Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
Health Care Friend and Marital Dispute Consultant
(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार)
-:Mob. & WhatsApp No.:-
85619-55619 (10 AM to 10 PM)
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स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।
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*थर्मामीटर द्वारा बुखार को नापने की तुलनात्मक जानकारी-Comparative information to measure fever by Thermometer*
अनेक बार कुछ घरों में जो थर्मामीटर होता है, उसमें बुखार को नापने में परिवारजनों को उलझन होती देखी जाती है। परिवार के कुछ लोगों को डिग्री सेल्सियस समझ नहीं आता है तो कुछ को डिग्री फ़ारेनहाइट समझ में नहीं आता है। अत: बुखार/ज्वर के दोनों प्रकार के परिणामों को आसानी से समझने के लिये डिग्री सेल्सियस (°C) एवं डिग्री फ़ारेनहाइट का तुलनात्मक विवरण दिया जा रहा है। आशा है, यह आम लोगों के लिये घरेलु तौर पर उपयोगी सिद्ध होगा।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' मो. एवं वाट्सएप नं.: 85619-55619 सुबह 10 बजे से रात्रि 10 बजे के बीच ही काल करें।
*थर्मामीटर द्वारा बुखार को नापने की तुलनात्मक जानकारी*
*Fever: Degree Celsius (°C) to Degree Fahrenheit (°F) Comparison (Aproximately) [बुखार: डिग्री सेल्सियस (°C) से डिग्री फ़ारेनहाइट (°F) में तुलना (लगभग)]:*
01-36.11°C = 097.00°F
02-36.22°C = 097.20°F
03-36.50°C = 097.70°F
04-36.66°C = 098.00°F
05-36.78°C = 098.20°F
06-36.94°C = 098.50°F
07-37.22°C = 099.00°F
08-37.50°C = 099.50°F
09-37.78°C = 100.00°F
10-38.06°C = 100.50°F
11-38.33°C = 101.00°F
12-38.61°C = 101.50°F
13-38.88°C = 102.00°F
14-39.16°C = 102.50°F
15-39.44°C = 103.00°F
16-39.72°C = 103.50°F
17-40.00°C = 104.00°F
18-40.27°C = 104.50°F
19-40.55°C = 105.00°F
20-40.83°C = 105.50°F
21-41.11°C = 106.00°F
यदि आप अस्वस्थ हैं तो निरामय उपचार हेतु आपके निकट के किसी आयुर्वेद और, या होम्योपैथी के डॉक्टर से सम्पर्क करें।
*स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिक जानकारी हेतु हमारी वेबसाइट पर विजिट/क्लिक करके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बने:*
>>> *Online Doctor* P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & WhatsApp No.: 8561955619, *Fix Time to Call: Between 10 AM to 10 PM Only.*
*-2nd Mobile: 9875066111*
टाइफाइड बुखार से बचाव के लिए घरेलू इलाज
टाइफाइड को एक खतरनाक बीमारी के रूप में जाना जाता है, इसमें कई दिनों तक तेज बुखार आता है। बुखार कम-ज्यादा होता रहता है, लेकिन कभी सामान्य नहीं होता। टाइफाइड का इन्फेक्शन होने के एक सप्ताह बाद रोग के लक्षण नजर आने लगते हैं। कई बार दो-दो माह बाद तक इसके लक्षण दिखते हैं। टाइफाइड और बुखार का घरेलू इलाज से बचाव किया जा सकता है।
बुखार से बचाव के घरेलू इलाज-
- तुलसी और सूर्यमुखी के पत्तों का रस पीने से भी टायफायड बुखार ठीक होते हैं। करीब तीन दिन तक सुबह-सुबह इसका प्रयोग करें।
- पान का रस, अदरक का रस और शहद को बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम पीने से आराम मिलता है।
- जलवायु परिवर्तन की वजह से बुखार होने तुलसी की चाय पीने से आराम मिलता है। इसके लिए 20 तुलसी की पत्तियां, 20 काली मिर्च, थोड़ी सी अदरक, जरा सी दालचीनी को पानी में डालकर खूब खौलाएं। अब इस मिश्रण को आंच से उतारकर छानें और इसमें मिश्री या चीनी मिलाकर गर्म-गर्म पीएं।
- यदि जुकाम या सर्दी-गर्मी में बुखार हो तो तुलसी, मुलेठी, गाजवां, शहद और मिश्री को पानी में मिलाकर काढा बनाएं और पीएं। इससे जुकाम सही हो जाता है और बुखार भी जल्द ही उतर जाता है।
- गर्मी के मौसम में टायफायड होने पर लू लगने के कारण बुखार होने का खतरा रहता है। ऐसे में आप कच्चे आम को आग या पानी में पकाकर इसका रस पानी के साथ मिलाकर पीएं।
टायफायड के अलावा, बुखार के कई और कारण भी हो सकते हैं, ऐसे में कुछ बातों का रखें ख्याल
- पुदीना और अदरक का काढ़ा पीने से बुखार उतर जाता है। काढ़ा पीकर घंटे भर आराम करें, बाहर हवा में न जाएं।
- लहसुन की कली पांच से दस ग्राम तक काटकर तिल के तेल में या घी में तलकर सेंधा नमक डालकर खाने से सभी प्रकार का बुखार ठीक होता है।
- तेज बुखार आने पर माथे पर ठंडे पानी का कपड़ा रखें तो बुखार उतर जाता है,और बुखार की गर्मी सिर पर नहीं चढ़ती है।
- पानी खूब पीएं और पीने के पानी को पहले गर्म करें और उसे ठंडा होने के बाद पीये। अधिक पानी पीने से शरीर का जहर पेशाब और पसीने के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है।
- बुखार में रोगी को अधिक से अधिक आराम की जरूरत होती है। भोजन का खास ख्याल रखें। बुखार होने पर दूध, साबूदाना, चाय, मिश्री आदि हल्की चीजें खाएं। मिश्री का शर्बत, मौसमी का रस, सोडा वाटर और कच्चे नारियल का पानी जरूर पीये।
- फ्लू में प्याज का रस बार-बार पीने से बुखार उतर जाता है, और कब्ज में भी आराम मिलता है।
- घरेलू दवाओं से यदि आपको आराम न मिले, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और उसके निर्देशानुसार इलाज करवाएं।
परामर्श : 10 AM से 10 PM के बीच। Mob & Whats App No. : 9875066111
Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your doctor.
कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें।
निवेदन : रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-9875066111.
Request : Due to the high number of patients, you may have to wait. Please patiently collaborate.--Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'-9875066111
बुखार चाहे कैसा भी हो.
बुखार का” ……..
बुखार एक बहुत ही आम समस्या है जो कभी वायरल फीवर के रूप में कभी घातक मलेरिया बनकर अलग-अलग नामों से यह सभी को अपनी चपेट में ले ही लेता है। लेकिन अधिकतर लोग सामान्य बुखार में डॉक्टर के पास जाने से बचते हैं।
मलेरिया का बुखार ठंड़ लगकर आता है। इस बुखार में रोगी के शरीर का तापमान 101 से 105 डिग्री तक बना रहता है। यह एक प्रकार का संक्रामक बुखार हैं जो कि पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे दिन पर ठंड़ लगकर आता है और फिर पसीना आकर उतर आता है। इस मलेरिया बुखार की तीन अवस्थाएं होती हैं। पहली- कंपकंपी के साथ बुखार आता है और अन्त में पसीना आकर बुखार उतर जाता है। यह मलेरिया बुखार के लक्षण माने जाते हैं। इसमें रोगी के जिगर और तिल्ली आदि बढ़ जाते हैं। यह एनोफिलीस नामक मादा मच्छरों के द्वारा फैलता है।
कारण : मलेरिया का बुखार ज्यादातर बारिश के मौसम में होता हैं। इसका अभिप्राय यह हैं कि यह बुखार मच्छरों के द्वारा फैलता है। यह मच्छर पानी के गड्डो, पोखरों, नलियों आदि के रूके हुए पानी में पैदा होते हैं। एनोफिलीज़ नामक मच्छर मरीज का खून चूस लेते हैं। यही परजीवी युक्त मच्छर जब किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटते हैं, तो वह इस रोग से पीड़ित हो जाता है।
लक्षण :- मलेरिया बुखार में रोगी के सिर में दर्द, जी मिचलाना, उल्टी होना, ठंड़ लगकर तेज बुखार का चढ़ना, बुखार उतरते समय पसीना आना आदि लक्षण पाए जाते हैं।
परहेज : मलेरिया के बुखार में रोगी को पेट को साफ करने का जुलाब दें। तेज बुखार होने पर ठंड़े पानी या बर्फ के पानी की पट्टी माथे पर रखें।
सावधानी : बरसात के दिनों में नालियों, गड्डों आदि में पानी इकट्टा न होने दें क्योंकि मच्छर इस गंदे पानी में ही अडें देते हैं। रोगाणुनाशक दवाओं जैसे- डी. डी. टी, बी. एच. सी. पाउडर, नीम या तम्बाकू का घोल या मिट्टी के तेल को सीलनभरी दीवारों, पोखरों, तालाबों, और नालियों में छिड़क दें। रोगी को पानी उबालकर पिलाना चाहिए और पत्ते वाली सब्जियां नहीं खाने को देनी चाहिए।
विभिन्न औषधियों से उपचार-
तुलसी :
- काली तुलसी या मरूवे के 4 पत्ते, बबूल के 4 पत्ते, काली मिर्च 4 पीसी तथा अजवाचन 1 ग्राम को एक साथ पीसकर पकाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े के ठंड़ा हो जाने पर बुखार चढ़ने से पहले पिलाने से बच्चों का मलेरिया का बुखार ठीक हो जाता है।
- तुलसी के 15 पत्ते, 10 काली मिर्च और 2 चम्मच चीनी को एक कप पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े की 3 खुराक दिन में 3 बार लेने से मलेरिया बुखार में लाभ मिलता है।
- तुलसी के 10 पत्ते, 5 ग्राम करंज की गिरी, 10 दाने काली मिर्च तथा 5 ग्राम जीरे आदि को पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। दिन में 3 बार इन 2-2 गोलियों का सेवन करने से मलेरिया में लाभ होता है।
- 10 ग्राम तुलसी के पत्ते और 7 कालीमिर्च को पानी में पीसकर सुबह और शाम लेते रहने से मलेरिया बुखार ठीक होता है।
- तुलसी के 22 पत्ते और 20 पिसी हुई कालीमिर्च को 2 कप पानी में डालकर उबाल लें। जब पानी चौथाई भाग रह जाये तब इसमें मिश्री मिलाकर ठंड़ा करके पीने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
- तुलसी के पत्ते और कालीमिर्च को एकसाथ मिलाकर सेवन करने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।
- तुलसी के पत्तों को प्रतिदिन सेवन करने से मलेरिया नहीं होता है। यदि मलेरिया हो जाए तो बुखार उतरने पर सुबह के समय तुलसी के 15 पत्ते और 10 कालीमिर्च खाने से मलेरिया बुखार दुबारा नहीं होता है।
- तुलसी के सेवन से सभी प्रकार के बुखारों में लाभ होता है। 20 तुलसी के पत्ते, 10 कालीमिर्च और 1 चम्मच शक्कर का काढ़ा मिलाकर सेवन करने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
- गुड़, कालीमिर्च तथा तुलसी का काढ़ा बनाकर नींबू के रस मिलाकर दिन में 3-3 घंटे के अन्तराल से गर्म-गर्म पीना चाहिए। इसके बाद रोगी को कम्बल ओढ़ा देना चाहिए। ऐसा करने से मलेरिया का बुखार दूर हो जाता है।
करंजुआ : 5 ग्राम करंजुआ के बीजों को पीसकर बनी छोटी-छोटी गोली को बुखार आने से 2 घण्टे पहले और बुखार जाने के 2 घण्टे बाद पानी के साथ दिन में 2 बार लेने से लाभ मिलता है।
ढाक : 10 ग्राम ढाक के बीजों की गिरी और 10 ग्राम करंजवा के बीजों के गिरी को पानी में घिसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर सुखा लें। बुखार आने के 4 घण्टे पहले यह 1 गोली पानी के साथ लेने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।
जीरा : 1 चम्मच जीरे को पीसकर 10 ग्राम गुड़ में मिला दें। इसकी 3 खुराक बनाकर बुखार चढ़ने से पहले, सुबह, दोपहर और शाम को पीने से मलेरिया का बुखार नहीं चढ़ता है।
1 चम्मच बिना सेंका हुआ जीरा लेकर पीस लें। इसको 3 गुना गुड़ में मिलाकर 3 गोलियां बना लें। निश्चित समय पर ठंड़ लगकर आने वाले मलेरिया के बुखार के आने से पहले 1-1 घण्टे के बीच 1 गोली खाएं। कुछ दिन रोजाना इन गोलियों का प्रयोग करने से मलेरिया का बुखार ठीक हो जाता है।
काला जीरा, एलुआ, सोंठ, कालीमिर्च, बकायन के पेड़ की निंबौली तथा करंजवे की मींगी को पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर दिन में 3-3 घण्टे के अन्तराल में 1-1 गोली खाने से मलेरिया का बुखार उतर जाता है।
प्याज : आधा प्याज का टुकड़ा लेकर उसके रस में एक चुटकी कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह और शाम में पीने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।
हरड़ : 10 ग्राम हरड़ के चूर्ण को 100 मिलीलीटर पानी में पकाकर काढ़ा बना ले। यह काढ़ा दिन में 3 बार पीने से मलेरिया रोग में फायदा होता है।
चकोतरा : चकोतरे के रस को गर्म करके पीने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
मलेरिया के बुखार में चकोतरे का रस विशेष रूप से लाभकारी रहता है क्योंकि इसमें मलेरिया को समाप्त करने वाला तत्व कुनैन प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहता है।
चिरायता : 10 ग्राम चिरायते के रस को 10 मिलीलीटर संतरे के रस में मिलाकर मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को दिन में 3 बार पिलाने से लाभ होता है।
चिरायते का काढ़ा 1 कप की मात्रा में दिन में 3 बार कुछ दिनों तक नियमित पीने से मलेरिया रोग के सारे कष्टों में शीघ्र आराम मिलता है।
नमक : 10 ग्राम सेंधानमक और 40 ग्राम देशी चीनी (बूरा) को मिलाकर बारीक पीस लें। इस चूर्ण को आघा चम्मच रोजाना 3 बार गर्म पानी से लेने से मलेरिया बुखार आना बन्द हो जाता है।
5 चम्मच सेंधानमक को तब तक भूनें जब तक वह भूरे रंग का न हो जायें। इस 1 चम्मच नमक को 1 गिलास गर्म पानी में मिलाकर दिन में 1 बार रोजाना मलेरिया बुखार आने से पहले पीने से लाभ होता हैं। ध्यान रहें कि बुखार आने पर इसका सेवन न करें।
नारंगी : 2 नारंगी के छिलके को 2 कप पानी में उबाल लें। पानी आधा रहने पर छानकर गर्म-गर्म पीनें से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है।
सेब : बुखार में सेब खाने से बुखार जल्दी ठीक होता है। मलेरिया बुखार आने के पहले सेब खाने से बुखार आने के समय बुखार नहीं आता है।
अमरूद : अमरूद और सेब का रस पीने से बुखार उतर जाता हैं।
अमरूद को खाने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
शहद : 20 ग्राम शुद्ध शहद, आधा ग्राम सेंधानमक और आधा ग्राम हल्दी को पीसकर गर्म पानी में डालकर रात को पीने से बुखार और जुकाम ठीक हो जाता हैं।
नीम : 20 ग्राम नीम की जड़ की छाल को कूटकर लगभग 150 मिलीलीटर पानी में मिलाकर मटकी में रात को भिगोकर सुबह पका लें। यह 40 मिलीलीटर पानी शेष रहने पर छानकर इसी प्रकार रात में या दिन में 3 बार पीने से मलेरिया बुखार में आराम मिलता है।
50 ग्राम नीम की जड़ की और बीच की छाल को यवकूट कर 600 मिलीलीटर पानी 18 मिनट तक उबाल कर छान लें। जब रोगी को बुखार चढ़ रहा हो तो इसे 40 से 60 मिलीलीटर की मात्रा में 2 से 3 बार पिलाने से मलेरिया का बुखार रुक जाता है।
मलेरिया के बुखार में नीम के तेल की 5-10 बूंदों को दिन मे 1 या 2 बार सेवन करना चाहिए।
60 ग्राम नीम के हरे पत्ते और 4 कालीमिर्च को पीसकर 125 मिलीलीटर पानी में उबालकर और छानकर पीने से मलेरिया ठीक हो जाता है।
नीम के पत्ते, निंबौली, कालीमिर्च, तुलसी, सोंठ और चिरायता को बराबर मात्रा में मिलाकर एक गिलास पानी में डालकर इतना उबाल लें कि आधा पानी उड़ जाए। फिर इस पानी को छानकर 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार पीने से मलेरिया का बुखार मिट जाता है।
नीम के कोमल पत्तों में आधा ग्राम फिटकरी भस्म मिलाकर कूट लें। फिर इसकी आधा-आधा ग्राम की गोलियां बना लें। यह 1-1 मिश्री के शर्बत के साथ लेने से मलेरिया में लाभ मिलता है।
नीम के थोडे़-से पत्तों और 8 से 10 कालीमिर्च लेकर 1 कप पानी में डालकर उबाल लें। पानी जब आघा कप बचे तो इसे दिन में 2 बार लेने से मलेरिया का बुखार मिट जाता है।
60 ग्राम नीम के हरे पत्ते और 4 कालीमिर्च को मिलाकर पीस लें। फिर इसे 125 मिलीलीटर पानी में डालकर छानकर रोगी को पिलाने से मलेरिया बुखार ठीक हो जाता है।
नीम की 5 पत्तियां, तुलसी के 5 पत्ते और 1 चम्मच नींबू के रस को एकसाथ मिलाकर चटनी बनाकर सुबह और शाम खाने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
10 ग्राम नीम की छाल, 10 ग्राम सूखा धनिया, 10 ग्राम सोंठ का चूर्ण तथा 5 तुलसी के पत्तों को एकसाथ पीसकर काढ़ा बनाकर दिन में 4 बार लेने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
नीम की छाल के काढ़े में धनिया ओर सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से मलेरिया बुखार समाप्त हो जाता है।
नीम की आंतरिक छाल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम, धनिया, सोंठ, लौंग, दालचीली या मिर्च को चिरायता और कुटकी के साथ सुबह और शाम लेने से मलेरिया, विषम, सविराम, शोथयुक्त (सूजन के साथ) आदि बुखार में लाभ होता है।
पित्तपापड़ा : 6 ग्राम पित्तपापड़ा और 3 ग्राम धनिया को एकसाथ मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से पुराने बुखार में शान्ति मिलती है।
हारसिंगार : हारसिंगार के 7-8 पत्तों के रस, अदरक रस और शहद को मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से पुराने से पुराना मलेरिया बुखार समाप्त हो जाता है।
कंटकरंज : कंटकरंज के बीजों का चूर्ण लगभग आधा ग्राम से लेकर 1 ग्राम की मात्रा में कालीमिर्च के साथ सुबह और शाम लेने से मलेरिया, शीतज्वर, सविराम, अविराम आदि बुखार नष्ट हो जाते हैं। ध्यान रहें कि इसे खाली पेट न लें।
रोहिनी (मांस रोहिनी) : रोहिनी की छाल का चूर्ण लगभग आधा ग्राम की मात्रा में दिन में 3 बार देने से या इसका काढ़ा 28 मिलीलीटर को रोजाना 3 बार सेवन करने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता हैं।
महाबला : महाबला की जड़ और सोंठ को मिलाकर काढ़ा बनाकर रख लें। इस काढ़े को 20 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में लेने से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है।
चिरईगोड़ा : चिरईगोडा़ (मिजुरगोरवा) के 50 ग्राम ताजे या छाया में सुखायें पत्तों को लगभग 1 लीटर पानी में 10 से 15 मिनट तक अच्छी तरह से धीमी आग पकाने के लिए रख दें। इसी काढ़े में चीनी मिलाकर चाय की तरह रोजाना दिन भर में मलेरिया के रोगी को 240 मिलीलीटर की मात्रा में पिलाने से लाभ पहुंचता है। ध्यान रहें कि इसका अधिक मात्रा में सेवन न करें।
भुईआंवला : भुई आंवला के पंचांग (तना, पत्ती, फल, फूल और जड़) का काढ़ा बनाकर 20 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह और शाम सेवन करने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।
मिर्च : 3 लालमिर्च को डंठल सहित पानी में पीसकर बायें हाथ की अनामिका अंगुली में लपेटकर, मलमल के कपड़े से बांध लें। कपड़े पर पानी डालते रहें ताकि गीला रहें। इस विधि को बुखार आने से कम से कम 2 घण्टे पहले करने से मलेरिया का बुखार नहीं आता है।
कालीमिर्च का चूर्ण तुलसी के रस और शहद में मिलाकर पीने से मलेरिया का बुखार दूर हो जाता है।
3 ग्राम कालीमिर्च, 3 ग्राम करंज की मींग (गिरी) और 3 ग्राम संहालू के हरे पत्तों को पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। बुखार आने से पहले से यह 1-1 गोली ताजे पानी से 4-4 घण्टे बाद लेने से बुखार में लाभ मिलता है।
कालीमिर्च को तुलसी के पत्तों के रस में मिलाकर 7 भावना (उबाल) देकर सुखा लें। फिर उसकी मटर के बराबर गोलियां बना लें। बुखार आने के 4 घण्टे पहले हर 1-1 घण्टे बाद यह 4 गोलियां खाने से बुखार नहीं चढ़ता है।
7 कालीमिर्च और प्याज से प्राप्त 50 मिलीलीटर रस को सुबह और शाम लेने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
1 हरी मिर्च के बीज को निकालकर बुखार आने के 2 घण्टे पहले अंगूठे में पहना कर बांध दें। इसी प्रकार इसे 2 से 3 बार बांधने से मलेरिया बुखार आना बन्द हो जाता हैं। हरी मिर्च बांधने से जलन होती है। ध्यान रहें कि जितनी देर तक सहन हों तो बांधे रखें फिर खोल दें।
मल्लसिन्दूर : लगभग एक चौथाई से कम मल्लसिन्दूर को तुलसी के पत्ते का रस के साथ सुबह और शाम लेने से मलेरिया का बुखार कम हो जाता है।
शिलासिन्दूर: लगभग एक चौथाई से कम की मात्रा में शिलासिन्दूर को 10 मिलीलीटर तुलसी के पत्तों के रस के साथ बुखार आने से पहले 2-2 घण्टे के अन्तराल पर देने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
कूठ : लगभग आधा ग्राम कूठ को घी और शहद के साथ सुबह और शाम सेवन करने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
श्रंगरहार (परिजात) : श्रंगरहार के पत्तों को यवकुट कर काढ़ा बनाकर सुबह और शाम 20 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से मलेरिया बुखार में राहत मिलती है।
धनिया : धनिया और सौंठ को पीसकर बराबर मात्रा में मिलाकर रोजाना दिन में 3 बार पानी से फंकी लेने से बुखार में राहत मिलती है।
आधा चम्मच पिसा हुआ धनिया, आधा चम्मच सोंठ, आधा चम्मच अजवाइन और चुटकीभर सेंधानमक को मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को दिन में 3 बार प्रयोग करने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
धनिया और सोंठ को बराबर की मात्रा में पीसकर आधा-आधा चम्मच खुराक के रूप में रोजाना 3 बार खाने से ठंड़ देकर आने वाला बुखार मिट जाता है।
पीपल : पीपल के 3 पत्तों को पीसकर शहद में मिलाकर चाटने से श्वास (दमा), खांसी के साथ मलेरिया बुखार भी ठीक होता है।
छाछ : छाछ पीने से हर चौथे दिन आने वाला मलेरिया का बुखार ठीक होता है।
लहसुन : लहसुन की 3 से 4 कलियों को छीलकर घी में मिलाकर खाने से मलेरिया की ठंड उतर जाती है।
अगर मलेरिया का बुखार सही समय पर आता हो तो लहसुन का रस हाथ पैरो के नाखूनों पर बुखार के आने से पहले लेप करें और 1 चम्मच लहसुन का रस 1 चम्मच तिल के तेल में मिलाकर जब तक बुखार न आए 1-1 घण्टे के बाद में जीभ पर लगाकर चूसें। इस तरह यह प्रयोग 3 से 4 दिन तक करने से मलेरिया का बुखार ठीक हो जाता है।
मुलेठी : 10 ग्राम छिली हुई मुलेठी, 5 ग्राम खुरासानी अजवाइन तथा थोड़े से सेंधानमक को एकसाथ मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से मलेरिया का बुखार दूर होता है।
आक : थोड़े-से आक के पत्तों पर नमक लगाकर उन्हें जलाकर राख बना लें। इस राख में से 2 चुटकी राख को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है।
आधा ग्राम आक की जड़ की छाल को सुबह और शाम पान में डालकर सेवन करने से मलेरिया के बुखार में राहत मिलती है।
अड़ूसा (बाकस) : अड़ूसा की जड़ की छाल को आधा ग्राम से 1 ग्राम या पत्ते के चूर्ण लगभग 1 चौथाई से कम की मात्रा में सुबह और शाम शहद के साथ सेवन करने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
शीतभज्जी : लगभग एक चौथाई शीतभज्जी का रस, पान के रस व शहद के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।
गोदन्ती : लगभग एक चौथाई से कम की मात्रा में गोदन्ती और इतनी की मात्रा में शुद्ध स्फटिका को एकसाथ मिलाकर मलेरिया का बुखार आने से पहले 2 घंटे पहले लेने से बुखार नहीं चढ़ता है।
जवाखार : 3 ग्राम जवाखार और 3 ग्राम पीपल को पीसकर गुड़ में मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर रख लें। सुबह और शाम 1-1 गोली को गर्म पानी से लेने से मलेरिया का बुखार उतर जाता है।
कपूरचूरा : 5 ग्राम कपूरचूरा को पानी से सेवन करने से मलेरिया के कारण लगने वाली ठंड़ उतर जाती है।
हींग : 2 ग्राम हींग को 2 ग्राम गुड़ में मिलाकर सुबह और शाम लेने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
सफेद कत्था : 10 ग्राम सफेद कत्था और 6 ग्राम मल्लसिन्दूर को एकसाथ मिलाकर पीस लें। फिर इसे नीम के रस में घोटकर उड़द के रूप में गोलियां बना लें। बुखार आने से 1 घण्टे पहले यह गोली लेने से जवानों का बुखार उतर जाता है। ध्यान रहें की यह गोली बच्चों और गर्भवती स्त्रियों को नहीं लेनी चाहिए।
गुड़ : 10 ग्राम गुड़ और 3 ग्राम कालाजीरा को एक साथ मिलाकर दिन में 4 बार 2-2 घण्टे के अन्तराल से 2-3 ग्राम की मात्रा में खाने से मलेरिया का बुखार नहीं होता है।
गिलोय : गिलोय का 5 अंगुल लम्बा टुकड़ा और 15 कालीमिर्च को मिलाकर और कूटकर 250 मिलीलीटर पानी में डालकर उबाल लें। जब यह पानी लगभग 50 मिलीलीटर की मात्रा में रह जाए तो इसे छानकर पीने से मलेरिया का बुखार दूर हो जाता है।
गिलोय (गुरूच) के काढ़े या रस में छोटी पीपल और शहद को मिलाकर 40 से 80 मिलीलीटर की मात्रा में रोजाना सेवन करने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता हैं।
बेल : बेल के पत्ते का रस 7 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह और शाम लेने से मलेरिया के बुखार में लाभ मिलता है।
नाड़ी हिंगु (डिकामाली) : आधा से 2 ग्राम नाड़ी हिंगु को गर्म पानी मे घोलकर, छान लें। इस घोल को सुबह और शाम लेते रहने से नियतकालिक बुखार में आने वाला कंपन कम हो जाता है।
कुटकी : 5 से 10 ग्राम कुटकी के चूर्ण को शहद के साथ सुबह और शाम लेने से नियतकालिक बुखार नष्ट होता है।
इन्द्रायव : इन्द्रायव के भूने हुए चूर्ण को 1 से 4 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सुबह और शाम सेवन करने से पर्यायिक और शीत बुखार कम हो जाता है। इसका काढ़ा गुर्च (गिलोय) के साथ बनाकर लेने से लाभ होता है।
मैनफल : मैनफल का गूदा, लौंग और दालचीनी के साथ लेने से 1 से 2 ग्राम की मात्रा में लेने से पारी से आने वाले बुखार में लाभ होता हैं। ध्यान रहें कि इसका अधिक सेवन करने से उल्टी (वमन) हो सकती है।
सत्यानाशी (पीला धतूरा) : पीला धतूरा का दूध 1 से 2 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम नींबू के रस के साथ घोटकर पीने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता हैं।
भारंगी (बभनेटी) : बभनेटी के पत्तों की सब्जी बनाकर खिलाने से मलेरिया के रोगी को बुखार से छुटकारा मिलता है।
आकड़ा : आकड़े के फूल की दो डोडी (बिना खिले फूल) को जरा-से गुड़ में लपेटकर मलेरिया ज्वर आने से पहले खाने से मलेरिया ज्वर नहीं चढ़ता है।
दूब हरी : मलेरिया ज्वर में दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर दिन में 2-3 बार चाटने से, पारी से चढ़ने वाले मलेरिया ज्वर में लाभ मिलता है।
फिटकरी : 1 ग्राम फिटकरी को 2 ग्राम चीनी में मिलाकर मलेरिया का बुखार आने से 2-2 घंटे पहले लेने से मलेरिया का बुखार नहीं आएगा और आएगा तो भी कम। फिर जब दूसरी बार भी मलेरिया का बुखार आने वाला हो तब इसी प्रकार से दे सकते हैं। ध्यान रहें कि रोगी को कब्ज नहीं होना चाहिए और यदि कब्ज हो तो पहले कब्ज को दूर करें।
1 ग्राम फिटकरी को फूले बताशे में डालकर मलेरिया बुखार आने से 2 घण्टे पहले रोगी को खिलाने से बुखार कम चढ़ता हैं।
1 ग्राम खाण्ड और 2 ग्राम भुनी फिटकरी को एकसाथ मिलाकर दिन में 2 बार पीने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
फूली हुई फिटकरी के चूर्ण में 4 गुना पिसी हुई खांड या चीनी को अच्छी तरह मिलाकर रख लें। इसे 2 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ एक दिन में 3 बार लेने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
कलौंजी : आधा चम्मच पिसी हुई कलौजी को 1 चम्मच शहद में मिलाकर चाटने से चौथे दिन आने वाला बुखार ठीक हो जाता है।
अजवाइन : मलेरिया बुखार के बाद हल्का-हल्का बुखार रहने लगता है। इसके लिए 10 ग्राम अजवाइन को रात में 100 मिलीलीटर पानी में भिगों दें और सुबह पानी गुनगुना करके जरा सा नमक डालकर कुछ दिन तक सेवन करने से बुखार मे आराम होता हैं।
नींबू : नींबू के 2 भाग कर लें। इसके पहले भाग में पिसी हुई कालीमिर्च और सेंधानमक भरकर तथा दूसरे भाग में मिश्री भरकर दोनों को गर्म करके चूसने से और वर्षा ऋतु के बाद आने वाला आन्त्रज्वर (टायफाइड), पित्तवमन आदि दूर हो जाते हैं।
बुखार आने से 2 घण्टे पहले कालीमिर्च, नमक और फिटकरी को बराबर मात्रा में पीसकर आधे नींबू पर लगाकर चूसें। नींबू को गर्म किये बिना दूसरा आधा टुकड़ा इसी प्रकार एक घण्टे के बाद चूसने से मलेरिया बुखार और मौसमी बुखार भी ठीक हो जाता हैं।
एक कप गर्म पानी में 2 चम्मच नींबू का रस मिलाकर पीने से बुखार का ताप गिर जाता है। 2 नींबू को काटकर 250 मिलीलीटर पानी में उबालकर पानी आधा शेष रह जाने पर छान लें। फिर इसमें 2 ग्राम सेंधानमक मिलाकर इसी प्रकार 2-3 दिन तक लगातार एक दिन मे 3 बार पीने करने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता हैं। ध्यान रहें कि इस औषधि के प्रयोग के समय भोजन न करें।
नींबू के रस को तेज कहवा में बिना दूध मिलाये हुए पीने से मलेरिया का बुखार दूर होता है।
नींबू और गन्ने का रस पीने से मलेरिया के बुखार में बहुत लाभ होता हैं।
आधे नींबू पर कालीमिर्च और कालानमक का चूर्ण लगाकर धीरे-धीरे चूसने से मलेरिया का बुखार दूर होता है।
आधे नींबू के रस में 4 चम्मच पानी और चीनी को मिलाकर दिन में 2 से 3 बार पीने से 3-4 दिन में ही मलेरिया का बुखार ठीक हो जाता है।
नींबू में नमक और कालीमिर्च को भरकर दिन में 2 बार चूसने से मलेरिया का बुखार उतर जाता है।
2 नींबू के छिलको के रस को 500 मिलीलीटर पानी में मिलाकर मिट्टी की हांडी या स्टील के भगोने (बर्तन) में रात को उबालकर आधा रहने पर रख दें। सुबह उठकर इस पानी को पीने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता हैं।
नींबू के रस को पानी में मिलाकर फिर उसमें इच्छानुसार चीनी मिलाकर पीने से मलेरिया बुखार 4 दिन में आना बन्द हो जाता हैं। कुनेन खाने से कानों में सांय-सांय की आवाज हो तो यह भी इससे ठीक हो जाती हैं। कुनेन के साथ नींबू और दूध का भी प्रयोग कर सकते हैं।
अमरूद : मलेरिया बुखार में अमरूद का सेवन लाभप्रद है। इसके नियमित सेवन से तिजारा और चौथिया ज्वर में भी आराम मिलता है।
अमरूद को खाने से इकतारा तथा चतुर्थक ज्वर में लाभ होता है।
भांग : शुद्ध भांग का चूर्ण 1 ग्राम, गुड़ 2 ग्राम, दोनों को मिलाकर 4 गोलियां बना लेते हैं। जाड़े का बुखार दूर करने के लिए 1-2 गोली 2-2 घंटे के अन्तर से दें या शुद्ध भांग की 1 ग्राम गोली बुखार में 1 घंटा पहले देने से बुखार का वेग कम हो जाता है।
श्योनाक : श्योनाक की लकड़ी का छोटा सा प्याला बना लें। रात को इसमें पानी रखकर और सुबह के समय उठकर इस पानी को पीने से नियतकालिक बुखार, एकान्तरा, तिजारी, चौथियां आदि के जहरीले बुखारों का नाश होता है।
श्योनाक, शुंठी, बेल के फल की गिरी, अनारदाना, अतीस को बराबर मात्रा में लेकर यवकूट कर लें। इसमें से 10 ग्राम औषधि, 500 लीटर पानी में उबालें। जब यह पानी 125 मिलीलीटर की मात्रा में जब बच जाये तब इसे छानकर सुबह, दोपहर तथा शाम को पीने से सब तरह के बुखार व अतिसार नष्ट हो जाते हैं।
अपामार्ग : अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च को बराबर की मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के बराबर की गोलियां तैयार कर लें। जब मलेरिया फैल रहा हो, उन दिनों यह 1-1 गोली सुबह-शाम भोजन करने के बाद नियमित रूप से सेवन करने से मलेरिया के बुखार का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का 2-4 दिन सेवन करना पर्याप्त होता है।
बैंगन : कोमल बैंगन को अंगारों पर सेंककर रोजाना सुबह के समय खाली पेट गुड़ के साथ खाने से मलेरिया बुखार से तिल्ली बढ़ जाने में और उसके कारण शरीर पीला पड़ जाने में लाभ होता है।
अतीस : 1 ग्राम अतीस के चूर्ण और 2 कालीमिर्च के चूर्ण को एक साथ मिलाकर दिन में 3-4 बार पानी से सेवन करने से मलेरिया का बुखार दूर हो जाता है।
आयापान : आयापान के 20 ग्राम पंचाग को 400 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालते हैं। जब यह पानी एक चौथाई की मात्रा में शेष रह जाता है तो इसे ठंड़ा कर लेते हैं। इस पानी को 5 से 10 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
आयापान के पत्ते का रस 10 से 20 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से मलेरिया बुखार मिट जाता है।
नमक का ये आसान प्रयोग कर देगा हर तरह के बुखार की छुट्टी
बदलते मौसम में बुखार की चपेट में आना एक आम बात है। कभी वायरल फीवर के नाम परतो कभी मलेरिया जैसे नामों से यह सभी को अपनी चपेट में ले लेता है। फिर बड़ा आदमी हो या कोई बच्चा इस बीमारी की चपेट में आकर कई परेशानियों से घिर जाते हैं। कई बुखार तो ऐसे हैं जो बहुत दिनों तक आदमी को अपनी चपेट में रखकर उसे पूरी तरह से कमजोर बना देता है। पर घबराइए नहीं सभी तरह के बुखार की एक अचूक दवा है भुना नमक। इसके प्रयोग किसी भी तरह के बुखार को उतार देता है।
भुना नमक बनाने की विधि- खाने मे इस्तेमाल आने वाला सादा नमक लेकर उसे तवे परडालकर धीमी आंच पर सेकें। जब इसका कलर कॉफी जैसा काला भूरा हो जाए तो उतार कर ठण्डा करें। ठण्डा हो जाने पर एक शीशी में भरकर रखें।जब आपको ये महसूस होने लगे की आपको बुखार आ सकता है तो बुखार आने से पहले एक चाय का चम्मच एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर ले लें। जब आपका बुखार उतर जाए तो एक चम्मच नमक एक बार फिर से लें। ऐसा करने से आपको बुखार कभी पलट कर नहीं आएगा।
विशेष :
- – हाई ब्लडप्रेशर के रोगियों को यह विधि नहीं अपनानी चाहिए।
- – यह प्रयोग एक दम खाली पेट करना चाहिए इसके बाद कुछ खाना नहीं चाहिए और ध्यान रखें कि इस दौरान रोगी को ठण्ड न लगे।
- – अगर रोगी को प्यास ज्यादा लगे तो उसे पानी को गर्म कर उसे ठण्डा करके दें।
- – इस नुस्खे को अजमाने के बाद रोगी को करीब 48 घंटे तक कुछ खाने को न दें। और उसके बाद उसे दूध चाय या हल्का दलिया बनाकर खिलाऐं।
सादा बुखार :
सादे बुखार में उपवास अत्यधिक लाभदायक है। उपवास के बाद पहले थोड़े दिन मूँग लें फिर सामान्य खुराक शुरु करें। ऋषि चरक ने लिखा है कि बुखार में दूध पीना सर्प के विष के समान है अतः दूध का सेवन न करें।
पहला प्रयोगः सोंठ, तुलसी, गुड़ एवं काली मिर्च का 50 मि.ली काढ़ा बनाकर उसमें आधा या 1 नींबू निचोड़कर पीने से सादा बुखार मिटता है।
दूसरा प्रयोगः शरीर में हल्का बुखार रहने पर, थर्मामीटर द्वारा बुखार न बताने पर थकान, अरुचि एवं आलस रहने पर संशमनी की दो-दो गोली सुबह और रात्रि में लें। 7-8 कड़वे नीम के पत्ते तथा 10-12 तुलसी के पत्ते खाने से अथवा पुदीना एवं तुलसी के पत्तों के एक तोला रस में 3 ग्राम शक्कर डालकर पीने से हल्के बुखार में खूब लाभ होता है।
तीसरा प्रयोगः कटुकी, चिरायता एवं इन्द्रजौ प्रत्येक की 2 से 5 ग्राम को 100 से 400 मि.ली. पानी में उबालकर 10 से 50 मि.ली. कर दें। यह काढ़ा बुखार की रामबाण दवा है।
चौथा प्रयोगः बुखार में करेले की सब्जी लाभकारी है।
पाँचवाँ प्रयोगः मौठ या मौठ की दाल का सूप बनाकर पीने से बुखार मिटता है। उस सूप में हरी धनिया तथा मिश्री डालने से मुँह अथवा मल द्वारा निकलता खून बन्द हो जाता है।
ऐसे में बिना डॉक्टर के परामर्श दवा खाने से अच्छा है कि आप घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खों को अपनाएं।
आज हम आपको बताने जा रहे हैं नानी का एक खास औषधि। इस औषधि को चिरायता कहा जाता है।
कैसा भी बुखार हो चिरायता एक ऐसी देहाती जड़ी- बूटी मानी जाती है जो कुनैन की गोली से अधिकप्रभावी होती है। एक प्रकार से यह एक देहाती घरेलू नुस्खा है।पहले चिरायते को घर में सुखा कर बनाया जाता था लेकिन
आजकल यह बाजार में कुटकी चिरायते के नाम से भी मिलता है।
लेकिन घर पर बना हुआ ताजा और विशुद्ध चिरायता ही अधिक कारगर होता है।
*चिरायता बनाने की विधि-
100 ग्राम सूखी तुलसी के पत्तेका चूर्ण, 100 ग्राम नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, 100 ग्राम सूखे चिरायते का चूर्ण लीजिए। इन तीनों को समान मात्रा में मिलाकर एक बड़े डिब्बे में भर कर रख लीजिए। यह तैयार चूर्ण मलेरिया या अन्य बुखार होने की स्थिति में दिन में तीन बार दूध से सेवन करें। मात्र दो दिन में आश्चर्यजनक लाभ होगा।
कारगर *एंटीबॉयोटिक- बुखार ना होने की स्थिति में भी यदि इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें तो यह चूर्ण किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह स्वाइन फ्लू ही क्यों ना हो, उसे शरीर से दूर रखता है। इसके सेवन से शरीर के सारे कीटाणु मर जाते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। इसके सेवन से खून साफ होता है तथा धमनियों में रक्त प्रवाह सुचारू रूप से संचालित होता है।
डेंगू बुखार का इलाज :–
गिलोय बेल की डंडी ले! डंडी के छोटे टुकड़े करे!
2 गिलास पानी मे उबाले! जब पानी आधा रह जाये!
ठंडा होने पर रोगी को पिलाये!
मात्र 45 मिनट बाद cell बढ़ने शुरू हो जाएँगे!!
इससे अच्छा और सस्ता कोई इलाज नहीं डेंगू बुखार का!
मलेरिया बुखार की खास दवा
सादा खाने का नमक पिसा हुआ लेकर तवे पर इतना सेंके कि उसका रंगकाला भूरा हो जाये । ठण्डा होने पर शीशी में भर लें । मलेरिया, विषमज्वर, एंकातरा – पारी तिजारी, चौथारी, चौथारी बुखारों की खास दवा है ।ज्वर आने से पहले छ: ग्राम भुना नमक एक गिलास गर्म पानी में मिलाकरदें| इन दो खुराकों में ज्वर चला जायेगा ।
विशेष – अधिक उच्च रक्तताप के रोगी और वृध्दों के लिये उपरोक्त नमक का प्रयोग न करें या सावधानीपूर्वक करें । यहाँ औषधि खाली पेट गुण करती है । अत: इस बात का ध्यान रखें कि रोगी कुछ न खाये और उसे ठण्ड न लगने पाए ।
– गेंदे के फूलों का रस 1 से 2 ग्राम की मात्रा में प्रयोग करने सेबुखार में लाभ मिलता है.
10-12 तुलसी के पत्ते तथा 8-10 काली मिर्च के चाय बनाकर पीने से खांसी जुकाम, बुखार ठीक होता है।
तुलसी रस सेबुखारउतर जाता है। इसे पानी में मिलाकर हर दो-तीन घंटे में पीने से बुखार कम हो जाता है।
तुलसी सौंठ के साथ सेवन करने से लगातार आने वालाबुखार ठीक होता है।
तुलसी, अदरक, मुलैठी सबको घोटकर शहद के साथ लेने से सर्दी के बुखार में आराम होता है।
यदि तुलसी की 11 पत्तियों का 4 खड़ी कालीमिर्च के साथ सेवन किया जाए तो मलेरिया एवं मियादी बुखार ठीक किए जा सकते हैं।
डेंगू का उपचार :–
आजकल डेंगू एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा है, जिससे कई लोगों की जान जा रही है l
यह एक ऐसा वायरल रोग है जिसका मेडिकल चिकित्सा पद्धति में कोई इलाज नहीं है परन्तु आयुर्वेद में इसका इलाज है और वो इतना सरल और सस्ता है की उसे कोई भी कर सकता है l
तीव्र ज्वर, सर में तेज़ दर्द, आँखों के पीछे दर्द होना, उल्टियाँ लगना, त्वचा का सुखना तथा खून के प्लेटलेट की मात्रा का तेज़ी से कम होना डेंगू के कुछ लक्षण हैं जिनका यदि समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी की मृत्यु भी सकती है l
यदि आपके किसी भी जानकार को यह रोग हुआ हो और खून में प्लेटलेट की संख्या कम होती जा रही हो तो चित्र में दिखाई गयी चार चीज़ें रोगी को दें :
१) अनार जूस
२) गेहूं घास रस३) पपीते के पत्तों का रस
४) गिलोय/अमृता/अमरबेल सत्व
– अनार जूस तथा गेहूं घास रस नया खून बनाने तथा रोगी की रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए है, अनार जूस आसानी से उपलब्ध है यदि गेहूं घास रस ना मिले तो रोगी को सेब का रस भी दिया जा सकता है l
– पपीते के पत्तों का रस सबसे महत्वपूर्ण है, पपीते का पेड़ आसानी से मिल जाता है उसकी ताज़ी पत्तियों का रस निकाल कर मरीज़ को दिन में २ से ३ बार दें , एक दिन की खुराक के बाद ही प्लेटलेट की संक्या बढ़ने लगेगीl
– गिलोय की बेल का सत्व मरीज़ को दिन में २-३ बार दें, इससे खून में प्लेटलेट की संख्या बढती है, रोग से लड़ने की शक्ति बढती है तथा कई रोगों का नाश होता है l यदि गिलोय की बेल आपको ना मिले तो किसी भी नजदीकी पतंजली चिकित्सालय में जाकर “गिलोय घनवटी” ले आयें जिसकी एक एक गोली रोगी को दिन में 3 बार दें l
यदि बुखार १ दिन से ज्यादा रहे तो खून की जांच अवश्य करवा लें l
यदि रोगी बार बार उलटी करे तो सेब के रस में थोडा नीम्बू मिला कर रोगी को दें, उल्टियाँ बंद हो जाएंगी l
ये रोगी को अंग्रेजी दवाइयां दी जा रही है तब भी यह चीज़ें रोगी की बिना किसी डर के दी जा सकती हैं l
डेंगू जितना जल्दी पकड़ में आये उतना जल्दी उपचार आसान हो जाता है और रोग जल्दी ख़त्म होता है l
रोगी के खान पान का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि बिना खान पान कोई दवाई असर नहीं करती
Source : http://www.ayurmyntra.com/%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B0/
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टाइफाइड बुखार से बचाव के लिए घरेलू इलाज
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टाइफाइड एक खतरनाक बीमारी होती है।
लगातार घटता बढ़ता रहता है तापमान।
घरेलु उपायों से भी हो सकता है इलाज।
शरीर में कम ना होने दें पानी की कमी।
टाइफाइड एक खतरनाक बीमारी है, इस बीमारी में तेज बुखार आता है, जो कई दिनों तक बना रहता है। यह बुखार कम-ज्यादा होता रहता है, लेकिन कभी सामान्य नहीं होता। टाइफाइड का इन्फेक्शन होने के एक सप्ताह बाद रोग के लक्षण नजर आने लगते हैं। कई बार दो-दो माह बाद तक इसके लक्षण दिखते हैं। टाइफाइड और बुखार का घरेलू इलाज से बचाव किया जा सकता है।
बुखार से बचाव के घरेलू इलाज-
- • पान का रस, अदरक का रस और शहद को बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम पीने से आराम मिलता है।
- • यदि जुकाम या सर्दी-गर्मी में बुखार हो तो तुलसी, मुलेठी, गाजवां, शहद और मिश्री को पानी में मिलाकर काढा बनाएं और पीएं। इससे जुकाम सही हो जाता है और बुखार भी जल्द ही उतर जाता है।
- • गर्मी के मौसम में टायफायड होने पर लू लगने के कारण बुखार होने का खतरा रहता है। ऐसे में आप कच्चे आम को आग या पानी में पकाकर इसका रस पानी के साथ मिलाकर पीएं।
- • जलवायु परिवर्तन की वजह से बुखार होने तुलसी की चाय पीने से आराम मिलता है। इसके लिए 20 तुलसी की पत्तियां, 20 काली मिर्च, थोड़ी सी अदरक, जरा सी दालचीनी को पानी में डालकर खूब खौलाएं। अब इस मिश्रण को आंच से उतारकर छानें और इसमें मिश्री या चीनी मिलाकर गर्म-गर्म पीएं।
- • तुलसी और सूर्यमुखी के पत्तों का रस पीने से भी टायफायड बुखार ठीक होते हैं। करीब तीन दिन तक सुबह-सुबह इसका प्रयोग करें।
टायफायड के अलावा, बुखार के कई और कारण भी हो सकते हैं, ऐसे में कुछ बातों का रखें ख्याल
- • बुखार में रोगी को अधिक से अधिक आराम की जरूरत होती है। भोजन का खास ख्याल रखें। बुखार होने पर दूध, साबूदाना, चाय, मिश्री आदि हल्की चीजें खाएं। मिश्री का शर्बत, मौसमी का रस, सोडा वाटर और कच्चे नारियल का पानी जरूर पीये।
- • पानी खूब पीएं और पीने के पानी को पहले गर्म करें और उसे ठंडा होने के बाद पीये। अधिक पानी पीने से शरीर का जहर पेशाब और पसीने के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है।
- • लहसुन की कली पांच से दस ग्राम तक काटकर तिल के तेल में या घी में तलकर सेंधा नमक डालकर खाने से सभी प्रकार का बुखार ठीक होता है।
- • तेज बुखार आने पर माथे पर ठंडे पानी का कपड़ा रखें तो बुखार उतर जाता है,और बुखार की गर्मी सिर पर नहीं चढ़ती है।
- • फ्लू में प्याज का रस बार-बार पीने से बुखार उतर जाता है,और कब्ज में भी आराम मिलता है।
- • पुदीना और अदरक का काढ़ा पीने से बुखार उतर जाता है। काढ़ा पीकर घंटे भर आराम करें, बाहर हवा में न जाएं।
- घरेलू दवाओं से यदि आपको आराम न मिले, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और उसके निर्देशानुसार इलाज करवाएं।

स्रोत : By Aditi Singh, ओन्ली माई हैल्थ सम्पादकीय विभाग Nov 23, 2015 : http://www.onlymyhealth.com/typhoid-bukhar-se-bachav-ke-gharelu-upchar-1339053075#pliip1
गिलोय-गुडूची जो अमृता है!
परिचय: गिलोय की बेल पूरे भारत में पाई जाती है। इसकी आयु कई वर्षों की होती है। इसका काण्ड/डंठल छोटी अंगुली से लेकर अंगूठे जितना मोटा हो सकता है। इसके पत्ते पान के आकार के होते हैं। इसमें ग्रीष्म ऋतु में छोटे-छोटे पीले रंग के गुच्छों में फूल आते हैं। इसके फल मटर के दाने के आकार के होते हैं जो पकने पर लाल हो जाते हैं।
नाम: मधुपर्णी, अमृता, तंत्रिका, कुण्डलिनी गुडूची आदि इसी के नाम हैं।
श्रृष्ठ गिलोय: नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलोय को औषधीय दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
मात्रा: एक वयस्क के लिये गिलोय चूर्ण के रूप में 3 से 6 ग्राम, सत के रूप में 2 ग्राम तक तथा क्वाथ के रूप में 50 से 100 मि.ली. की मात्रा लाभकारी व संतुलित होती है।
औषधीय उपयोग: औषधि के रूप में गिलोय के जड़, काण्ड तथा पत्तों का प्रयोग किया जाता है। इनके अलावा गिलोय का धनसत्व भी प्रयोग किया जाता है। इसे चूर्ण, छाल, रस और काढ़े के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और इसके तने को कच्चा भी चबाया जा सकता है।
घनसत्व बनाने की विधि: घनसत्व तैयार करने के लिए ताजा गिलोय की बेल को एक या दो इंच के टुकड़ों में काट कर उन्हें कुचल लें। इस कुचले हुए गिलोय को कांच या मिट्टी के बर्तन में लगभग चार घंटे के लिए भिगो दें। चार घंटे बाद हाथों से मल−मलकर गिलोय बाहर फेंक दें और पानी को कपड़े से छानकर तीन-चार घंटे पड़ा रहने दें इससे इसका सत्व तेजी से तली में बैठ जाता है। बाद में सावधानी पूर्वक पानी को दूसरे बर्तन में निकाल लें और बर्तन में नीचे जमी/बची सफेद तलछट को धूप में सुखा लें। यही मटमैले रंग की तलछट गिलोय का धनसत्व कहलाता है। इसका प्रयोग तीन महीने तक किया जा सकता है।
या
घनसत्व तैयार करने की विधि इस प्रकार है-हो सके तो नीम पर चढ़ी हुई, नहीं तो सामान्य गिलोय बेल जो ताजा, रसदार चमकीली हो, लेकर उसकी एक या दो-दो इंच के टुकड़े कर लें। उन टुकड़ों को पत्थर से कुचल कर एक साफ बरतन में (कांच या मिट्टी का) पानी के अन्दर गला दें। चार घंटे पश्चात उन्हें हाथों से मल-मल कर बाहर निकाल कर फेंक दें। पानी को कपड़े से छानकर 3-4 घंटे पड़ा रहने दें, जिससे गिलोय सत्व बरतन की पेंदी में जम जाए। धीरे-धीरे उस पानी को दूसरे बरतन में निकाल लें और नीचे जो सफेद रंग का सत्व जमा हो, उसे निकाल कर धूप में सुखा लें। यह मटमैला रंग का पदार्थ ही गिलोय घन सत्व है इसे लगभग तीन माह तक प्रयुक्त कर सकते हैं।
पंचामृत: गिलोय रस 10-20 मिलीग्राम, घृतकुमारी रस 10-20 मिलीग्राम, गेहूँ का जवारा 10-20 मिलीग्राम, तुलसी 7 पत्ते, नीम 2 पत्ते, सुबह शाम खली पेट सेवन करने से कैंसर से लेकर सभी असाध्य रोगों में लाभ होता है। यह पंचामृत शरीर की शुद्धि व रोग प्रतिरोधक क्षमता/Disease Resistance के लिए अत्यंत लाभकारी है। इसे रसायन के रूप में शुक्रहीनता दौर्बल्य में भी प्रयोग करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह शुक्राणुओं के बनने की और उनके सक्रिय होने की प्रक्रिया को बढ़ाती है। इस प्रकार यह औषधि एक समग्र कायाकल्प योग है। साथ ही शोधक भी तथा शक्तिवर्धक भी है।
पाये जाने वाले तत्व: गिलोय के काण्ड में स्टार्च के अलावा अनेक जैव सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। इसमें तीन प्रकार के एल्केलाइड पाए जाते हैं, जिनमें बरबेरीन प्रमुख है। इसमें एक कड़वा ग्लूकोसाइड 'गिलोइन' भी पाया जाता है। इसके धनसत्व में जो स्टार्च होता है, वह ताजे में 4 प्रतिशत से लेकर सूखे में 1.5 प्रतिशत होता है।
प्रमुख गुण:
मुख्य रूप से गिलोय का
मुख्य रूप से गिलोय का
उल्टी,
बेहोशी,
कफ,
पीलिया,
धातू विकार,
सिफलिस,
एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार,
चर्म रोग,
झाइयां,
झुर्रियां,
कमजोरी,
गले के संक्रमण,
खाँसी,
छींक,
विषम ज्वर नाशक,
सुअर फ्लू,
बर्ड फ्लू,
टाइफायड,
मलेरिया,
कालाजार,
डेंगू,
पेट कृमि,
पेट के रोग,
सीने में जकड़न,
शरीर का टूटना या दर्द,
जोडों में दर्द,
रक्त विकार,
निम्न रक्तचाप,
हृदय दौर्बल्य,
क्षय (टीबी),
लीवर,
किडनी,
मूत्र रोग,
मधुमेह,
रक्तशोधक,
रोग पतिरोधक,
गैस,
बुढापा रोकने वाली,
खांसी मिटाने वाली,
भूख बढ़ाने वाली पाकृतिक औषधि के रूप में खूब प्रयोग होता है।
गिलोय भूख बढ़ाती है, शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है।
1-रोगाणूनाशक: आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोग निष्कर्ष-गिलोय की रोगाणुनाशी क्षमताओं पर बड़े विशाल स्तर पर प्रयोग हुए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार सूक्ष्मतम विषाणु समूह से लेकर स्थूल कृमियों तक इसका प्रभाव होता है। 'इण्डियन जनरल ऑफ एक्सपेरीमेण्टल बायोलॉजी' (6, 245, 1938) के अनुसार प्रायोगिक परीक्षणों में पाया गया कि वायरस पर गिलोय का घातक प्रभाव होता है।
2-डेंगू और मलेरिया: गिलोय ऐसी आयुर्वेदिक बेल है, जिसमें सभी प्रकार के ज्वर विशेषकर डेंगू और मलेरिया रोगों से लड़ने के गुण हैं। आयुर्वेद के विशेषज्ञों का मानना है कि गिलोय का इस्तेमाल डेंगू पीडि़तों के लिए वरदान साबित हो सकता है। शोधों से ज्ञात हुआ है कि गिलोय ज्वर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए काफी कारगर साबित हुआ है। बुखार को ठीक करने का इसमें अद्भुत गुण है। यह मलेरिया पर अधिक प्रभावी नहीं है, लेकिन शरीर की समस्त मेटाबोलिक क्रियाओं को व्यवस्थित करने के साथ सिनकोना चूर्ण या कुनाईन (कोई भी एंटी मलेरियल) औषधि के साथ देने पर उसके घातक प्रभावों को रोक कर शीघ्र लाभ देती है।
आजकल डेंगू एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा है, जिससे कई लोगों की जान जा रही है। यह एक ऐसा वायरल रोग है, जिसका मेडिकल चिकित्सा पद्धति में कोई इलाज नहीं है, परन्तु आयुर्वेद में इसका इलाज है और वो इतना सरल और सस्ता है की उसे कोई भी कर सकता है।
लक्षण: तीव्र ज्वर, सर में तेज़ दर्द, आँखों के पीछे दर्द होना, उल्टियाँ लगना, त्वचा का सूखना तथा खून के प्लेटलेट की मात्रा का तेज़ी से कम होना डेंगू के कुछ लक्षण हैं, जिनका यदि समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी की मृत्यु भी सकती है।
3-प्लेटलेट्स: अगर रोगी के प्लेटलेट्स बहुत कम हो गए हैं, तो चिंता की बात नहीं, एलोवीरा और गिलोय मिलाकर सेवन करने से प्लेटलेट्स तेजी से बढ़ते हैं। गिलोय इसमें पपीता के 3-4 पत्तों का रस मिलाकर दिन में तीन चार लेने से रोगी को प्लेटलेट की मात्रा में तेजी से इजाफा होता है। प्लेटलेट बढ़ाने का इस से बढ़िया कोई इलाज नहीं है। यह चिकनगुनियां, डेंगू, स्वायन फ्लू और बर्ड फ्लू में रामबाण होता है।
4-प्लेटलेट्स काढा: यदि किसी को डेंगू यह रोग हुआ हो और खून में प्लेटलेट्स की संख्या कम होती जा रही हो तो चार चीजें रोगी को दें:-
(1) अनार जूस
(2) गेहूं घास रस
(3) पपीते के पत्तों का रस
(4) गिलोय/अमृता/अमरबेल सत्व
- -अनार जूस तथा गेहूं घास रस नया खून बनाने तथा रोगी की रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए है, अनार जूस आसानी से उपलब्ध है। यदि गेहूं घास रस ना मिले तो रोगी को सेब का रस भी दिया जा सकता है।
- -पपीते के पत्तों का रस सबसे महत्वपूर्ण है, पपीते का पेड़ आसानी से मिल जाता है। उसकी ताज़ी पत्तियों का रस निकाल कर मरीज़ को दिन में दो से तीन बार दें, एक दिन की खुराक के बाद ही प्लेटलेट की संख्या बढ़ने लगेगी।
- -गिलोय बेल की डंडी ले, डंडी के छोटे टुकड़े करे। उसे दो गिलास पानी मे उबालें, जब पानी आधा रह जाये तो ठंडा होने पर काढ़े को रोगी को पिलायें। मात्र 45 मिनट बाद सेल्स बढ़ने शुरू हो जाएँगे!
- -गिलोय की बेल का सत्व मरीज़ को दिन में दो तीन बार दें, इससे खून में प्लेटलेट की संख्या बढती है, रोग से लड़ने की शक्ति बढती है तथा कई रोगों का नाश होता है।
- -यदि गिलोय की बेल आपको ना मिले तो किसी भी नजदीकी पतंजली चिकित्सालय में जाकर “गिलोय घनवटी” ले आयें, जिसकी एक एक गोली रोगी को दिन में तीन बार दें।
- -यदि बुखार एक दिन से ज्यादा रहे तो खून की जांच अवश्य करवा लें।
- -यदि रोगी बार-बार उलटी करे तो सेब के रस में थोडा निम्बू मिलाकर रोगी को दें, उल्टियाँ बंद हो जाएंगी।
- -यदि रोगी को अंग्रेजी दवाइयां दी जा रही है, तब भी यह (उक्त) चीज़ें रोगी की बिना किसी डर के दी जा सकती हैं।
- -डेंगू जितना जल्दी पकड़ में आये उतना जल्दी उपचार आसान हो जाता है और रोग जल्दी ख़त्म होता है।
- -रोगी के खान पान का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि बिना खान पान कोई दवाई असर नहीं करती।
4-पुराना बुखार: पुराने बुखार या 6 दिन से भी ज्यादा समय से चले आ रहे बुखार के लिए गिलोय उत्तम औषधि है। इस प्रकार के बुखार के लिए लगभग 40 ग्राम गिलोय को कुचलकर मिट्टी के बर्तन में पानी मिलाकर रात भर ढक कर रख देते हैं। सुबह इसे मसल कर छानकर रोगी को दिया जाना चाहिए। इसकी 80 ग्राम मात्रा दिन में तीन बार पीने से जीर्ण ज्वर नष्ट हो जाता है। गिलोय के रस में पीपल का चूर्ण और शहद को मिलाकर लेने से जीर्ण-ज्वर तथा खांसी ठीक हो जाती है।
5-अज्ञात कारणों से बुखार: ऐसा बुखार जिसके कारणों का पता नहीं चल पा रहा हो उसका उपचार भी गिलोय द्वारा संभव है। पुररीवर्त्तक ज्वर/Typhus fever में गिलोय की चूर्ण तथा उल्टी के साथ ज्वर होने पर गिलोय का धनसत्व शहद के साथ रोगी को दिया जाना चाहिए।
6-मलेरिया, कालाजार, टायफायड: बार-बार होने वाला मलेरिया, कालाजार जैसे रोगों में भी यह बहुत उपयोगी है। मलेरिया में कुनैन के दुष्प्रभावों को यह रोकती है। टायफायड जैसे ज्वर में भी यह बुखार तो खत्म करती है और रोगी की शारीरिक दुर्बलता भी दूर करती है।
7-रोगाणु नाशक: टीबी के कारक माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलम बैसीलस जीवाणु की वृद्धि को यह रोक देती है। यह रक्त मार्ग में पहुंच कर उस जीवाणु का नाश करती है और उसकी सिस्ट बनाने की प्रक्रिया को बाधित करती है। ऐस्केनिशिया कोलाइ नामक रोगाणु जिसका आक्रमण मुख्यतः मूत्रवाही संस्थान तथा आंतों पर होता है, को यह समूल नष्ट कर देती है। ग्लूकोज टोलरेंस तथा एड्रीनेलिनजन्य हाइपर ग्लाइसीमिया के उपचार में भी गिलोय आश्चर्यजनक परिणाम देती है। इसके प्रयोग से रक्त में शर्करा का स्तर नीचे आता है। मधुमेह के दौरान होने वाले विभिन्न संक्रमणों के उपचार में भी गिलोय का प्रयोग किया जाता है।
8-गिलोय-जड़ शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट: गिलोय की जड़ें शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है। यह कैंसर की रोकथाम और उपचार में प्रयोग की जाती है।
मात्रा: गिलोय को चूर्ण के रूप में 5-6 ग्राम, सत् के रूप में 2 ग्राम तक क्वाथ के रूप में 50से 100 मि. ली.की मात्रा लाभकारी व संतुलित होती है।
9-कमजोरी: बुखार या लंबी बीमारी के बाद आई कमजोरी को दूर करने के लिए गिलोय के क्वाथ का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके लिए 100 ग्राम गिलोय को शहद के साथ पानी में पकाना चाहिए। सुबह-शाम इसकी बीस-तीस मिलीलीटर मात्रा का सेवन करना चाहिए। इससे शरीर में शक्ति का संचार होता है।
10-त्वचा विकार: एलर्जी, कुष्ठ तथा सभी प्रकार त्वचा विकारों में भी गिलोय का प्रयोग लाभ पहुंचाता है। आंत्रशोथ तथा कृमि रोगों में भी गिलोय लाभकारी है। घाव: एक टेबल स्पून गिलोय का काढ़ा प्रतिदिन पीने से घाव भी ठीक होते है। गिलोय के काढ़े में अरण्डी का तेल मिलाकर पीने से चरम रोगों में लाभ मिलता है-खून साफ होता है।
10-गुर्दे की पथरी: गिलोय/अमृता एक बहुत अच्छी उपयोगी मूत्रवर्धक एजेंट भी है जो कि गुर्दे की पथरी को दूर करने में मदद करता है और रक्त से यूरिया कम करता है।
11-सर्दी, जुकाम, बुखार: गिलोय-सर्दी, जुकाम, बुखार आदि में एक अंगुल मोटी व 4 से 6 लम्बी गिलोय लेकर 400 ग्राम पानी में उबालें, 100 ग्राम रहने पर पीयें। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता/इम्यून सिस्टम को मजबूत कर त्रिदोषों का शमन करती है व सभी रोगों, बार-बार होने वाले सर्दी, जुकाम, बुखार आदि को भी ठीक करती है। नजला, जुकाम खांसी, बुखार के लिए गिलोय के पत्तों का रस शहद में मिलाकर दो तीन बार सेवन करने से लाभ होगा।
12-त्रिदोषनाशक: यह तीनों प्रकार के दोषों का नाश भी करती है। घी के साथ यह वातदोष, मिसरी के साथ पित्तदोष तथा शहद के साथ कफ दोष का निवारण करती है। हृदय की दुर्बलता, लो ब्लड प्रेशर तथा विभिन्न रक्त विकारों में यह फायदा पहुंचती है।
13-कभी कोई बीमारी ही नहीं होगी: गिलोय के 6″ तने को लेकर कुचल लें। उसमें 4-5 पत्तियां तुलसी की मिला लें। इसको एक गिलास पानी में मिलाकर, उबालकर इसका काढा बनाकर पीजिये। इसके साथ ही तीन चम्मच एलोवेरा का गूदा पानी में मिलाकर नियमित रूप से सेवन करते रहने से जिन्दगी भर कोई भी बीमारी नजदीक नहीं आती है।
14-जलन: गिलोय का रस को नीम के पत्ते एवं आंवला के साथ मिलाकर काढ़ा बना लें। प्रतिदिन 2 से 3 बार सेवन करे इससे हाथ पैरों और शरीर की जलन दूर हो जाती है।
15-खून की कमी (एनीमिया): प्रतिदिन सुबह-शाम गिलोय का रस घी में मिलाकर या शहद गुड़ या मिश्री के साथ गिलोय का रस मिलकर सेवन करने से शरीर में खून की कमी (एनीमिया) दूर होती है।
16-दिमांगी कमजोरी दूर करे-याददाश्त बढ़ाये: गिलोय के काढ़े को ब्राह्मी के साथ सेवन से दिल यानी हृदय मजबूत होता है, उन्माद या पागलपन दूर हो जाता है, गिलोय याददाश्त वर्धक है। साथ में अपामार्ग, शतावरी और शंखपुष्पी मिलाकर सेवन करने से स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है!
17-वात संतुलित करे: गैस, जोडों का दर्द, शरीर का टूटना, असमय बुढापा वात असंतुलित होने का लक्षण हैं। गिलोय का एक चम्मच चूर्ण को घी के साथ लेने से वात संतुलित होता है।
18-पित्त की बीमारियों का इलाज: एक चम्मच गिलोय का चूर्ण खाण्ड या गुड के साथ खाने से पित्त की बिमारियों में सुधार आता है और कब्ज दूर होती है।
19-गठिया और आमवात:
- (1) गिलोय का चूर्ण शहद के साथ खाने से कफ और सोंठ के साथ आमवात से सम्बंधित बीमारीयां (गठिया) रोग ठीक होता है। एक टेबल स्पून गिलोय का काढ़ा प्रतिदिन पीने से खून साफ होता है। और गठिया रोग भी ठीक हो जाता है।
- (2) गिलोय का चूर्ण, दूध के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से गठिया ठीक हो जाता है।
- (3) गिलोय और सोंठ समान मात्रा में लेकर इसका काढ़ा बनाकर पीने से पुराने गठिया रोगों में लाभ मिलता है।
- (4) गिलोय का रस तथा त्रिफला आधा कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद पीने से घुटनों के दर्द में लाभ होता है।
20-बाँझपन से मुक्ति: गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर नियमित खिलाने से बाँझपन से मुक्ति मिलती हैं।
21-दुग्ध वृद्धि: गिलोय का काढ़ा बनाकर दिन में दो बार प्रसूता स्त्री को पिलाने से स्तनों में दूध की कमी होने की शिकायत दूर होती है और बच्चे को स्वस्थ दूध मिलता है।
22-पेट दर्द: गिलोय का रास शहद के साथ मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से पेट का दर्द ठीक होता है।
23-पीलिया: गिलोय के पत्तों को पीसकर एक गिलास मट्ठा में मिलाकर सुबह-सुबह पीने से पीलिया ठीक हो जाता है। गिलोय का एक चम्मच चूर्ण या काली मिर्च अथवा त्रिफला का एक चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर चाटने से पीलिया रोग में लाभ होता है। गिलोय की बेल गले में लपेटने से भी पीलिया में लाभ होता है। गिलोय के काढ़े में शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से भी पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
24-बवासीर: मट्ठे के साथ गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण सुबह शाम लेने से बवासीर में लाभ होता है।
25-कान रोग: गिलोय को पानी में घिसकर और गुनगुना करके दोनों कानो में दिन में 2 बार डालने से कान का मैल निकल जाता है। और गिलोय के पत्तों के रस को गुनगुना करके इस रस को कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।
26-बच्चों का सूखा रोग: गिलोय के रस में रोगी बच्चे का कमीज रंगकर सुखा लें और यह कुर्त्ता सूखा रोग से पीड़ित बच्चे को पहनाकर रखें। इससे बच्चे का सूखिया रोग जल्द ठीक होगा।
27-प्रदर: गिलोय का रस पीने से या गिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करने से प्रदर रोग खत्म हो जाता है। या गिलोय और शतावरी को साथ-साथ कूट लें फिर एक गिलास पानी में डालकर इसे पकाएं। जब काढ़ा आधा रह जाये इसे सुबह-शाम पीयें। प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
28-चर्मरोग: मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयों पर गिलोय के फलों को पीसकर लगाये मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयां दूर हो जाती है। गिलोय के पत्तों को हल्दी के साथ पीसकर खुजली वाले स्थान पर लगाइए और सुबह-शाम गिलोय का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से रक्त विकार दूर होकर खुजली से छुटकारा मिलता है।
29-कैंसर: कैंसर की बीमारी में 6 से 8 इंच की इसकी डंडी लें। इसमें गैहूं घास/जवारा का जूस और 5-7 पत्ते तुलसी के और 4-5 पत्ते नीम के डालकर सबको कूटकर काढ़ा बना लें। इसका सेवन खाली पेट करने से Aplastic Anaemia-एप्लासिटक एनीमिया भी ठीक होता है।
30-कोढ़: 1 लीटर उबलते हुये पानी मे एक कप गिलोय का रस और 2 चम्मच अनन्तमूल का चूर्ण मिलाकर ठंडा होने पर छान लें। इसका एक कप प्रतिदिन दिन में तीन बार सेवन करें इससे खून साफ होता हैं और कोढ़ ठीक होने लगता है। गिलोय के रस को सफेद दाग पर दिन में 2-3 बार लगाइए एक-डेढ़ माह बाद असर दिखाई देने लगेगा।
31-नेत्र विकार: लगभग 10 ग्राम गिलोय के रस में शहद और सेंधानमक (एक-एक ग्राम) मिलाकर, इसे खूब उबाले फिर इसे ठण्डा करके आंखो में लगाएं इससे नेत्र विकार ठीक हो जाते हैं।
32-मिर्गी: गिलोय और पुनर्नवा का काढ़ा बना कर सेवन करने से कुछ दिनों में मिर्गी रोग में फायदा दिखाई देगा।
33-शोधक और शक्तिवर्धक: गिलोय एक उच्च कोटि की शोधक तथा शक्तिवर्धक औषधि है। अत: गिलोय रक्त शोधन करके शारीरिक दुर्बलता को भी दूर करती है। यह कफ को छांटता है। धातु को पुष्ट करता है। हृदय को मजबूत करती है।
34-मोटापा: गिलोय और त्रिफला चूर्ण को सुबह और शाम शहद के साथ चाटने से मोटापा कम होता है और गिलोय, हरड़, बहेड़ा, और आंवला मिला कर काढ़ा बनाइये और इसमें शिलाजीत मिलाकर और पकाइए इस का नियमित सेवन से मोटापा रुक जाता है। गिलोय और नागरमोथा, हरड को सम मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना कर चूर्ण शहद के साथ दिन में 2–3 बार सेवन करने से भी मोटापा घटने लगता है।
35-संभोग शक्तिवर्धक: बराबर मात्रा में गिलोय, बड़ा गोखरू और आंवला कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसका एक चम्मच चूर्ण प्रतिदिन मिश्री और घी के साथ सेवन करने से संभोग शक्ति में वृद्धि होती है।
36-वीर्य गाढ़ा: अलसी और वशंलोचन समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें, और इसे गिलोय के रस तथा शहद के साथ हफ्ते–दस दिन तक सेवन करे इससे वीर्य गाढ़ा हो जाता है।
गिलोय
गिलोय पान के पत्ते कि तरह की एक त्रिदोष नाशक श्रेष्ट बहुवर्षिय औषधिये बेल होती है। अमृत के गुणों वाली गिलोय की बेल लगभाग भारत वर्ष के हर गाँव शहर बाग़ बगीचे में और वन उपवन में बहुतायत से पायी जाती है यह मैदानों, सड़कों के किनारे, जंगल, पार्क, बाग-बगीचों, पेड़ों-झाड़ियों और दीवारों पर लिपटी हुई दिखाई दे जाती है। नीम पर चढ़ी गिलोय में सब से अधिक औषधीय गुण पाए जाते हैं, नीम पर चढी हुई गिलोय नीम का गुण अवशोषित कर लेती है। इसकी पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन, फासफोरस और तने में स्टार्च पाया जाता है। यह वात, कफ और पित्त का शमन करती है। गिलोय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। गिलोय एक श्रेष्ट एंटीबायटिक एंटी वायरल और एंटीएजिड भी होती है। यदि गिलोय को घी के साथ दिया जाए तो इसका विशेष लाभ होता है, शहद के साथ प्रयोग से कफ की समस्याओं से छुटकारा मिलता है। प्रमेह के रोगियों को भी यह स्वस्थ करने में सहायक है। ज्वर के बाद इसका उपयोग टॉनिक के रूप में किया जाता है। यह शरीर के त्रिदोषों (कफ ,वात और पित्) को संतुलित करती है और शरीर का कायाकल्प करने की क्षमता रखती है। गिलोय का उल्टी,बेहोशी, कफ, पीलिया, धातू विकार, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, चर्म रोग, झाइयां,झुर्रियां, कमजोरी, गले के संक्रमण, खाँसी, छींक, विषम ज्वर नाशक, सुअर फ्लू, बर्ड फ्लू,टाइफायड, मलेरिया, कालाजार, डेंगू, पेट कृमि, पेट के रोग, सीने में जकड़न, शरीर का टूटना या दर्द, जोडों में दर्द, रक्त विकार, निम्न रक्तचाप, हृदय दौर्बल्य, क्षय (टीबी), लीवर, किडनी, मूत्र रोग, मधुमेह, रक्तशोधक, रोग पतिरोधक, गैस, बुढापा रोकने वाली, खांसी मिटाने वाली, भूख बढ़ाने वाली पाकृतिक औषधि के रूप में खूब प्रयोग होता है। गिलोय भूख बढ़ाती है, शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है। अमृता एक बहुत अच्छी उपयोगी मूत्रवर्धक एजेंट है जो कि गुर्दे की पथरी को दूर करने में मदद करता है और रक्त से रक्त यूरिया कम करता है। गिलोय रक्त शोधन करके शारीरिक दुर्बलता को भी दूर करती है। यह कफ को छांटता है। धातु को पुष्टकरता है। ह्रदय को मजबूत करती है। इसे चूर्ण, छाल, रस और काढ़े के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और इसके तने को कच्चा भी चबाया जा सकता है।
गिलोय के औषधीय उपयोग
- गिलोय एक रसायन है, यह रक्तशोधक, ओजवर्धक, ह्रदयरोग नाशक, शोधनाशक और लीवर टोनिक भी है। यह पीलिया और जीर्ण ज्वर का नाश करती है अग्नि को तीव्र करती है, वातरक्त और आमवात के लिये तो यह महा विनाशक है।
- गिलोय के 6″ तने को लेकर कुचल ले उसमे 4 -5 पत्तियां तुलसी की मिला ले इसको एक गिलास पानी में मिला कर उबालकर इसका काढा बनाकर पीजिये। और इसकेसाथ ही तीन चम्मच एलोवेरा का गुदा पानी में मिला कर नियमित रूप से सेवनकरते रहने से जिन्दगी भर कोई भी बीमारी नहीं आती। और इसमें पपीता के 3-4पत्तो का रस मिला कर लेने दिन में तीन चार लेने से रोगी को प्लेटलेट की मात्रा में तेजी से इजाफा होता है प्लेटलेट बढ़ाने का इस से बढ़िया कोई इलाज नहीं है यह चिकन गुनियां डेंगू स्वायन फ्लू और बर्ड फ्लू में रामबाण होता है।
- गैस, जोडों का दर्द ,शरीर का टूटना, असमय बुढापा वात असंतुलित होने का लक्षण हैं। गिलोय का एक चम्मच चूर्ण को घी के साथ लेने से वात संतुलित होता है ।
- गिलोय का चूर्ण शहद के साथ खाने से कफ और सोंठ के साथ आमवात से सम्बंधित बीमारीयां (गठिया) रोग ठीक होता है।
- गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर नियमित खिलाने से बाँझपन से मुक्ति मिलती हैं।
- गिलोय का रस और गेहूं के जवारे का रस लेकर थोड़ा सा पानी मिलाकर इस कीएक कप की मात्रा खाली पेट सेवन करने से रक्त कैंसर में फायदा होगा।
- गिलोय और गेहूं के ज्वारे का रस तुलसी और नीम के 5 – 7 पत्ते पीस कर सेवन करने से कैंसर में भी लाभ होता है।
- क्षय (टी .बी .) रोग में गिलोय सत्व, इलायची तथा वंशलोचन को शहद के साथ लेने से लाभ होता है।
- गिलोय और पुनर्नवा का काढ़ा बना कर सेवन करने से कुछ दिनों में मिर्गी रोग में फायदा दिखाई देगा।
- एक चम्मच गिलोय का चूर्ण खाण्ड या गुड के साथ खाने से पित्त की बिमारियों में सुधार आता है और कब्ज दूर होती है।
- गिलोय रस में खाण्ड डालकर पीने से पित्त का बुखार ठीक होता है। और गिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करने से पित्त का बढ़ना रुकता है।
- प्रतिदिन सुबह-शाम गिलोय का रस घी में मिलाकर या शहद गुड़ या मिश्री के साथ गिलोय का रस मिलकर सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर होती है।
- गिलोय ज्वर पीडि़तों के लिए अमृत है, गिलोय का सेवन ज्वर के बाद टॉनिक का काम करता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। शरीर में खून की कमी (एनीमिया) को दूर करता है।
- फटी त्वचा के लिए गिलोय का तेल दूध में मिलाकर गर्म करके ठंडा करें। इस तेल को फटी त्वचा पर लगाए वातरक्त दोष दूर होकर त्वचा कोमल और साफ होती है।
- सुबह शाम गिलोय का दो तीन टेबल स्पून शर्बत पानी में मिलाकर पीने से पसीने से आ रही बदबू का आना बंद हो जाता है।
- गिलोय के काढ़े को ब्राह्मी के साथ सेवन से दिल मजबूत होता है, उन्माद या पागलपन दूर हो जाता है, गिलोय याददाश्त को भी बढाती है।
- गिलोय का रस को नीम के पत्ते एवं आंवला के साथ मिलाकर काढ़ा बना लें।प्रतिदिन 2 से 3 बार सेवन करे इससे हाथ पैरों और शरीर की जलन दूर हो जाती है।
- मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयो पर गिलोय के फलों को पीसकर लगाये मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयां दूर हो जाती है।
- गिलोय, धनिया, नीम की छाल, पद्याख और लाल चंदन इन सब को समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बना लें। इस को सुबह शाम सेवन करने से सब प्रकार का ज्वर ठीक होता है।
- गिलोय, पीपल की जड़, नीम की छाल, सफेद चंदन, पीपल, बड़ी हरड़, लौंग, सौंफ, कुटकी और चिरायता को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण के एक चम्मच को रोगी को तथा आधा चम्मच छोटे बच्चे को पानी के साथ सेवन करने से ज्वर में लाभ मिलता है।
- गिलोय, सोंठ, धनियां, चिरायता और मिश्री को सम अनुपात में मिलाकर पीसकर चूर्ण बना कर रोजाना दिन में तीन बार एक चम्मच भर लेने से बुखार में आराम मिलता है।
- गिलोय, कटेरी, सोंठ और अरण्ड की जड़ को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर पीने से वात के ज्वर (बुखार) में लाभ पहुंचाता है।
- गिलोय के रस में शहद मिलाकर चाटने से पुराना बुखार ठीक हो जाता है। औरगिलोय के काढ़े में शहद मिलाकर सुबह और शाम सेवन करें इससे बारम्बार होनेवाला बुखार ठीक होता है।गिलोय के रस में पीपल का चूर्ण और शहद को मिलाकरलेने से जीर्ण-ज्वर तथा खांसी ठीक हो जाती है।
- गिलोय, सोंठ, कटेरी, पोहकरमूल और चिरायता को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर सुबह और शाम सेवन करने से वात का ज्वर ठीक हो जाता है।
- गिलोय और काली मिर्च का चूर्ण सम मात्रा में मिलाकर गुनगुने पानी से सेवन करने से हृदयशूल में लाभ मिलता है। गिलोय के रस का सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होती है और दिल के रोग ठीक होते हैं।
- गिलोय और त्रिफला चूर्ण को सुबह और शाम शहद के साथ चाटने से मोटापा कमहोता है और गिलोय, हरड़, बहेड़ा, और आंवला मिला कर काढ़ा बनाइये और इसमेंशिलाजीत मिलाकर और पकाइए इस का नियमित सेवन से मोटापा रुक जाता है।
- गिलोय और नागरमोथा, हरड को सम मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना कर चूर्ण शहद के साथ दिन में 2 – 3 बार सेवन करने से मोटापा घटने लगता है।
- बराबर मात्रा में गिलोय, बड़ा गोखरू और आंवला लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसका एक चम्मच चूर्ण प्रतिदिन मिश्री और घी के साथ सेवन करने से संभोग शक्ति मजबूत होती है।
- अलसी और वशंलोचन समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें, और इसे गिलोय के रस तथा शहद के साथ हफ्ते – दस दिन तक सेवन करे इससे वीर्य गाढ़ा हो जाता है।
- लगभग 10 ग्राम गिलोय के रस में शहद और सेंधानमक (एक-एक ग्राम) मिलाकर,इसे खूब उबाले फिर इसे ठण्डा करके आंखो में लगाएं इससे नेत्र विकार ठीक होजाते हैं।
- गिलोय का रस आंवले के रस के साथ लेने से नेत्र रोगों में आराम मिलता है।
- गिलोय के रस में त्रिफला को मिलाकर काढ़ा बना लें। इसमें पीपल का चूर्ण और शहद मिलकर सुबह-शाम सेवन करने से आंखों के रोग दूर हो जाते हैं और आँखों की ज्योति बढ़ जाती हैं।
- गिलोय के पत्तों को हल्दी के साथ पीसकर खुजली वाले स्थान पर लगाइए औरसुबह-शाम गिलोय का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से रक्त विकार दूर होकर खुजली से छुटकारा मिलता है।
- गिलोय के साथ अरण्डी के तेल का उपयोग करने से पेट की गैस ठीक होती है।
- श्वेत प्रदर के लिए गिलोय तथा शतावरी का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होता है।गिलोय के रस में शहद मिलाकर सुबह-शाम चाटने से प्रमेह के रोग में लाभ मिलता है।
- गिलोय के रस में मिश्री मिलाकर दिन में दो बार पीने से गर्मी के कारण से आ रही उल्टी रूक जाती है। गिलोय के रस में शहद मिलाकर दिन में दो तीन बार सेवन करने से उल्टी बंद हो जाती है।
- गिलोय के तने का काढ़ा बनाकर ठण्डा करके पीने से उल्टी बंद हो जाती है।
- 6 इंच गिलोय का तना लेकर कुट कर काढ़ा बनाकर इसमे काली मिर्च का चुर्ण डालकर गरम गरम पीने से साधारण जुकाम ठीक होगा।
- पित्त ज्वर के लिए गिलोय, धनियां, नीम की छाल, चंदन, कुटकी क्वाथ का सेवन लाभकारी है, यह कफ के लिए भी फायदेमंद है।
- नजला, जुकाम खांसी, बुखार के लिए गिलोय के पत्तों का रस शहद मे मिलाकर दो तीन बार सेवन करने से लाभ होगा।
- 1 लीटर उबलते हुये पानी मे एक कप गिलोय का रस और 2 चम्मच अनन्तमूल काचूर्ण मिलाकर ठंडा होने पर छान लें। इसका एक कप प्रतिदिन दिन में तीन बारसेवन करें इससे खून साफ होता हैं और कोढ़ ठीक होने लगता है।
- गिलोय का काढ़ा बनाकर दिन में दो बार प्रसूता स्त्री को पिलाने से स्तनों में दूध की कमी होने की शिकायत दूर होती है और बच्चे को स्वस्थ दूध मिलता है।
- एक टेबल स्पून गिलोय का काढ़ा प्रतिदिन पीने से घाव भी ठीक होते है।गिलोय के काढ़े में अरण्डी का तेल मिलाकर पीने से चरम रोगों में लाभ मिलता है खून साफ होता है और गठिया रोग भी ठीक हो जाता है।
- गिलोय का चूर्ण, दूध के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से गठिया ठीक हो जाता है।
- गिलोय और सोंठ सामान मात्रा में लेकर इसका काढ़ा बनाकर पीने से पुराने गठिया रोगों में लाभ मिलता है।
- या गिलोय का रस तथा त्रिफला आधा कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद पीने से घुटने के दर्द में लाभ होता है।
- गिलोय का रास शहद के साथ मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से पेट का दर्द ठीक होता है।
- मट्ठे के साथ गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण सुबह शाम लेने से बवासीर में लाभ होता है।गिलोय के रस को सफेद दाग पर दिन में 2-3 बार लगाइए एक-डेढ़ माह बाद असर दिखाई देने लगेगा ।
- गिलोय का एक चम्मच चूर्ण या काली मिर्च अथवा त्रिफला का एक चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर चाटने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
- गिलोय की बेल गले में लपेटने से भी पीलिया में लाभ होता है। गिलोय के काढ़े में शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
- गिलोय के पत्तों को पीसकर एक गिलास मट्ठा में मिलाकर सुबह सुबह पीने से पीलिया ठीक हो जाता है।
- गिलोय को पानी में घिसकर और गुनगुना करके दोनों कानो में दिन में 2 बार डालने से कान का मैल निकल जाता है। और गिलोय के पत्तों के रस को गुनगुना करके इस रस को कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।
- गिलोय का रस पीने से या गिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करने से प्रदररोग खत्म हो जाता है। या गिलोय और शतावरी को साथ साथ कूट लें फिर एक गिलास पानी में डालकर इसे पकाएं जब काढ़ा आधा रह जाये इसे सुबह-शाम पीयें प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
- गिलोय के रस में रोगी बच्चे का कमीज रंगकर सुखा लें और यह कुर्त्ता सूखा रोग से पीड़ित बच्चे को पहनाकर रखें। इससे बच्चे का सूखिया रोग जल्द ठीक होगा।
मात्रा: गिलोय को चूर्ण के रूप में 5-6 ग्राम, सत् के रूप में 2 ग्राम तक क्वाथ के रूप में 50से 100 मि. ली.की मात्रा लाभकारी व संतुलित होती है।
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Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
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सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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कौमार्य
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खजूर की चटनी
खनिज
खरबूजा-Musk melon
खरेंटी
खरैंटी शिलाजीत
खाज
खांसी
खिरेंटी
खिरैटी
खीप
खीरा
खुजली
खुशी-Joy
खुश्की
खुश्बू
खोया
गंजापन-Baldness
गठिया
गठिया-Arthritis
गठिया-Gout
गड़तुम्बा
गंडा-ताबीज
गंध
गन्ने का रस
गरमा गरम
गर्भ निरोधक
गर्भधारण
गर्भपात
गर्भवती
गर्भवती कैसे हों?
गर्भावस्था
गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy
गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy
गर्भाशय
गर्भाशय भ्रंश
गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy
गर्म पानी
गर्मी
गर्मी-Heat
गलगण्ड
गाजर
गाजवां
गांठ
गाँठ-Knot
गारंटी
गारण्टेड इलाज
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गिलोय
गिल्टी
गुड़हल
गुंदा
गुदाद्वार
गुदाभ्रंश
गुम्मा
गुर्दे
गुलज़ाफ़री
गुस्सा
गृध्रसी
गृह-स्वामिनी
गेदुआ की छाछ
गैस
गैस्ट्रिक
गैहूं का जवारा
गोक्षुरादि चूर्ण
गोखरू
गोखरू (LAND CALTROPS)
गोंद कतीरा-Hog-Gum
गोंदी
गोभी-Cabbage
गोरख मुंडी
गोरखगांजा
गोरखबूटी
गोरखमुंडी
ग्रीन-टी
घमोरी
घरेलु नुस्खे
घाघरा
घाव
चकवड़
चक्कर
चपाती
चमत्कारिक सब्जियां
चरित्र
चर्बी
चर्म
चर्म रोग
चर्मरोग
चाय
चाय-Tea
चालीस के पार-Forty Across
चिकनगुनिया
चिकित्सकीय
चिटकन
चिंतित
चिरायता-Absinth
चिरोटा
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चोक
चौलाई
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छरहरी काया
छाछ
छाजन बूटी
छाले
छींक
छीकें
छुअ
छुआरा
छुहारा
छोटा गोखरू
छोटा धतूरा
छोटी हरड़
जंक फूड
जकवड़
जख्म
जंगली तिल्ली
जंगली तुलसी
जंगली पेड़
जंगली मिर्ची
जंगली-कटीली चौलाई
जटामांसी-Spikenard
जलजमनी
जलन
जलोदर रोग-Ascites Disease
जवारा
जवारे
जवासा-Alhag
जहर
जामुन का जूस
जायफल
जिगर
जीरा
जीवन रक्षक
जीवनी शक्ति
जुएं
जुकाम
जुदाई
जुलाब
जूएं
जूस
जोड़ों के दर्द
जोड़ों में दर्द
जौ
ज्यूस
ज्योति
ज्वर
ज्वर-Fiver
झाइयाँ
झांईं
झाड़-फूंक
झुर्रियाँ
झुर्रियां
झुर्री
झूठे दर्द
टमाटर का रस
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टॉन्सिल
टोटला
ट्यूमर
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पत्थरचट्टा
पत्नी
पथरी
पदार्थ
पनीर
पपीता
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पमाड
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परम्परागत चिकित्सा
परहेज
पराठा
परामर्श
परिस्थिति
पवाड़
पवाँर
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पाचक
पाचन
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पाचनशक्ति
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पाठक संख्या पंद्रह लाख
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पारिजात
पालक
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पित्ती
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पुरुष
पुंसत्व
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मुहाँसे
मूँगफली
मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders
मूत्र
मूत्र असंयमितता
मूत्र में जलन-Burning in Urine
मूत्ररोग
मूत्राशय
मूत्रेन्द्रिय
मूर्च्छा (Unconsciousness)
मूली
मूली कर रस
मृत्यु
मृत्युदण्ड
मेथी
मेथी दाना
मेंहदी
मैथुन
मोगरा (Mogra)
मोटापा
मोटापा-Obesity
मोतियाबिंद
मौत
मौलसिरी
मौसमी बीमारियां
यकृत
यकृत प्लीहा
यकृत वृद्धि-Liver Growth
यकृत-लीवर-जिगर-Lever
यूपेटोरियम परफोलियेटम
यूरिक एसिड लेबल
योग विज्ञापन
योन
योन संतुष्टि
योनि
योनि ढीली
योनि शिथिल
योनि शूल-Vaginal Colic
योनि संकोचन
योनिद्वारा
योनिभ्रंश
योनी
योनी संकोचन
यौन
यौन आनंद
यौन उत्तेजक पिल्स (sexual stimulant pills)
यौन क्षमता
यौन दौर्बल्य
यौन शक्तिवर्धक
यौन शिक्षा
यौन समस्याएं
यौनतृप्ति
यौनशक्ति
यौनशिक्षा
यौनसुख
यौनानंद
यौनि
रक्त प्रदर (Blood Pradar)
रक्त रोहिड़ा-TECOMELLA UNDULATA
रक्तचाप
रक्तपित्त
रक्तशोधक
रक्ताल्पता
रक्ताल्पता (एनीमिया)-Anemia
रस-juices
रातरानी Night Blooming Jasmine/Cestrum nocturnum
रामबाण
रामबाण औषधियाँ-Panacea Medicines
रुक्षांश
रूढिवादी
रूसी
रूसी मोटापा
रेचक
रेठु
रोग प्रतिरोधक
रोबोट सेक्स
रोमांस
लकवा
लक्षण
लक्ष्मी
लंच
लसोड़ा
लस्सी
लहसुन
लहसुन-Garlic
लाइलाज
लाइलाज का इलाज
लाक्षणिक इलाज
लाक्षणिक जानकारी
लाभ
लिंग
लिंग प्रवेश
लिसोड़ा
लीकोरिया
लीवर
लीवर सिरोसिस
लीवर-Liver
लू-hot wind
लैंगिक
लोनिया
लौकी
लौंग की चाय
ल्युकोरिया
ल्यूकोरिया
ल्यूज योनी
वजन
वज़न
वजन कम
वजन बढाएं-Weight Increase
वन तुलसी
वन/जंगली तुलसी
वनौषधियाँ
वमन
वमन विकृति-Vomiting Distortion
वसा
वात
वात श्लैष्मिक ज्वर
वात-Rheumatism
वायरल
वायरल फीवर
वायरल बुखार-Viral Fever
वासना
विचारतंत्र
विटामिन
विधारा
वियाग्रा-Viagra
वियोग
विरह वेदना
विलायती नीम
विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध
विवाहेत्तर सम्बंध
विश्वास
विष
विष हरनी
विषखपरा
वीर्य
वीर्य वृद्धि
वीर्यपात
वृक्कों (गुर्दों) में पथरी-Renal (Kidney) Stone
वृक्ष
वैज्ञानिक
वैधानिक
वैवाहिक जीवन
वैवाहिक जीवन-Marital
वैवाहिक रिश्ते
वैश्यावृति
व्याकुल
व्यायाम
व्रण
शंखपुष्पी
शरपुंखा
शराब
शरीफा-सीताफल-Custard apple
शर्करा
शलगम-Beets
शल्यक्रिया
शहद
शहद-Honey
शारीरिक
शारीरिक रिश्ते
शिथिलता
शीघ्र पतन
शीघ्रपतन
शीस
शुक्राणु
शुक्राणु-Sperm
शुक्राणू
शुगर
शोक
शोथ
शोध
श्योनाक
श्रेष्ठतर
श्वास
श्वांस
श्वेत प्रदर
श्वेत प्रदर-Leucorrhea
श्वेतप्रदर
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संकुचन
संकोच
संक्रमण
संक्रमित
संक्रामक
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संतरा-Orange
संतान
संतुष्टि
सत्यानाशी
सदा सुहागन
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सब्जी
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हारसिंगार
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