Friday, September 07, 2018

हुलहुल-वनौषधि परिचय (Cleome viscosa, Dog Mustard, Yellow Spider Flower, Tickweed हुरहुर, कुत्ता सरसों, जंगली सरसों, अर्क कान्ता)

हुलहुल-वनौषधि परिचय
(Cleome viscosa, Dog Mustard, Yellow Spider Flower, Tickweed)

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Botanical Name: Cleome Viscosa/CLEOME VISCOSA L

Family: Cleomaceae (Spider Flower Family)

पर्यायवाची (Synonyms): Polanisia Viscosa, हुरहुर, कुत्ता सरसों, जंगली सरसों, अर्क कान्ता
चेतावनी (Warning): यहां प्रस्तुत विवरण केवल जनहित में औषधियों/दवाइयों, मानव स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में जागरूकता बढाने के लिए ही लिखा गया है। पाठक स्वयं अपना इलाज करने का खतरा मोल नहीं लें। कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें। [Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your Doctor.]






आयुर्वेदिक उपयोग (Ayurvedic Uses):

खरपतवार (Weed) के रूप में खेतों, मेड़ों और खुली जगह पर या जंगली क्षेत्रों में अपने आप पैदा होने वाला यह एक जंगली पौधा/जड़ी बूटी है। जो आमतौर पर तीन प्रकार का देखा/पाया जाता है, लेकिन ग्रंथकारों ने इसे दो प्रकार का ही उल्लेख किया है। जिसे पीले फूल और सफेद फूल वाली हुलहुल के नाम से जाना/पहचाना जाता है। मेरे अनुभव में पीले फूल वाली हुलहुल में ही दो प्रजातियां होती हैं। जिनमें पत्तों के आकारों और डंठल के रंग में अंतर होता है। वर्तमान में हुलहुल जैसे उपयोगी औषधीय पौधों को संरक्षित करना अपने आप में चुनौती बनता जा रहा है, क्योंकि किसानों द्वारा खेती में खरपतवार नाशक दवाइयों के अंधाधुंध उपयोग के कारण यह महत्वपूर्ण तथा ऐसी ही अन्य अनेक उपयोगी जंगली बनौषधियां लगातार नष्ट/समाप्त होती जा रही है। छोटे से प्रयास के रूप में हमने जयपुर स्थित हमारे निरोगधाम में/के आपपास के जंगलों से शुद्ध आॅर्गेनिक हुलहुल को संरक्षित, संग्रहित करके उपयोग में लाया जा रहा हैं। यहां संक्षेप में हुरहुर की जनोपयोगी जानकारी प्रस्तुत है।


स्वभाव एवं गुण (Nature and Properties):

स्वभाव सामान्यत: गर्म। स्वाद कड़वा, तीखा और ठंडा। पित्तकारक, लेकिन कफ तथा वात नाशक। वीर्य वर्धक। पेचिश नाशक। सभी प्रकार के चर्म रोगों में अत्यंत उपयोगी।




संकलन (Collection):

सितम्बर माह के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के पहले-दूसरे सप्ताह के दौरान अर्थात बरसात के मौसम की समाप्ति के बाद जैसे ही धूप निकलना शूरू हो तो हुलहुल के पौधे को जड़ से उखाड़ कर और छाया शुष्क करके इसका पंचांग बनाया जा सकता है। इसी प्रकार से हरे पत्ते और पकने पर फलियों को सुखाकर बीज संग्रहित किये जा सकते हैं। संग्रहित औषधि तत्वों को ठीक से सुखाकर सूखे और हवाबंद डब्बों में सुरक्षित किया जा सकता है।






ऑर्गेनिक औषधि अधिक प्रभावी (Organic Herb More Effective): 


भारत सरकार की कृषि नीति किसानों के हित में नहीं होने के कारण किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। जो किसानों की दुर्दशा का मूल कारण रहा है। इस कारण किसी भी तरीके से किसान अधिकतम उपज चाहता है। अत: किसानों द्वारा उपज बढाने के लिये अस्वास्थ्यकर रासायनिक उर्वरकों/खादों एवं कीटनाशकों का अधिकाधिक प्रयोग किया जाता है। (Therefore, more and more unhealthy chemical fertilizers and pesticides are used to increase yield by farmers) जिसके कारण फसल के साथ-साथ खेतों में उगने वाली वनौषधियां (Herbal Remedies) भी अप्रभावी या विषैली/विषाक्त) (Ineffective or Toxic) हो जाती हैं। जिनका औषधीय प्रयोग (Medicinal Use) करने से वांछित उपचारात्मक परिणाम (Desired Remedial Results) नहीं मिल पाते हैं। अत: उपज कम और लागत अधिक होने के बावजूद रोगियों के इलाज हेतु जैविक/ऑर्गेनिक/कार्बनिक पद्धति से उत्पादित (Produced by Organic Method) वनौषधियों का ही उपयोग किया जाना चाहिये। लेकिन ऑर्गेनिक वनौषधियों का बाजार में मिलना मुश्किल ही नहीं, असंभव सा होता जा रहा है। इसी वजह से हमारे द्वारा कुछ महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों का छोटे स्तर पर ऑर्गेनिक पद्धति से उत्पादन और, या संग्रहण किया जाना शुरू किया गया है। इसी क्रम में ऑर्गेनिक हुलहुल भी हमारे यहां उपलब्ध है। जिसे जरूरतमंद लोगों को निजी उपयोग हेतु अल्प मात्रा में घर बैठे डाक के जरिये रजिस्टर्ड पार्सल से भी पाउडर के रूप में उपलब्ध करवाया जाता है। लेकिन व्यापारियों के लिये बड़ी मात्रा में इसकी आपूर्ति करना संभव नहीं है।


बवासीर (पाइल्स-Piles-Hemorrhoids):

इसके पत्तों को पीसकर पुल्टिस बना लें और गुदा द्वार अर्थात बवासीर पर चिपकाकर लंगोल बांध कर रखें। 4 से 7 दिन में बवासीर के बाहरी मस्से झड़कर ठीक हो जायेंगे।


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बवासीर/पाइल्स-Hemorrhoids/Piles:






आसान प्रसव (Easy Delivery):

जड़ को धागे में बांधकर गर्भिणी के हाथ, सिर, कान या कमर में बांधने से प्रसव आसानी से हो जाता है, लेकिन याद रखकर प्रसव होने के तुरंत बाद इसे प्रसूता के शरीर से इसे हटा/खोल देना चाहिये। अन्यथा अनर्थ हो सकता है।


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गिल्टी (Gland):
सफेद फूल वाली हुलहुल के पत्तों का लेप गिल्टी पर लगाने से गिल्टी/गांठ पिघल सकती/जाती है।




चर्म रोग (Skin Disease):

अस्वास्थ्यकर घावों, नासूरों, त्वचा की बीमारी, खुजली, अल्सर, कुष्ठ रोग, चमड़ी फटकर बनने वाले ब्रणों/अल्सरों पर पत्तियों को पीसकर लगाया जाता है। अनेक अनुभवी गुणीजनों का कहना है कि हुलहुल का सम्पूर्ण पौधा घाव, अल्सर, सूजन और त्वचा संक्रमण में परम्परागत इलाज के रूप प्रयोग किया जाता रहा है। बीजों, जड़ों, और पत्तियों के आसव/अर्क का उपयोग लाइलाज अल्सरों में जमा मैग्गोट नामक मुलायम लार्वा के क्लीनर/साफसफाई के रूप में उपयोग किया जाता है। घावों/फोड़ों में मवाद बनना रोकने के लिये इसकी पत्तियों को पानी में उबाल कर घावों/फोड़ों पर लगाया/धोया जाता है। यही वजह है कि अनेक क्षेत्रों के आदिवासियों द्वारा हुलहुल के पौधे को कुचल या मसल कर शरीर के किसी भी बाहरी हिस्से पर होने वाले फफोलों/छालों के उद्भेदों, संक्रमणों, चमड़ी के रोगों को नियंत्रित करने के लिये सफलतापूर्वक लगाया/प्रयोग किया जाता रहा है।


उपदंश (सिफलिस-Syphilis):

एक पुरानी बैक्टीरिया संवाहक बीमारी, जो मुख्य रूप से यौन सम्बन्धों के दौरान संक्रमण से सम्पर्क में आती है, लेकिन विकासशील भ्रूण को संक्रमण से भी संयोग से भी हो सकती है। इस तकलीफ में हुलहुल की पत्तियों को पीसकर और पानी में घोलकर पीने से आराम मिलता है।


प्रमेह-सूजाक (Gonorrhea):

प्रमेह या सूजाक में पुरुषों की लिंग/मूत्रमार्ग या स्त्रियों की योनि/मूत्रमार्ग में सूजन होने के साथ—साथ पनीले, पीले या सफेद द्रव्य का स्राव होता है। इस तकलीफ में हुरहुर का सेवन जहां प्रमेह नाशक है, वहीं वीर्य/शक्ति एवं स्वास्थ्य वर्धक भी है। अत: इसके बीजों के पाउडर या पंचांग पाउडर का सेवन किया जा सकता है।


ऐंठन (Cramp):

हाथ-पैरों में ऐंठन होने पर हुलहुल के 50 से 70 ग्राम ताजा पत्तों को पीसकर या 5 से 10 ग्राम शुद्ध पाउडर को कुछ दिनों तक पानी में मिलाकर पीने से हाथ-पैरों में ऐंठन वाला दर्द ठीक हो जाता है।



कान दर्द (Earache/Ear Pain):

पत्तियों का रस कान दर्द से छुटकारा पाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। बहरेपन/कम सुनाई देने या कान से निकलने वाले पीबयुक्त/मवाद स्राव की तकलीफ से परेशान आस्ट्रेलियन आदिवासियों द्वारा इसके रस को तेल में उबालकर कान में डाला जाता है।


पेट दर्द एवं आंतों के कीड़े (Stomach Pain And Intestinal Worms):

पेट की शिकायतों में बीज काढ़ा इस्तेमाल किया जाता है। इसके बीज आंतों के कीड़ों को मार देते हैं और वायुनाशक हैं। अफ्रीका एवं अमेरिका में हुलहुल को कृमिनाशक (पेट के कीड़े को दुर करने की दवा) के रूप में प्रयोग किया जाता है। बीज का ताजा पाउडर वयस्कोंं को 2000 से 4000 मिलीग्राम तथा अवयस्कों या बच्चों को 300 मिलीग्राम से 1300 मिलीग्राम तक सोते समय पानी के साथ पिलाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। पेट दर्द का निदान होता है और पेट की अनेक तकलीफों में आराम मिलता है। 

कब्ज (Constipation):

इसका काढा कब्ज का असरकारी इलाज है।

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पेचिश (Dysentery):

पेट में मरोड़ के साथ दर्द होना और मरोड़ के साथ पेचिश/दस्त आना जिसमें आंव एवं रक्त का मिश्रण हो, तो कुछ दिन तक हुलहुल के पत्तों का काढा पीने जल्दी आराम मिल जाता है।

पाचक एवं भूख वर्धक (Digestive and Appetite):

हुलहुल का काढा रेचक/दस्तावर होने के साथ-साथ भूख को बढ़ाने और पाचन शक्ति को मजबूत करने में भी सहायक है।

सिरदर्द (Headache):

सिरदर्द की तकलीफ से परेशान लोगों द्वारा इसके पत्तों का पुल्टिस/लेप इस्तेमाल किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी सिरदर्द के उपचार के लिए इसकी पत्तियों का उपयोग करते हैं।

दांत (Teeth):

विटामिन सी की कमी के कारण दांतों में एक बीमारी होती है, जिसमें दांतों के मसूढों में सूजन और रक्तस्राव होता है। हुलहुल की जड़ों का उपयोग स्कर्वी रोधक/मसूड़ों से रक्तस्राव एवं सूजन रोधक सिद्ध हुआ है एवं यह इन तकलीफों के उपचार में सहायक/प्रोत्साहक के रूप में उपयुक्त पाया गया है।

हृदय (Heart):

श्रीलंका सहित अनेक देशों में इलुहुल को जड़ों और बीजों को हृदय को मजबूती प्रदान करने वाले प्रोत्साहक/उत्तेजक के रूप में उपयोग किया जाता रहा है।

ठंड, बुखार एवं दस्त (Cold, Fever and Diarrhea):

हुलहुल के बीजों का उपयोग ठंड लगकर आने वाले बुखार, मलेरिया और बुखार के साथ दस्त की तकलीफ के उपचार लिए भी किया जाता है।

शिशु विकार (Infants Disorders):

शिशुओं की पसली चलने के साथ में होने वाली बेहोशी और ऐंठन में इसके बीजों का उपयोग किया जाता है।

मूत्रवर्धक (Diuretic):

हुलहुल मूत्रवर्धक है।

दमा (Asthma):

पत्तों का रस।

सार (Abstract):
संक्षेप में कहा जाये तो नवीनतम शोधों के अनुसार हुरहुर के पौधे में मलेरिया बुखार, सिर दर्द, ओटिटिस मीडिया-[otitis media-मध्यकर्णशोथ], आंखों के घावों, अल्सर, स्कर्वी, संधिशोथ, त्वचा रोग, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोग [gastrointestinal (जठरांत्र-relating to the stomach and the intestines-पेट और आंतों से संबंधित], डिस्प्सीसिया [dyspepsia-indigestion-अपच, अजीर्ण, बदहजमी], ब्रोंकाइटिस [bronchitis-श्वास नली का प्रदाह, श्वसनीशोध], जिगर की बीमारियों, गर्भाशय की शिकायतों और शिशुओं के आंतों के इलाज में उपयोगी माना जाता है।

वयस्कों के लिये दवाई की मात्रा:

  • पत्ते: 2 ग्राम-पाचन क्रिया को सुधारते है।
  • बीज: 2 ग्राम-आँतों के कीड़े नष्ट करते है।
  • पत्तों का रस: 2 ग्राम-दमा मिटता है।
  • जड़: कान में बाँधने से भूत-प्रेत का प्रकोप नहीं होता।
नोट: उक्त आलेख में दिनांक: 24.10.2018 को आंशिक संपादन किया गया।

Extra
अजगंधा (क्लीओम विस्कोसा Cleome viscosa)

यह एक वर्षीय शाकीय पौधा है। वर्षा ऋतु में यह पुष्पित व फलित होता है तथा सड़कों के किनारे फुटपाथ पर आसानी से नजर आ जाता है।


पौधे की ऊँचाई लगभग 1 मीटर तक होती है पत्तियाँ 5 पालियों में बँटी होती है और रोमिल होती है पुष्प पीले रंग के होते हैं। पुंकेसर स्पष्ट व लम्बे होते हैं। फल, फली की तरह लम्बे, सम्पुटिका युक्त होते हैं।


यह उष्ण कटिबन्धीय जलवायु का पौधा है और जंगली अवस्था में प्राकृतिक रूप में उगता है। पौधे में विशिष्ट गन्ध होती है। इसमें क्लीओमिन और विस्कोसिन एल्केलाइड पाये जाते हैं।


पत्तियाँ खाने योग्य व पौष्टिक होती हैं। इनका स्वाद कड़वा होता है, इसलिये अन्य सब्जियों के साथ मिलाकर आहार में शामिल की जा सकती हैं।



जुकाम में पत्तियों की भाप लेने से लाभ होता है। खाँसी-जुकाम में पत्तियों का काढ़ा बनाकर लिया जाता है। घाव और विषैले कीट के काटने पर पत्तियाँ पीसकर लगाई जाती हैं। बवासीर रोग में पाइल्स को इसके बीजों के काढ़े से धोने पर उनकी सूजन खत्म हो जाती है। इसकी सब्जी गर्भवती महिलाओं के लिये एक पौष्टिक आहार है।

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1 comment:

  1. महत्वपूर्ण जानकारी आपने बताये...

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