Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)

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Alternanthera Sessilis-अल्टरनेथेरा सेसिलिस

+Synonyms

Common Name: Periquito Sessil-पेरिकिटो सेसिल
English: mukunawanna, water amaranth
Hindi: gudre-saag, gudrisag-गुडरे-साग, गुडरीसाग
Marathi: kanchari, koypa, laanchari-कांचरी, कायपा, लांचरी
Sanskrit: lonika, matsyaksaka, matsyaksi, matsyaksika, minakshi, minaksi, patturah-संस्कृत: लोनिका, मत्स्यकीका, मत्स्यकी, मत्स्यकी, मिनाक्षी, मिनाक्षी, पेटुरा

Family: Amaranthaceae


परिवार: अमरन्थासी

Origin and geographic distribution:

उत्पत्ति और भौगोलिक वितरण:

Alternanthera sessilis possibly originates from tropical America but is now widespread in the tropics and subtropics of the world, including the whole of tropical Africa.


अल्टरनेथेरा सेसिलिस संभवतः उष्णकटिबंधीय अमेरिका से उत्पन्न होता है, लेकिन अब पूरे उष्णकटिबंधीय अफ्रीका सहित दुनिया के उष्णकटिबंधीय और उपप्रकार में व्यापक है।

General Information:

  • Alternanthera sessilis is an erect, ascending or creeping herbaceous plant that is usually perennial, though sometimes annual, growing up to 1 metre tall.-अल्टरनेथेरा सेसिलिस एक स्तंभन, आरोही या रेंगने वाला शाकाहारी पौधा है जो आमतौर पर बारहमासी होता है, हालांकि कभी-कभी वार्षिक, 1 मीटर तक लंबा होता है।
  • The plant is often widely branched, and has a robust taproot.-संयंत्र अक्सर व्यापक रूप से शाखाओं में बँधा होता है, और इसमें एक मजबूत टैपरोट होता है।
  • The plant is often harvested from the wild for local use as a food and medicine.-भोजन और दवा के रूप में स्थानीय उपयोग के लिए पौधे को अक्सर जंगली से काटा जाता है।
  • The leaves are often sold in local markets in Benin and Sri Lanka.-पत्तियों को अक्सर बेनिन और श्रीलंका के स्थानीय बाजारों में बेचा जाता है।
Description/विवरण:

Link: https://uses.plantnet-project.org/en/Alternanthera_sessilis_(PROTA)


Perennial, sometimes annual herb up to 1 m tall, erect, ascending or creeping, often widely branched, with robust taproot; stem striate, terete below, slightly tetragonous above, solid, sometimes floating in water and fistulose in lower part, stem and branches with narrow lines of whitish hairs and branch and leaf axils with tufts of white hairs.-बारहमासी, कभी-कभी वार्षिक जड़ी बूटी 1 मीटर तक लंबा, सीधा, आरोही या रेंगना, अक्सर व्यापक रूप से शाखाओं में बँधा हुआ, मजबूत टैपरोट के साथ; तने की पट्टी, नीचे की ओर टेरीटैग, ऊपर से थोड़ा तिर्यक, ठोस, कभी-कभी पानी में तैरता हुआ और निचले हिस्से में फिस्टुलोज, सफ़ेद बालों की संकीर्ण रेखाओं के साथ तना और शाखाएँ और सफेद बालों के गुच्छों के साथ शाखा और पत्ती की पुतलियाँ।

Leaves opposite, simple; petiole up to 5 mm long; blade linear-lanceolate, oblong to ovate or obovate, 1–15 cm × 0.2–3 cm, glabrous to sparsely pilose.-विपरीत, सरल; 5 मिमी तक का पेटीओल; ब्लेड लीनियर-लांसोलेट, ओवेट या ओबोवेट करने के लिए, 1–15 सेमी × 0.2–3 सेंटीमीटर, गोलाकार पाइलोज़ के लिए चमकदार।

Inflorescence an axillary, sessile, subglobose head 5 mm in diameter, solitary or in clusters of up to 5.-पुष्पक्रम एक अक्षीय, सीसाइल, 5 इंच व्यास का सिर, एकान्त या 5 तक के समूहों में।


Flowers bisexual, regular, 5-merous; tepals free, equal, ovate to elliptical, up to 2.5 mm long, white to pinkish, 1-veined; stamens united at base into a very short cup, 2 without anthers; ovary superior, strongly compressed, 1-celled, style very short.-फूल उभयलिंगी, नियमित, 5-म्यूर; tepals मुक्त, बराबर, अंडाकार से अण्डाकार, 2.5 मिमी तक लम्बा, सफ़ेद से गुलाबी, 1-मुड़ा हुआ; एक बहुत ही छोटे कप में आधार पर एकजुट होने वाले पुंकेसर, बिना पंख के 2; अंडाशय बेहतर, दृढ़ता से संपीड़ित, 1-कोशिका, शैली बहुत छोटी।


Fruit an obreniform, corky, indehiscent capsule c. 2 mm long, dark brown, 1-seeded.-फल एक ओब्रीनीफॉर्म, कॉर्क, इंडिसेन्ट कैप्सूल c। 2 मिमी लंबा, गहरा भूरा, 1-बीज वाला।


Seed discoid, c. 1 mm long, shiny brown.-बीज विच्छेदित, सी। 1 मिमी लंबा, चमकदार भूरा।


Alternanthera sessilis flowers and fruits throughout the year with most vigorous vegetative growth at the onset of the rainy season and the most vigorous reproductive growth at the end of it. The flowers are self-pollinated and the fruits are dispersed by wind and water.-अल्टरनेथेरा सेसिलिस फूल और फल पूरे वर्ष भर वर्षा की शुरुआत में सबसे अधिक वानस्पतिक विकास और इसके अंत में सबसे जोरदार प्रजनन वृद्धि के साथ। फूल स्व-परागित होते हैं और फल हवा और पानी से फैल जाते हैं।



Alternanthera comprises about 200 species, distributed pantropically but most abundantly in tropical America. In tropical Africa about 6 species are found.-अल्टरनेटर में लगभग 200 प्रजातियां शामिल हैं, जो उष्णकटिबंधीय अमेरिका में सबसे अधिक बहुतायत से वितरित की जाती हैं। उष्णकटिबंधीय अफ्रीका में लगभग 6 प्रजातियाँ पाई जाती हैं।


Habitat-उत्पत्तिस्थान

Waste and cultivated ground, especially in damp or wet conditions. Moist shady places at elevations up to 2,400 metres in Nepal.-अपशिष्ट और खेती की जमीन, विशेष रूप से नम या गीली परिस्थितियों में। नेपाल में 2,400 मीटर तक की ऊँचाई पर छायादार स्थान।

Ailment Treated:
उपचारित उपचार:
Link: http://medicinalplants.co.in/phakchet/


Plant is galactagogue, cholagogue, febrifuge, depurative, cooling, constipating, digestive and astringent. Young shoots are nutritious and also used for night blindness. Leaf and stem are applied in snake- bite.- पौधा गैलाक्टागोग, कोलेगॉग, फ़ेब्रिफ्यूज, डिप्यूरेटिव, कूलिंग, कब्ज़, पाचन और कसैला होता है। युवा शूट पौष्टिक होते हैं और रतौंधी के लिए भी उपयोग किया जाता है। साँप के काटने पर पत्ती और तना लगाया जाता है।

(1) Galactagogue-गैलेक्टागॉग: (an agent that promotes the secretion of milk.— called also lactagogue)  (एक एजेंट जो दूध के स्राव को बढ़ावा देता है। - जिसे लैक्टागॉग भी कहा जाता है)
(2) Cholagogue-चोलगॉग:
(3) Febrifuge-फिब्रिफ्यूज: (an agent that promotes an increased flow of bile-एक एजेंट जो पित्त के बढ़े हुए प्रवाह को बढ़ावा देता है)
(4) Depurative-डिप्यूरेटिव: Used for or capable of depurating (मलिनता हटाना, शुद्ध करना, निखारना); purifying (remove contaminants from-सफ़ाई) ; purgative (रेचक, जुलाब, पेट साफ़ करनेवाली)
(5) cooling-कूलिंग: 
(6) Constipating: (कब्ज पैदा करना-to cause constipation in; make costive-मलबध्द.) 
(7) Digestive: (a substance promoting digestion-पाचन को बढ़ावा देने वाला पदार्थ)
(8) Astringent: (कसैला) (Medicine/Medical: a substance that contracts the tissues or canals of the body, thereby diminishing discharges, as of mucus or blood. or a cosmetic that cleans the skin and constricts the pores.-एक पदार्थ जो शरीर के ऊतकों या नहरों को सिकोड़ता है, जिससे डिस्चार्ज कम हो जाता है, जैसे कि बलगम या रक्त। या एक कॉस्मेटिक जो त्वचा को साफ करता है और छिद्रों को संकुचित करता है।)
(9) Night Blindness: (रात का अंधापन)

(10) snake- bite: सर्प- दंश

Medicinal Uses:
औषधीय उपयोग:

1-The plant is said to be abortifacient (अबॉर्टिफैसेंट-गर्भ गिराने वाली-गर्भस्रावक), cholagogue* (कॉलीगॉग-कोलेजोग-कोलेगॉग-An agent that stimulates gallbladder contraction to promote bile flow.-एक एजेंट जो पित्त के प्रवाह को बढ़ावा देने के लिए पित्ताशय की थैली के संकुचन को उत्तेजित करता है।) (वह वस्‍तु जो पित्ताशय को संकुचित होने के लिए उत्तेजित करता है और इस प्रकार आँत में पित्त के बहाव को बढ़ाती है(An agent that promotes the flow of bile into the intestine, especially as a result of contraction of the gallbladder.-एक एजेंट जो आंत में पित्त के प्रवाह को बढ़ावा देता है, खासकर पित्ताशय की थैली के संकुचन के परिणामस्वरूप।), febrifuge (Febrifuge-A medicine used to reduce fever. फेब्री फ्यूज, ज्वरनाशक, ज्वर प्रशामक औषधि, तापह्रासी) and galactagogue (galactagogue गैलेक्टागोग) (A food or drug that promotes or increases the flow of a mother's milk-एक भोजन या दवा जो माँ के दूध के प्रवाह को बढ़ावा देती है या बढ़ाती है).
-(कहा जाता है कि यह पौधा गर्भनिरोधक, चोलगॉग, फिब्रिफ्यूज और गैलेक्टागॉग है।)

*Cholagogue: 

2-It is eaten by nursing mothers who wish to increase their milk flow.
(यह नर्सिंग/दूध पिलाने वाली माताओं द्वारा खाया जाता है जो अपने दूध के प्रवाह को बढ़ाने की इच्छा रखती हैं।)

3-In many places of the world, the leaves of Alternanthera sessilis are eaten as a cooked vegetable or raw as a salad.

दुनिया के कई स्थानों में, अल्टरनेथेरा सेसिलिस की पत्तियों को पका हुआ सब्जी या सलाद के रूप में कच्चा खाया जाता है।

4-In tropical Africa its use as a vegetable has been reported from Guinea (where it is used in place of rice as a staple and is said to be satiating), Benin (in sauces and soup), Nigeria (in soup), DR Congo, Tanzania and Zambia (as a relish), as well as from Madagascar and Réunion (as a potherb).

उष्णकटिबंधीय अफ्रीका में एक सब्जी के रूप में इसका उपयोग गिनी से किया गया है (जहां इसे एक प्रधान के रूप में चावल के स्थान पर उपयोग किया जाता है और इसे संतृप्त करने के लिए कहा जाता है), बेनिन (सॉस और सूप में), नाइजीरिया (सूप में), डीआर कांगो तंजानिया और ज़ाम्बिया (एक नम्र के रूप में), साथ ही मेडागास्कर और रियूनियन (एक पोर्श के रूप में) से।

5-In Sri Lanka the plant is tied in bundles and sold on markets for use in salads. It is also exported to Europe for clients of South-Indian origin.

श्रीलंका में पौधे को बंडलों में बांधा जाता है और सलाद में उपयोग के लिए बाजारों में बेचा जाता है। इसे दक्षिण-भारतीय मूल के ग्राहकों के लिए यूरोप में भी निर्यात किया जाता है।

6-In Ghana a decoction with some salt is taken to stop vomiting blood.


घाना में कुछ नमक के साथ काढ़ा खून की उल्टी को रोकने के लिए लिया जाता है।

7-In Nigeria the pounded plant is used against headache and vertigo, and leaf sap (रस) is sniffed (सूंघना) up the nose to treat neuralgia (तंत्रिका शूल).

नाइजीरिया में पाउंड्ड प्लांट का उपयोग सिरदर्द और चक्कर के खिलाफ किया जाता है, और लीफ सैप (रस) को स्नायु (तंत्रिका शूल) का इलाज करने के लिए नाक से सूंघा जाता है।

8-In Senegal and India leafy twigs, ground to a powder, are applied against snakebites.

सेनेगल और भारत के पत्तेदार टहनियों में, एक पाउडर के लिए जमीन, सर्पदंश के खिलाफ लागू किया जाता है।

9-The plant is also used in veterinary medicine in Kenya.

पौधे का उपयोग केन्या में पशु चिकित्सा में भी किया जाता है।

10-Alternanthera sessilis is used in local medicine in Taiwan, often in mixtures with other medicinal plants, to treat hepatitis, tight chest, bronchitis, asthma and other lung troubles, to stop bleeding and as a hair tonic.

अल्टरनेथेरा सेसिलिस का उपयोग ताइवान में स्थानीय चिकित्सा में किया जाता है, अक्सर अन्य औषधीय पौधों के साथ मिश्रण में, हेपेटाइटिस, तंग छाती, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा और अन्य फेफड़ों की परेशानियों के इलाज के लिए, रक्तस्राव को रोकने के लिए और एक बाल टॉनिक के रूप में।

11-In India it is used as a cholagogue, abortifacient and febrifuge (ज्वरनाशक), in Thailand and Sri Lanka as a galactagogue ((A food or drug that promotes or increases the flow of a mother's milk-एक भोजन या दवा जो माँ के दूध के प्रवाह को बढ़ावा या बढ़ाती है)).

भारत में इसका उपयोग चोलगॉग, गर्भपात और ज्वर के रूप में, थाईलैंड और श्रीलंका में एक गैलेक्टोगोग के रूप में किया जाता है।

6-Alternanthera sessilis is used for simple stomach disorders, diarrhoea, dysentery and as a plaster for diseased or wounded skin parts and against fever.

अल्टरनेथेरा सेसिलिस का उपयोग साधारण पेट की बीमारियों, दस्त, पेचिश और रोगग्रस्त या घायल त्वचा के हिस्सों के लिए और बुखार के खिलाफ प्लास्टर के रूप में किया जाता है।

7-An infusion (आसव, अर्क) (A drink, remedy, or extract prepared by soaking the leaves of a plant or herb in liquid-किसी पौधे या जड़ी बूटी के पत्तों को तरल में भिगो कर तैयार किया गया पेय, उपाय या अर्क) of the entire plant is used as a remedy against intestinal cramps (आंतों में ऐंठन), fever, diarrhoea and dysentery
(पूरे पौधे के जलसेक का उपयोग आंतों में ऐंठन, बुखार, दस्त और पेचिश के खिलाफ एक उपाय के रूप में किया जाता है।)

4-The juice (रस) of the plant is used to treat white discharge in the urine. (पौधे के रस का उपयोग मूत्र में सफेद पानी/श्वेत प्रदर के स्राव के इलाज के लिए किया जाता है।)

5-The plant is used in mixtures with other medicinal plants, to treat hepatitis, tight chest, bronchitis, asthma, and lung troubles, to stop bleeding and as a hair tonic.
(पौधे का उपयोग अन्य औषधीय पौधों के साथ मिश्रण में किया जाता है, हेपेटाइटिस, तंग छाती, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा और फेफड़ों की परेशानियों के इलाज के लिए, रक्तस्राव को रोकने के लिए और एक बाल टॉनिक के रूप में।)

6-It is also applied externally in the treatment of scabies, cuts and wounds, boils; and as a cooling agent to treat fever.
(यह खुजली, कट और घाव, फोड़े के उपचार में बाहरी रूप से भी लगाया जाता है; और बुखार के इलाज के लिए शीतलन एजेंट के रूप में।)

7-A paste of the plant is applied as a poultice on wounds, to draw out spines and other objects from the body, and is also used to treat VD (Venereal Disease-वैनेरल डिजीज-यौनरोग-Venereal means-of or relating to sexual desire or sexual intercourse-Venereal का मतलब है-या यौन इच्छा या संभोग से संबंधित).

(पौधे का एक पेस्ट घावों पर पुल्टिस के रूप में लगाया जाता है, शरीर से रीढ़ और अन्य वस्तुओं को बाहर निकालने के लिए और वीडी के इलाज के लिए भी उपयोग किया जाता है।)

-A paste is used to draw out spines or any other object from the body and it is also used to cure hernia.


एक पेस्ट का उपयोग रीढ़ या शरीर से किसी अन्य वस्तु को बाहर निकालने के लिए किया जाता है और इसका उपयोग हर्निया को ठीक करने के लिए भी किया जाता है।

8-Menstrual disorders: Mixed with corn flour (flour made from corn) and baked (सेंका हुआ), it is eaten to treat menstrual disorders.


(मकई का आटा और बेक्ड के साथ मिश्रित, यह मासिक धर्म संबंधी विकारों के इलाज के लिए खाया जाता है।)

9-The juice of the root is used in the treatment of dysuria (मूत्रकृच्छता सम्बन्धी-painful or difficult urination-दर्दनाक या कठिन पेशाब), fevers and bloody dysentery.
(जड़ के रस का उपयोग डिसुरिया, बुखार और खूनी पेचिश के उपचार में किया जाता है।)
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*What is Cholagogues 

Substances of synthetic or plant origin that increase the discharge of bile into the duodenum, stimulate its formation in the liver cells, or increase its passage through the biliary tracts.-सिंथेटिक या पौधों की उत्पत्ति के पदार्थ जो पित्त के निर्वहन को ग्रहणी में बढ़ाते हैं, यकृत कोशिकाओं में इसके गठन को उत्तेजित करते हैं, या पित्त पथ के माध्यम से इसके पारित होने को बढ़ाते हैं।


Some cholagogues perform more than one of these functions. They act directly on the process of bile production and through the neurohumoral system of metabolic regulation (in particular, carbohydrate-phosphorus metabolism). The formation of bile is intensified under the influence of gastric juice, orally administered acidic fluids, mineral waters, egg yolks, mechanical irritation of the gastric mucosa, and the entry of bile or bile acids into the intestinal tract. The most commonly used pharmacological stimulants of bile formation are preparations of bile acids (dihydrocholic acid, or Chologon, Decholin) and natural bile (allochol, cholenzym). They cause an increase in the secretion of bile salts and an increase in the total quantity of bile secreted. Some plant remedies have a cholagogic effect; including rose fruit extracts (cholosas), or infusions of everlastings. The new synthetic cholagogic agents, such as oxaphenamide and cyclovalone, have cholagogic, antiseptic, and anti-inflammatory properties. To relax the muscular clamp that overlaps the ostium of the common bile duct within the duodenal wall, magnesium sulfate, spasmolytic agents, or mineral waters such as Borzhomi, Essentuki No. 4 and No. 17, Smirnov, Slavianov, Sairme, and Arzni may be prescribed.-कुछ चोलोगोग इनमें से एक से अधिक कार्य करते हैं। वे सीधे पित्त उत्पादन की प्रक्रिया पर और चयापचय विनियमन के न्यूरोहुमोरल सिस्टम (विशेष रूप से, कार्बोहाइड्रेट-फास्फोरस चयापचय) के माध्यम से कार्य करते हैं। गैस्ट्रिक जूस के प्रभाव के तहत पित्त का गठन तेज होता है, मौखिक रूप से प्रशासित अम्लीय तरल पदार्थ, खनिज पानी, अंडे की जर्दी, गैस्ट्रिक म्यूकोसा की यांत्रिक जलन, और आंतों में पित्त या पित्त एसिड का प्रवेश होता है। पित्त गठन के सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले औषधीय उत्तेजक पित्त एसिड (डायहाइड्रोकोलिक एसिड, या कोलोन, डेकोलिन) और प्राकृतिक पित्त (एलोचोल, कोलेनिलम) की तैयारी है। वे पित्त लवण के स्राव में वृद्धि और स्रावित पित्त की कुल मात्रा में वृद्धि का कारण बनते हैं। कुछ पौधों के उपचार में एक कोलेगोगिक प्रभाव होता है; गुलाब के फल के अर्क (चोलोसस), या चिरस्थायी आसव सहित। नए सिंथेटिक कोलेजोगिक एजेंट, जैसे कि ऑक्सफेनामाइड और साइक्लोवलोन, में कोलेगोगिक, एंटीसेप्टिक और विरोधी भड़काऊ गुण हैं। ग्रहणी दीवार, मैग्नीशियम सल्फेट, स्पैस्मोलाईटिक एजेंटों, या खनिज पानी जैसे बोरझोमी, एस्सेंतुकी नंबर 4 और नंबर 17, स्मिरनोव, स्लेवियनोव, सेरेम, और आरज़नी के भीतर आम पित्त नली के ओस्टियम को ओवरलैप करने वाले पेशी क्लैंप को आराम करने के लिए। निर्धारित किया जाए।



Cholagogues are used principally in the treatment of chronic inflammatory diseases of the liver and gallbladder (cholescystitides, cholangitides, cholecystohepatitides) and in cholelithiasis. Antiseptic drugs are often prescribed simultaneously with cholagogic agents in these diseases. An elevation of pressure in the gallbladder by means of cholagogic agents is sometimes used to expel small calculi that are blocking the duct.-Cholagogues का उपयोग मुख्य रूप से जिगर और पित्ताशय की थैली (क्रॉसलिस्टीटाइड्स, कोलेजनिटाइड्स, कोलेसीसोएपेटाइटिस) और कोलेलिथियसिस की पुरानी सूजन संबंधी बीमारियों के उपचार में किया जाता है। एंटीसेप्टिक दवाओं को अक्सर इन रोगों में कोलेजेगिक एजेंटों के साथ एक साथ निर्धारित किया जाता है। पित्तवाहिनी एजेंटों के माध्यम से पित्ताशय की थैली में दबाव की एक ऊंचाई को कभी-कभी छोटे पथरी को निष्कासित करने के लिए उपयोग किया जाता है जो वाहिनी को अवरुद्ध कर रहे हैं।
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Herbal Actions: Cholagogue  


David Hoffmann L. BSc (Hons), MNIMH ©
This is an action that has the specific effect of stimulating the flow of bile from the liver. In orthodox pharmacology there is a differentiation between 'direct cholagogues' which actually increase the amount of secreted bile, and 'indirect cholagogues' which simply increase the amount of bile being released by the gall bladder. This differentiation is not very important in holistic herbal practice, especially as we are not going to use purified ox bile!-यह एक ऐसी क्रिया है जिसमें यकृत से पित्त के प्रवाह को उत्तेजित करने का विशिष्ट प्रभाव होता है। रूढ़िवादी फार्माकोलॉजी में 'प्रत्यक्ष कोलेगोग्स' के बीच एक अंतर होता है जो वास्तव में स्रावित पित्त की मात्रा को बढ़ाता है, और 'अप्रत्यक्ष कोलेगोग्स' जो पित्त मूत्राशय द्वारा जारी पित्त की मात्रा को बढ़ाता है। समग्र हर्बल अभ्यास में यह भेदभाव बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, खासकर जब हम शुद्ध बैल पित्त का उपयोग नहीं करने जा रहे हैं!

Most bitters and hepatics are also cholagogues. A whole range of plant constituents will have that action on the liver tissue, but without it being forced or damaging. The secretion of bile is of great help to the whole digestive and assimilative process, and as we are what we eat- we are what we digest. The role of bile is partially that of facilitating fat digestion but also of being a natural laxative, and thus cleansing to the system. Without exploring the vast complexities of liver function, it is worth noting that bile formation and flow are fundamental to it all. Thus, these herbs have a much deeper value than 'simply' the release of bile, they help ensure a strong and healthy liver and so enliven the whole being.-अधिकांश बिटर्स और हेपेटिक्स भी कोलेगोग्यूस हैं। संयंत्र घटकों की एक पूरी श्रृंखला में यकृत के ऊतक पर कार्रवाई होगी, लेकिन इसके बिना मजबूर या हानिकारक हो सकता है। पित्त का स्राव पूरी पाचन और आत्मसात प्रक्रिया में बहुत मदद करता है, और जैसा हम खाते हैं वैसा ही होता है- हम वही हैं जो हम पचाते हैं। पित्त की भूमिका आंशिक रूप से वसा पाचन की सुविधा के साथ-साथ एक प्राकृतिक रेचक होने की भी है, और इस प्रकार प्रणाली को साफ करती है। यकृत समारोह की विशाल जटिलताओं की खोज के बिना, यह ध्यान देने योग्य है कि पित्त का गठन और प्रवाह यह सभी के लिए मौलिक हैं। इस प्रकार, इन जड़ी-बूटियों में पित्त की रिहाई 'बस' की तुलना में अधिक गहरा मूल्य है, वे एक मजबूत और स्वस्थ जिगर सुनिश्चित करने में मदद करते हैं और इसलिए पूरे अस्तित्व को समृद्ध करते हैं।



Indications for cholagogues-चोलोगोग के संकेत


for long term maintenance of dyskinesia of the bile duct and to stimulate normal contractions to deliver bile to the small intestine.-पित्त नली के डिस्केनेसिया के दीर्घकालिक रखरखाव के लिए और छोटी आंत में पित्त पहुंचाने के लिए सामान्य संकुचन को प्रोत्साहित करने के लिए।


for disorders caused by insufficient or congested bile, such as intractable biliary constipation, jaundice and mild hepatitis.-अपर्याप्त या कंजस्टेड पित्त के कारण होने वाले विकारों के लिए, जैसे कि अट्रैक्टिव पित्तल कब्ज, पीलिया और माइल्ड हैपेटाइटिस।


for the treatment of autonomic functional disorders in the epigastric area; for symptoms of indigestion to aid in the digestion of fat-soluble substances.-एपिगैस्ट्रिक क्षेत्र में स्वायत्त कार्यात्मक विकारों के उपचार के लिए; अपच के लक्षणों के लिए वसा में घुलनशील पदार्थों के पाचन में सहायता के लिए।



for helping the liver's detoxification work.-जिगर के विषहरण कार्य में मदद करने के लिए।



for gallstones, unless they are lodged in the bile duct and causing a great deal of pain.-पित्त पथरी के लिए, जब तक वे पित्त नली में दर्ज नहीं किए जाते हैं और दर्द का एक बड़ा कारण बनते हैं।


Contra-indications of cholagogues


painful gallstones; the increased contractile activity could further constrict the bile duct leading to incredibly intense pain.-दर्दनाक पित्त पथरी; बढ़ी हुई सिकुड़ा गतिविधि पित्त नली को अविश्वसनीय रूप से तीव्र दर्द के लिए आगे रोक सकती है।


acute bilious colic.-तीव्र द्विध्रुवीय शूल।


obstructive jaundice; the same reservations apply here as with painful gallstones.-बाधक जाँडिस; दर्दनाक पित्त पथरी के समान ही आरक्षण यहां लागू होता है।



Acute cholecystitis unless gallstones have been ruled out; cholecystitis can be caused by infection, but you should determine the cause before using a cholagogue.-जब तक पित्त पथरी से इंकार नहीं किया जाता है तब तक तीव्र कोलेसिस्टिटिस; कोलेसिस्टिटिस संक्रमण के कारण हो सकता है, लेकिन आपको एक कोलेगॉग का उपयोग करने से पहले कारण निर्धारित करना चाहिए।


Acute viral hepatitis.


Extremely toxic liver disorders; a cholagogue may be too stressful for a liver that is damaged to this extent; but this must be weighed against the potential benefit to be derived from the liver-protecting properties of the particular herb.-अत्यधिक विषाक्त यकृत विकार; एक जिगर के लिए एक कोलेगोग बहुत अधिक तनावपूर्ण हो सकता है जो इस हद तक क्षतिग्रस्त हो जाता है; लेकिन यह विशेष जड़ी बूटी के जिगर की रक्षा गुणों से प्राप्त होने वाले संभावित लाभ के खिलाफ तौला जाना चाहिए।


Herbal Cholagogues 


Artichoke

Balmony
Barberry
Black Root
Blue Flag
Boldo
Boneset 
Butternut
Dandelion root
Fringetree bark 
Fumitory
Gentian
Golden Seal
Greater Celandine
Mountain Grape
Rosemary
Sage
Wahoo 
Wild Indigo
Wild Yam
Yellow Dock
हाथी चक
Balmony
दारुहल्दी
काली जड़
नीला झंडा
Boldo
boneset
Butternut
सिंहपर्णी की जड़ें
फ्रिंजेट्री की छाल
पित्तपापड़ा
किरात
गोल्डन सील
ग्रेटर कैलैंडिन
माउंटेन अंगूर
रोजमैरी
साधू
वाहू
जंगली इंडिगो
जंगली रतालू

पीला बंदरगाह


Carminatives that are also Alterative : Blue Flag, Fringetree bark, Golden Seal, Mountain Grape, Wild Indigo, Yellow Dock

Carminatives that are also Anti-Catarrhal : Boneset, Golden Seal, Wild Indigo

Carminatives that are also Anti-Inflammatory : Barberry, Blue Flag, Fumitory, Golden Seal, Rosemary, Wild Yam


Carminatives that are also Anti-Microbial : Barberry, Golden Seal, Greater Celandine, Mountain Grape, Rosemary, Sage, Wild Indigo


Carminatives that are also Anti-Spasmodic : Black Root, Rosemary, Sage, Wild Yam


Carminatives that are also Astringent : Rosemary, Sage


Carminatives that are also Bitter : Artichoke, Balmony, Barberry, Boldo, Boneset, Butternut, Dandelion root, Fumitory, Gentian, Golden Seal, Mountain Grape, Wahoo, Wild Indigo


Carminatives that are also Demulcent :


Carminatives that are also Diaphoretic : Barberry, Boneset, Rosemary, Wild Yam


Carminatives that are also Diuretic : Blue Flag, Boldo, Boneset, Fringetree bark, Fumitory, Wahoo


Carminatives that are also Emmenagogue : Artichoke, Balmony, Barberry, Boldo, Boneset, Butternut, Dandelion root, Fumitory, Gentian, Golden Seal, Mountain Grape, Rosemary, Wahoo, Wild Indigo


Carminatives that are also Laxative : all cholagogues are to some degree, especially : Butternut, Dandelion root, Yellow Dock


Carminatives that are also Nervine : Rosemary


Carminatives that are also Tonic : Balmony, Blue Flag, Boldo, Boneset, Dandelion root, Fringetree bark, Gentian, Golden Seal, Yellow Dock



Carminatives that are also Vulnerary : Golden Seal
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Properties:

गुण:

The fresh leaves of Alternanthera sessilis contain per 100 g: water 80 g, energy 251 kJ (60 kcal), protein 4.7 g, fat 0.8 g, carbohydrate 11.8 g, fibre 2.1 g, Ca 146 mg, P 45 mg (Leung, W.-T.W., Busson, F. & Jardin, C., 1968).-अल्टरनेथेरा सेसिलिस की ताजी पत्तियों में प्रति 100 ग्राम: पानी 80 ग्राम, ऊर्जा 251 केजे (60 किलो कैलोरी), प्रोटीन 4.7 ग्राम, वसा 0.8 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 11.8 ग्राम, फाइबर 2.1 ग्राम, सीए 146 मिलीग्राम, पी 45 मिलीग्राम (लेउंग, डब्ल्यू) होते हैं। ।-TW, Busson, F. & Jardin, C., 1968)।


In Alternanthera sessilis the following compounds have been demonstrated to be present: the triterpenes α-spinasterol, β-spinasterol, stigmasterol, β-sitosterol, oleanotic acid and its derivatives and saturated (aliphatic) esters. The leaves contain dietary fibre (about 12 g per 100 g dry matter) and incorporation of about 75 g of this vegetable fibre in the daily diet of diabetics significantly reduced the postprandial (भोजोनोपरांत) blood glucose level.-अल्टरनेथेरा सेसिलिस में निम्नलिखित यौगिकों को उपस्थित होने के लिए प्रदर्शित किया गया है: ट्राइटरपेनस α-spinasterol, aster-spinasterol, stigmasterol, β-sitosterol, oleanotic acid और इसके डेरिवेटिव और संतृप्त (aliphatic) एस्टर। पत्तियों में आहार फाइबर (लगभग 12 ग्राम प्रति 100 ग्राम शुष्क पदार्थ) होता है और मधुमेह रोगियों के दैनिक आहार में लगभग 75 ग्राम इस वनस्पति फाइबर को शामिल करने से पोस्टपेंडियल (भोजोनोपरांत) रक्त शर्करा के स्तर में काफी कमी आई है।


In tests in India, leaf pastes of Alternanthera sessilis exhibited inhibition of mutagenicity in Salmonella typhimurium [A bacterium that causes food poisoning or a form of salmonella (a bacterium that occurs mainly in the intestine, especially a serotype causing food poisoning) that causes food poisoning in humans] strains. They inhibited the formation of the potent environmental carcinogen (a substance capable of causing cancer in living tissue) nitrosodiethanolamine* from its precursors such as triethanolamine (a soluble hygroscopic basic amino alcohol C6H15NO3 that is used as a reducing agent, a corrosion inhibitor in aqueous solution, and in making fatty acid soaps). The aqueous (जलयुक्त) alcohol extract of the entire plant exhibits hypothermic (In Pathology . subnormal body temperature. In Medicine/Medical . the artificial reduction of body temperature to slow metabolic processes, as for facilitating heart surgery.) and histaminergic (of autonomic nerve fibers) activities and relaxes smooth muscles. An ether extract of Alternanthera sessilis yielded an active principle having anti-ulcerative properties.-भारत में परीक्षणों में, अल्टरनेथेरा सेसिलिस के पत्तों के पेस्ट ने साल्मोनेला टायफिम्यूरियम [एक जीवाणु में उत्परिवर्तन के निषेध को प्रदर्शित किया है, जो खाद्य विषाक्तता या साल्मोनेला का एक रूप (एक जीवाणु जो मुख्य रूप से आंत में होता है, विशेष रूप से एक भोजन को विषाक्तता का कारण बनता है) भोजन विषाक्तता का कारण बनता है। मनुष्यों में] उपभेद। उन्होंने प्रबलित पर्यावरण कैसरजन (जीवित ऊतक में कैंसर पैदा करने में सक्षम पदार्थ) नाइट्रोडोडाइथनॉलमाइन * को इसके अग्रदूतों जैसे ट्राईथेनॉलमाइन (एक घुलनशील हीड्रोस्कोपिक बुनियादी अमीनो अल्कोहल C615NO3), जो एक कम करने वाले एजेंट, एक जलीय घोल में संक्षारण अवरोधक के रूप में उपयोग किया जाता है, के निर्माण को रोक दिया। , और फैटी एसिड साबुन बनाने में)। पूरे पौधे का जलीय (जलयुक्त) अल्कोहल अर्क हाइपोथर्मिक (पैथोलॉजी में। शरीर के तापमान को कम करता है। मेडिसिन / मेडिकल में। हृदय की सर्जरी की सुविधा के लिए चयापचय प्रक्रियाओं को धीमा करने के लिए शरीर के तापमान की कृत्रिम कमी।) और हिस्टामिनर्जिक (स्वायत्त तंत्रिका का) फाइबर) गतिविधियों और चिकनी मांसपेशियों को आराम। अल्टरनेथेरा सेसिलिस के ईथर निकालने से अल्सर-विरोधी गुण होने वाले एक सक्रिय सिद्धांत की प्राप्ति हुई।


*Nitrosodiethanolamine: A pale yellow, oily liquid nitrosamine with a characteristic odor that is light sensitive and emits toxic fumes of nitrogen oxides when heated to decomposition. N-Nitrosodi-n-butylamine is primarily used in laboratory research to induce tumors in experimental animals, but is also used as an intermediate in the synthesis of di-n-butylhydrazine. This substance is detected in various foods, including smoked meats, cheese and soybean oil, as a result of nitrosation of amines that are present in these products and is detected as a contaminant in rubber products. Exposure to N-Nitrosodi-n-butylamine irritates the skin and eyes and may damage the liver and kidneys. This substance is mutagenic in animals and is reasonably anticipated to be a human carcinogen. (NCI Thesaurus)-* नाइट्रोसोडायथेनामाइन: एक पीले पीले, तैलीय तरल नाइट्रोसमाइन की विशेषता गंध के साथ होती है जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती है और अपघटन होने पर नाइट्रोजन ऑक्साइड के जहरीले धुएं का उत्सर्जन करती है। N-Nitrosodi-n-butylamine मुख्य रूप से प्रयोगशाला अनुसंधान में प्रायोगिक जानवरों में ट्यूमर को प्रेरित करने के लिए उपयोग किया जाता है, लेकिन यह भी di-n-butylhydrazine के संश्लेषण में एक मध्यवर्ती के रूप में उपयोग किया जाता है। यह पदार्थ विभिन्न खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, जिसमें स्मोक्ड मीट, पनीर और सोयाबीन तेल शामिल हैं, इन उत्पादों में मौजूद अमाइन के नाइट्रोसेशन के परिणामस्वरूप और रबर उत्पादों में एक दूषित तत्व के रूप में पाया जाता है। N-Nitrosodi-n-butylamine के संपर्क में आने से त्वचा और आंखों में जलन होती है और यह लीवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है। यह पदार्थ जानवरों में उत्परिवर्तजन है और एक मानव कार्सिनोजन होने के लिए उचित रूप से अनुमानित है। (NCI थिसॉरस)

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सगतरा, शीस, खीप Crotalaria Bburhia

Crotalaria Bburhia Buch.-Ham. (C. burhia) (Fabaceae), is an undershurb found distributed in arid parts of the world. It extensively grows in Pakistan, India and Afghanistan. It is a highly medicinal plant. The leaves, branches and roots can be used as a cooling medicine. Plant juice is useful for treatments of gout, eczema, hydrophobia (an abnormal fear of water or Rabies पागल कुत्ते या गीदड़ के काटने से होने वाली बीमारी।), pain and swellings, wounds and cuts, infection, kidney pain, abdominal problems, rheumatism and joint pain in traditional medicine system. The medicinal activity is the result of the presence of various important phytochemicals (any of various biologically active compounds found in plants) like alkaloids (एल्कलॉएड्स=एल्कलॉएड प्राकृतिक रूप से उपलब्ध रासायनिक यौगिक होते हैं, जिनमें प्रायः क्षारीय नाइट्रोजन परमाणु होते हैं।), flavonoids (फ्लावोनोइड्स=Flavonoids (फ्लावोनोइड्स) औषधीय नमक सूजन, थ्रोम्बोजेनेसिस, जारणकारी तनाव, कोरोनरी हृद की बीमारी, अर्बुद, अस्थि सुषिरता और अन्य स्थितियों के उपचार के लिए निर्देशित किया जाता है।), phenols (फ़िनोल वस्तुत: कार्बनिक यौगिकों की एक श्रेणी का नाम है जिसका प्रथम सदस्य 'फिनोल' या कार्बोलिक अम्ल है। बेंजीन केंद्रक का एक या एक से अधिक हाइड्रोजन जब हाइड्रॉक्सिल समूह से विस्थापित होता है, तब उससे जो उत्पाद प्राप्त होते हैं उसे फिनोल कहते हैं। ), polyphenols (पोलीफेनॉल्स औषधीय नमक हृदयवाही संबंधी रोग, कैंसर और अन्य स्थितियों के उपचार के लिए निर्देशित किया जाता है।), tannins, steroids, triterpenoids (Triterpenes are a class of chemical compounds composed of three terpene units with the molecular formula C30H48; they may also be thought of as consisting of six isoprene units. Animals, plants and fungi all produce triterpenes, including squalene, the precursor to all steroids), anthraquinones (Anthraquinones (also known as anthraquinonoids) are a class of naturally occurring phenolic compounds based on the 9,10-anthraquinone skeleton), crotalarine (), monocrotaline, croburhine, crosemperine, quercetins and β-sitosterol. Crotalaria burhia is also known to possess antimicrobial, anti-inflammatory and antinociceptive activities, which supports its traditional uses. In this article, a comprehensive account of phytochemical constituents and pharmacological activities is presented along with traditional uses of Crotalaria burhia Buch.-Ham. ---क्रोटलारिया बुरिया बुच।-हाम। (सी। बुर्हिया) (फेबासी), दुनिया के शुष्क भागों में वितरित एक अंडरशर्ट है। यह पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर बढ़ता है। यह एक अत्यधिक औषधीय पौधा है। पत्तियों, शाखाओं और जड़ों को एक शीतलन दवा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। पौधे का रस गाउट, एक्जिमा, हाइड्रोफोबिया, दर्द और सूजन, घाव और कटौती, संक्रमण, गुर्दे में दर्द, पेट की समस्याओं, गठिया और पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली में जोड़ों के दर्द के उपचार के लिए उपयोगी है। औषधीय गतिविधि विभिन्न महत्वपूर्ण फाइटोकेमिकल्स (पौधों में पाए जाने वाले किसी भी जैविक रूप से सक्रिय यौगिकों में से एक) की उपस्थिति का परिणाम है, जैसे अल्कलॉइड, फ्लेवोनोइड, फिनोल, पॉलीफेनोल्स, टैनिन, स्टेरॉयड, ट्राइटरपीनॉइड्स, एंथ्राक्विनोन, क्रोटालैरिन, मोनोक्रोटोलाइन, क्रोबोरिन और कैथरीन। और and-साइटोस्टेरॉल। Crotalaria burhia को रोगाणुरोधी, विरोधी भड़काऊ और एंटीकोसिसेप्टिक गतिविधियों के अधिकारी के रूप में भी जाना जाता है, जो इसके पारंपरिक उपयोगों का समर्थन करता है। इस लेख में, क्रोटेलरिया बुरिया बुच के पारंपरिक उपयोगों के साथ-साथ फाइटोकेमिकल घटकों और औषधीय गतिविधियों का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत किया गया है।-हैम
वाराही कंद, बाराही कन्द, रतालु

https://easyayurveda.com/2015/12/17/dioscorea-bulbifera-air-potato-uses-research/

Dioscorea bulbifera L. (Air-potato)

https://botany.biology.ufl.edu/2013/11/18/dioscorea-bulbifera-l-air-potato/

बाराही कन्द, रतालु

http://allpaedia.com/%E2%80%8C%E2%80%8C%E2%80%8C%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9/%E2%80%8C%E2%80%8C%E2%80%8C%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6-%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3/11246-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%2C-%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%81%2C-dioscorea-bulbifera.html


प्रोस्टेट ग्रंथि बढने का कारण, बचाव और बिना आॅपरेशन उपचार
Prostate Gland Enlargement Causes, Prevention and Treatment Without Operation


लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
WhatsApp No. 8561955619 (10AM to 10PM)

इन दिनों सामान्यत: देखने में आता है कि 50 की आयु पार कर चुके पुरुषों की प्रोस्टेट ग्रंथि अर्थात पौरुष ग्रंथि का बढ़ जाना एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। वर्तमान में 40 की आयु पार पुरुषों में भी यह समस्या देखी जा रही है।

प्रोस्टेट ग्रंथि क्या है?
What is the Prostate Gland?
असल में प्रोस्टेट ग्लेंड मेल रिप्रोडक्टिव ग्लैंड (Male Reproductive Gland-नर/पुरुष प्रजनन ग्रंथि) है, जिसका मुख्य काम शुक्राणु निर्माण और शुक्राणु वहन करना है। इसी ग्रंथि से सेक्‍सुअल क्‍लाइमेक्‍स अर्थात यौनानंद के दौरान वीर्य आगे जाता है और चर्मोत्कर्ष के समय वीर्य स्खलन होता है। इस ग्रंथि को पुरुषों का दूसरा दिल भी कहा जाता है। इस ग्रंथि का दैनिक मुख्य कार्य मूत्र बहाव को नियंत्रित करना भी होता है।




प्रोस्टेट ग्रंथि बढने के लक्षण:
Prostate Gland Enlargement Symptoms:
1. बार-बार पेशाब जाना पड़ता है।
2. पेशाब करते समय दर्द होना।
3. रात्रि को 2 या 3 बार पेशाब जाना।
4. मूत्रत्याग के समय जलन का अहसास होना।
5. मूत्रत्याग के समय सनसनाहट होना।
इत्यादि।

नोट: विशेषज्ञ डॉक्टर्स का कहना है कि 50 वर्ष पार करने के बाद अगर पेशाब करने में किसी भी तरह की तकलीफ हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिये।

प्रोस्टेट ग्रंथि बढने के कारण:
Prostate Gland Enlargement Reasons:
01. कम पानी पीने की आदत।
02. आनुवांशिकता।
03. अधिक शराब पीना।
04. आनुवांशिकता होने पर थोड़ी शराब या कम पानी पीना।
05. हार्मोंस बदलाव।
06. कैफीनयुक्त पदार्थों का सेवन करना। जिनमें चाय, कॉफी, सोफ्ट ड्रिंक, चॉकलेट, आइसक्रीम आदि प्रमुख हैं।
07. बढती आयु।
08. शारीरिक कार्य/व्यायाम नहीं करना।
09. रेडमीट का सेवन करना।
10. विटामिन सी की कमी।
11. भोजन में हरी सब्जियों एवं फलों को शामिल नहीं करना।
12. संक्रमण।
13. सक्षम होते हुए भी कम संभोग करना।
इत्यादि।

प्रोस्टेट ग्रंथि बढने के बचाव:
Prostate Gland Enlargement Prevention:
बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लेसिया (बीपीएच) Benign Prostatic Hyperplasia (BPH) अर्थात प्रोस्टेट ग्रंथि का अत्यधिक बढ जाने से बचाव के लिए:-
1. वसायुक्त खाद्य पदार्थों से परहेज करें और शराब पीने से बचें।
2. स्वास्थ्य शोधकर्ताओं के अनुसार, संतुलित आहार प्रोस्टेट को स्वस्‍थ बनाये रखने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. सब्‍िजयां जिन में आइसोथियोसाइनेट अधिक मात्रा में होता जैसे ब्रोकली, फूलगोभी व मछली प्रोस्टेट के खतरे को कम करने में सहायक होती है।
4. सोया उत्पाद भी प्रोस्टेट को बढ़ने से रोकने में मदद करते हैं।
5. विटामिन ई भी प्रोस्टेट सूजन को कम करने में मदद करता है।
6. फेंटा हुआ मक्खन, वनस्पति तेल, गेहूं के बीज और साबुत अनाज भी प्रोस्टेट को रोकने और उसको न बढ़ने देने में काफी मददगार सिद्ध होते हैं।
7. प्रोस्टेट के रोगियों को अधिक मात्रा मे तरल पदार्थ का सेवन करना चाहिये।
8. एक और महत्वपूर्ण बात अगर आपकी अंडरवियर काफी तंग रहेगी तो आपकी जननेन्द्रिय दबी रहेगी और साथ में गरम भी हो जाएगी। अत: ढीली अंडरवियर पहनें और जननेन्द्रिय को ओवरहीटिंग से बचाएं।

नोट: प्रोस्टेट ग्रंथि के बढने के कारणों के निवारण पर ध्यान दिया जाये तो प्रोस्टेट ग्रंथि को बढने से रोका जा सकता है। इसके अलावा नियमित जांच करवाते रहें और डॉक्टर की सलाह का पालन करें, लेकिन ऐलोपैथिक चिकित्सकों द्वारा लिखी गयी मूत्रल/मूत्रवर्धक दवाईयों (Diuretic Medicines) का अत्यावश्यक होने पर ही सेवन करें। अन्यथा उनके घातक दुष्प्रभाव (Side Effects) सहने होंगे।


प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने के दुष्परिणाम:
Adverse Side Effects of the Prostate Gland Enlargement:
प्रोस्टेट ग्रंथि बढने के पुरुषों में सामान्‍य तौर पर दो प्रकार की तकलीफें होती देखी जाती हैं।
1. बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लेसिया (बीपीएच) Benign Prostatic Hyperplasia (BPH) अर्थात प्रोस्टेट ग्रंथि का अत्यधिक बढ जाना: इसमें प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार सामान्‍य से बड़ा हो जाता है, जिस कारण मूत्रमार्ग छोटा/संकरा हो जाता है। जिसकी वजह से पेशाब करने में परेशानी और दर्द हो सकता है। इसमें पेशाब करने में दिक्कत होती है। पेशाब करने के फौरन बाद फिर से पेशाब करने की इच्छा होती है। पेशाब करने पर जलन होती है। कई बार पेशाब के साथ रक्त भी निकलता है। अचानक पेशाब बंद होने पर पेट के नीचे दर्द होने लगता है। मूत्र थैली में पेशाब जमने से यूरिन इन्फेक्शन भी हो सकता है। मूत्र थैली में स्टोन होने की संभावना हो सकती है। हाइड्रोनेफ्रोसिस (मूत्र पथ में मूत्र प्रवाह में बाधा के कारण गुर्दे की सूजन) नामक समस्या भी हो सकती है। किडनी का कार्य भी बाधित हो सकता है। पीड़ित पुरुषों को ऑपरेशन का डर सताने लगता है। जिसके कारण उनकी यौन इच्छा/क्षमता समाप्त होती देखी जा सकती हैं। पर याद रखने की जरूरत है कि यह रोग केवल दवाईयों द्वारा भी नियंत्रित किया जा सकता है। अत: डरना कोई समाधान नहीं, बल्कि अनेक दूसरी समस्याओं को निमंत्रित करना है। डॉक्टर के निर्देश के अनुसार दवा लेने से इस रोग का इलाज संभव है। पर रोगियों पर दवा असर नहीं करती है, केवल उन्हें ही सर्जरी करवानी पड़ती है।
2. प्रोस्‍टेट कैंसर (Prostate Cancer): दूसरा प्रोस्‍टेट ग्रंथि कैंसरग्रस्‍त हो सकती है और अगर सही समय पर इसका इलाज न किया जाए, तो यह आसपास के अंगों को भी अपनी चपेट में ले लेती है। यह जीवन के लिये भी खतरा पैदा कर सकती है।

प्रोस्टेट ग्रंथि का प्राकृतिक उपचार:
Prostate Gland Natural Treatment:
शोधकर्ताओं का मानना है कि प्रोस्टेट ग्रंथि बढने का प्राकृतिक इलाज आसान नहीं होता, लेकिन फिर भी इसे प्राकृतिक तरीके से ठीक करने का एकमात्र उपाय जीवनसाथी के साथ नियमित, लेकिन संयमित संभोग करते रहना है। जिससे पौरुष ग्रंथि मजबूत होती है और प्रोस्टेट का खतरा कम होता है। यद्यपि बढती उम्र के पुरुषों या कम उम्र में ही किन्हीं कारणों से यौन अक्षम हो चुके पुरुषों के लिये यह उपाय कारगर नहीं है।

प्रोस्टेट ग्रंथि का घरेलु उपचार:
Prostate Gland Home Remedies:
1. प्रत्येक 3 घंटों में मूत्रत्याग करने का प्रयास करें।
2. एक बार में मूत्रत्याग ठीक से नहीं होने पर दो बार मूत्रत्याग, सहायक हो सकता है-मूत्रत्याग पश्चात थोड़ी देर प्रतीक्षा करें और फिर से मूत्रत्याग का प्रयास करें।
3. शरीर गर्म रहना चाहिये, जिसके लिये व्यायाम सहायक होता है।
4. सायंकाल पेय पदार्थ सीमित लें। अपने रात्रि भोजन के बाद तरल पदार्थ न लें।
5. सक्रिय रहें, क्योंकि ठंडा मौसम और निष्क्रियता मूत्र के अटकने के खतरे को बढ़ाते हैं।
6. सोयाबीन: किसी भी रूप में सोयाबीन का सेवन करने से टेटोस्टरोन हार्मोन के स्तर में कमी आती है। (टेस्टोस्टेरोन मुख्य पुरुष यौन हार्मोन है जो प्रजनन क्षमता, मांसपेशी द्रव्यमान, वसा वितरण और लाल रक्त कोशिका उत्पादन को नियंत्रित करता है।)
7. टमाटर, नींबू आदि का खूब इस्तेमाल करें: टमाटर, नींबू आदि में विटामिन सी की प्रचुरता होती है। प्रोस्टेट डिसऑर्डर अर्थात प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि के दौरान विटामिन सी की पर्याप्त मात्रा लेनी चाहिए। इसलिए इस दौरान विटामिन सी की प्रचुरता वाले खाद्य पादार्थों का सेवन करना चाहिए।

प्रोस्टेट ग्रंथि का आयुर्वेदिक उपचार:
Prostate Gland Ayurvedic treatment:
1. अलसी के बीज: अलसी के बीज को मिक्सी में पीसकर पाउडर बनायें। फिर प्रतिदिन इसे 10 से 20 ग्राम पानी के साथ सेवन करें। याद रहे एक बार में पांच दिन से अधिक की अलसी नहीं पीसें और अलसी की तासीर गर्म होती है, इसीलिए गर्मियों में इसके सेवन के साथ पानी की मात्रा बढ़ा दे। मेरे द्वारा अपने पेशेंट्स को जड़ी-बूटियों के अर्कों से परिष्कृत आॅर्गेनिक अलसी बीज (Organic Flax Seeds Sophisticated in Herbs Extracts) उपलब्ध करवाये जाते हैं। जिससे प्रोस्टेट ग्रंथि सहित अनेक शारीरिक तकलीफों के समाधान में आश्चर्यजनक परिणाम मिल रहे हैं।
2. भुना सुहागा: 6 ग्राम विधिवत भुने हुए सुहागे को गुड़ में मिलाकर इसकी 3 गोलियां बनाकर 1-1 गोली 3 दिन सुबह हल्के गर्म घी के साथ सेवन करने से अंडकोष की वृद्धि रुक जाती है। यह अनुभवसिद्ध है। लेकिन याद रहे कि इसका सेवन करते समय दही, केला चावल तथा ठंडे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
3. गोखरू: मूत्र सम्बंधित रोगो में आॅर्गेनिक कांटा गोखरू बहुत लाभकारी हैं, इसको 5 ग्राम की मात्रा में अर्थात एक छोटा चम्मच गुनगुने पानी के साथ लेना चाहिये। मगर ध्यान रहे कि गोखरू का सेवन करने के एक घंटे पहले और एक घंटे बाद कुछ ना खायें। मैंने रोगी के लक्षणों के अनुसार अन्य औषधियों के साथ और सिंगल अनेक पेशेंट को दिया है और अच्छे परिणाम रहे हैं।
4. जिंक: प्रोस्टेट ग्लेंड के उपचार में ज़िंक अहम भूमिका निभाता है| कद्दू में ज़िंक भरपूर मात्रा में पाया जाता है। कद्दू के बीजो की गिरी को तवे पर हल्का सुनहरा होने तक भून लें। इसके बाद भुनी हुई गिरियों को मिक्सी में डालकर बारीक पाउडर तैयार कर लें। 15 से 20 ग्राम पाउडर पानी के साथ रोजाना सेवन करने से प्रोस्टेट ग्लेंड सिकुड़ने लगेगा और मूत्रमार्ग में होने वाला अवरोध दूर हो जायेगा।
5. कुलथी-पालक: कुलथी और पालक को बराबर मात्रा में लेकर पानी में अच्छी तरह उबालकर काढ़ा तैयार कर लें। रोजाना सुबह-शाम इस काढ़े के सेवन से प्रोस्टेट ग्लेंड की तकलीफ धीरे-धीरे अपने आप ठीक हो जायेगी।
6. नींबू-नारियल-धनिया पानी: प्रोस्टेट ग्लेंड के अधिक बढ़ जाने पर सादे पानी के स्थान पर नींबू पानी, नारियल पानी और धनिये के पानी का सेवन करें।
7. अंजीर: रोजाना शाम को पानी में दो अंजीर भिगों दें, उन्हें सुबह और सुबह दो अंजीर भिगों दें, उन्हें शाम अच्छे से चबा-चबाकर खायें। खाने के बाद ऊपर से पानी पी जायें। प्रोस्टेअ ग्रंथि के अधिक बढ़ने पर इससे अच्छे परिणाम मिलते हैं।
8. फूल हरड़: रात को सोने से पहले एक फूल हरड़ को साफ़ पानी में भिगोकर रख दें। अगले दिन सुबह इसके बीज निकालकर इसे चबा-चबाकर खायें और इसके बाद इसके पानी को आराम से घूंट-घूंट करके पी जायें।

प्रोस्टेट ग्रंथि का होम्योपैथिक उपचार:
Prostate Gland Homeopathic treatment:
प्रोस्टेट ग्रंथि की तकलीफों में सही से लक्षणों का मिलान करके उचित होम्योपैथिक दवाई दी जाये तो बहुत अच्छे परिणाम मिलते हैं। लेकिन याद रहे बिना लक्षणों को मिलाये होम्योपैथिक दवाईयों से स्वस्थ होने की उम्मीद नहीं करें। इसी कारण होम्योपैथिक चिकित्सा को लाक्षणिक चिकित्सा भी कहा जाता है। कुछ दवाईयों का विवरण लक्षणानुसार प्रस्तुत है:-

1.0 सैबाल सैरूलेटा Q: रोगी के निम्न लक्षणों पर यह दवा अधिक उपयोगी है:-
1.1 प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ गयी हो।
1.2 पेशाब करते समय जलन, अत्यंत दर्दनाक तकलीफ के साथ ऐसा लगे मानो पेशाब नली में मानो कुछ अड़ा या अटका हुआ हो।
1.3 रात्रि को अनेक बार पेशाब को जाना पड़े और पेशाब बून्द-बून्द आने जैसे लक्षण हों।
1.4 बहुत ज्यादा डकारें आती हों, पेट में गैस बनती हो, बार-बार दूध पीने का मन करे और रोगी बार-बोर दूध पीता भी रहे।
1.5 रोगी को अपनी जननेन्द्रिय ठण्डी अनुभव होती है, रोगी को लगता है कि उसका वीर्य समाप्त हो गया है, इस कारण वह सफलतापूर्वक संभोग नहीं कर पता हो।
1.6 उक्त लक्षणों के साथ में रोगी को मानसिक तथा शारीरिक कमजोरी के लक्षण मौजूद हों।
1.7 खुराक एवं मात्रा: रोगी के रोग की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उक्त दवा की 10 से 30 बूंद, दिन में 3 बार, ठीक होने तक सेवन करवाना चाहिये।

2.0 स्टैफिसैग्रिया 30: रोगी के निम्न लक्षणों पर यह दवा अधिक उपयोगी है:-
2.1 पेशाब नली पर दबाव सा अनुभव हो और पेशाब करने जाने पर पेशाब आये ही नहीं।
2.2 पेशाब करते समय बूंद-बूंद आये और पेशाब नली में जलन महसूस होती हो।
2.3 पेशाब करने के बाद भी ऐसा महसूस हो मानो थोड़ा सा पेशाब शेष रह गया।
2.4 पेशाब करने के बाद तेज दर्द होता हो।
2.5 अत्यधिक कामुकता। हर समय यौन विचारों में खोये रहना। अत्यंत कमजोरी का अनुभव होना। बिना किसी सांस रोग के संभोग करने के बाद सांस लेने में परेशानी होना।
2.6 रोगी को आमाशय बिलकुल खाली महसूस होता है, चाहे कितना भी खा ले, लेकिन भूख सी लगी ही रहती है।
2.7 रोगी अकेला रहना चाहता है। उसको तेज गुस्सा आता है, लेकिन गुस्से और गुस्से के अपमान को पी जाता। गुस्से की स्थिति में रोगी बार-बार थूक को निगलता रहता है।
2.8 खुराक एवं मात्रा: रोगी के रोग की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उक्त दवा की 30 नम्बर की 6-7 पिल्स/गोली, दिन में 3 बार, ठीक होने तक सेवन करवाना चाहिये।

3.0 सैलिडेगो विर्गौरिया Q: रोगी के निम्न लक्षणों पर यह दवा अधिक उपयोगी है:-
3.1 पेशाब कम मात्रा में लाल या बादामी रंग का आना।
3.2 पेशाब में तलछट आना।
3.3 पेशाब करते समय जलन होना।
3.4 पेशाब में बदबू आना।
3.5 जननेन्द्रिय में इतनी खुजली होना कि खुजाने से निशान पड़ जाते हैं। चेचक के जैसे दाने निकल आते हैं।
3.6 रात्रि को सोते समय मुंह का स्वाद बिगड़ जाना।
3.7 जीभ पर मोटी सी परत जमी रहती है।
3.8 सांस और बलगम के लक्षण भी हो सकते हैं।
3.9 खुराक एवं मात्रा: रोगी के रोग की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उक्त दवा की Q अर्थात मदर टिंचर 2 से 5 बूंद तक पानी में मिलाकर दिन में 3 बार, ठीक होने तक सेवन करवाना चाहिये।

4.0 कोनियम 30 या 200: रोगी के निम्न लक्षणों पर यह दवा अधिक उपयोगी है:-
4.1 पेशाब करने में परेशानी, पेशाब रुक-रुक कर आना।
4.2 पेशाब का अपने आप ही बूंद-बूंद हर समय टपकते रहना।
4.3 तीव्र यौनेच्छा होने पर भी जननांगों की शिथिलता के कारण संभोग नहीं कर पाता।
4.4 प्रोस्टेट ग्रंथि का सख्त हो जाना और बढ जाना।
4.5 याददाश्त कमजोर हो जाना। किसी भी चीज को रखकर भूल जाना।
4.6 सिर को आगे-पीछे घुमाने से नहीं, लेकिन दांये-बांये घुमाने से चक्कर आ जाना।
4.7 विचित्र लक्षण रोगी को आंख बंद करते ही अर्थात सोते ही पसीना शुरू हो जाता है।
4.8 खुराक एवं मात्रा: रोगी के रोग की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उक्त दवा की 30 नम्बर की 6-7 पिल्स/गोली, दिन में 3 बार, ठीक होने तक सेवन करवाना चाहिये।

नोट: होम्योपैथी की उपरोक्त दवाईयों के अलावा रोगी के लक्षणों के अनुसार कल्केरिया-फ्लोर, चिमाफिला अम्बेलाटा, बैराइटा-कार्ब, हाइड्रैन्जिया, पिकरिक-एसिड, कैनाबिस-इण्डिका आदि दवाइयां उचित शक्ति एवं मात्रा में सेवन करवाई जा सकती हैं।


*नोट: यह लेख मेरे (डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश') द्वारा दिनांक: 24.11.2018, विशेष रूप से मेरे द्वारा संचालित वाट्सएप ग्रुप Health Care Friend-स्वास्थ्य रक्षक सखा के सदस्यों के लिये लिखा गया है। जिसका लिंक: https://chat.whatsapp.com/HHcJSKjEpKsAFzk2sZAg53 यह लिंक कुछ दिनों बाद बंद कर किया जा सकता है।*

*नोट:* किसी भी पुरानी या लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी से पीड़ित लोगों को, अपनी बीमारी को अपनी नियति मानकर निराश या हताश (Frustrated or Depressed) होने की जरूरत नहीं है। देशी जड़ी बूटियों और होम्योपैथी में इलाज संभव है। अपने आपपास के किसी अनुभवी डॉक्टर से सम्पर्क किया जा सकता है। देशभर में अनेकानेक अनुभवी तथा योग्य होम्योपैथ/आयुर्वेद के डॉक्टर उपलब्ध हैं। 


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शहद और लहसुन के अनुभवसिद्ध उपयोग (Experienced Uses of Honey and Garlic)

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
WhatsApp No. 8561955619 (10AM to 10PM)
आदिम युग से संसारभर के आदिवासी अपनी बीमारियों का प्राकृतिक तरीके से उपचार करते आये हैं। इस ज्ञान को बिना लेखबद्ध किये हजारों सालों तक पीढी दर पीढी आगे बढाया जाता रहा है। कालांतर में इसी ज्ञान को भारत में आयुर्वेद नाम दिया गया और धन्वंतरि को आयुर्वेद का जन्मदाता घोषित कर दिया गया। जिसका लाभ यह हुआ कि जड़ी-बूटियों को लेखबद्ध किया जाने लगा और उनका लाभ वृहद स्तर पर मिलने लगा। जिससे मानवता का बहुत भला हुआ है। यद्यपि अभी भी गोपनीयता या अन्य कारणों से संसार के अनेक आदिवासी कबीलों को प्राप्त जड़ी-बूटियों के ज्ञान की जानकारी सार्वजनिक नहीं हो पायी है। फिर भी आयुर्वेद के शोधार्थियों ने अपना काम जारी रखकर बहुत सी जड़ी-बूटियों तथा दवाईयों के मिश्रण को मानव जीवन के लिये उपयोगी बनाया है। इसी क्रम में शहद और लहसुन के मिश्रण के कुछ अनुभवसिद्ध नुस्खे जनहित में यहां प्रस्तुत कर रहा हूं:

सामग्री:
1. आॅर्गेनिक लहसुन की मध्यम आकार की 2 कलियां।
2. छोटी मधुमक्खी का शुद्ध जंगली शहद एक चम्मच।

बनाने की विधि:
लहसुन को कलियों को छीलकर, उन्हें हल्‍का सा कुचल/कूट लें और इनको फि‍र शहद में मिला लें। कलियों को शहद में 5 मिनट तक रखी रहने दें, जिससे लहसुन की कलियों में शहद अंदर तक भर जाये।

सेवन विधि:
उक्त कुचली हुई और शहद में डूबी हुई कलियों को प्रतिदिन सुबह खाली पेट चबा-चबाकर खाना चाहिये। ध्यान रहे केवल खाली पेट ही सेवन करना उपयोगी रहेगा।

[@] *नोट: कृपया सम्पूर्ण लेख को ध्यान से पढें और यदि पढ़ने के बाद यदि यह उपयोगी लगे तो जनहित में इसे अन्य लोगों को आगे फॉरवर्ड/शेयर किया जा सकता है!* [@]

सेवन के लाभ:
1. कोलेस्ट्रॉल का दुश्मन (Enemy of Cholesterol): शहद और लहसुन में प्राकृतिक तरीके से कोलेस्ट्रॉल को कम करने के गुण पाये जाते हैं। अत: शहद और लहसुन यह मिश्रण जहां एक ओर कोलेस्ट्रॉल का बनना रोकता है, वहीं दूसरी ओर हमारे हृदय की धमनियों में पहले से जमे हुए कोलेस्ट्रॉल को भी कम करने में भी मददगार सिद्ध होता है।

2. प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये (Increase the immunity): जिन लोगों को जरा सा मौसम बदलते ही सर्दी-जुकाम हो जाती है या जिन्हें बार-बार बीमारियां होती ही रहती हैं। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है। अत: जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है, उनको लहसनु एवं शहद के उक्त मिश्रण का विशेषकर सर्दियों में सेवन करना चाहिये।

3. संक्रामक रोधी (Anti-infectious): किसी भी तरह के फंगल संक्रमण से बचाव हेतु शहद और लहसुन के मिश्रण का सेवन लाभकारी है। एंटी बैक्टीरियल एवं एंटी फंगल गुणों से भरपूर (Anti-bacterial and Anti-fungal Properties) यह मिश्रण हमें अनेक प्रकार के इंफेक्शन/संक्रमण से से बचाए रखने में सहायक होता है। लेकिन जिनका पाचनतंत्र ठीक नहीं है, उन्हें सबसे पहले अपनी वाचन प्रणाली को ठीक करना चाहिये।

4. गले की समस्याएं: सर्दियों में होने वाली गले की समस्याएं, जैसे खराश व सूजन आदि में शहद और लहसुन के मिश्रण का उपयोग फायदेमंद रहता है। एंटी इंफ्लेमेटरी (Anti Inflammatory) गुणों से भरपूर होने के कारण यह बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ है।


5 सर्दी जुकाम: सर्दी जुकाम से बचने के लिए शहद और लहसुन के इस मिश्रण का प्रयोग फायदेमंद रहता है। तासीर में गर्म होने के कारण यह सर्दी से उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के रोगों से आराम दिलाने में काफी कारगर सिद्ध होता रहा है।—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', 23.11.2018

स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।
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डिप्रेशन (Depression): अनुभवसिद्ध (Experienced) सफल होम्योपैथिक उपचार

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
WhatsApp No. 8561955619 (10AM to 10PM)
@>>>>>>>>>> हम अनेक लोगों से सुनते रहते हैं कि मैं डिप्रेशन में हूं। हकीकत यह है कि वर्तमान में तेजी से भागती दौड़ती दुनिया में अधिकतर लोग किसी न किसी चाहत, असफलता या उपलब्धि (Desire, Failure or Achievement) के दबाव एवं तनाव (Pressure and Stress) में जीने को विवश हैं। जब यह दबाव एवं तनाव अधिक बढकर अनियंत्रित हो जाता है तो अधिकतर लोग अत्यधिक निराश हो जाते हैं। निराश व्यक्ति को कुछ भी नहीं सूझता और कुछ निराश लोग इतने दु:खी हो जाते हैं कि उन्हें अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है। सामान्यत: इसी अवस्था को डिप्रेशन (Depression) कहा जाता है। जिसके कारण अनेक लोगों के मन में आत्मघात (Suicide) के विचार भी आने लगते हैं। जिनमें से कुछ आत्महत्या भी कर लेते हैं। अत: इस स्थिति का समय रहते समाधान करना बहुत जरूरी होता है।


[@] *नोट: कृपया सम्पूर्ण लेख को ध्यान से पढें और यदि पढ़ने के बाद यह उपयोगी लगे तो जनहित में इसे लोगों को आगे फॉरवर्ड/शेयर किया जा सकता है!* [@]


@>>>>>>>>>> दुष्प्रभाव रहित (Without side effect) होम्योपैथित दवाइयों से डिप्रेशन का सफल उपचार: होम्योपैथिक दवाइयों का परीक्षण चूहे, खरगोश या मेंढकों पर नहीं, बल्कि स्वस्थ लोगों पर किया जाता है। अत: परीक्षण के दौरान यह नोट किया जाता है कि किसी दवा विशेष का मानव के शरीर के साथ-साथ मन पर क्या और कैसे प्रभाव पड़ता है। इसी कारण होम्योपैथिक दवाइयां मनुष्य के मन पर बहुत गहरा एवं सकारात्मक असर करती हैं। अत: यह समझना और समझाना जरूरी है कि होम्योपैथी में मन से जुड़े विकारों या गड़बड़ियों के उपचार की बहुत सारी दवाइयां उपलब्ध हैं। मगर सही दवा, दवा की शक्ति एवं मात्रा का चयन किसी अनुभवी होम्योपैथ द्वारा डिप्रेशन की स्थिति से पीड़ित व्यक्ति के मानसिक एवं शारीरिक लक्षणों को जानकर तथा विश्लेषण करके ही किया जा सकता है। डिप्रेशन के रोगी तथा रोगी के परिजनों को रोगी की हर प्रकार की छोटी-बड़ी लाक्षणिक जानकारी डॉक्टर को बताना बहुत जरूरी होता है। अन्यथा रोगी का सही उपचार असंभव है। होम्योपैथिक दवाइयां व्यक्ति के अंदर स्थापित उस कारण को दूर करने में सक्षम होती हैं, जो डिप्रेशन सहित किसी भी बीमारी का मूलाधार/कारण होता है। यहां कुछ होम्योपैथक दवाइयों के लक्षणानुसार नाम दिये जा रहे हैं, जो डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्ति को स्वस्थ करने में सहायक हो सकती हैं। मैं जिन दवाइयों का उल्लेख कर रहा हूं, मैंने उन दवाइयों के सहयोग से डिप्रेशन के शिकार दर्जनों रोगियों को स्वस्थ किया हैं। आगे बढने से पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यद्यपि होम्योपैथिक दवाइयों के कोई दुष्प्रभाव नहीं होते हैं, लेकिन यह बतलाना कानूनी बाध्यता है कि किसी योग्य होम्योपैथ के परामर्श के बिना खुद अपना इलाज करने का प्रयास न करें।


1. अर्जेंटम नाइट्रिकम: जब रोगी को मानसिक और शारीरिक रूप से खुद पर नियंत्रण रख पाना मुश्किल या असंभव हो जाये। रास्ते में चलते समय ऊंची इमारतों के पास से गुजरते समय ऊंची इमारतों की ओर देखने से रोगी को डर लगने लगे। रोगी को पुल पार करने से डर लगता है। ऊंची इमारतों के ऊपर से नीचे देखने से भी रोगी डरता है। उसे हमेशा मृत्यु का भय घेरे रहता है। अनेक बार रोगी अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी किया करता है। रोगी को किसी के इंतजार से घबराहट होती है। उसे मीठे की विशेष चाहत होती है। किसी बड़े या अनजान व्यक्ति से मिलने जाने या किसी समारोह में जाने या किसी प्रकार का भाषण देने जाने से पहले रोगी के मन में इतनी व्याकुलता, घबराहट और डर की स्थिति पैदा हो जाती है कि उसे बार-बार पेशाब और शौच जाना पड़ता है। यह सब रोगी के स्नायुमंडल की कमजोरी के प्रमाण हैं। ऐसे लक्षणों के आधार पर इस दवाई से मैंने अनेक रोगियों को सम्पूर्ण आरोग्य प्रदान किया है। यहां तक कि यौन सम्बन्धों में घबराहट के मामले में भी यह दवा अत्यंत उपयोगी है।


2. आर्सेनिक एल्बम: जिस रोगी में बेचैनी, घबराहट, मृत्युभय और अत्यधिक कमजोरी के लक्षण दिखाई दें। रोगी को बार-बार थोड़ी थोड़ी प्यास लगती रहती है। रोगी कितनी ही कमजोर और नि:शक्त हो गया हो, लेकिन वह एक जगह टिक कर बैठ नहीं सकता। रोगी को हमेशा मृत्यु का भय सताता रहता है, वह मन में सोचता और अपने परिवारजनों को बोलता रहता है कि दवा खाना बेकार है, अब वह नहीं बचेगा। उसे अकेले रहने से डर लगता है। जब रोगी भूत-प्रेत दिखने की बातें करे या उसके मन में आत्महत्या करने की प्रबल इच्छा हो तो यह दवा अत्यंत उपयोगी होती है। अनेक ऐसे रोगी जो ऊपरी हवा या भूत-प्रेत का साया बतलाकर नारकीय जीवन जीने को विवश कर दिये जाते हैं। उनके लक्षण मिलाने करने पर यह दवा चमत्कार जैसा प्रभाव दिखाती है। मैंने अनेक ऐसी औरतों को स्वस्थ करने में सफलता अर्जित की है। जिन्हें भूतग्रस्त बतलाकर प्रताड़ित किया जाता था। जिन्हें भोपाओं के हवाले करके प्रताड़नाएं दी जाती थी।


3. एसिड फॉस: वियोग, जुदाई, प्रेम में असफलता, शोक, दु:ख, आत्मीयजन की मृत्यु, प्रेम में धोखा या असफलता आदि के कारण अनेक प्रकार की मानसिक और शारीरिक परेशानियां उत्पन्न होने लगती हैं। जैसे-चिंताग्रस्त रहना और थकावट, पर्याप्त नींद नहीं आना, अचानक पसीना-पसीना हो जाना, किसी भी काम या विषय में मन नहीं लगना, हतोत्साह के साथ रोगी दु:खी और व्याकुल रहने लगे। शुरुआत मानसिक कमजोरी से होती है, जो बाद में शारीरिक कमजोरी में भी बदल जाती है। यदि तत्काल ध्यान नहीं दिया जाये तो रोगी इस कदर डिप्रेशन का शिकार हो जाता है कि वह अनेक बार अपने मित्रों, ग्राहकों, पड़ोसियों, सहकर्मियों और परिजनों तक के नाम भूल जाता है। छोटा-मोटा हिसाब-किताब तक नहीं कर सकता। मन अत्यधिक शिथिल हो जाता है। ऐसी अवस्था में यह दवा उपयोगी होती है। वियोग, जुदाई और असफल प्रेम सम्बन्धों के कारण अवसादग्रस्त अनेक रोगियों का मैंने सफल उपचार किया है। जिसमें अन्य दवाओं के साथ इस दवा की भी अहम भूमिका रही।


अन्य दवाइयां: उपरोक्त के अलावा लक्षणानुसार नेट्रम म्यूर, आॅरम मैटालिकम, स्टेफिसेग्रिया, नक्स वोमिका, इग्नेशिया, विरेट्रम एल्बम, कल्केरिया कार्बोनिका आदि होम्योपैथक अनेक दवाइयां रोगी की मानसिक एवं शारीरिक स्थिति के अनुसार उपयोगी हो सकती हैं। जिनका निर्धारण अनुभवी होम्योपैथ आसानी से कर सकते हैं।


कमजोरी का उपचार: डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक रूप से अत्यधिक कमजोर हो जाते हैं। अत: उनकी कमजोरी के निदान हेतु मैं शुद्ध, ताजा एवं आॅर्गेनिक देशी दर्जनों जड़ी बूटियों से निर्मित 'Rejuvenation Powder-कायाकल्प पाउडर' एवं 'Stimulator (Recharge and Stimulate Yourself)' का भी सेवन करवाता हूं। जिससे कुछ ही महिनों में रोगी फिर से अपने आप को स्वस्थ और तरोताजा अनुभव करने लगता है।


लेख का मकसद: इस लेख को लिखने का मूल मकसद आम लोगों/पाठकों में यह समझ पैदा करना है कि जब किसी कारण से किसी भी व्यक्ति/परिजन को मानसिक परेशानी हो तो उसे डिप्रेशन कहकर हल्के से नहीं लें या उसे कैमीकलयुक्त दवाइयों के हवाले नहीं करें, बल्कि ऐसे हालात में पेशेंट के प्रति विशेष अपनापन, सहानुभूति और देखरेख का भाव रखते हुए उसे किसी योग्य होम्योपैथ को दिखायें तो आश्चर्यजनक परिणाम मिलेंगे। *लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'* 21.11.2018, (यह लेख विशेष रूप से मेरे द्वारा संचालित वाट्सएप ग्रुप *Health Care Friend-स्वास्थ्य रक्षक सखा* के सदस्यों के लिये लिखा गया है।) जिसका लिंक: https://chat.whatsapp.com/HHcJSKjEpKsAFzk2sZAg53 यह लिंक कुछ दिनों बाद बंद कर किया जा सकता है।


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*हां अनेकानेक स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों की जानकारी और रोगियों के अनुभवों की जानकारी हेतु मेरी निम्न वेबसाइट/Facebook Page पर विजिट/क्लिक कर सकते हैं:-*


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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

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सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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Cucumber कब्जी कमजोरी कमर कमर दर्द कमेड़ा करेला कर्ण वेदना कर्णरोग कष्टार्तव-Dysmenorrhea कांच निकलना काजू कान कानून सम्मत काम काम शक्ति कामवाण पाउडर कामशक्ति कामशक्ति-Sexual power कामेच्छा कामोत्तेजना कायाकल्प कार्बोहाइड्रेट कार्बोहाइड्रेट-Carbohydrates काला जीरा काला नमक काली जीरी काली तुलसी काली मिर्च काले निशान कास-खांसी-Cough किडनी किडनी संक्रमण किडनी स्‍टोन कीड़े कीमोथेरेपी कुकरौंधा कुकुंदर कुटकी-Black Hellebore कुबडापन कुमेड़ा कुल्थी कुल्ला कुष्ट कुष्ठ कृमि केला केसर कैफीन-Caffeine कैलोरी कैलोरी चार्ट कैलोरी-Calories कैवांच कैविटी कैंसर कॉफी कॉफ़ी कॉलेस्ट्रॉल कोंडी घास कोढ़ कोबरा कोलेस्ट्रॉल कोलेस्ट्रॉल-Cholesterol कोलेस्ट्रोल कौंच कौमार्य क्रियाशीलता क्रोध क्षय रोग-Tuberculosis क्षारीय तत्व क्षुधानाश खजूर खजूर की चटनी खनिज खरबूजा-Musk melon खरेंटी खरैंटी शिलाजीत खाज खांसी खिरेंटी खिरैटी खीप खीरा खुजली खुशी-Joy खुश्की खुश्बू खोया गंजापन-Baldness गठिया गठिया-Arthritis गठिया-Gout गड़तुम्बा गंडा-ताबीज गंध गन्ने का रस गरमा गरम गर्भ निरोधक गर्भधारण गर्भपात गर्भवती गर्भवती कैसे हों? गर्भावस्था गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy गर्भावस्था-Pregnancy गर्भाशय गर्भाशय भ्रंश गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy गर्म पानी गर्मी गर्मी-Heat गलगण्ड गाजर गाजवां गांठ गाँठ-Knot गारंटी गारण्टेड इलाज गाल ब्लैडर गिलोय गिल्टी गुड़हल गुंदा गुदाद्वार गुदाभ्रंश गुम्मा गुर्दे गुलज़ाफ़री गुस्सा गृध्रसी गृह-स्वामिनी गेदुआ की छाछ गैस गैस्ट्रिक गैहूं का जवारा गोक्षुरादि चूर्ण गोखरू गोखरू (LAND CALTROPS) गोंद कतीरा-Hog-Gum गोंदी गोभी-Cabbage गोरख मुंडी गोरखगांजा गोरखबूटी गोरखमुंडी ग्रीन-टी घमोरी घरेलु ​नुस्खे घाघरा घाव चकवड़ चक्कर चपाती चमत्कारिक सब्जियां चरित्र चर्बी चर्म चर्म रोग चर्मरोग चाय चाय-Tea चालीस के पार-Forty Across चिकनगुनिया चिकित्सकीय चिटकन चिंतित चिरायता-Absinth चिरोटा चुंबन चोक चौलाई छपाकी छरहरी काया छाछ छाजन बूटी छाले छींक छीकें छुअ छुआरा छुहारा छोटा गोखरू छोटा धतूरा छोटी हरड़ जंक फूड जकवड़ जख्म जंगली तिल्ली जंगली तुलसी जंगली पेड़ जंगली मिर्ची जंगली-कटीली चौलाई जटामांसी-Spikenard जलजमनी जलन जलोदर रोग-Ascites Disease जवारा जवारे जवासा-Alhag जहर जामुन का जूस जायफल जिगर जीरा जीवन रक्षक जीवनी शक्ति जुएं जुकाम जुदाई जुलाब जूएं जूस जूस-Juice जोड़ों के दर्द जोड़ों में दर्द जौ ज्यूस ज्योति ज्वर ज्वर-Fiver झाइयाँ झांईं झाड़-फूंक झुर्रियाँ झुर्रियां झुर्री झूठे दर्द टमाटर का रस टमाटर-Tomatoes टाइफाइड टाटबडंगा टायफायड टूटी हड्डी टॉन्सिल टोटला ट्यूमर ठंड ठंडापन ठेकेदार डॉक्टर डकार डकारें डायबिटीज डायरिया डिग्री फ़ारेनहाइट डिग्री सेल्सियस डिजिसेक्सुअल डिटॉक्सीफाई डिटॉक्सीफिकेशन डिनर डिप्रेशन डिब्बाबंद भोजन डिलेवरी डीकामाली डीगामाली डेंगू डेंगू-Dengue डॉ. निरंकुश डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' डॉ. मीणा ढकार ढीलापन ढीली योनि तकलीफ का सही इलाज तंत्र-मंत्र तम्बाकू तरबूज-Watermelon तलाक ताकत तिल तिल्ली तुंबा तुंबी तुम्बा तुलसी तेल त्रिदोषनाशक त्रिफला त्वचा त्वचा रोग थकान थाईरायड थायरायड-Thyroid थायरॉइड दण्डनीय अपराध दंत वेदना दन्तकृमि दन्तरोग दमा दर वेदना दरार दर्द दर्द निवारक दर्द निवारक दवा दर्दनाक दस्त दही दाग-धब्बे-Stains-Spots दाढ़ दांत दांतो में कैविटी-Teeth Cavity दाद दाम्पत्य दाम्पत्य विवाद सलाहकार दाम्पत्य-Conjugal दाल दालचीनी दालें दिमांग दिल दीर्घायु दु:खी दुर्गंध दुर्बलता दुष्प्रभाव दुष्प्रभावरहित दूध दूध वृद्धि दूधी दूधी-Milk Hedge दृष्टिदोष दो मन द्रोणपुष्पी द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes धड़कन धनिया बीज धनिया-Coriander धमासा धात धातु धातु पतन धार्मिक धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं? धैर्यहीन नज़ला नपुंसक नपुंसकता नाइट्रिक एसिड नाक नाखून नागबला नागरमोथा नाडी हिंगु नाड़ी हिंगु (डिकामाली) नामर्दी नारकीय पीड़ा नारियल नाश्ता निमोनिया निम्न रक्तचाप निम्बू नियासिन निराश निरोगधाम निर्गुण्डी निर्गुन्डी निष्कपट स्नेह निष्ठा निसोरा नींद नींबू नींबू-Lemon नीम-azadirachta indica नुस्खे नुस्खे-Tips नेगड़ नेत्र रोग नेुचरल नैतिक नॉर्मल डिलेवरी नोनिया नौसादर न्युमोनिया-Pneumonia न्यूरॉन्स पक्षघात पंचकर्म पढ़ने में मन लगेगा पंतजलि पत्तागोभी-CABBAGE पत्थर फोड़ी पत्थरचट्टा पत्नी पथरी पदार्थ पनीर पपीता पपीता-CARICA PAPPYA पमाड परदेशी लांगड़ी परम्परागत चिकित्सा परहेज पराठा परामर्श परिस्थिति पवाड़ पवाँर पाइल्स पाक-कला पाचक पाचन पाचनतंत्र पाचनशक्ति पाठक संख्या 16 लाख पार पाठक संख्या पंद्रह लाख पायरिया पारदर्शिता पारिजात पालक पालक-Spinach पित्त पित्ताशय पित्ती पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne पिरामिड पीलिया पीलिया-Jaundice पीलिया-कामला-Jaundice पुआड़ पुदीना पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava पुरुष पुंसत्व पेचिश पेट के कीड़े पेट दर्द पेट में गैस पेट रोग पेड़ पेद दर्द पेरिकिटो सेसिल पेशाब पेशाब में रुकावट पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy पोष्टिक लड्डू पौधे पौरुष पौरुष ग्रंथि पौष्टिक रागी रोटी प्याज-Onion प्यास प्रजनन प्रतिरक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिरोधक प्रतिरोधक-Resistance प्रदर प्रमेह प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery प्रसव प्रसव सुरक्षा चक्र प्रसव-पीड़ा प्रसूति प्राणायाम प्रेग्नेंसी-Pregnancy प्रेम प्रेमरस प्रेमिका प्रेमी प्रोटीन प्रोटीन का कार्य प्रोटीन के स्रोत प्रोस्टेट प्रोस्‍टेट कैंसर प्रोस्टेट ग्रंथि प्रोस्टेट ग्रन्थि प्लीहा प्लूरिसी-Pleurisy प्लेटलेट्स फंगल फटन फफूंद-Fungi फरास फल फल-Fruit फाइबर फिटकरी फुंसी-Pimples फूलगोभी-CAULIFLOWER फेंफड़े फेरम फॉस फैट फैटी लीवर फोटोफोबिया फोड़ा फोड़े-Boils फोरप्ले फोलिक एसिड फ्लू फ्लू-Flu फ्लेक्स सीड्स बकायन बकुल बड़ी हरड़ बथुआ बथुआ पाउडर बथुआ-White Goose Foot बदबू बंध्यापन बबूल-ACACIA बरसाती बीमारियाँ बरसाती बीमारियां बलगम बलवृद्धि बला बलात्कार बवासीर बहरापन बहुनिया बहुमूत्रता- बांझपन बादाम-Almonds बादाम. बाल बाल झड़ना बाल झडऩा-Hair Falling बिना सिजेरियन मां बनें बिवाई बीजबंद बीड़ी बीमारियों के अनुसार औषधियां बीमारी बील बुखार बूंद-बूंद पेशाब बेल बेली बैक्टीरिया बॉयोकैमी ब्र​ह्मदण्डी ब्रेस्ट ग्रोथ ब्लड प्रेशर ब्लैक मेलिंग ब्लॉकेज भगंदर भगंदर-Fistula-in-ano भगनासा भगन्दर भगोष्ठ भड़भांड़ भय भविष्य भस्मक रोग भावनात्मक भुई आंवला-Phyllanthus Niruri भूई आमला भूई आंवला भूख भूख बढ़ाने भूत-प्रेत भूमि भूमि आंवला भोजनलीवर मकोय मकोय-Soleanum nigrum मक्का मक्का के भुट्टे मंजीठ मटर-PEA मंद दृष्टि मंदाग्नि मदार मधुमेह मधुमेह-Diabetes मन्दाग्नि-Dyspepsia मरुआ मरोड़ मर्द मर्दाना मलाशय मलेरिया मलेरिया (Malaria) मवाद मसाले मस्तिष्क मस्से मस्से-WARTS महंगा इलाज महत्वपूर्ण लेख महाबला माइग्रेन माईग्रेन माईंड सैट माजूफल मानवव्यवहार मानसिक मानसिक लक्षण मानसिक-Mental मानिसक तनाव-Mental Stress मायोपिया मासिक मासिक-धर्म मासिकधर्म मासिकस्राव माहवारी मिनरल मिर्गी मिर्च-Chili मीठा खाने की आदत मुख मैथुन-ओरल सेक्स-Oral Sex मुख्य लक्षण मुधमेह मुलहठी मुलेठी मुहाँसे मूँगफली मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders मूत्र मूत्र असंयमितता मूत्र में जलन-Burning in Urine मूत्ररोग मूत्राशय मूत्रेन्द्रिय मूर्च्छा (Unconsciousness) मूली मूली कर रस मृत्यु मृत्युदण्ड मेथी मेथी दाना मेंहदी मैथुन मोगरा (Mogra) मोटापा मोटापा-Obesity मोतियाबिंद मौत मौलसिरी मौसमी बीमारियां यकृत यकृत प्लीहा यकृत वृद्धि-Liver Growth यकृत-लीवर-जिगर-Lever यूपेटोरियम परफोलियेटम यूरिक एसिड लेबल योग विज्ञापन योन योन संतुष्टि योनि योनि ढीली योनि शिथिल योनि शूल-Vaginal Colic योनि संकोचन योनिद्वारा योनिभ्रंश योनी योनी संकोचन यौन यौन आनंद यौन उत्तेजक पिल्स (sexual stimulant pills) यौन क्षमता यौन दौर्बल्य यौन शक्तिवर्धक यौन शिक्षा यौन समस्याएं यौनतृप्ति यौनशक्ति यौनशिक्षा यौनसुख यौनानंद यौनि रक्त प्रदर (Blood Pradar) रक्त रोहिड़ा-TECOMELLA UNDULATA रक्तचाप रक्तपित्त रक्तशोधक रक्ताल्पता रक्ताल्पता (एनीमिया)-Anemia रस-juices रातरानी Night Blooming Jasmine/Cestrum nocturnum रामबाण रामबाण औषधियाँ-Panacea Medicines रुक्षांश रूढिवादी रूसी रूसी मोटापा रेचक रेठु रोग प्रतिरोधक रोबोट सेक्स रोमांस लकवा लक्षण लक्ष्मी लंच लसोड़ा लस्सी लहसुन लहसुन-Garlic लाइलाज लाइलाज का इलाज लाक्षणिक इलाज लाक्षणिक जानकारी लाभ लिंग लिंग प्रवेश लिसोड़ा लीकोरिया लीवर लीवर सिरोसिस लीवर-Liver लू-hot wind लैंगिक लोनिया लौकी लौंग की चाय ल्युकोरिया ल्यूकोरिया ल्यूज योनी वजन वज़न वजन कम वजन बढाएं-Weight Increase वन तुलसी वन/जंगली तुलसी वनौषधियाँ वमन वमन विकृति-Vomiting Distortion वसा वात वात श्लैष्मिक ज्वर वात-Rheumatism वायरल वायरल फीवर वायरल बुखार-Viral Fever वासना विचारतंत्र विटामिन विधारा वियाग्रा-Viagra वियोग विरह वेदना विलायती नीम विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध विवाहेत्तर सम्बंध विश्वास विष विष हरनी विषखपरा वीर्य वीर्य वृद्धि वीर्यपात वृक्कों (गुर्दों) में पथरी-Renal (Kidney) Stone वृक्ष वैज्ञानिक वैधानिक वैवाहिक जीवन वैवाहिक जीवन-Marital वैवाहिक रिश्ते वैश्यावृति व्याकुल व्यायाम व्रण शंखपुष्पी शरपुंखा शराब शरीफा-सीताफल-Custard apple शर्करा शलगम-Beets शल्यक्रिया शहद शहद-Honey शारीरिक शारीरिक रिश्ते शिथिलता शीघ्र पतन शीघ्रपतन शीस शुक्राणु शुक्राणु-Sperm शुक्राणू शुगर शोक शोथ शोध श्योनाक श्रेष्ठतर श्वास श्वांस श्वेत प्रदर श्वेत प्रदर-Leucorrhea श्वेतप्रदर षड़यंत्र संकुचन संकोच संक्रमण संक्रमित संक्रामक संखाहुली सगतरा संतरा-Orange संतान संतुष्टि सत्यानाशी सदा सुहागन सदाफूली सदाबहार सदाबहार चूर्ण सनबर्न सफ़ेद दाग सफेद पानी सफेद मूसली सब्जि सब्जियां-Vegetables सब्जी संभालू संभोग समर्पण-Dedication सरकार को सुझाव सरफोंका सरहटी सर्दी सर्दी जुकाम-Cold सर्दी-जुकाम सर्पक्षी सर्पविष सलाद संवाद संवेदना सहदेई सहदेवी सहानभूति साइटिका साइटिका-Sciatica साइड इफेक्ट्स साबूदाना-Sago सायटिका सिगरेट सिजेरियन सिर दर्द सिर वेदना सिरका सिरदर्द सिरोसिस सी-सेक्शन सीजर डिलेवरी सुगर सुदर्शन सुहागा सूखा रोग सूजन सेक्स सेक्स उत्तेजक दवा सेक्स परामर्श-Sex Counseling सेक्स पार्टनर सेक्स पावर सेक्स समस्या सेक्स हार्मोन सेक्‍स-Sex सेंधा नमक सेब सेमल-Bombax Ceiba सेल्स सोजन-सूजन सोंठ सोना पाठा सोयाबीन सोयाबीन (Soyabean) सोयाबीन-Soyabean सोराइसिस सोरियासिस-Psoriasis सौंठ सौंदर्य सौंदर्य-Beauty सौन्दर्य सौंफ सौंफ की चाय सौंफ-Fennel स्किन स्खलन स्तन स्तन वृद्धि स्तनपान स्तम्भन स्त्री स्त्रीत्व स्त्रैण स्पर्श स्मृति-लोप स्वप्न दोष स्वप्नदोष स्वप्नदोष-Night Fall स्वभाव स्वभावगत स्वरभंग स्वर्णक्षीरी स्वस्थ स्वास्थ्य स्वास्थ्य परामर्श स्वास्थ्य रक्षक सखा हजारदानी हड़जोड़ हड्डी हड्डी में दर्द हड्डी संक्रमण हड्डीतोड़ ज्वर हड्डीतोड़ बुखार हरड़ हरसिंगार हरी दूब-CREEPING CYNODAN हरीतकी हर्टबर्न हस्तमैथुन हस्तमैथुन-Masturbation हाई बीपी हाथ-पैर नहीं कटवायें हारसिंगार हालात हिचकी हिचकी-Hiccup हिमोग्लोबिन-hemoglobin हिस्टीरिया हिस्टीरिया-Hysteria हींग हीनतर हुरहुर हुलहुल हृदय हृदय-Heart हेपेटाइटिस हेपेटाईटिस हेल्थ टिप्स-Health-Tips हेल्थ बुलेटिन हैजा हैपीनेस-Happiness हैल्थ होम केयर टिप्स-Home Care Tips होम्यापैथ होम्योपैथ होम्योपैथिक होम्योपैथिक इलाज होम्योपैथिक उपचार होम्योपैथी होम्योपैथी-Homeopathy