काढ़े को उबालकर गाढ़ा कर लें। इस गाढ़े काढ़े में शहद को मिलाकर आंखों में रोजाना 3 से 4 बार लगाने से कनीनिका प्रदाह, व्रण (घाव), या ढलका रोग (आंखों से पानी आना) पूरी तरह से दूर हो जाता है।
गुदा पाक : बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर गुदा को रोजाना 3 से 4 बार धोयें। रोजाना इससे गुदा को धोने से गुदा पाक जल्दी ठीक हो जाता है।
उर:क्षत (सीने में घाव) : 10 ग्राम बबूल की मुलायम पत्तियां, 10 ग्राम अनार की पत्ती, 10 ग्राम आंवला और 6 ग्राम धनिया लेकर रात को ठंडे पानी में भिगो देना चाहिए। इसे सुबह मसलकर और छानकर इसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर रख लेते हैं। यह पानी दिन में 3-4 बार पीने से मुंह से खून का आना बंद हो जाता है।
जीभ और मुंह का सूखापन : मुंह व जीभ का सूखापन खत्म करने के लिए बबूल की गोंद मुंह में रखकर चूसें। इससे मुंह का सूखापन पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
जीभ की सूजन और जलन : बबूल की मुलायम पत्तियों को पीसकर पानी में मिलाकर पीयें। इससे गर्मी अथवा सर्दी के कारण मुंह में छाले, जीभ सूखना तथा जीभ पर दाने हो जाने की बीमारी दूर हो जाती है।
मसूढ़ों का फोड़ा : 1 ग्राम भुनी सुपारी का चूर्ण, 1 ग्राम फिटकरी, 2 ग्राम सेलखड़ी एवं 1 ग्राम कत्था को मिलाकर बारीक पॉउडर (मंजन) बना लें। रोजाना 2 से 3 बार मंजन करने से मसूढ़ों का दर्द और फोड़े खत्म हो जाते हैं।
मसूढ़ों का रोग : मसूढ़ों की सूजन तथा गले के दर्द में बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर कुल्ला करें। इसके रोजाना प्रयोग से मसूढ़ों का रोग ठीक हो जाता है।
हिचकी का रोग :
- 500 ग्राम पानी में बबूल के कांटे को पकायें। जब 3 हिस्सा पानी जल जायें, तब इसे छानकर रोगी को पिलायें इससे हिचकी में लाभ होता है।
- बबूल के सूखे या गीले कांटों को आधा किलो पानी में डालकर उबाल लें। 250 ग्राम पानी शेष रह जाने पर उसमें शहद मिलाकर पीने से हिचकी दूर हो जाती है।
पेशाब का अधिक मात्रा में आना : बबूल की कच्ची फली को छाया में सुखाकर उसे घी में तलकर पाउडर बना लें। इस पाउडर की 3-3 ग्राम मात्रा रोजाना सेवन करने से पेशाब का ज्यादा आना बंद होता है।
बवासीर (अर्श) : बबूल के बांदा को कालीमिर्च के साथ पीस लें। इस मिश्रण को पानी के साथ रोजाना सुबह-शाम पीने से बवासीर में खून का निकलना बंद हो जाता है।
मधुमेह के रोग :
- बबूल की कोमल पत्तियों को सिलपर पानी के साथ पीस लें, साथ ही उसमें 4-5 कालीमिर्च भी डाल दें और छानकर सुबह-शाम पियें। इससे मधुमेह के रोग में लाभ होता है।
- 3 ग्राम बबूल के गोंद का चूर्ण पानी के साथ या गाय के दूध के साथ दिन में 3 बार रोजाना सेवन करने से मधुमेह रोग में लाभ पहुंचता है।
मोटापा दूर करने के लिए : बबूल के पत्तों को पानी के साथ पीसकर शरीर पर लगाने से मोटापे के रोग में लाभ होता है।
बिस्तर पर पेशाब करना : बबूल की कच्ची फलियों को छाया में सुखाकर, घी में भूनकर उसमें मिश्री मिलाकर 4-4 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम गर्म दूध के साथ पीने से बिस्तर पर पेशाब करने का रोग ठीक हो जाता है।
हाथ-पैरों में पसीना आना : बबूल के पत्ते को पीसकर उसमें हरड़ का चूर्ण मिलाकर रोजाना मालिश करने से हाथ-पैरों में पसीना आना बंद हो जायेगा। बबूल के सूखे पत्ते को हाथ-पैरों पर मलने से भी लाभ होता है।
नहरूआ (स्यानु) : बबूल के बीजों को पीसकर नहरुवा के घाव पर लेप करने से रोगी को लाभ मिलता है।
हाथ-पैरों के फटने पर : फटी एड़ी या हाथ की घाईयों में कीकर की पिसी हुई गोली देने से देने लाभ मिलता है।
कुष्ठ (कोढ़) : 30 ग्राम बबूल की छाल का हिम (शर्बत) बनाकर पीने से कोढ़ रोग समाप्त हो जाता है।
होंठों के लिए : बबूल की छाल का चूर्ण बनाकर होठों पर लगाने से होठों के छाले और उपदंश मिट जाता है।
जलने पर : बबूल की गोंद को पानी में घोलकर शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से जलन दूर हो जाती है।
लिंगोद्रेक (चोरदी) : 3 ग्राम कीकर (बबूल) की गोंद को मिश्री के साथ रोजाना सुबह-शाम सेवन करने से 3 दिनों में ही लिंगोद्रक (चोरदी) रोग दूर हो जाता है।
सिर का दर्द : पानी में बबूल का गोंद घिसकर सिर पर लगाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।
विनसेण्ट एन्जाइना के रोग में : बबूल की छाल को पीसकर पानी में मिलाकर काढ़ा बनाकर उससे गरारे करने से विनसेण्ट एन्जाइना के रोग में आराम आता है।
स्त्रोत : जे के हेल्थ
बबूल के गुणकारी नुस्खे
सूखी खाँसी: बबूल के गोंद का छोटा सा टुकड़ा मुँह में रखकर चूसने से खाँसी में आराम होता है।
ज्यादा पसीना: शरीर से बहुत पसीना आता हो तो बबूल की पत्तियाँ पीसकर शरीर पर मसलें। इसके बाद छोटी हरड़ का महीन पिसा हुआ चूर्ण भभूति की तरह पूरे शरीर पर लगाकर मसलें और फिर स्नान कर लें। थोड़े दिन यह प्रयोग करने पर पसीना आना बन्द हो जाता है।
रक्त प्रदर: बबूल का गोंद घी में तल कर फूले निकाल लें और पीस लें। इसके बराबर वजन में असली सोना गेरू पीसकर मिला कर तीन बार छान कर शीशी में भर लें। मासिक ऋतु स्राव के दिनों में सुबह शाम 1-1 बड़ा चम्मच चूर्ण ताजे पानी के साथ लेने से रक्त प्रदर यानी अधिक मात्रा में स्राव होना बन्द हो जाता है।
स्त्रोत : हिंदी वेब दुनिया
लुकमान वैद्य बबूल का वृक्ष
लुकमान वैद्य और बबुल
लुकमान के जीवन मे उल्लेख है कि एक आदमी को उसने भारत भेजा आयुर्वेद की शिक्षा के लिए और उससे कहा कि तू बबूल के वृक्ष के नीचे सोता हुआ भारत पहुच। और किसी दूसरे वृक्ष के नीचे न तो आराम करना और न ही सोना। वह आदमी जब तक भारत आया, क्षय रोग से पीड़ित हो गया था। कश्मीर पहुंचकर उसने पहले चिकित्सक को कहा कि मैं तो मरा जा रहा हूं। मैं तो सीखने आया था आयुर्वेद, अब सीखना नहीं है। सिर्फ मेरी चिकित्सा कर दें। मैं ठीक हो जाऊं तो अपने घर वापस लोटू। उस वैद्य न उससे कहा, तू किसी विशेष वृक्ष के नीचे सोता हुआ तो नहीं आया?
उस आदमी ने तपाक से कहा: हां मुझे मेरे गुरु ने आज्ञा दी थी कि तू बबूल के वृक्ष के नीचे सोता हुआ जाना।
वह वैद्य हंसा। उसने कहा, "तू कुछ मत कर। तू अब नीम के वृक्ष के नीचे सोता हुआ वापस लौट जा।"
वह नीम के वृक्ष के नीचे सोता हुआ वापस लौट गया। वह जैसा स्वास्थ चला था, वैसा स्वास्थ लुकमान के पास पहुंच गया।
लुकमान ने उससे पूछा: "तू जिन्दा लौट आया, अब आयुर्वेद में जरूर कोई राज है।"
उसने कहा—"लेकिन मैंने कोई चिकित्सा नहीं की।"
उसने कहा—इसका कोई सवाल नहीं है। क्योंकि मैंने तुझे जिस वृक्ष के नीचे सोते हुए भेजा था। तू जिन्दा लौट नहीं सकता था। तू लौटा कैसे। क्या किसी और वृक्ष ने नीचे सोत हुआ लौटा है।
उसने कहा—"मुझ आज्ञा दी कि अब बबूल से बचूं। और नीम के नीचे सोता हुआ लौट जाऊं। तो लुकमान ने कहा कि वह भी जानते है।"
असल में बबूल सक-अप करता है एनर्जी को। आपकी जो एनर्जी है, आपकी जो प्राण ऊर्जा है, उसे बबूल पीता है। बबूल के नीचे भूलकर मत सोना। और अगर बबूल की दातुन की जाती रही है तो उसका कुल कारण इतना है कि बबूल की दातुन में सर्वाधिक जीवन एनर्जी होती है। वह आपके दांतों को फायदा पहुंचा देती है। क्योंकि वह पाता रहता है। जो भी निकलेगा पास से वह उसकी एनर्जी पी लेता है। नीम आपकी एनर्जी नहीं पीता है। बल्कि अपनी एनर्जी आपको दे देता है। अपनी ऊर्जा आप पर उड़ेल देता है।
लेकिन पीपल के वृक्ष के नीचे भी मत सोना। क्योंकि पीपल का वृक्ष ज्यादा एनर्जी उड़ेल देता है कि उसकी वजह से आप बीमार पड़ जाएंगे। पीपल का वृक्ष सर्वाधिक शक्ति देने वाला वृक्ष है। इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि पीपल का वृक्ष बोधि-वृक्ष बन गया, उसके नीचे लोगों को बुद्धत्व मिला। उसका कारण है कि वह सर्वाधिक शक्ति दे पाता है। वह अपने चारों और से शक्ति आप पर लुटा देता है। लेकिन साधारण आदमी उतनी शक्ति नहीं झेल पाएगा। सिर्फ पीपल अकेला वृक्ष है, पृथ्वी पर जो रात में भी और दिन में भी पूरे समय शक्ति दे रहा है। इसलिए उसको देवता कहा जाने लगा। उसकी और कोई कारण नहीं है। सिर्फ देवता ही हो सकता है जो ले न और देता ही चला जाए। लेता नहीं, लेता ही नहीं देता ही चला जाता है।
यह जो आपके भीतर प्राण ऊर्जा है, इस प्राण-ऊर्जा को…यही आप है।
–ओशो, महावीर-वाणी, भाग—१, प्रवचन—नौवां, दिनांक 26 अगस्त, 1971, पाटकर हाल, बम्बई, Posted on दिसम्बर 21, २०१०, स्त्रोत : ओशो सत्संग
स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।
Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
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टूटी हड्डी,
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स्तन वृद्धि
Sunday, March 04, 2012
--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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कांच निकलना
काजू
कान
कानून सम्मत
काम
काम शक्ति
कामवाण पाउडर
कामशक्ति
कामशक्ति-Sexual power
कामेच्छा
कामोत्तेजना
कायाकल्प
कार्बोहाइड्रेट
कार्बोहाइड्रेट-Carbohydrates
काला जीरा
काला नमक
काली जीरी
काली तुलसी
काली मिर्च
काले निशान
कास-खांसी-Cough
किडनी
किडनी संक्रमण
किडनी स्टोन
कीड़े
कीमोथेरेपी
कुकरौंधा
कुकुंदर
कुटकी-Black Hellebore
कुबडापन
कुमेड़ा
कुल्थी
कुल्ला
कुष्ट
कुष्ठ
कृमि
केला
केसर
कैफीन-Caffeine
कैलोरी
कैलोरी चार्ट
कैलोरी-Calories
कैवांच
कैविटी
कैंसर
कॉफी
कॉफ़ी
कॉलेस्ट्रॉल
कोंडी घास
कोढ़
कोबरा
कोलेस्ट्रॉल
कोलेस्ट्रॉल-Cholesterol
कोलेस्ट्रोल
कौंच
कौमार्य
क्रियाशीलता
क्रोध
क्षय रोग-Tuberculosis
क्षारीय तत्व
क्षुधानाश
खजूर
खजूर की चटनी
खनिज
खरबूजा-Musk melon
खरेंटी
खरैंटी शिलाजीत
खाज
खांसी
खिरेंटी
खिरैटी
खीप
खीरा
खुजली
खुशी-Joy
खुश्की
खुश्बू
खोया
गंजापन-Baldness
गठिया
गठिया-Arthritis
गठिया-Gout
गड़तुम्बा
गंडा-ताबीज
गंध
गन्ने का रस
गरमा गरम
गर्भ निरोधक
गर्भधारण
गर्भपात
गर्भवती
गर्भवती कैसे हों?
गर्भावस्था
गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy
गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy
गर्भाशय
गर्भाशय भ्रंश
गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy
गर्म पानी
गर्मी
गर्मी-Heat
गलगण्ड
गाजर
गाजवां
गांठ
गाँठ-Knot
गारंटी
गारण्टेड इलाज
गाल ब्लैडर
गिलोय
गिल्टी
गुड़हल
गुंदा
गुदाद्वार
गुदाभ्रंश
गुम्मा
गुर्दे
गुलज़ाफ़री
गुस्सा
गृध्रसी
गृह-स्वामिनी
गेदुआ की छाछ
गैस
गैस्ट्रिक
गैहूं का जवारा
गोक्षुरादि चूर्ण
गोखरू
गोखरू (LAND CALTROPS)
गोंद कतीरा-Hog-Gum
गोंदी
गोभी-Cabbage
गोरख मुंडी
गोरखगांजा
गोरखबूटी
गोरखमुंडी
ग्रीन-टी
घमोरी
घरेलु नुस्खे
घाघरा
घाव
चकवड़
चक्कर
चपाती
चमत्कारिक सब्जियां
चरित्र
चर्बी
चर्म
चर्म रोग
चर्मरोग
चाय
चाय-Tea
चालीस के पार-Forty Across
चिकनगुनिया
चिकित्सकीय
चिटकन
चिंतित
चिरायता-Absinth
चिरोटा
चुंबन
चोक
चौलाई
छपाकी
छरहरी काया
छाछ
छाजन बूटी
छाले
छींक
छीकें
छुअ
छुआरा
छुहारा
छोटा गोखरू
छोटा धतूरा
छोटी हरड़
जंक फूड
जकवड़
जख्म
जंगली तिल्ली
जंगली तुलसी
जंगली पेड़
जंगली मिर्ची
जंगली-कटीली चौलाई
जटामांसी-Spikenard
जलजमनी
जलन
जलोदर रोग-Ascites Disease
जवारा
जवारे
जवासा-Alhag
जहर
जामुन का जूस
जायफल
जिगर
जीरा
जीवन रक्षक
जीवनी शक्ति
जुएं
जुकाम
जुदाई
जुलाब
जूएं
जूस
जोड़ों के दर्द
जोड़ों में दर्द
जौ
ज्यूस
ज्योति
ज्वर
ज्वर-Fiver
झाइयाँ
झांईं
झाड़-फूंक
झुर्रियाँ
झुर्रियां
झुर्री
झूठे दर्द
टमाटर का रस
टमाटर-Tomatoes
टाइफाइड
टाटबडंगा
टायफायड
टूटी हड्डी
टॉन्सिल
टोटला
ट्यूमर
ठंड
ठंडापन
ठेकेदार डॉक्टर
डकार
डकारें
डायबिटीज
डायरिया
डिग्री फ़ारेनहाइट
डिग्री सेल्सियस
डिजिसेक्सुअल
डिटॉक्सीफाई
डिटॉक्सीफिकेशन
डिनर
डिप्रेशन
डिब्बाबंद भोजन
डिलेवरी
डीकामाली
डीगामाली
डेंगू
डेंगू-Dengue
डॉ. निरंकुश
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
डॉ. मीणा
ढकार
ढीलापन
ढीली योनि
तकलीफ का सही इलाज
तंत्र-मंत्र
तम्बाकू
तरबूज-Watermelon
तलाक
ताकत
तिल
तिल्ली
तुंबा
तुंबी
तुम्बा
तुलसी
तेल
त्रिदोषनाशक
त्रिफला
त्वचा
त्वचा रोग
थकान
थाईरायड
थायरायड-Thyroid
थायरॉइड
दण्डनीय अपराध
दंत वेदना
दन्तकृमि
दन्तरोग
दमा
दर वेदना
दरार
दर्द
दर्द निवारक
दर्द निवारक दवा
दर्दनाक
दस्त
दही
दाग-धब्बे-Stains-Spots
दाढ़
दांत
दांतो में कैविटी-Teeth Cavity
दाद
दाम्पत्य
दाम्पत्य विवाद सलाहकार
दाम्पत्य-Conjugal
दाल
दालचीनी
दालें
दिमांग
दिल
दीर्घायु
दु:खी
दुर्गंध
दुर्बलता
दुष्प्रभाव
दुष्प्रभावरहित
दूध
दूध वृद्धि
दूधी
दूधी-Milk Hedge
दृष्टिदोष
दो मन
द्रोणपुष्पी
द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes
धड़कन
धनिया बीज
धनिया-Coriander
धमासा
धात
धातु
धातु पतन
धार्मिक
धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं?
धैर्यहीन
नज़ला
नपुंसक
नपुंसकता
नाइट्रिक एसिड
नाक
नाखून
नागबला
नागरमोथा
नाडी हिंगु
नाड़ी हिंगु (डिकामाली)
नामर्दी
नारकीय पीड़ा
नारियल
नाश्ता
निमोनिया
निम्न रक्तचाप
निम्बू
नियासिन
निराश
निरोगधाम
निर्गुण्डी
निर्गुन्डी
निष्कपट स्नेह
निष्ठा
निसोरा
नींद
नींबू
नींबू-Lemon
नीम-azadirachta indica
नुस्खे
नुस्खे-Tips
नेगड़
नेत्र रोग
नेुचरल
नैतिक
नॉर्मल डिलेवरी
नोनिया
नौसादर
न्युमोनिया-Pneumonia
न्यूरॉन्स
पक्षघात
पंचकर्म
पढ़ने में मन लगेगा
पंतजलि
पत्तागोभी-CABBAGE
पत्थर फोड़ी
पत्थरचट्टा
पत्नी
पथरी
पदार्थ
पनीर
पपीता
पपीता-CARICA PAPPYA
पमाड
परदेशी लांगड़ी
परम्परागत चिकित्सा
परहेज
पराठा
परामर्श
परिस्थिति
पवाड़
पवाँर
पाइल्स
पाक-कला
पाचक
पाचन
पाचनतंत्र
पाचनशक्ति
पाठक संख्या 16 लाख पार
पाठक संख्या पंद्रह लाख
पायरिया
पारदर्शिता
पारिजात
पालक
पालक-Spinach
पित्त
पित्ताशय
पित्ती
पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne
पिरामिड
पीलिया
पीलिया-Jaundice
पीलिया-कामला-Jaundice
पुआड़
पुदीना
पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava
पुरुष
पुंसत्व
पेचिश
पेट के कीड़े
पेट दर्द
पेट में गैस
पेट रोग
पेड़
पेद दर्द
पेरिकिटो सेसिल
पेशाब
पेशाब में रुकावट
पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy
पोष्टिक लड्डू
पौधे
पौरुष
पौरुष ग्रंथि
पौष्टिक रागी रोटी
प्याज-Onion
प्यास
प्रजनन
प्रतिरक्षा
प्रतिरक्षा प्रणाली
प्रतिरोधक
प्रतिरोधक-Resistance
प्रदर
प्रमेह
प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery
प्रसव
प्रसव सुरक्षा चक्र
प्रसव-पीड़ा
प्रसूति
प्राणायाम
प्रेग्नेंसी-Pregnancy
प्रेम
प्रेमरस
प्रेमिका
प्रेमी
प्रोटीन
प्रोटीन का कार्य
प्रोटीन के स्रोत
प्रोस्टेट
प्रोस्टेट कैंसर
प्रोस्टेट ग्रंथि
प्रोस्टेट ग्रन्थि
प्लीहा
प्लूरिसी-Pleurisy
प्लेटलेट्स
फंगल
फटन
फफूंद-Fungi
फरास
फल
फाइबर
फिटकरी
फुंसी-Pimples
फूलगोभी-CAULIFLOWER
फेंफड़े
फेरम फॉस
फैट
फैटी लीवर
फोटोफोबिया
फोड़ा
फोड़े-Boils
फोरप्ले
फोलिक एसिड
फ्लू
फ्लू-Flu
फ्लेक्स सीड्स
बकायन
बकुल
बड़ी हरड़
बथुआ
बथुआ पाउडर
बथुआ-White Goose Foot
बदबू
बंध्यापन
बबूल-ACACIA
बरसाती बीमारियाँ
बरसाती बीमारियां
बलगम
बलवृद्धि
बला
बलात्कार
बवासीर
बहरापन
बहुनिया
बहुमूत्रता-
बांझपन
बादाम-Almonds
बादाम.
बाल
बाल झड़ना
बाल झडऩा-Hair Falling
बिना सिजेरियन मां बनें
बिवाई
बीजबंद
बीड़ी
बीमारियों के अनुसार औषधियां
बीमारी
बील
बुखार
बूंद-बूंद पेशाब
बेल
बेली
बैक्टीरिया
बॉयोकैमी
ब्रह्मदण्डी
ब्रेस्ट ग्रोथ
ब्लड प्रेशर
ब्लैक मेलिंग
ब्लॉकेज
भगंदर
भगंदर-Fistula-in-ano
भगनासा
भगन्दर
भगोष्ठ
भड़भांड़
भय
भविष्य
भस्मक रोग
भावनात्मक
भुई आंवला-Phyllanthus Niruri
भूई आमला
भूई आंवला
भूख
भूख बढ़ाने
भूत-प्रेत
भूमि
भूमि आंवला
भोजनलीवर
मकोय
मकोय-Soleanum nigrum
मक्का
मक्का के भुट्टे
मंजीठ
मटर-PEA
मंद दृष्टि
मंदाग्नि
मदार
मधुमेह
मधुमेह-Diabetes
मन्दाग्नि-Dyspepsia
मरुआ
मरोड़
मर्द
मर्दाना
मलाशय
मलेरिया
मलेरिया (Malaria)
मवाद
मसाले
मस्तिष्क
मस्से
मस्से-WARTS
महंगा इलाज
महत्वपूर्ण लेख
महाबला
माइग्रेन
माईग्रेन
माईंड सैट
माजूफल
मानवव्यवहार
मानसिक
मानसिक लक्षण
मानसिक-Mental
मानिसक तनाव-Mental Stress
मायोपिया
मासिक
मासिक-धर्म
मासिकधर्म
मासिकस्राव
माहवारी
मिनरल
मिर्गी
मिर्च-Chili
मीठा खाने की आदत
मुख मैथुन-ओरल सेक्स-Oral Sex
मुख्य लक्षण
मुधमेह
मुलहठी
मुलेठी
मुहाँसे
मूँगफली
मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders
मूत्र
मूत्र असंयमितता
मूत्र में जलन-Burning in Urine
मूत्ररोग
मूत्राशय
मूत्रेन्द्रिय
मूर्च्छा (Unconsciousness)
मूली
मूली कर रस
मृत्यु
मृत्युदण्ड
मेथी
मेथी दाना
मेंहदी
मैथुन
मोगरा (Mogra)
मोटापा
मोटापा-Obesity
मोतियाबिंद
मौत
मौलसिरी
मौसमी बीमारियां
यकृत
यकृत प्लीहा
यकृत वृद्धि-Liver Growth
यकृत-लीवर-जिगर-Lever
यूपेटोरियम परफोलियेटम
यूरिक एसिड लेबल
योग विज्ञापन
योन
योन संतुष्टि
योनि
योनि ढीली
योनि शिथिल
योनि शूल-Vaginal Colic
योनि संकोचन
योनिद्वारा
योनिभ्रंश
योनी
योनी संकोचन
यौन
यौन आनंद
यौन उत्तेजक पिल्स (sexual stimulant pills)
यौन क्षमता
यौन दौर्बल्य
यौन शक्तिवर्धक
यौन शिक्षा
यौन समस्याएं
यौनतृप्ति
यौनशक्ति
यौनशिक्षा
यौनसुख
यौनानंद
यौनि
रक्त प्रदर (Blood Pradar)
रक्त रोहिड़ा-TECOMELLA UNDULATA
रक्तचाप
रक्तपित्त
रक्तशोधक
रक्ताल्पता
रक्ताल्पता (एनीमिया)-Anemia
रस-juices
रातरानी Night Blooming Jasmine/Cestrum nocturnum
रामबाण
रामबाण औषधियाँ-Panacea Medicines
रुक्षांश
रूढिवादी
रूसी
रूसी मोटापा
रेचक
रेठु
रोग प्रतिरोधक
रोबोट सेक्स
रोमांस
लकवा
लक्षण
लक्ष्मी
लंच
लसोड़ा
लस्सी
लहसुन
लहसुन-Garlic
लाइलाज
लाइलाज का इलाज
लाक्षणिक इलाज
लाक्षणिक जानकारी
लाभ
लिंग
लिंग प्रवेश
लिसोड़ा
लीकोरिया
लीवर
लीवर सिरोसिस
लीवर-Liver
लू-hot wind
लैंगिक
लोनिया
लौकी
लौंग की चाय
ल्युकोरिया
ल्यूकोरिया
ल्यूज योनी
वजन
वज़न
वजन कम
वजन बढाएं-Weight Increase
वन तुलसी
वन/जंगली तुलसी
वनौषधियाँ
वमन
वमन विकृति-Vomiting Distortion
वसा
वात
वात श्लैष्मिक ज्वर
वात-Rheumatism
वायरल
वायरल फीवर
वायरल बुखार-Viral Fever
वासना
विचारतंत्र
विटामिन
विधारा
वियाग्रा-Viagra
वियोग
विरह वेदना
विलायती नीम
विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध
विवाहेत्तर सम्बंध
विश्वास
विष
विष हरनी
विषखपरा
वीर्य
वीर्य वृद्धि
वीर्यपात
वृक्कों (गुर्दों) में पथरी-Renal (Kidney) Stone
वृक्ष
वैज्ञानिक
वैधानिक
वैवाहिक जीवन
वैवाहिक जीवन-Marital
वैवाहिक रिश्ते
वैश्यावृति
व्याकुल
व्यायाम
व्रण
शंखपुष्पी
शरपुंखा
शराब
शरीफा-सीताफल-Custard apple
शर्करा
शलगम-Beets
शल्यक्रिया
शहद
शहद-Honey
शारीरिक
शारीरिक रिश्ते
शिथिलता
शीघ्र पतन
शीघ्रपतन
शीस
शुक्राणु
शुक्राणु-Sperm
शुक्राणू
शुगर
शोक
शोथ
शोध
श्योनाक
श्रेष्ठतर
श्वास
श्वांस
श्वेत प्रदर
श्वेत प्रदर-Leucorrhea
श्वेतप्रदर
षड़यंत्र
संकुचन
संकोच
संक्रमण
संक्रमित
संक्रामक
संखाहुली
सगतरा
संतरा-Orange
संतान
संतुष्टि
सत्यानाशी
सदा सुहागन
सदाफूली
सदाबहार
सदाबहार चूर्ण
सनबर्न
सफ़ेद दाग
सफेद पानी
सफेद मूसली
सब्जि
सब्जी
संभालू
संभोग
समर्पण-Dedication
सरकार को सुझाव
सरफोंका
सरहटी
सर्दी
सर्दी-जुकाम
सर्पक्षी
सर्पविष
सलाद
संवाद
संवेदना
सहदेई
सहदेवी
सहानभूति
साइटिका
साइटिका-Sciatica
साइड इफेक्ट्स
साबूदाना-Sago
सायटिका
सिगरेट
सिजेरियन
सिर दर्द
सिर वेदना
सिरका
सिरदर्द
सिरोसिस
सी-सेक्शन
सीजर डिलेवरी
सुगर
सुदर्शन
सुहागा
सूखा रोग
सूजन
सेक्स
सेक्स उत्तेजक दवा
सेक्स परामर्श-Sex Counseling
सेक्स पार्टनर
सेक्स पावर
सेक्स समस्या
सेक्स हार्मोन
सेक्स-Sex
सेंधा नमक
सेब
सेमल-Bombax Ceiba
सेल्स
सोजन-सूजन
सोंठ
सोना पाठा
सोयाबीन
सोयाबीन (Soyabean)
सोयाबीन-Soyabean
सोराइसिस
सोरियासिस-Psoriasis
सौंठ
सौंदर्य
सौंदर्य-Beauty
सौन्दर्य
सौंफ
सौंफ की चाय
सौंफ-Fennel
स्किन
स्खलन
स्तन
स्तन वृद्धि
स्तनपान
स्तम्भन
स्त्री
स्त्रीत्व
स्त्रैण
स्पर्श
स्मृति-लोप
स्वप्न दोष
स्वप्नदोष
स्वप्नदोष-Night Fall
स्वभाव
स्वभावगत
स्वरभंग
स्वर्णक्षीरी
स्वस्थ
स्वास्थ्य
स्वास्थ्य परामर्श
स्वास्थ्य रक्षक सखा
हजारदानी
हड़जोड़
हड्डी
हड्डी में दर्द
हड्डी संक्रमण
हड्डीतोड़ ज्वर
हड्डीतोड़ बुखार
हरड़
हरसिंगार
हरी दूब-CREEPING CYNODAN
हरीतकी
हर्टबर्न
हस्तमैथुन
हस्तमैथुन-Masturbation
हाई बीपी
हाथ-पैर नहीं कटवायें
हारसिंगार
हालात
हिचकी
हिचकी-Hiccup
हिमोग्लोबिन-hemoglobin
हिस्टीरिया
हिस्टीरिया-Hysteria
हींग
हीनतर
हुरहुर
हुलहुल
हृदय
हृदय-Heart
हेपेटाइटिस
हेपेटाईटिस
हेल्थ टिप्स-Health-Tips
हेल्थ बुलेटिन
हैजा
हैपीनेस-Happiness
हैल्थ
होम केयर टिप्स-Home Care Tips
होम्यापैथ
होम्योपैथ
होम्योपैथिक
होम्योपैथिक इलाज
होम्योपैथिक उपचार
होम्योपैथी
होम्योपैथी-Homeopathy


