Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
Health Care Friend and Marital Dispute Consultant
(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार)
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85619-55619 (10 AM to 10 PM)
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स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।
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सावधान: यौन उत्तेजक पिल्स (sexual stimulant pills) नामर्दी का कारण। लाइलाज का इलाज-1 (Treatment of Incurable-1)
अधिकतर स्त्री-पुरुषों के जीवन में यौन समस्याएं अर्थात सेक्स प्रोब्लम्स इस कारण विद्यमान (Existing) हैं, क्योंकि इन प्रोब्लम्स के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाना तथा शर्म, संकोच में डूबे रहना, ऐसे स्त्री-पुरुषों के व्यक्तित्व का कमजोर पहलु है। केवल इसी वजह से अनेकों स्त्री-पुरुषों का दाम्पत्य जीवन बर्बाद होकर नर्क बना हुआ है। अनेक उच्च पदस्थ तथा उच्च शिक्षा प्राप्त पुरुष भी इस क्षेत्र में मूर्खतापूर्ण आचरण करते रहते हैं। प्रोपर सेक्स एज्यूकेशन का अभाव, कुसंस्कार एवं सेक्स प्रोब्लम्स के बारे में अधकचरा ज्ञान रखने वालों से सलाह लेना या बिना योग्य डॉक्टरी सलाह के विज्ञापनों के आधार पर या गुमराह दोस्तों की सलाह पर यौन उत्तेजक पिल्स/गोलियों (sexual stimulant pills) का सेवन करने वालों में से 70 फीसदी से अधिक पुरुष 6 माह से 2 साल के अंदर पूरी तरह से नपुंसक/नामर्द (Neuter) हो जाते हैं। ऐसे पुरुषों की इन मूर्खताओं का खामियाजा उनकी निर्दोष पत्नियों को ताउम्र भुगतना पड़ता है। जबकि यदि इनके द्वारा प्रारंभ में ही किसी योग्य डॉक्टर से सम्पर्क किया जाये तो इनकी यौन कमजोरियों/बीमारियों का अधिक आसानी से दूरगामी समाधान संभव है।
केवल इतना ही नहीं, बल्कि यौन उत्तेजक पिल्स का सेवन करने वालों का होम्योपैथी एवं देशी जड़ी बूटियों के जरिये भी बहुत आसानी से इलाज संभव नहीं हो पाता है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि यौन उत्तेजक गोलियों का अत्यधिक सेवन करके अपने पुंसत्व को खो चुके पुरुषों को 6 माह से 2 साल तक लगातार शुद्ध, ताजा एवं ओर्गेनिक देशी जड़ी बूटियों तथा होम्योपैथिक दवाइयों का सेवन करवाने के बाद मुश्किल से 50-60 फीसदी पुरुष ही फिर से अपने पुंसत्व को प्राप्त कर पाते हैं। वह भी पूर्ववत नहीं।
अत: सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात 'किसी भी स्थिति में किसी भी प्रकार की यौन उत्तेजक पिल्स/गोलियों का भूलकर भी सेवन नहीं करें।' दूसरी बात 'यौन उत्तेजक पिल्स या गोली किन्हें कहते हैं? जिन गोलियों, तेलों या अन्य किसी भी रूप में उपलब्ध दवाइयों के बारे में दावा किया जाता है कि उनका सेवन या उपयोग करने के तत्काल बाद अत्यंत यौन उत्तेजना या लम्बे समय तक यौन उत्तेजना उत्पन्न होगी, तो समझो दवा रूपी ऐसी वस्तुएं पुरुषों की यौन क्षमताओं की दुश्मन और पुंसत्व को खतम करने वाला धीमा जहर हैं।'
एक पुरुष रोगी ने अपनी वेदना मुझे इन शब्दों में लिखकर भेजी थी।
''डॉक्टर साहब मेरी गलतियों और मूर्खताओं की की वजह से मुझे समय से पहले सेक्स की कमजोरी आ गयी। जबकि मैं सेक्स का अत्यधिक भूखा था। दोस्तों की सलाह पर मैंने 32 साल की उम्र में..... नाम की यौन उत्तेजक गोली लेकर सेक्स करना शुरू कर दिया था। मैं हर महिने में 10 से 15 बार इस गोली का सेवन करता था। जिसको लेने के बाद तुरंत उत्तेजना आती थी और लम्बे समय तक वीर्य स्खलन नहीं होता था। एक साल बाद स्थिति यह है कि एक साथ 3 गोली लेने पर भी शरीर तो बुखार की तरह गरम होकर तपने लगता है, लेकिन लिंग में उत्तेजना नहीं आती है। मुझे लगता है कि मेरे इन हालातों के कारण मेरी पत्नी ने नाजायज सम्बन्ध बना लिये हैं। मैं पत्नी का सामना नहीं कर पा रहा हूं। सब कुछ जानते हुए भी कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं हूं। अनेक बार आत्महत्या करने का विचार आता है। कृपया मुझे बचा लें।''
उपरोक्त स्थिति किसी एक पुरुष की नहीं, लाखों पुरुष इन हालातों से गुजर रहे हैं। लगातार एक साल तक उपचार करने के बाद उक्त निराश एवं जीवन से हार चुके पुरुष रोगी के जीवन में फिर से आशा की किरण जागना शुरू हुआ है। उसे यौन उत्तेजना शुरू हो चुकी है और वह फिर से यौन सम्बन्ध बनाने में सफल हुआ है। यद्यपि अभी भी मंजिल बहुत दूर है। मुझे विश्वास है कि यदि शुद्ध, ताजा एवं ओर्गेनिक (Organic) देशी-जड़ी बूटियों से निर्मित नुस्खों का नियमित सेवन किया जाये और साथ में होम्योपैथी की अमृत तुल्य तथा दुष्प्रभाव रहित सेलेनियम, लाईकोपोडियम, स्टेफिसेग्रिया, एग्नस कैस्टस, कैलेडियम, अवेना सेटाइवा, ओनोसमोडियम, योहिम्बीनम, नक्स वोमिका, सल्फर, अर्जेंटम नाईट्रिकम, एसिडम फॉस्फोरिकम, सार्सापारिल्ला जैसी अनेकानेक दवाइयों में से चयनित (Selected) का निर्धारित रीति से उचित मात्रा एवं उचित शक्ति में सेवन किया जाये तो निराशा के भंवर में डूब चुके पुरुषों के जीवन में फिर से बहार आ सकती है।
नोट/Note: अपने स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे हेल्थ वाट्सएप No.: 8561955619 पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे उचित समाधान प्राप्त करें। Dr. PL Meena, On Line-Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार) तथा संचालक निरोगधाम (लाइलाज का इलाज) Health WhatsApp No. 8561955619, Mob.: 9875066111
----------------------------देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये गये हैं। जो बेशक कुछ मंहगे अवश्य हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों को "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है और चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम लगातार जारी है। तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज चाहने वाले माफ करें। हेल्थ बलेटिन प्राप्त करने के लिये 9875066111 पर अपना नाम पता लिखकर भेजें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-27.03.2018.
यौन शक्तिवर्धक (केसर-युक्त) 'कामवाण पाउडर'-Sexual Power
स्त्री एवं पुरुष दोनों के स्वस्थ, सफल एवं सन्तुष्टि प्रदायक यौन-सम्बन्ध दाम्पत्य जीवन की आधारशिला होते हैं। वर्तमान में अनेक प्रकार के तनाव और मानसिक दबावों के चलते यौन-क्षमता समाप्त या कमजोर होती जा रही हैं। स्त्रियों में श्वेतप्रदर सहित अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इन सब कारणों से लोगों के दाम्पत्य जीवन बिखर रहे हैं।
यौन अक्षमता को थोड़ा स्पष्ट करना बहुत जरूरी है। जो पुरुष अपनी पत्नी से यौन संबन्ध नहीं बना पाते या जल्द ही स्खलित या शिथिल या ठंडे हो जाते हैं, वे यौन रोगी या नपुंसकता के रोगी कहलाते हैं। इस समस्या का सीधा सम्बंध लैंगिक कमजोरी से ही माना जाता है। इनमें से बहुसंख्यक पुरुष शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं होते, लेकिन उनके अवचेतन मन में बैठे कुछ प्रचलित अंधविश्वासों के चक्कर में फंसकर, यौन-अक्षमता के शिकार होकर वे मानसिक रूप से नपुंसक/नामर्द हो जाते हैं। मानसिक नपुंसकता के रोगी अपनी पत्नी के पास जाने से डरने लगते हैं। वे इतने भयभीत रहते हैं कि सहवास भी नहीं कर पाते। इस कारण उनकी मानसिक स्थिति लगातार बिगड़ती ही चली जाती है।
इसका दु:खद दुष्परिणाम यह होता है कि इस रोग में रोगी अपनी परेशानी, किसी दूसरे को नहीं बता पाता या उसे सही उपचार नहीं करा पाता, मगर जब वह पत्नी को संभोग के दौरान पत्नी को पूरी सन्तुष्टि नहीं दे पाता, तो रोगी की पत्नी को उसकी अक्षमता का पता चल ही जाता है। वह जान जाती है कि उसका पति नंपुसकता के शिकार है। इससे पति-पत्नी के बीच में लड़ाई-झगड़े और विवाद शुरू हो जाते हैं। अनेक मामलों में बात विवाहेत्तर यौन सम्बन्धों या तलाक तक पहुंच जाती है।
वास्तव में ऐसे रोगियों का इलाज होम्योपैथी के जरिये सम्भव है, लेकिन न तो ऐसे रोगी प्रयास करते हैं और न हीं उन्हें समर्पित तथा अनुभवी होम्योपैथ डॉक्टर मिल पाते हैं। इस कारण वे जीवनभर घुट-घुट कर अपमानजनक जीवन जीने को विवश होते हैं।
बहुत से सामान्य पुरुषों की यौन कमजोरी जो नामर्दी तक नहीं पहुंच पाती है, वे भी धीरे-धीरे उपरोक्त स्थिति की ओर लगातार बढ रहे होते हैं, लेकिन शर्म-संकोचवश वे अपनी समस्या को किसी के सामने नहीं रख पाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी शारीरिक यौन क्षमताओं को बरकरार रखने तथा बढाने के लिये प्रतिवर्ष खुराक लेते रहना चाहिये। इससे उन्हें बहुत सम्बल मिल सकता है।
ऐसे लोगों के लिये स्प्ष्ट किया जाता है कि हमारे देश में अनेक आयुर्वेदिक औषधियां स्त्री और पुरुष दोनों में संतुलित कामशक्ति का संचार करने में अनादिकाल से सम्पूरक सिद्ध होती रही हैं। मगर दु:ख का विषय है कि जंगल लगातार समाप्त होते जा रहे हैं और प्रगति की राह पर चलने को मजबूर किसानों द्वारा खेती में जहरीले कीटनाशकों और खादों का उपयोग किया जाता है। ऐसे में खेतों में या खेतों के किनारे पैदा होने वाली शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियां मिलना लगभग मुश्किल सा हो गया है। कुछ लोग व्यावसायिक रूप से औषधियों की खेती करने लगे हैं, लेकिन अधिक उपज लेने के चक्कर में, उनके द्वारा भी जहरीले कीटनाशकों और खादों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।
उपरोक्त कारणों से बाजार में उपलब्ध औषधियों से आशातीत परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। इन हालातों में हमने राजस्थान की जलवायु में पनप सकने वाली कुछ प्रमुख औषधियों को आॅर्गेनिक विधि से पैदा करके, उन्हें छाया शुष्क करके और निर्धारित रीति से उनका शोधन करके, उनका बारीक पाउडर बनाने का छोटा सा प्रयास शुरू किया है। जो अत्यंत परिश्रमपूर्ण होने के साथ-साथ तुलनात्मक रूप से काफी मंहगा कार्य सिद्ध हो रहा है। मगर प्रसन्नता की बात यह है कि हजारों लोगों पर इन औषधियों का उपयोग करने के बाद उत्साहवर्द्धक परिणाम मिले हैं। जो सबसे बड़ा संतोष का विषय है।
अत: उपरोक्त हालातों में स्त्री-पुरुषों को यौन समस्याओं से सम्बन्धित ताजा एवं शुद्ध 'कामवाण पाउडर' को इच्छुक लोगों को अग्रिम आॅर्डर पर एक और दो माह के उपयोग हेतु क्रमश: 300 एवं 600 ग्राम के पैक में घर बैठे रीजनेबल कीमत पर, रजिस्टर्ड पार्सल के जरिये उपलब्ध करवाने का निर्णय लिया है। इन दवाइयों का पहली बार लगातार 6 महिने तक तथा इसके बाद हर साल एक-दो महिने सेवन करते रहने पर कोई भी सामान्य पुरुष 65 से 70 साल तक सफलतापूर्वक यौनसम्बन्ध बना सकता है।
'कामवाण पाउडर' में मुख्यत: निम्न महत्वपूर्ण औषधियों का सम्मिश्रण है:-
01. सफेद मूसली: संकेत-प्राकृतिक रूप से कामोत्तेजक, पुष्टिकारक, एंटीऑक्सीडेंट, वीर्य, यौन शक्ति, उर्जा, शुक्राणु, सेक्स आवृति/ड्राईव, स्तम्भन और बल वर्द्धक। नियमित रक्त संचार करके यौनांगों को स्वस्थ एवं शक्ति प्रदान करती है। वीर्य को पुष्ट और गाढा करती है, साथ ही रोगों से लड़ने हेतु शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है। श्वेतप्रदर, बांझपन, शिथिलता, ठंडापन, नपुंसकता, शीघ्रपतन और अल्पशुक्राणुता से बचाती है।
02. बबूल की पत्ती एवं कच्ची फली: संकेत-यौन कमजोरी तथा शीघ्रपतन को ठीक करके स्तम्भन शक्ति बढाती हैं। वीर्य को गाढा करके शुक्राणुओं की संख्या में वृद्धि करती हैं। मूत्र विकारों से मुक्ति दिलाती हैं।
03. अश्वगंधा: संकेत-इसे इण्डियन जिनसेंग भी कहा जाता है। लेकिन अश्वगंधा पूरी तरह से प्राकृतिक परिणाम प्रदान करती है। यह वातनाशक, बलकारक, शक्तिवर्द्धक तथा पाचनशक्ति वर्द्धक। बांझपन, गर्भस्त्राव, श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर, जोड़ों में दर्द, कमरदर्द, नपुंसकता, यौन कमजोरी, शीघ्रपतन, कमजोर पाचन प्रणाली, गठिया, वातरोग, शियाटिका, हाई ब्लड पेशर, थकावट आदि को दूर करती है।
04. मुलेठी: संकेत-वात, पित्त और कफ-त्रिदोषनाशक। नपुंसकता (नामर्दी), ऐसिडिटी, कब्ज, आंव, अल्सर, कफ, खांसी, मूत्ररोग, अनियमित और दर्दनाक माहवारी, स्नायु कमजोरी, जोड़ों एवं मांसपेशियों के दर्द आदि को दूर करके, प्राकृतिक कामशक्ति बढाती है। हृदय को मजबूत करती है। नेत्रज्योति एवं रक्त की मात्रा बढाती है। सौन्दर्य वर्द्धक है।
05. शतावरी: संकेत-इसे आयुर्वेदिक औषधियों की रानी कहा जाता है। यौनांगों में शिथिलता-ढीलापन, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, मूत्रविकार, अपच, अजीर्ण, कब्ज, प्रदर, माईग्रेन, अनिद्रा नाशक एवं दुग्धवर्द्धक, प्रजनन क्षमता बढाये, मधुमेह नियंत्रित करे और सुंदरता निखारे।
06. मेथी: संकेत-कोलेस्ट्रॉल लेवल में सुधार, ब्लड प्रेशर कंट्रोल, शुगर संतुलन, चर्म रोग नाशक, पाचनशक्ति बर्द्धक, कृमिरोग नाशक है।
07. बीजबंद: संकेत-यौन दुर्बलता, कब्ज, खूनी बवासीर, मूत्रातिसार, श्वेत प्रदर, हृदय दुर्बलता, उच्च रक्तचाप, शीघ्रपतन, कमजोरी आदि।
08. जायफल: संकेत-कामशक्ति एवं कामेन्द्रिय शक्ति वर्धक, त्वचा की झाईयाँ, जोड़ों का दर्द, वात एवं कफ नाशक, अजीर्ण, गर्भाशय-शोथ आदि में विशेष लाभदायक है।
09. वंशलोचन: संकेत-वीर्य वृद्धि, वीर्य गाढा, गर्भपात प्रतिरोधक, प्रदर, प्रमेह, यकृत/लीवर के रोग आदि में लाभदायक है।
10. गोखरू बीज: संकेत-गोखरू पुरुष के प्रजनन अंगों को स्वस्थ रखता है, शुक्राणुओं की गुणवत्ता, गतिशीलता व आयतन को बढ़ावा देता है। बलवर्धक एवं प्राकृतिक कामेच्छा वर्धक। साइटिका एवं चर्मरोग में उपयोगी। सभी मूत्र रोगों में उपयोगी। त्रिदोष (वात, कफ और पित्त) नाशक। बांझपन, यौन कमजोरी, गुर्दारोगों आदि में लाभकारी।
11. शिलाजीत: संकेत-दिमागी ताकत एवं रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये और मधुमेह, रक्तचाप, तनाव, यौन कमजोरी, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष आदि को नियंत्रित करे।
12. निर्गुण्डी: संकेत-शिलाजीत के साथ निर्गुण्डी का सेवन सभी तकलीफों में आश्चर्यजनक परिणाम देता है। साथ ही पाचन-क्रिया को मजबूत करके लीवर को ताकतवर बनाती है।
13. सौंठ: संकेत-सिरदर्द, अर्द्धसिर शूल, कब्ज, भूख की कमी, अजीर्ण, मधुमेह, अंडकोषवृद्धि, दर्दनाक माहवारी, प्रदर, जोड़ों-वात-कमर के दर्द से मुक्ति। आदि।
14. गिलोय: संकेत-पुराना ज्वर, मधुमेह, कब्ज नाशक, यौनशक्ति वर्धक एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने वाली औषधि है।
15. काली मूसली: संकेत-कामेच्छा में कमी, प्रदर, सीने में जलन, चर्मरोग, पेशाब में जलन आदि को दूर करता है। शक्ति वर्धक है। शुक्राणू वर्धक। ऐण्टीआॅक्सीडेंट। प्रजनन शक्ति बढाये।
16. आमला: संकेत-रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं नेत्रज्योति बढाये, ऐण्टीआॅक्सीडेंट-शरीर से विशैले पदार्थ निकाले, पाचनतंत्र को मजबूत करे, वृद्धावस्था की गति को रोके, दिल की रक्षा करे, नींद नहीं आना आदि।
17. मकोय: संकेत-यौन-शक्ति वर्धक, कामोत्तेजक, वीर्य वर्धक, त्रिदोष (वात, कफ और पित्त) शामक, पाचन, यकृत/लीवर शोधक एवं उतेजक, शोथहर, रक्तशोधक, कुष्ठ व विषनाशक, कब्ज, बवासीर, दमा, श्वास, अनिद्रा, चर्मरोग, घबराहट, ऐंठन, बांयटे, पेट में जलन, पीलिया, यकृत रोग, गठिया आदि में उपयोगी।
18. डीकामाली: संकेत-अपच, भूख की कमी, कब्ज, चर्मरोग, संक्रमण, बवासीर, आंतों के कृमि आदि के उपचार में सहायक।
19. भूई आमला: संकेत-स्वस्थ यौनशक्ति के लिये पाचन क्रिया और पाचन क्रिया के लिये स्वस्थ लीवर का होना आवश्यक है। लीवर क्लीनिंग, गैस्ट्रिक अल्सर एवं एंटीऑक्सिडेंट हेतु उपयोगी है। भूई आमला लीवर को ताकत प्रदान करता है। शराब के सेवन से क्षतिग्रस्त यकृतों को पुनर्जीवित करे। साथ ही यह गठिया-जोड़ों के दर्द का प्राकृतिक तरीके से शमन करता है। मूत्रवर्धक, रक्तचाप को कम करता है, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूती प्रदान करे। शुगर लेवल को कम करे।
20. श्योनाक: संकेत-कब्ज, फोड़े और घावों, मुंह कैंसर, खुजली और अन्य त्वचा रोगों के लिए एक प्रभावी उपाय, गर्भधारण की संभावना बढ़ाये। रक्तशोधक। स्त्रीरोग संबंधी विकारों में उपयोगी और यहां तक कि बचपन के मनोवैज्ञानिक यौन विकारों के मामले में भी प्रभावी। दिल का टॉनिक, रक्त शोधक, रोग शामक, भूख वर्धक। गठिया-वात। पाचन शक्ति वर्धक। संक्रमण नाशक आदि।
21. कौंच: संकेत-कौंच को भारतीय बियाग्रा कहा जाता है। यद्यपि यह बियाग्रा से भी ताकवर है, लेकिन इसका प्रभाव स्थायी है, जबकि बियाग्रा का तात्कालिक प्रभाव होने के साथ-साथ अनेक दुष्प्रभाव भी होते हैं। नपुंसकता, नसों की कमजोरी, लिंग का ढीलापन और शीघ्रपतन, वीर्य के पतलेपन, शुक्राणुओं की कमी, दर्द व पेट की तकलीफें, मधुमेह, गैस, श्वेतप्रदर, बांझपन, गर्भपात आदि की समस्या आदि में अत्युत्तम है।
22. तालमखाना: संकेत-तालमखाना यौनशक्ति और कामोत्तेजना बढाने वाला, पेशाब साफ लाने वाला, एंटी बॉयोटिक एवं पोषक गुणों से भरपूर है। वीर्य विकार, वीर्य का पतलापन, शुक्राणुओं की कमी, नामर्दी, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि में उपयोगी है। शारीरिक कमजोरी को घटाता है। यह हृदय और किडनी के लिये भी बहुत उपयोगी है। स्त्रियों की कमजोरी, विशेषकर प्रसवकाल के बाद की कमजोरी में विशेष लाभदायक है।
23. लाजवंती/छुईमुई: संकेत-नपुंसकता, शीघ्रपतन और मर्दाना कमजोरी, स्तनों का ढीलापन दूर करे, गर्भाशय के बाहर आने की समस्या, बवासीर (Piles) और भगंदर (Anal fistula), चर्मरोग, मधुमेह, गले के रोग, संकोचक, आदि में लाभदायक है।
24. सेमलकंद/सेमल मूसली: पुष्टिकारक, कामोत्तेजक और नपुंसकता नाशक, बलकारक, अपार बलवीर्य वर्धक, स्तम्भन शक्ति बढ़ाती है, शरीर की कान्ति निखारती, प्रमेह-धातु की कमजोरी और शरीर की क्षीणता में सेमल की मूसली अव्वल दर्जे की चीज है।
25. उटंगन: संकेत-यह सभी प्रकार की यौन समस्याओं का समाधान है तथा यौनशक्ति बढाने में विशेष उपयोगी है।
26. केसर: संकेत- अजीर्ण, अपच, गैस को दूर करे। रक्त शुद्धिकरण करके किडनी और लिवर की करे सुरक्षा। यौन क्षमता अर्थात मर्दानगी वर्धक। माहावारी तथा गर्भाशय सम्बन्धी तकलीफों में लाभकारी। ज्योतिवर्धक। बाल झड़ना रोके। अर्थराइटिस-गठिया में आरामदायक। स्मरण-शक्ति बढाये।
26. केसर: संकेत- अजीर्ण, अपच, गैस को दूर करे। रक्त शुद्धिकरण करके किडनी और लिवर की करे सुरक्षा। यौन क्षमता अर्थात मर्दानगी वर्धक। माहावारी तथा गर्भाशय सम्बन्धी तकलीफों में लाभकारी। ज्योतिवर्धक। बाल झड़ना रोके। अर्थराइटिस-गठिया में आरामदायक। स्मरण-शक्ति बढाये।
इत्यादि।
जो कोई पुरुष उपरोक्त 'कामवाण पाउडर' पाउडर को घर बैठे मंगवाना चाहते हैं, वे हम से सीधे सम्पर्क कर सकते हैं।
*नोट: मेरी ओर से भेजी जा रही उक्त पाठ्य सामग्री से यदि आपको किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो प्लीज तुरंत अवगत कराएं। आगे से आपको नहीं भेजी जायेगी। यदि यह सामग्री आपको किसी अन्य स्रोत से मिली है और यदि आप अपने वाट्सएप इनबॉक्स में नियमित रूप से प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने मोबाईल में हमारा वाट्सएप 9875066111 सेव/एड करें और हमें नियमित सामग्री प्राप्त करने हेतु वाट्सएप 9875066111 पर लिखें।*
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', HCF&MDC
(Health Care Friend and Marital Dispute Consultant)
स्वाथ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार
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Mobile No. मोबाईन नम्बर: 9875066111 (10AM to 10PM)
Jaipur, Rajasthan, 27 दिसम्बर, 2017, 21.40PM
उपशीर्षक:
Sexual Power,
आॅर्गेनिक,
कामवाण पाउडर,
कामशक्ति,
नामर्दी,
यौन शक्तिवर्धक,
श्वेतप्रदर
Wednesday, December 27, 2017
शीघ्रपतन का होम्योपैथिक इलाज!
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
आगे बढने से पहले पाठकों को अवगत करवाना उचित होगा कि 30 नवम्बर, 2017 को 'शीघ्रपतन' शीर्षक से लिखे लेख में निम्न विषयों की जानकारी दी जा चुकी है:
1. शीघ्रपतन से कितने पुरुष परेशान रहते हैं?
2. शीघ्रपतन किसे कहते हैं?
3. वीर्य स्खलन की समय सीमा क्या होनी चाहिये?
4. स्त्री की योन तृप्ति क्या है?
5. सम्भोग को समान भोग बताना कितना सही?
6. शीघ्रपतन का गर्भधारण से सम्बन्ध?
7. शीघ्रपतन दाम्पत्य बिखराव का कारण!
8. शीघ्रपतन के कारण।
उक्त जानकारी मेरी वेबसाइट के निम्न लिंक पर पढी जा सकती है:-
07 दिसम्बर, 2017 को 'शीघ्रपतन नाशक सात घरेलु नुस्खे!' शीर्षक से लिखे लेख में शीघ्रपतन नाशक सात घरेलु नुस्खों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा चुकी है।
उक्त जानकारी मेरी वेबसाइट के निम्न लिंक पर पढी जा सकती है:-
http://www.healthcarefriend.in/2017/12/blog-post_69.html
शीघ्रपतन के होम्योपैथिक इलाज के बारे में लिखने से पहले स्पष्ट कर देना उचित होगा कि होम्योपैथी में किसी भी रोग की कोई सुनिश्चित दवाई नहीं होती है। इलाज करने के लिये रोगी के सम्पूर्ण लक्षणों को जानने के बाद उचित दवाई का निर्धारण करना होता है, जो हम होम्योपैथ्स के लिये बहुत ही कठिन और परिश्रमपूर्ण कार्य है। दु:खद पहलु यह है कि अधिकतर रोगी, अपने लक्षण बताने में ही संकोच करते हैं। जिसके कारण रोगी को भारी शारीरिक एवं आर्थिक नुकसान होता है। साथ ही उपचारक का भी समय बर्बादा होता है और नाम खराब होता है।
यहां पर कुछ प्रमुख होम्योपैथिक औषधियों की जानकारी दी जा रही है, जो शीघ्रपतन की समस्या के समाधान में सहायक सिद्ध हो सकती हैं। मगर याद रहे किसी अनुभवी होम्योपैथ के परामर्श के बिना इन दवाईयों का सेवन करना उचित नहीं होगा, क्योंकि दवाई के नाम मात्र से कुछ नहीं हो सकता। महत्वपूर्ण कार्य है, रोगी के सम्पूर्ण लक्षणों को पूछकर/जानकर दवा की सही मात्रा और दवा की शक्ति का निर्धारण करना।
आॅरम मेटालिकम: रोगी को आत्महत्या करने का मन करता है और अपने आप को बिल्कुल निकम्मा महसूस करता है, निराशा अधिक होने के साथ ही शरीर का रक्तदाब बढ़ जाता है, जीवन में एकदम निराशापन हो जाता है। रोगी को भूख तथा प्यास लगती है, जी मिचलाने लगता है और दम घुटने लगता है तथा गर्मी भी लगने लगती है। अण्डकोष में दर्द और सूजन आ जाती है, अण्डको अन्डकोषों में कठोरता उत्पन्न हो जाती है, लिंग में तेज उत्तेजना होती है। भयंकर शारीरिक कामोत्तेजना तथा चंचलता का भाव होना, परन्तु इसके बाद बहुत शीघ्र ही लिंग में अत्यधिक शिथिलता। मैथुन शूरू करते ही लिंग का ढीला पड़ जाना। हस्तमैथुन के दुष्परिणाम आदि लक्षण पाये जाते हैं। स्त्री रोगी की योनि में तेज उत्तेजना होती है। बांझपन का रोग तथा इसके साथ ही योनि में तेज जलन के साथ बांझपन हो तो यह दवाई स्त्रियों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
सेलिनियम: सेलेनियम उन रोगियों के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है जो व्यक्ति जवानी के जोश में आकर अपने वीर्य को समय से पहले ही समाप्त कर चुके होते हैं और संभोग क्रिया के समय पूरी तरह सफल नहीं हो पाते। स्त्री के साथ संभोग क्रिया करने के बाद रोगी का चिड़चिड़ा हो जाना। सोते समय रोगी का वीर्य अपने आप ही निकल जाना। मन में संभोग करने की इच्छा तेज होना, लेकिन संभोग करते समय लिंग का उत्तेजित न होना, वीर्य का पतला हो जाना। बार-बार वीर्य-स्राव। बिना कामेच्छा के ही प्रात: काल लिंग में उत्तेजना होना, परन्तु सहवास की कोशिश करने पर लिंग का शिथिल हो जाना। अत्यधिक लैंगिक दुर्बलता। मन में अत्यधिक कामेच्छा होने पर भी लिंग में कड़ापन न आना अथवा सेक्स पूर्ण न हो पाना। जननेन्द्रिय/लिंग में खुजली तथा सुरसुरी। नींद में, पाखाने के समय अथवा अनजाने में लिंग से गोंद जैसा लसदार पदार्थ निकलना आदि लक्षणों में सेलिनियम का उपयोग लाभदायी हो सकता है।
ऐग्नस कैक्टस: लैंगिक दोष उत्पन्न होना, मृत्यु का भय होना। अधिक उदासी के साथ जल्दी मृत्यु का भय महसूस हो रहा हो। मन-मस्तिष्क स्थिर न रहना, याददाश्त कमजोर होना, किसी कार्य को करने में उत्साह न होना। जो पुरुष जवानी में अधिक मौज-मस्ती करते रहे हैं और कामवासना में अधिक डूबे रहने के कारण शारीरिक रूप से कमजोर तथा नपुंसक हो जाते हैं। जिनके प्रजनन अंग ठण्डे तथा ढीले पड़ गये हों। लिंग में कमजोरी, परन्तु कामेच्छा का अधिक होना, मल-त्याग के समय जोर लगाने से अथवा नींद में वीर्य स्खलन, एकदम मानसिक अवसन्नता, कमजोर तथा अनमनेपन का भाव आदि लक्षणों में इसका सेवन करें।
ग्रैफाइटिस: हर समय डर सा लगते रहना, किसी भी काम को करने में मन न लगना, बहुत ज्यादा भावुक हो जाना, किसी भी फैसले को करने में दुविधा होना, उदास सा बैठे रहना। गर्म पीने वाली चीजों का हजम न होना। जितनी बार भी भोजन करे उतनी ही बार जी मिचलाना और उल्टी आना, आमाशय में दबाव सा महसूस होना। आमाशय में जलन होने के कारण भूख न लगन। डकार लेने में परेशानी होना। पेट में गैस बनना। सेक्स करने की इच्छा का तेज होना, लेकिन सेक्सक्रिया के दौरान अपने सहभागी को पूरी तरह से खुश न कर पाना। अत्यधिक कामोत्तेजना के कारण योनि में लिंग-प्रवेश के तुरन्त बाद या प्रवेश से पूर्व ही वीर्य-स्खलन हो जाए। लिंग में कड़ापन न आना। हस्तमैथुन तथा अतिरिक्त काम-तृप्ति के कारण लिंग में शिथिलता, लिंगमुण्ड/सुपारी पर कटे-फटे घाव तथा खाल उधड़ जाना, लिंग में सूजन तथा लसदार-चिपचिपे स्राव होना। सेक्स क्रिया से मन का बिल्कुल हट जाना आदि लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को ग्रैफाइटिस औषधि देने से लाभ होता है।
लाइकोपोडियम: लाइकोपोडियम नामर्दी की मुख्य औषध है। यह ऐसे रोगियों के लिए बहुत उपयोगी है जो मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से भी कमजोर होते हैं और जिन्हें शरीर में बहुत अधिक कमजोरी होती है। रोगी को और भी कई प्रकार के रोग होते हैं जो इस प्रकार हैं- लालची, कंजूस, धन का लालची, दूसरे के प्रति घृणा की भावना रखना आदि। रोगी को भय होता है तथा क्रोधित स्वभाव का हो जाता है, अपमान के कारण उसे और भी कई प्रकार की बीमारियां हो जाती है। अत्यधिक मैथुन तथा अत्यधिक अप्राकृतिक मैथुन के कारण लिंग में उत्तेजना या कड़ापन ही न आना। नपुंसकता रोग होने के साथ ही रोगी को संभोग करने की इच्छा अधिक होती है तथा समय से पहले अपने आप ही वीर्य निकल जाता है और इसके बाद लिंग ठण्डा हो जाता है तथा संभोग की शक्ति कम हो जाती है अर्थात संभोग करने का मन नहीं करता है, संभोग करने के समय में लिंग में हल्का कड़ापन होता है, संभोग करते समय नींद सी आने लगती है, रोगी संभोग के प्रति भयभीत हो जाता है तथा जम्भाई आती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो इन लक्षणों के साथ शीघ्रपतन के लक्षण में लाइकोपोडियम सर्वोत्तम दवाई है। यह दवाई विशेषकर वृद्धों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हो चुकी है।
फास्फोरस: रोगी का उत्साह कम, मन चिड़चिड़ा हो जाता है। उसे डर लगता है और रोगी को ऐसा लगता है कि हर कोने से कोई चीज रैंगती हुई बाहर निकल रही हो तथा उसके मन में दिव्यदृष्टि जैसी दशा उत्पन्न हो जाती है। रोगी अचानक चौंक पड़ता है। रोगी की सोचने की शक्ति कम हो जाती है, रोगी पागलों की तरह का व्यवहार करता है। उसे जीवन मेें आनन्द की अनुभूति नहीं होती है। अकेले रहने पर मृत्यु का भय लगा रहता है। दिमाग थका-थका सा रहता है। वह अपने प्रति अधिक उच्च धारणा रखता है, शरीर में उत्तेजना अधिक होती है, सारा शरीर गरम रहता है, रोगी अस्थिर रहता है और उसे चारों ओर अशान्ति प्रतीत होती है। खाना खाते ही रोगी को तुरन्त भूख लग जाती है, भोजन करने के बाद हर बार खट्टा स्वाद और खट्टी डकारें आती है, डकार आने के साथ ही खाना खाया हुआ भोजन तुरन्त वापस मुंह में आ जाता है, जैसे ही आमाशय के अन्दर पानी गरम होता है, वैसे ही उसकी उल्टी हो जाती है। रोगी में संभोग करने की शक्ति नहीं रहती है, रोगी को संभोग क्रिया करने के लिए अधिक इच्छा होती है, लेकिन उसका अपने आप ही वीर्यपात हो जाता है। दिन-रात बारम्बार पतले, लसदार रंगहीन तरल पदार्थ का मूत्र-मार्ग से स्राव होना। रोगी को संभोग करने के सपने आते हैं और अपने आप ही वीर्यपात हो जाता है। इत्यादि लक्षणों पर फास्फोरस लाभदायक है।
फास्फोरिक एसिडम: ऐसे रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोगी है जो पहले बहुत तन्दुरुस्त (स्वास्थ्य) रहे हों, लेकिन बाद में स्वप्नदोष, हस्तमैथुन, स्त्री प्रसंग, अनुचित बुरे कार्य करने के कारण अपने वीर्य को नष्ट करते हैं। जिसके कारण उनका शरीर ठण्डा पड़ जाता है और कमजोरी अधिक हो जाती हैं। अधिक रोना-धोना और बड़बड़ाना, इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही रोगी को ठण्ड भी लगती है और अधिक निराशा होती है। रोगी को रसीले पदार्थों का सेवन करने की इच्छा होती है, खट्टी डकारें आती है, जी मिचलाने लगता है। आमाशय में दबाव महसूस होता है और भोजन करने के बाद ठीक प्रकार से नींद नहीं आती है, ठण्डा दूध पीने का मन करता है। रोगी को बार-बार पेशाब आता है तथा इसके साथ ही पेशाब में दूध जैसा सफेद पदार्थ भी आता है। जो वीर्य नहीं होता, लेकिन रोगी वीर्य समझकर परेशान होता रहता है। रोगी को रात के समय में मलत्याग करते समय वीर्यपात हो जाता है। वीर्यपात होते ही रोगी को जलन भी होती है। संभोग करने की शक्ति घट जाती है, अण्डकोष को छूने पर दर्द होता है तथा अण्डकोष सूजा रहता है, आलिंगन करने के समय में लिंग ठण्डा (शिथिल) पड़ जाता है। युवकों की अत्यधिक कामवासनाओं में लिप्तता तथा हस्तमैथुन। व्यभिचार आदि के कारण लैंगिक कमजोरी। नामर्दी के साथ अचैतन्यता/मूर्छा जैसी अवस्था। मलत्याग करने के समय में भी लिंग शिथिल पड़ा रहता है। लिंग की त्वचा पर सूजन आ जाती है तथा लिंग की सुपारी पर भी सूजन आ जाती है, लिंग पर घाव हो जाता है। मानसिक दुर्बलता। थोड़ी-बहुत उत्तेजना हो भी जाये तो सेक्स क्रिया पूर्ण न कर पाना। इस प्रकार के लक्षणों में फास्फोरिकम एसिडम का प्रयोग किया जा सकता है।
प्लैटिनम: रोगी अत्यधिक अहंकारी, अभिमानी हो जाता है। किसी की परवाह नहीं करना। सबको हर बात में अपने से छोटा समझना और अपने आप को हर बात में सब से बड़ा समझना। दूसरों के प्रति घृणा का भाव। इस प्रकार की अत्यधिक उत्तेजना, जिसके कारण हस्तमैथुन या अन्य तरीके से वीर्यपात करने को विवश होना पड़े। अत्यधिक कामोत्तेजना के कारण मिर्गी का दौरा पड़ जाये, असहनीय कामोत्तेजना होते रहना तथा साथ में लिंग/जननेन्द्रिय में लगातार सुरसुरी होना। अत्यधिक कामोत्तेजना के कारण शीघ्रपतन के लक्षण में प्लैटिनम लाभदायक है।
सीपिया: रोगी को अपने जननांग बिल्कुल ठण्डे से महसूस होना और उनमें बहुत ज्यादा पसीना आना, पुराना सुजाक रोग होने के कारण पेशाब के रास्ते से रात के समय दर्द के साथ स्राव का आना। लिंग के आगे के भाग पर मस्से से निकलना। बहुत दिनों तक बीमारी बने रहना अथवा बारम्बार वीर्यस्राव के कारण लिंग का दुर्बल हो जाना। कामेच्छा का घट जाना अथवा कामेच्छा के प्रति अरुचि आदि लक्षणों में सीपिया मदद कर सकती है।
सल्फर: रोगी का हर बात को तुरंत ही भूल जाना, किसी भी बात को सोचने और समझने में बहुत मुश्किल होना, मन में अजीब-अजीब से विचार आना जैसे कि वह किसी भी चीज को सुंदर वस्तु समझने लगता है, अपने आपको दुनिया का सबसे अमीर आदमी समझने लगता है, रोगी का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, किसी भी व्यक्ति से सही तरीके से बात न करना, काम करने में मन न लगना, रोगी इतना आलसी हो जाता है कि उसको खुद को ही जगा पाना मुश्किल हो जाता है, खुलकर भूख लगने पर भी रोगी का हमेशा कमजोरी और दुबला-पतला सा रहना। रोगी चाहे जितना भी भोजन कर ले उसको तब भी भूख लगती रहती है, अगर रोगी भोजन नही करता तो उसके सिर में दर्द शुरू हो जाता है और कभी-कभी तो रोगी को बिल्कुल भी भूख नहीं लगती, थोड़ा सा भोजन करते ही रोगी की भूख समाप्त हो जाती है। रोगी के लिंग में सूजन आने के कारण दर्द होना। वीर्य का अपने आप ही निकल जाना। सोते समय लिंग में बहुत तेजी से खुजली का होना और लिंग का बहुत कमजोर पड़ जाना। अंडकोषों का लटक जाना। कामेच्छा के समय जबरदस्त खाँसी उठना। लिंग में भरपूर कड़ापन न आना एवं योनि में प्रवेश के पूर्व ही अथवा प्रवेश करते ही बहुत जल्दी वीर्य स्खलित हो जाना। रोगी के लिंग में बहुत ही बदबूदार पसीने आना आदि लक्षणों के आधार पर सल्फर औषधि का प्रयोग करना असरकारक रहता है।
जिंकम मेटालिकम: मुख्य क्रिया मस्तिष्क सम्बंधित लक्षणों में विशेष रूप से होती है। यह औषधि ऊतकों को सुधारने में तेजी से क्रिया करती है और ऊतकों से सम्बंधी लक्षणों को समाप्त करती है। अण्डकोष की सूजन और ऊपर की ओर खिंचाव महसूस होना। लिंग की तेज उत्तेजना। रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें रोगभ्रम रहता है और साथ ही वीर्यपात हो जाता है। बालों का झड़ना। अण्डकोषों के वीर्य की थैली में खिंचाव महसूस होना। मन से सम्बंधित ऐसे लक्षण, जिसमें रोगी की स्मरणशक्ति कमजोर होने लगती है तथा उसे थोड़े देर पहले ही कही हुए बातें याद नहीं रहती। ऐसे रोगी शोर-शराबा पसन्द नहीं करता तथा हल्के शोर-शराबा में ही गुस्सा हो जाता है। इसके अतिरिक्त काम करने की इच्छा न करना, किसी से मिलने या बातचीत करने की इच्छा न होना। दूसरे के कहे हुए बातों को दोहराते रहना। मन में बुरे विचार आना तथा काल्पनिक रूप से भयभीत रहना। मल का सूखकर कठोर हो जाना तथा कब्ज बनना। इन कारणों से शीघ्रपतन होने पर रोगी को जिंकम मेटालिकम उपयोगी सिद्ध होगी।
कैलेडियम: रोगी अत्यन्त भुलक्कड़ होता है। जो काम कर चुका हो उस पर फिर सोचने लगता है कि किया या नहीं; दरवाजा बन्द कर चुका है, किन्तु लौट कर फिर ख्याल आता है कि बन्द किया या नहीं और फिर जाकर दरवाजे की कुण्डी को हाथ लगाकर इतमिनान करता है। जिस चीज का निश्चय करना हो उसे बार-बार जाकर, देखकर, हाथ लगाकर निश्चय करता है और वापस लौटने पर फिर अनिश्चित-का-अनिश्चित बना रहता है। रोगी सारे दिन बैठा-बैठा यही सोचा करता है कि जो काम वह कर चुका है या हो जाने चाहिये थे, वे उसने किये या नहीं किये, वे हुए या नहीं हुए। मन की इस प्रकार की दुर्बलता इसमें आ जाती है। जितना ही वह किसी विषय पर मन केन्द्रित करना चाहता है, उतना ही मन उस पर केन्द्रित नहीं हो पाता। मन की इस प्रकार की दुर्बलता प्राय: व्यभिचारियों में, हस्त-मैथुन करनेवालों में पायी जाती है। रोगी का मन अत्यन्त विषयासक्त होता है। उसमें स्त्री-प्रसंग की उत्कट इच्छा होती है, परन्तु मैथुन के प्रति असमर्थता होती है। स्त्री का आलिंगन करता है, परन्तु शारीरिक उत्तेजना ही नहीं हो पाती। ऐसे लोग सड़क के किनारे खड़े हुए आती-जाती ललनाओं की ओर ताका करते हैं और उनका वीर्य रिसता रहता है। ऐसे व्यभिचारी-विचारों से ग्रस्त पुरुष रातभर उलटा-पलटा करते हैं, लेकिन संभोग करने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसे रोगी को इतना मीठा पसीना आता है कि मक्खियां तक उस मिठास के लिये उसकी तरफ़ खिंची चली आती हैं। पसीना आने से रोगी को सभी तकलीफों में आराम मिलता है। इन लक्षणों में कैलेडियम सर्वोत्तम दवाई है।
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम: ज्यादा नशा करने के कारण रोगी की मांसपेशियों के कमजोर हो जाने पर, ठण्ड न बर्दाश्त कर पाना, त्वचा और श्लैष्मिका झिल्लियों का सुन्न पड़ जाना। ज्यादा नींद आना या नींद न आना, रोगी का चिड़चिड़ा हो जाना और याददाश्त का कमजोर हो जाना। संभोग क्रिया करने का बिल्कुल मन न करना, लिंग का सिकुड़कर छोटा हो जाना, अपने आप ही वीर्य निकल जाना। मूत्रनली से पुराने सूजाक जैसा स्राव निकलना। मूत्राशय के कष्ट, मूत्रनली में वेदना, सम्पूर्ण ध्वजभंग/नामर्दी। लिंगमुण्ड का प्रदाह, अण्डकोष में दर्द, जननेन्द्रिय में खुजली, जननेन्द्रिय की शिथिलता, सहवास के समय अतिशीघ्र स्खलित हो जाना, रात में स्वप्नदोष, कामेच्छा का अभाव आदि लक्षणों में कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम का सेवन अत्यन्त उपयोगी है।
कोनियम मेकुलेटम: टांगों का कांपना, चलने-फिरने में परेशानी होना, कुछ दूर चलते ही शरीर का जवाब दे देना, कमजोरी, खून की कमी आदि लक्षण जो ज्यादा बुढ़ापे के लक्षण होते हैं। याददाश्त का कमजोर हो जाना और जनेन्द्रियों का कमजोर पड़ जाना। रात को नींद न आना, सुबह-सुबह बिस्तर छोड़ने का मन न करना, शरीर का टूटा-टूटा सा लगना। किसी भी चीज को रखकर कुछ ही समय में भूल जाना की कहां रखी है। पुरुष के अंदर संभोग की इच्छा तेज होने पर भी संभोग क्रिया में सफल न हो पाना, लिंग का कमजोर पड़ जाना, अण्डकोश का सख्त और बढ़ जाना। प्रचण्ड कामेच्छा रहने पर भी लिंग का उत्तेजित न होना। रात्रि में बिना स्वप्न के ही वीर्यम्राव। अत्यधिक सेक्स इच्छा होने पर भी सम्पूर्ण अथवा आंशिक, ध्वजभंग/नामर्दी। दर्द भरा वीर्यस्राव तथा भारी दर्दनाक लिंगोत्तेजना। लिंगोत्तेजना होने पर छुरी से काटने जैसा दर्द। विधुर तथा स्त्री प्रसंग के अनभ्यस्त पुरुषों की दबी हुई कामेच्छा का दुष्परिणाम, लैंगिक दुर्बलता, शीघ्रपतन के लक्षण आदि में कोनियम मेकुलेटम सर्वोत्तम दवाई है।
उक्त औषधियों के अतिरिक्त भी लक्षणानुसार होम्योपैथी में अनेकानेक ऐसी औषधियाँ हैं, जो शीघ्रपतन नामक तकलीफ का समाधान करने में उपयोगी सिद्ध होती हैं।
*नोट: मेरी ओर से भेजी जा रही उक्त पाठ्य सामग्री से यदि आपको किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो प्लीज तुरंत अवगत कराएं। आगे से आपको नहीं भेजी जायेगी। यदि यह सामग्री आपको किसी अन्य स्रोत से मिली है और यदि आप अपने वाट्सएप इनबॉक्स में नियमित रूप से प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने मोबाईल में हमारा वाट्सएप 9875066111 सेव/एड करें और हमें नियमित सामग्री प्राप्त करने हेतु वाट्सएप 9875066111 पर लिखें।*
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', HCF&MDC
(Health Care Friend and Marital Dispute Consultant)
स्वाथ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार
Health WhatsApp हेल्थ वाट्सएप: 8561955619
Mobile No. मोबाईन नम्बर: 9875066111 (10AM to 10PM)
Jaipur, Rajasthan, 26 दिसम्बर, 2017, 04.44AM
निरोगधाम पर 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच
हमारा मकसद है रोगियों का आरोग्य अर्थात रोगमुक्ति। यह तब ही सम्भव है, जबकि उनको सही, शुद्ध और ताजा दवाईयां उपलब्ध हों। वर्तमान में बड़े-बड़े नाम वाले बाबाओं तक की औषधियां निर्धारित मानदण्डों पर खरी नहीं उतर रही हैं। ऐसे में रोगी करें भी तो करें क्या?
ऐसे में हम कम से कम हमारे सम्पर्क में आने वाले रोगियों को तो 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियां उपलब्ध करवाने की कौशिश कर रहे हैं। इस दिशा में हमने छोटी सी शुरूआत की है। हमने हमारे फॉर्म पर कुछ अति महत्वपूर्ण औषधियों की खेती शुरू की है। जिनमें यौन रोगों के निवारण तथा यौन क्षमता बढाने के लिये सुप्रषिद्ध——कौंच——नामक औषधि भी शामिल है। पिछले वर्ष भी हमने 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच की खेती की थी। कौंच के पाउडर से अकल्पनीय परिणाम सामने आये हैं। यद्यपि हम रोगियों की जरूरत पूरी करने में असफल रहे। इस कारण इस बार हमने पिछले साल की तुलना में 100 गुणा अधिक कौंच के पौधे लगाये हैं। कौंच के पौधों का रोपण वर्षाकाल के शुरू होने से बहुत पहले ही कर दिया था। अत: अब बेल छोड़ रहे हैं। जिनके ओरिजनल चित्र प्रस्तुत हैं।
कौंच सहित महत्वपूर्ण औषधियों की पैदावार करना इस कारण भी जरूरी हो गया, क्योंकि बाजार में सड़ी—गली और अनुपयोगी औषधियां मिलती हैं। जिनसे सही परिणाम नहीं मिलने पर आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों का विश्वास टूटता है और उपचार करने वाला चिकित्सक बदनाम होते हैं। साथ ही रोगी के धन का भी अपव्यय होता है। रोगी का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिये हमारा लेख—''कौंच : सड़ी-गली-पुरानी अनुपयोगी आयुर्वेदिक औषधियां!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश''' पढा जा सकता है।
यहां पर हमारे फॉर्म पर रोपे गये कौंच की बेलों के नवीनतम 11 जनू, 2017 के चित्र प्रस्तुत हैं।
कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते हैं। इसकी पत्तियों, बीजों व शाखाओं का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है। ज्यादातर कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक यौन—शक्ति बरकरार रखने के लिए किया जता है। आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि कौंच के बीज अमेरिका की प्रसिद्ध सेक्स शक्ति वर्धक दवा वियग्रा से भी 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली होते है। मेरा अपना अनुभव है कि 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच को सही तरीके से शोधन करके अन्य 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक दवाईयों के साथ सेवन करने से निम्न तकलीफों में अकल्पनीय परिणाम मिलते हैं:
1 लिंग की कमजोरी।
लिंग की नसों की कमजोरी
2 वीर्य का पतलापन।
3 नपुंसकता/नामर्दी।
4 शीघ्रपतन/शीघ्रस्खलन।
5 उत्तेजना में कमी।
6 बदन दर्द/गठिया दर्द।
7 पेट/गैस की तकलीफे।
8 मधुमेह/डायबिटीज।
9 पुराना बुखार।
10 बदन में सूजन।
12 श्वेत प्रदर/ल्यूकोरिया।
13 मासिकधर्म की तकलीफें।
14 स्तन वृद्धि।
15 खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव।
16 शारीरिक बलवृद्धि।
17 वजन बढ़ाना।
18 पुरानी खांसी।
19 उदर कृमि नष्ट।
20 शुक्राणुओं की कमी।
इत्यादि।
नोट: हमें खेद है कि हमारे पास उपलब्ध सौ फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों की उपलब्धता में कमी के कारण हम, हम से सम्पर्क करने वाले सभी आयुर्वेद प्रेक्टिशनर्स को औषधियां उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। क्योंकि हमारी पहली प्राथमिकता हम से सम्पर्क करने वाले रोगियों का उपचार करना है।
नोट: हमें खेद है कि हमारे पास उपलब्ध सौ फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों की उपलब्धता में कमी के कारण हम, हम से सम्पर्क करने वाले सभी आयुर्वेद प्रेक्टिशनर्स को औषधियां उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। क्योंकि हमारी पहली प्राथमिकता हम से सम्पर्क करने वाले रोगियों का उपचार करना है।
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परामर्श समय : 10 AM से 10 PM के बीच।
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या स्वास्थ्य परामर्थ हेतु रिक्वेस्ट भेज सकते हैं।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
आॅन लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा
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मेरी पत्नी का बदबू मारने वाला ल्यूकोरिया, सिरदर्द और मेरी
नामर्दी, कब्जी, लीवर की बीमारी सहित सभी तकलीफें खत्म हो गयी
रेस्पेक्टेड डॉक्टर निरंकुश सर मैं आपका धन्यवाद किन शब्दों में अदा करूं समझ में नहीं आ रहा। आपने बहुत छोटी सी रकम लेकर मेरा व्यक्तिगत और सेक्सुअल जीवन बचा लिया। मैं 14 साल से 23 साल की उम्र तक लगभग हर रोज हस्तमैथुन करने का अभ्यस्त रहा। अनेक बार एक ही दिन में कई कई बार हस्तमैथुन करता था। इसके बाद एक खूबसूरत आंटी (मकान मालकिन) ने मुझे अपने सौंदर्य के जाल में ऐसा फंसाया कि 28 साल की उम्र तक शादी याद ही नहीं आयी। मकान मालिक अंकल के दफ्तर जाते ही आंटी मेरे साथ और मेरे दोस्त के साथ लगभग हर दिन सेक्स करती थी। अनेक बार एक ही दिन में कई कई बार भी सेक्स करवाती थी। इस चक्कर में हम दोनों का केरियर बर्बाद हो गया। जब अंकल का तबादला दूसरे शहर में हो गया और आंटी भी साथ चली गयी तब हमें पता चला कि अब शादी करनी होगी।
शादी की तो पत्नी को ल्यूकोरिया की इतनी भयंकर बीमारी कि उसकी योनि से बदबू आती थी। मैं उसके साथ सम्बन्ध ही नहीं बना पाया और पत्नी के होते हुए फिर से हस्तमैथुन शुरू हो गया। टेंशन में शराब शुरू कर दी। पत्नी का इलाज कराया तो कुछ सुधार हुआ। जिससे सेक्स शुरू हुआ। 2 बच्चे हो गए। पत्नी बच्चों में खो गयी, लेकिन मैं खुश नहीं हुआ। हमेशा टेंशन ही टेंशन और शराब ही शराब। लीवर खराब हो गया। कब्ज और पाइल्स का शिकार हो गया। पत्नी टेंशन में एकदम सूख कर लकड़ी हो गयी। उसे भयंकर सिरदर्द वाला माइग्रेन हो गया। सिर की नसें फूलने लगी और भयंकर दर्द होने पर उल्टियां होने लगी। उसके लिए रसोई और बच्चे संभालना ही मुश्किल हो गए। मैं पत्नी से विमुख, घर परिवार की कोई परवाह नहीं। मेरी सेक्स उत्तेजना जाती रही। मेरी सेक्स करने की भयंकर इच्छा होती, लेकिन शरीर साथ नहीं देता। पत्नी और मैं दोनों एक दूसरे से सेक्स सुख पाने को तरसने लगे। साथ रहकर भी अजनबी लोगों की तरह रहने लगे। पत्नी का बदन बदबू मारता और मेरा बदन निष्प्राण सा हो गया। बहुतेरी दवाई करवाई। जब तक दवा तब तक थोड़ा बहुत असर। हम दोनों ने इलाज पर डेढ़ लाख से अधिक खर्चा कर दिया, लेकिन अंत में सब बेकार।
जनवरी, 2016 की बात है। एक दिन मेरी पत्नी को उसकी सहेली ने डॉक्टर पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' जी के बारे में बताया और उनकी साईट हैल्थ केयर फ्रेंड के बारे में बताया तो नेट पर पढा। पत्नी ने मुझे बताया। मैंने इलाज और डॉक्टर के नाम से ही तौबा कर ली थी। सो इलाज करवाने से मना कर दिया। पत्नी को अपना इलाज करवाने को बोल दिया। पहले महीने में मेरी पत्नी ने 1570 रुपये की दवाई मंगवाई और उसका सिर दर्द गायब हो गया। पत्नी से मैंने डॉक्टर निरंकुश जी का नम्बर लिया और 9875066111 पर बात की और अपना इलाज शुरू करवाया।
6-7 महीना के लगातार इलाज ने हमारी दोनों की जिंदगी बदल दी। मेरी शराब की लत छुड़वाई। लीवर और कब्ज का इलाज किया तो धीरे-धीरे लिंग में उत्तेजना आने लगी। एक दिन ख़ुशी में मैंने अपनी पत्नी को बाहों में भर लिया और हम फिर से सेक्स के आनंद को पाने में सफल हुए। मेरी पत्नी का बदबू मारने वाला ल्यूकोरिया, माइग्रेन और मेरी नामर्दी, कब्जी, लीवर की बीमारी सहित सभी तकलीफें खत्म हो गयी हैं। हम दोनों डॉक्टर साहब के कर्जदार हैं। हमारा सही इलाज करके और अपने लिटरेचर तथा मौखिक समझाइश के जरिये हमारा सोचने का तरीका ही बदल दिया।-मनमोहन दुबे (परिवर्तित नाम) लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
डॉक्टर टिप्पणी:
~~~~~~~~बेशक पेशेंट दम्पत्ति अपने इलाज के लिए मुझे श्रेय दे रहे हैं, लेकिन असल में यह अमृततुल्य तथा हानि रहित होम्योपैथिक दवाईयों और आयुर्वेद की 100 फीसदी शुद्ध ऑर्गेनिक औषधियों का कमाल है। मेरे मतानुसार सभी डॉक्टर अपने रोगी का सही से इलाज करना चाहते हैं। मगर वर्षों तक पंसारी की दुकान की शोभा बढाने वाली सड़ी-गली और निष्प्राण वनौषधियाँ इलाज में सबसे बड़ी बाधा हैं। आयुर्वेद की असफलता का यही सबसे बड़ा कारण है। हम हमारे फ़ार्म पर पैदा की गयी ताजा और 100 फीसदी शुद्ध ऑर्गेनिक औषधियों का ही उपयोग करते हैं। होम्योपैथी की विश्वसनीय फार्मेसी की दवाई खरीदते हैं और रोगी को अपना ग्राहक नहीं, अपनी चिकित्सा का मकसद समझते हैं। रोगी हम पर विश्वास करते हैं। बस सफल चिकित्सा का यही छोटा सा राज है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-85-619-55-619
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
आॅन लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा
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अपने आसपास में पाया जाने वाला एरण्ड, अण्डउआ, अरण्ड, अरंड, एरंड, अरण्डी, अण्डी का पेड़ स्वास्थ्य रक्षा में कितना उपयोगी एवं सहायक है। आजमाकर देखेंगे तो आश्चर्यचकित हो जायेंगे!
एरण्ड, जिसे अरण्ड, अरण्डी, अण्डी आदि और बोलचाल की भाषा में अण्डउआ भी कहते हैं। इसके बीज अत्यंत उष्णवीर्य, गुल्म, शूल, वायु, यकृत व प्लीहा के रोग, उदर विकार व बवासीर को दूर करने वाले और अत्यंत अग्निदीपक होते हैं। इसका तेल सौम्य विचेरक (हलका जुलाब) का काम करता है। अरण्ड के पत्ते, मूल, बीज और तेल उपयोग में लिए जाते हैं। इसका तेल इतना निरापद जुलाब है कि इसे बाल, वृद्ध, गर्भवती स्त्री और नवप्रसूता आदि भी बेखटके सेवन कर सकते हैं। इसको स्त्री पुरुष के गुप्त रोगो के साथ साथ सैंकड़ो अनेकानेक जटिल बीमारियो में इसको उपयोग किया जाता हैं। आइये जाने अरण्ड के बारे में।
अरण्ड का पौधा प्राय: सारे भारत में पाया जाता है। अरण्ड की खेती भी की जाती है और इसे खेतों के किनारे-किनारे लगाया जाता है। ऊंचाई में यह 2.4 से 4.5 मीटर होता है। अरण्ड का तना हरा और चिकना तथा छोटी-छोटी शाखाओं से युक्त होता है। अरण्ड के पत्ते हरे, खंडित, अंगुलियों के समान 5 से 11 खंडों में विभाजित होते हैं। इसके फूल लाल व बैंगनी रंग के 30 से 60 सेमी. लंबे पुष्पदंड पर लगते हैं। फल बैंगनी और लाल मिश्रित रंग के गुच्छे के रूप में लगते हैं। प्रत्येक फल में 3 बीज होते हैं, जो कड़े आवरण से ढके होते हैं। एरंड के पौधे के तने, पत्तों और टहनियों के ऊपर धूल जैसा आवरण रहता है, जो हाथ लगाने पर चिपक जाता है।
अरण्ड दो प्रकार का होते हैं-लाल रंग के तने और पत्ते वाले अरण्ड को लाल और सफेद रंग के होने पर सफेद अरण्ड कहते हैं। पेड़ लाली लिए हो तो रक्त अरण्ड और सफेद हो तो श्वेत अरण्ड कहलाता है। इसकी दो जातियां और भी होती हैं। एक मल अरण्ड और दूसरी वर्षा अरण्ड। वर्षा अरण्ड, बरसात के सीजन में उगता है। मल एरंड 15 वर्ष तक रह सकता है। वर्षा अरण्ड के बीज छोटे होते हैं, परन्तु उनमें मल अरण्ड से अधिक तेल निकलता है। अरण्ड का तेल पेट साफ करने वाला होता है, परन्तु अधिक तीव्र न होने के कारण बालकों को देने से कोई हानि नहीं होती है।
सफेद अरण्ड : सफेद अरण्ड, बुखार, कफ, पेट दर्द, सूजन, बदन दर्द, कमर दर्द, सिर दर्द, मोटापा, प्रमेह और अंडवृद्धि का नाश करता है।
लाल अरण्ड : पेट के कीड़े, बवासीर, रक्तदोष (रक्तविकार), भूख कम लगना, और पीलिया रोग का नाश करता है। इसके अन्य गुण सफेद अरण्ड के जैसे हैं।
पेड़ : अरण्ड का पेड़ 2.4 से 4.5 मीटर, पतला, लम्बा और चिकना होता है।
फूल : अरण्ड का फूल एक लिंगी, लाल बैंगनी रंग के होते हैं। अरण्ड के फूल ठंड से उत्पन्न रोग जैसे खांसी, जुकाम और बलगम तथा पेट दर्द संबधी बीमारी का नाश करता है।
फल : अरण्ड के फल के ऊपर हरे रंग का आवरण होता है। प्रत्येक फल में तीन बीज होते हैं।
अरण्ड के पत्ते : अरण्ड के पत्ते वात पित्त को बढ़ाते हैं और मूत्रकृच्छ्र (पेशाब करने में कठिनाई होना), वायु, कफ और कीड़ों का नाश करते हैं।
अरण्ड के अंकुर : अरण्ड के अंकुर फोड़े, पेट के दर्द, खांसी, पेट के कीड़े आदि रोगों का नाश करते हैं।
बीज : एरंड के बीज सफेद चिकने होते हैं। अरण्ड के बीजों का गूदा बदन दर्द, पेट दर्द, फोड़े-फुंसी, भूख कम लगना तथा यकृत सम्बंधी बीमारी का नाश करता है।
अरण्ड का तेल : पेट की बीमारी, फोड़े-फुन्सी, सर्दी से होने वाले रोग, सूजन, कमर, पीठ, पेट और गुदा के दर्द का नाश करता है।
स्वभाव : अरण्ड गर्म प्रकृति का होता है।
हानिकारक:
अरण्ड आमाशय को शिथिल करता है, गर्मी उत्पन्न करता है और उल्टी लाता है। इसके सेवन से जी घबराने लगता है। लाल अरण्ड के 20 बीजों की गिरी नशा पैदा करती है और ज्यादा खाने से बहुत उल्टी होता है एवं घबराहट या बेहोशी तक भी हो सकती है। यह आमाशय के लिए अहितकर होता है।
अरण्ड आमाशय को शिथिल करता है, गर्मी उत्पन्न करता है और उल्टी लाता है। इसके सेवन से जी घबराने लगता है। लाल अरण्ड के 20 बीजों की गिरी नशा पैदा करती है और ज्यादा खाने से बहुत उल्टी होता है एवं घबराहट या बेहोशी तक भी हो सकती है। यह आमाशय के लिए अहितकर होता है।
तुलना : अरण्ड की तुलना जमालघोटा से की जा सकती है।
दोषों को दूर करने वाला : कतीरा और मस्तगी एरंड के गुणों को सुरक्षित रखकर इसके दोषों को दूर करता है।
नोट : लाल एरंड का तेल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में गर्म दूध के साथ लेने से योनिदर्द, वायुगोला, वातरक्त, हृदय रोग, जीर्णज्वर (पुराना बुखार), कमर के दर्द, पीठ और कब्ज के दर्द को मिटाता है। यह दिमाग, रुचि, आरोग्यता, स्मृति (याददास्त), बल और आयु को बढ़ाता है और हृदय को बलवान करता है।
गुण : लाल व सफेद दोनों प्रकार के अरण्ड मधुर, गर्म, भारी होते हैं, शोथ, कमर, वस्ति स्थान तथा सिर की पीड़ा, उदर रोग, ज्वर, श्वास, कफ, अफरा, खाँसी, कुष्ठ और गठिया रोग के नाशक हैं। अरण्ड पुराने मल को निकालकर पेट को हल्का करती है। यह ठंडी प्रकृति वालों के लिए अच्छा है, अर्द्धांग वात, गृध्रसी (साइटिका के कारण उत्पन्न बाय का दर्द), जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) तथा समस्त वायुरोगों की नाशक है। इसके पत्ते, जड़ और बीज उसका तेल सभी औषधि के रूप में इस्तेमाल किए जाते है। यहां तक कि ज्योतिषी और तांत्रिक भी ग्रहों के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए अरण्ड का प्रयोग करते हैं।
हानिकारक प्रभाव : राइसिन नामक विषैला तत्त्व होने के कारण एरंड के 40-50 दाने खाने से या 10 ग्राम बीजों के छिलकों का चूर्ण खाने से उल्टी होकर व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।
मात्रा :
बीज 2 से 6 दाने।
तेल 5 से 15 मिलीलीटर।
पत्तों का चूर्ण 3 से 4 ग्राम।
जड़ की पिसी लुगदी 10 से 20 ग्राम ।
जड़ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम।
स्वाद : अरण्ड खाने में तीखा, बेस्वाद होता है।
अरण्ड निम्न बीमारियों में उपयोगी :
1-चर्म रोग नाशक: अरण्ड की 20 ग्राम ताजा/गीली जड़ को 400 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब यह 100 मिलीलीटर शेष रह जाये, तो इसे रोगी को पिलाने से सभी चर्म रोगों में लाभ होता है। अरण्ड के तेल की मालिश करते रहने से शरीर के किसी भी अंग की त्वचा के फटने के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
2-सिर और भौहों के बाल उगायें: ऐसे शिशु जिनके सिर पर बाल नहीं उगते हों या बहुत कम हों या ऐसे पुरुष-स्त्री जिनकी पलकों व भौंहों पर बहुत कम बाल हों तो उन्हें अरण्ड के तेल की मालिश नियमित रूप से सोते समय करना चाहिए। इससे कुछ ही हफ्तों में सुंदर, घने, लंबे, काले बाल उग आयेंगे।
3 : सिर दर्द: अरण्ड के तेल की मालिश सिर में करने से सिर दर्द की पीड़ा दूर होती है। अरण्ड की जड़ को पानी में पीसकर माथे पर लगाने से भी सिर दर्द में राहत मिलती है।
4 : जलने पर: अरण्ड का तेल थोड़े-से चूने में फेंटकर आग से जले घावों पर लगाने से वे शीघ्र भर जाते हैं। अरण्ड के पत्तों के रस में बराबर की मात्रा में सरसों का तेल फेंटकर लगाने से भी यही लाभ मिलता है।
5 : पायरिया: अरण्ड के तेल में कपूर का चूर्ण मिलाकर दिन में 2 बार नियमित रूप से मसूढ़ों की मालिश करते रहने से पायरिया रोग में आरम मिलता है।
6 : शिश्न (लिंग) की शक्ति बढ़ाने के लिए: मीठे तेल में अरण्ड के पिसे बीजों का चूर्ण औटाकर शिश्न (लिंग) पर नियमित रूप से मालिश करते रहने से उसकी शक्ति बढ़ती है।
7 : मोटापा दूर करना: अरण्ड की जड़ का काढ़ा छानकर एक-एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन बार सेवन करें। अरण्ड के पत्ते, लाल चंदन, सहजन के पत्ते, निर्गुण्डी को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, बाद में 2 कलियां लहसुन की डालकर पकाकर काढ़ा बनाकर रखा रहने दें। इसमें से जो भाप निकले उसकी उस भाप से गला सेंकने और काढ़े से कुल्ला करना चाहिए। अरण्ड के पत्तों का खार (क्षार) को हींग डालकर पीये और ऊपर से भात (चावल) खायें। इससे लाभ हो जाता है। अरण्ड के पत्तों की सब्जी बनाकर खाने से मोटापा दूर हो जाता है।
8 : स्तनों में दूध वृद्धि हेतु: अरण्ड के पत्तों का रस दो चम्मच की मात्रा में दिन में तीन बार कुछ दिनों तक नियमित पिलाएं। इससे स्तनों में दूध की वृद्धि होती है। अरण्ड पाक को 10 ग्राम से लेकर 20 ग्राम की मात्रा में गुनगुने दूध के साथ प्रतिदिन सुबह और शाम को पिलाने से प्रसूता यानी बच्चे को जन्म देने वाली माता के स्तनों में दूध में वृद्धि होती है। मां के स्तनों पर अरण्ड के तेल की मालिश दिन में 2-3 बार करने से स्तनों में पर्याप्त मात्रा में दूध की वृद्धि होती है।
9 : बालकों के पेट के कृमि (कीड़े): अरण्ड का तेल गर्म पानी के साथ देना चाहिए अथवा अरण्ड का रस शहद में मिलाकर बच्चों को पिलाना चाहिए। इससे बच्चों के पेट के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं। अरण्ड के पत्तों का रस नित्य 2-3 बार बच्चे की गुदा में लगाने से बच्चों के चुनने (पेट के कीड़े) मर जाते हैं।
10 : नींद कम आना: अरण्ड के अंकुर बारीक पीसकर उसमें थोड़ा सा दूध मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को कपाल (सिर) तथा कान के पास लेप करने से नींद का कम आना दूर हो जाता है।
11 : पीनस रोग: अरण्ड के तेल को तपाकर रख लें और जिस ओर नाक में पीनस हो गया हो, उस ओर के नथुने से, उस तेल को दिन में कई बार सूंघने से पीनस नष्ट हो जाती है।
12 : योनि शूल (दर्द): अरण्ड की जड़ और सोंठ को घिसकर योनि पर लेप करें। इससे योनि दर्द ठीक हो जाता है। अरण्ड तेल में रूई का फोहा भिगोकर योनि में धारण करने से योनि का दर्द मिट जाता है।
13 : पीठ के दर्द: अरण्ड के तेल को गाय के पेशाब में मिलाकर देना चाहिए। इससे पीठ, कमर, कन्धे, पेट और पैरों का शूल (दर्द) नष्ट हो जाता है।
14 : बच्चों के दस्त: अरण्ड और चूहे की लेण्डी का चूर्ण नींबू के रस में मिलाकर बच्चों की नाभि और गुदा पर लेप करना चाहिए। इससे बच्चों का दस्त आना बंद हो जाता है।
15 : पिसा हुआ कांच खा लेने पर: पिसा हुआ कांच खा लेने पर 30 ग्राम एरंड का तेल पिलाने से लाभ मिलता है।
16 : माथे (मस्तक) के दर्द: अरण्ड की जड़ को भांगरे के रस में घिसकर नाक में लगाकर सूंघे, इससे छींक आकर मस्तक शूल नष्ट हो जाता है।
17 : होंठों का फटना: होंठों के फटने पर रात्रि को अरण्ड तेल होठ पर लगाने से लाभ मिलता है।
18 : हृदय रोग: अरण्ड की जड़ का काढ़ा जवाखार के साथ देने से हृदय रोग और कमर के दर्द का नाश हो जाता है।
19 : स्तनों की सूजन (स्त्रियों के स्तन में दूध के कारण आयी हुई सूजन और दर्द): स्तनों के सूजन से पीड़ित महिला के स्तनों में अरण्ड के पत्तों की पुल्टिस बांधनी चाहिए। इससे स्तनों की सूजन और दर्द में बहुत अधिक लाभ मिलता है।
20 : पेट में दर्द या बार-बार दस्त होना: अरण्ड के तेल का जुलाब देना चाहिए। इसका जुलाब बहुत ही उत्तम होता है। इससे पेट में दर्द नहीं होता और पानी की तरह पतले दस्त भी नहीं होते, केवल मल-शुद्धि होती है। यदि इसका जुलाब फायदा नहीं पहुंचाता तो यह कोई हानि नहीं पहुंचाता। छोटे बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के लिए यह समान रूप से उपयोगी है। सोंठ के काढ़े के साथ पीने से अरण्ड के तेल की दुर्गन्ध कम हो जाती है अथवा मट्ठे से कुल्ला करके अरण्ड का तेल पीने से उससे अरुचि नहीं होती ।
21 : अंडकोष वृद्धि: 2 चम्मच अरण्ड तेल सुबह-शाम दूध में मिलाकार सेवन करने से अंडकोष के बढे़ हिस्से से आराम मिलता है। साथ ही इस तेल की मालिश भी करनी चाहिए। 10 ग्राम अरण्ड तेल को 3 ग्राम गुग्गुलु और 10 ग्राम गाय के पेशाब के साथ सुबह-शाम पीने से एवं अंडकोष पर अरण्ड पत्ते गर्म करके बांधने से अंडकोष वृद्धि ठीक हो जाती है। अरण्ड की जड़ को सिरके में कूट-पीसकर महीने लेप बना कर गर्म करें, कुनकुना गर्म अण्डकोषों पर लेप करें। इस उपाय से अण्डकोषों की सूजन उतर जाती है।
22 : आंखों के रोग: अरण्ड के तेल के अंजन से आंखों से पानी बहता है, इसलिए इसे नेत्र विरेचन कहते हैं। अरण्ड तेल दो बूंद आंखों में डालने से, इनके भीतर का कचरा निकल जाता है और आंखों की किरकरी बंद हो जाती है। अरण्ड के पत्तों की जौ के आटे के साथ पुल्टिस बनाकर आंखों पर बांधने से आंखों पर आई पित्त की सूजन नष्ट हो जाती है।
23 : स्त्री के स्तन रोग: जब किसी स्त्री के स्तनों में दूध आना बंद हो जाता है और स्तनों में गांठें पड़ जाती हैं, तब अरण्ड के 500 ग्राम पत्तों को 20 लीटर पानी में घंटे भर उबालें, तथा गर्म पानी की धार 15-20 मिनट स्त्री के स्तनों पर डाले, अरण्ड तेल की मालिश करें, उबले हुए पत्तों की महीन पुल्टिस स्तनों पर बांधे। इससे गांठें बिखर जायेगी और दूध का प्रवाह पुन: प्रारम्भ हो जायेगा। स्तन के चारों ओर की त्वचा फट जाने पर अरण्ड तेल लगाने से तुरन्त लाभ होता है। अरण्ड के पत्तों को सिरके में पीसकर स्तनों पर प्रतिदिन मलने से कुछ ही दिनों में स्तन कठोर हो जाते हैं। इसके अलावा गांठें पिघलकर दूध उतरने लगता है तथा सूजन की तकलीफ दूर हो जाती हैं।
24 : पीलिया:
- गर्भवती महिला को यदि पीलिया हो जाये और गर्भ शुरुआती अवस्था में हो तो, अरण्ड के पत्तों का 10 ग्राम रस सुबह-सुबह 5 दिन पिलाने से पीलिया दूर हो जाता है और सूजन भी दूर हो जाती है।
- अरण्ड के पत्तों के 5 ग्राम रस में पीपल का चूर्ण मिलाकर नाक में डालकर सूंघने से या आंखों में अंजन करने से पीलिया रोग मिटता है और सूजन भी दूर हो जाती है।
- अरण्ड की जड़ का रस 6 ग्राम, दूध 250 ग्राम में मिलाकर पिलाने से कामला रोग मिटता है।
- अरण्ड की जड़ के 80 मिलीलीटर काढे़ में दो चम्मच शहद मिलाकर चाटने से खांसी दूर हो जाती है।
- अरण्ड के पत्तों का रस 10 ग्राम से 20 ग्राम तक गाय के कच्चे दूध में मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से 3 से 7 दिन में पीलिया नष्ट हो जाता है। रोगी को दही-चावल ही खिलायें और यदि कब्ज हो तो दूध अधिक पिलाएं।
- 10 ग्राम अरण्ड के पत्ते लेकर, उन्हें 100 ग्राम दूध में पीसकर छान लें और उसमें 5 ग्राम शक्कर मिलाकर दिन में 3 बार पीने से कामला रोग शांत हो जाता है।
- अरण्ड का रस डाभ (कच्चे नारियल के पानी) में मिलाकर खाली पेट पीएं। इससे पीलिया का रोग ठीक हो जाता है।
25 : खांसी: अरण्ड के पत्तों का क्षार 3 ग्राम, तेल एवं गुड़ आदि को बराबर मात्रा में मिलाकर चाटने से खांसी दूर हो जाती है।
26 : पेट के रोग: अरण्ड के बीजों के बीच के भाग को पीसकर, गाय के चौगुने दूध में पकायें जब यह खोवा की तरह हो जाय तो उसमें दो भाग चीनी मिला लें। इसे प्रतिदिन 15 ग्राम खाने से पेट की गैस मिटती है। पुराने पेट के दर्द में रोज रात को सोने के समय 125 ग्राम गर्म पानी में एक नींबू का रस निचोडकऱ, अरण्ड का तेल डालकर पीने से कुछ समय में ही दर्द दूर हो जाता है।
27 : प्रवाहिका (संग्रहणी): यदि मल के साथ आंव और खून निकलता हो तो आरम्भ में ही 10 ग्राम अरण्ड तेल देने से आंव आना कम हो जाता है और खून का गिरना भी कम हो जाता है।
28 : एपैन्डिक्स: इस रोग के प्रारम्भ में ही अरण्ड तेल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन देने से आपरेशन करने की आवश्यकता नहीं रहती और एपैन्डिक्स रोग ठीक हो जाता है।
29 : वादी की पीड़ा: अरण्ड और मेंहदी के पत्तों को पीसकर लेप करने से वादी की पीड़ा मिट जाती है।
30 : प्लीहोदर (तिल्ली का बढ़ जाना): अरण्ड के पंचाग की 10 ग्राम राख को 40 ग्राम गौमूत्र में मिलाकर पिलाने से प्लीहोदर मिट जाता है।
31 : अर्श (बवासीर):
- अरण्ड के पत्तों के 100 ग्राम काढ़े में घृतकुमारी का रस 50 ग्राम मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।
- अरण्ड तेल और घृत कुमारी का स्वरस मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से जलन शांत हो जाती है।
- मस्से और गुदा की त्वचा फट जाने पर प्रतिदिन रात्रि को अरण्ड तेल देने से बहुत लाभ होता है।
- अरण्ड के तेल की मालिश नियमित रूप से करते रहने से बवासीर के मस्से, पैरों की कील (कार्नस), मुहासें, मस्से, बिवाई, धब्बे, गठानों पर की सारी तकलीफें धीरे-धीरे दूर हो जाएंगी।
- नीम और अरण्ड के तेल को गर्म करें तथा उसमें 1 ग्राम अफीम व 2 ग्राम कपूर का चूर्ण डालकर मलहम (गाढ़ा पेस्ट) बना लें। इस पेस्ट को मस्सों पर लगाने से मस्से सूखकर झड़ जाते हैं।
- अरण्ड का तेल लेकर प्रतिदिन मस्सों पर लगाने से कुछ ही दिनों में बादी बवासीर ठीक हो जाती है।
32 : पेट की चर्बी: पेट पर चढ़ी हुई चर्बी को उतारने के लिए हरे अरण्ड की 20 से 50 ग्राम जड़ को धोकर कूटकर 200 ग्राम पानी में पकाकर 50 ग्राम शेष रहने पर पानी को प्रतिदिन पीने से पेट की चर्बी उतरती है।
33 : प्रसव कष्ट (डिलीवरी के दौरान स्त्री को होने वाली पीड़ा): प्रसवकाल में कष्ट कम हो सके इसके लिए गर्भवती स्त्री को 5 महीने बाद, अरण्ड तेल का 15-15 दिन के अन्तर से हलका जुलाब देते रहें। प्रसव के समय 25 ग्राम अरण्ड तेल को चाय या दूध में मिलाकर देने से प्रसव शीघ्र होता है।
34 : मासिक-धर्म: अरण्ड के पत्तों को गर्मकर पेट पर बांधने से मासिक-धर्म नियमित रूप से होने लगता है।
35 : गुर्दे (वृक्कशूल) दर्द: अरण्ड की मींगी को पीसकर, गर्म लेप करने से गुर्दे की वात पीड़ा व सूजन में लाभ होता है।
36 : वातरक्त: वातरक्त में अरण्ड का 10 ग्राम तेल एक गिलास दूध के साथ सेवन करना चाहिए।
37 : रक्त विकार: अरण्ड की गिरी एक, दूध 125 ग्राम, जल 250 ग्राम मिलाकर उबालते हैं। जब केवल दूध मात्र शेष रह जाए तो इसमें 10 ग्राम चीनी या मिश्री डालकर पिला दें, इस प्रकार एक गिरी से शुरू करके, 7 दिन तक 1-1 गिरी बढ़ाकर घटायें। एक गिरी पर लाने से रक्त के रोग मिटते हैं। यह प्रयोग अत्यंत वात शामक भी है।
38 : विषनाशक: अरण्ड के पत्तों का 100 ग्राम रस पिलाकर वमन (उल्टी) कराने से सांप तथा बिच्छू के विष में लाभ होता है। इसी प्रकार अफीम तथा दूसरी तरह के जहर में भी इससे लाभ होता है। अरण्ड के 20 ग्राम फलों को पीस-छानकर पिलाने से अफीम का विष उतरता है।
39 : नहरूआ: अरण्ड के पत्तों को गर्म कर बांधने से नहरूआ की सूजन मिट जाती है। अरण्ड की जड़ को गाय के घी में मिलाकर पीने से नहरूआ रोग नष्ट हो जाता है। नहरूआ के रोगी को 20 ग्राम अरण्ड के पत्तों का रस और 60 ग्राम घी मिलाकर 3 दिन तक पीने से नहरूआ रोग में आराम मिलता है।
40 : नाड़ी घाव (व्रण): अरण्ड की कोमल कोपलों को पीसकर लेप करने से नाड़ी का घाव मिटता है।
41 : शय्याक्षत (बिस्तर पर पडे़ रहने से होने वाले घाव): अरण्ड तेल लगाने से शय्याक्षत बड़ी जल्दी मिटते हैं। बच्चों के उल्टी, दस्त और बुखार में एरंड तेल से लाभदायक कोई और वस्तु नहीं है।
42 : दुष्ट व्रण (घाव): बिगड़े हुए घाव और फोड़ों पर एरंड के पत्तों को पीसकर लगाने लाभ मिलता है।
43 : वात प्रकोप और वात शूल: अरण्ड के बीजों को पीसकर लेप करने से छोटी संधियों और गठिया की सूजन मिटती है। वात रोग में अरण्ड तेल उत्तम गुणकारी है। कमर व जोड़ों का दर्द, हृदय दर्द, कफ और जोड़ों की सूजन, इन सब रोगों में अरण्ड की जड़ 10 ग्राम और सोंठ का चूर्ण 5 ग्राम का काढ़ा बनाकर सेवन करना चाहिए तथा दर्द पर अरण्ड तेल की मालिश करनी चाहिए।
44 : विद्रधि (फोड़ा) होने पर: अरण्ड की जड़ को पीसकर घी या तेल में मिलाकर कुछ गर्म कर गाढ़ा लेप करने से फोड़ा मिट जाता है।
45 : किसी भी प्रकार की सूजन: किसी भी प्रकार की सूजन, आमवात इत्यादि में अरण्ड के पत्तों को गर्म कर तेल चुपड़कर बांधने से लाभ होता है।
46 : बुखार की जलन: बुखार में होने वाली जलन में अरण्ड के पत्ते धोकर साफकर शरीर पर धारण करने से जलन नष्ट हो जाती है।
47 : तिल मस्से: पत्ते के वृन्त पर थोड़ा चूना लगाकर तिल पर बार-बार घिसने से तिल निकल जाता है। अरण्ड के तेल में कपड़ा भिगोकर मस्से पर बांधने से मस्से मिट जाते हैं। चेहरे या पूरे शरीर पर तिल, धब्बे या भूरे-भूरे दाग (लीवर स्पोंटस) हो या गाल या त्वचा पर छोटी-छोटी गिल्टियां (गांठे), सख्त गुठलियां निकलने पर रोजाना दिन में 2 से 3 बार लगातार अरण्ड के तेल की मालिश करने से धीरे-धीरे सब समाप्त हो जाते हैं। अरण्ड का तेल लगाने से जख्म भी भर जाते हैं और इसकों मस्सों पर लगाने से मस्सा ढीला होकर गिर जाता है।अरण्ड के तेल को सुबह और शाम 1-2 बूंद हल्के हाथ से मस्से पर मलने से 1 से 2 महीनों में मस्से गिर जाते हैं।
48 : पित्तजगुल्म: पित्तजगुल्म एवं पैत्तिक शूल में यष्टिमधु के 50 ग्राम काढे़ में अरण्ड तेल 5-10 मिलीलीटर मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।
49 : सौंदर्यवर्धक: अरण्ड के तेल में चने का आटा मिलाकर चेहरे पर रगड़ने से झांई आदि मिटकर चेहरा सुंदर हो जाता है।
50 : नाखून: अरण्ड के गुनगुने (हल्के गर्म) तेल में नाखूनों को कुछ मिनट डुबोये रखें, फिर उसी तेल की मालिश करें। यदि डूबोना सम्भव नहीं हो तो गर्म तेल में रुई डुबोकर नाखूनों पर रखें। इससे नाखून चमकने लगेंगे।
51 : सांप के काटे जाने पर: अरण्ड की कोपलें दस ग्राम, पांच कालीमिर्च, दोनों को पीसकर पानी में मिलाकर पिला दें। इससे उल्टी होगी, कफ निकलेगा। थोड़ी देर बाद पुन: इसी तरह पिलायें। इससे जहर बाहर निकलेगा।
52 : घाव: यदि कहीं चोट लगकर खून आने लगे, घाव हो जाए तो अरण्ड का तेल लगाकर पट्टी बांधने से लाभ होता है। अरण्ड के तेल को घाव पर लगायें। अरण्ड के तेल में नीम का तेल मिलाकर घाव पर लगायें।
53 : दाग-धब्बे: तिल, मस्से, चेहरे पर धब्बे, घट्टा-आटन, कील-मुंहासे हो तो एक दो महीने तक सुबह-शाम अरण्ड के तेल की मालिश करें। इससे उपर्युक्त विकार ठीक हो जाते हैं। मस्से, औटन पर तेल में गाज (कपड़ा) भिगोकर पट्टी बांधकर रखना चाहिए। अरण्ड के तेल में चने का आटा मिलाकर चेहरे पर रगड़ने से झांई आदि दूर होकर चेहरा साफ हो जाता है।
54 : बिवाइयां (एड़ी का फटना): पैरों को गर्म पानी से धोकर उनमें अरण्ड का तेल लगाने से बिवाइयां (फटी एड़ियां) ठीक हो जाती हैं।
55 : आंख में कुछ गिर जाना: आंख में मिट्टी, कंकरी गिर जाये, धुआं, तीव्र गंध से दर्द हो तो अरण्ड के तेल की एक बूंद आंख में डालने से लाभ होता है। तेल डालने के बाद हर 25 मिनट में सेंक करें।
56 : वायु गोला और गुल्म: पेट में गांठ की तरह उभार को वायुगोला कहते हैं। यह घटता बढ़ता है। अरण्ड का तेल 2 चम्मच, गर्म दूध में मिलाकर पीने से इसमें लाभ होता है।
57 : गठिया (जोड़ का दर्द):
- पेट में आंव दब जाने से गठिया हो जाती है। गठिया में अरण्ड का तेल कब्ज दूर करने हेतु सेवन करें। इससे आंव बाहर निकलेगी और गठिया में आराम होगा।
- घुटने के दर्द को दूर करने के लिए 1 ग्राम हरड़ और अरण्ड का तेल साथ सेवन करने से रोगी के घुटनों का दर्द दूर होता है।
- 25 ग्राम अरण्ड का तेल रोजाना सुबह-शाम खाली पेट पीये इससे गठिया के रोग में लाभ होता है। अरण्ड के बीजों को पानी में पीसकर गर्म कर सूजन व दर्द के स्थानों पर बांधने से राहत मिलती है।
58 : आंत्रवृद्धि:
- एक कप दूध में 2 चम्मच अरण्ड का तेल डालकर 1 महीने तक पीने से आंत्रवृद्धि ठीक हो जाती है।
- खरैटी के मिश्रण के साथ अरण्ड का तेल गर्मकर पीने से पेट का फूलना, दर्द, आंत्रवृद्धि व गुल्म खत्म होती है।
- इन्द्रायण की जड़ का पाउडर, अरण्ड के तेल या दूध में मिलाकर पीने से निश्चित रूप से अंत्रवृद्धि खत्म हो जायेगी।
- 250 ग्राम गर्म दूध में 20 ग्राम अरण्ड का तेल मिलाकर 1 महीने तक पियें इससे वातज अंत्रवृद्धि ठीक हो जाती है।
- 2 चम्मच अरण्ड का तेल और बच का काढ़ा बनाकर उसमें 2 चम्मच अरण्ड का तेल मिलाकर खाने से लाभ होता है।
59 : दांत घिसना या किटकिटाना: कई बच्चे रात को सोने के बाद भी दांत घिसते (किट-किटाते) रहते हैं। इस प्रकार के रोग में बच्चे के गुदा में अरण्ड का रस डाल लें। इससे सभी कीड़े नष्ट हो जाते हैं और दांत का घिसना बंद हो जाता है।
60 : आंखों का फूला, जाला: 30 ग्राम अरण्ड के तेल में 25 बूंद कार्बोलिक एसिड मिलाकर सुबह और शाम 2-2 बूंद आंख में डालने से आंखों के फूले और जाले से छुटकारा मिलता है।
61 : पेट का साफ होना: यदि मल त्यागने में कठिनाई का अनुभव हो तो अरण्ड के तेल को दूध के साथ देने से लाभ होता है।
62 : बिलनी: अरण्ड के बीज, स्फटिका और टंकण का आंखों पर लेप लगाना चाहिए।
63 : वायु का विकार: अरण्ड के तेल की 2 चम्मच मात्रा को गर्म दूध में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।
64 : कांच निकलना (गुदाभ्रंश):
- अरण्ड के तेल को हरे कांच की शीशी में भरकर 1 सप्ताह तक धूप में सुखाये। इस तेल को गुदाभ्रंश पर रूई से लगाएं। इससे गुदाभ्रंश निकलना बंद होता है।
- अरण्ड का तेल आधे से एक चम्मच की मात्रा में उम्र के अनुसार हल्के गर्म दूध में मिलाकर रोज रात को सोते समय दें। यह कब्ज और आमाशय दोनों शिकायतें को खत्म कर गुदा रोग को ठीक करता है।
65 : बालों का झड़ना (गंजेपन का रोग):
- अरण्ड या सरसों के तेल में हल्दी जलाकर छान लें और इसमें थोड़ा सा कपूर मिलाकर सिर के गंजे जगह पर मालिश करें। इससे सिर पर बाल उगना शुरू हो जाते हैं।
- एरंड के गूदे को पीसकर बाल गिर जाने के बाद लगाने से बाल फिर से उग आते हैं।
66 : पलकें और भौहें: एरंड (अरंडी) के तेल की मालिश 1-1 दिन के अन्तराल पर करने से पलकों और भौहें के बाल उग आते हैं।
67 : स्तनों से दूध का टपकना: अरण्ड के पत्तों को पानी में पीसकर छाती (सीने) पर सुबह-शाम के समय लेप करने से छाती से दूध का टपकना बंद हो जाता है।
68 : कब्ज (कोष्ठबद्धता):
- अरण्ड के तेल की 10 बूंदों को रात को सोते समय पानी में मिलाकर सेवन करने से कब्ज (कोष्ठबद्धता) की बीमारी में लाभ होता है।
- अरण्ड का तेल 30 ग्राम को गर्म दूध में मिश्री के साथ पीने से कब्ज दूर हो जाता है। 1 कप दूध में 2 चम्मच अरण्ड का तेल मिलाकर सोते समय पिलाएं। इससे पेट की कब्ज नष्ट हो जाती है।
- अरण्ड के तेल की 2 से 4 बूंद को माता के दूध में मिलाकर दें।
- अरण्ड के तेल की पेट पर मालिश करने से पेट साफ हो जाता हैं।
- 6 ग्राम अरण्ड के तेल में 6 ग्राम दही मिलाकर आधे-आधे घंटे के अन्तर के बाद पिलाने से वायुगोला हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
- अरण्ड का तेल 20 ग्राम और अदरक का रस 20 ग्राम मिलाकर पी लें, फिर ऊपर से थोड़ा-सा गर्म पानी पीने से वायु गोला में तुरन्त होता है।
- अरण्ड का तेल और उसकी 2 से 3 कलियां खाने से पेट साफ हो जाता है।
- अरण्ड का तेल 3 चम्मच, बादाम रोगन 1 चम्मच को 250 ग्राम दूध में गर्म कर सोने से पहले लें। 1 चम्मच अरण्ड का तेल दूध में मिलाकर सोने से पहले पीने से लाभ होता है।
- अरण्ड के तेल की 30 बूंदों तक की मात्रा को 250 ग्राम तक दूध में मिलाकर सेवन करने से सामान्य पेट की गैस दूर हो जाती है।
- नवजात शिशुओं को छोटी चम्मच में दी जा सकती है। कोष्ठबद्धता (कब्ज) को नष्ट करने के लिए रात को सोते समय अरण्ड के 5 ग्राम तेल को हल्के गर्म पानी के साथ लेने से लाभ मिलता है।
- सोते समय 2 चम्मच अरण्ड का तेल पीने से कब्ज दूर होती है, दस्त साफ आता है। इसे गर्म दूध या गर्म पानी में मिलाकर पी सकते हैं।
69 : उल्टी और दस्त: 10 ग्राम अरण्ड की जड़ को छाछ के साथ पीसकर पिलाने से उल्टी और दस्त बंद हो जाते हैं।
70 : गर्भनिरोध:
- मासिक-धर्म के बाद तीन दिन तक अरण्ड की मींगी खाने से एक वर्ष तक गर्भ नहीं ठहरता है।
- अरण्ड का एक बीज छीलकर माहवारी खत्म होने के दो दिन बाद सुबह के समय खाली पेट बिना चबाएं पानी से निगल लेते हैं। इससे एक वर्ष तक गर्भ नहीं ठहरता है।
71 : बुखार: अरण्ड की जड़, गिलोय, मजीठ, लाल चंदन, देवदारू तथा पद्याख का काढ़ा पिलाने से गर्भवती स्त्री का ज्वर (बुखार) दूर हो जाता है।
72 : गर्भाशय की सूजन: अरण्ड के पत्तों का रस छानकर रूई भिगोकर गर्भाशय के मुंह पर 3-4 दिनों तक रखने से गर्भाशय की सूजन मिट जाती है। गर्भाशय की सूजन प्राय: प्रसव के बाद होती है। इसमें महिला को बहुत तेज बुखार होता है। ऐसी अवस्था में अरण्ड के पत्तों के रस में शुद्ध रूई का फोहा भिगोकर योनि में रखने से आराम होता है।
73 : नपुंसकता (नामर्दी): अरण्ड के बीज 5 ग्राम, पुराना गुड़ 10 ग्राम, तिल 5 ग्राम, बिनौले की गिरी 5 ग्राम, कूट 2 ग्राम, जायफल 2 ग्राम, जावित्री 2 ग्राम, अकरकरा 2 ग्राम। इन सबको कूट-पीसकर एक साफ कपड़े में रखकर पोटली बना लें और इस पोटली को बकरी के दूध में उबालें। दूध जब अच्छी तरह पक जाये, तो इसे ठंडा करके 5 दिन तक पियें तथा पोटली से शिश्न (लिंग) की सिंकाई करें।
74 : आमातिसार: 1 चम्मच एरंड तेल को गर्म-गर्म दूध में मिलाकर पिलाने से आमातिसार रोग में लाभ मिलता है।
75 : बहरापन: असगंध, दूध, अरण्ड की जड़, शतावर और काले तिल के तेल को बराबर मात्रा में लेकर 200 ग्राम सरसों के तेल में डालकर पका लें। इस तेल को कान में डालने से कान के सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
76 : कमर का दर्द:
- अरण्ड के बीज के अंदर का गूदा, दूध में पीसकर पिलाने से कमर दर्द में लाभ होता है।
- कमर दर्द होने पर अरण्ड के बीज की 5 मींगी दूध में पीसकर पिलाने से लाभ होता है।
- अरण्ड के पत्तों पर तेल लगाकर कमर में बांधकर हल्का-सा सेंकने से शीत ऋतु में उत्पन्न कमर का दर्द शांत हो जाता है।
- अरण्ड की जड़ और सोंठ को जल में उबालकर काढ़ा बनायें। काढ़े को छानकर उसमें भुनी हींग और काला नमक मिलाकर पीने से शीत लहर के कारण उत्पन्न कमर के दर्द से राहत मिलती है।
- 35 ग्राम अरण्ड के बीजों की गिरी पीसकर 250 ग्राम दूध में पकायें। जब इसका खोया बन जाये तो इसे 70 ग्राम घी में भून लें। इसमें 70 ग्राम चीनी मिलाकर सुबह 3 चम्मच लगातार खायें, इससे कमर दर्द मिट जाता है।
77 : चोट लगने पर: चोट लगकर खून आने लगे, घाव हो तो एरंड का तेल लगाकर पट्टी बांधने से लाभ होता है। एरंड के पत्ते पर तिल का तेल लगाकर गर्म करके बांधने से चोट से सूजन एवं दर्द में लाभ होता है।
78 : आंवरक्त: पेचिश के रोगी को एरंड का तेल हल्के गुनगुने दूध में मिलाकर रात को सोते समय सेवन करने से पेचिश रोग ठीक हो जाता है।
79 : अग्निमान्द्यता (अपच):
- अरण्ड की जड़ का चूर्ण खाने से भूख बढ़ती है।
- 2 चम्मच अरण्ड का तेल गौमूत्र (गाय का पेशाब) या दूध में मिलाकर सेवन करने से आंतें स्वस्थ होती हैं।
80 : प्रदर रोग: अरण्ड की जड़ की राख दूध के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है।
81 : मोच:
- अरण्ड के पत्ते पर सरसों और हल्दी गर्म करके मोच वाले स्थान पर लगायें और पत्ते को उस पर रखकर पट्टी बांध दें।
- अरण्ड के बीज की गिरी 10 ग्राम काले तिल 10 ग्राम दूध में पीसकर हल्का गर्म करके मोच पर बांध दें।
82 : जलोदर (पेट में पानी की अधिकता): अरण्ड के तेल के साथ गोरखमुण्डी मिलाकर खाने से जलोदर में लाभ होगा।
83 : शीतपित्त:
- कूठ का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से 1.80 ग्राम में अरण्ड का तेल मिलाकर दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से आमवात में लाभ होता है। इसका बाहरी प्रयोग भी किया जाता है।
- अरण्ड के तेल में तारपीन का तेल बराबर मिलाकर मालिश करने से पित्ती में लाभ होता है।
- पित्ती उछलने पर सबसे पहले चार चम्मच अरण्ड का तेल पीसकर पेट साफ कर लें। इसके बाद 5 ग्राम छोटी इलायची के दाने, 10 ग्राम दालचीनी, पीपर 10 ग्राम सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण मक्खन के साथ खायें।
84 : स्तनों का सुडौल और पुष्ट होना: अरण्ड के तेल से स्तनों की मालिश करने से स्तन सुडौल, पुष्ट और बढ़ते हैं।
85 : पेट के कीड़ों के लिए: अरण्ड के पत्तों के रस में हींग डालकर पीने से पेट की आंतों में फंसे कीड़े मरकर बाहर आ जाते हैं।
86 : वात रोग:
- अरण्ड के तेल में गाय का मूत्र मिलाकर 1 महीने तक रोज खाने से हर तरह के वात रोग खत्म हो जाते हैं।
- अरण्ड की लकड़ी जलाकर उसकी 10 ग्राम राख को पानी के साथ खाने से वात रोग में लाभ होता है। अरण्ड की जड़ को घी या तेल में पीसकर गर्म करके लगाने से वात विद्रधि (फोड़ा) रोग खत्म होते हैं।
87 : स्तनों के आकार में वृद्धि: अरण्ड के तेल की मालिश करने से स्तनों का आकार बढ़ने लगता है।
88 : स्तनों की घुंडी का फटना: अरण्ड के तेल से स्तन या स्तनों की चूंची विदार (घुंडी फटने) में मालिश करने से लाभ मिलता है।
89 : शिरास्फीति: हाथ की शिराओं के रोग में 2 चम्मच अरण्ड का तेल दूध में मिलाकर रात में सेवन करें एवं अरण्ड तेल से मालिश करें। इससे रोगी शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
90 : नाक के रोग:
- अरण्ड के नये मुलायम पत्तों को पीसकर चूने में अच्छी तरह मिलाकर नाक की बवासीर पर लगाने से कुछ ही समय में यह रोग ठीक हो जाता है। (चूना घोंघे वाला या सीप वाला ही होना चाहिए)।
- अरण्ड के छिलकों की राख बनाकर नाक के नथुनों (छेदों) से सूंघने से नकसीर (नाक से खून बहना) रुक जाती है।
91 : सभी प्रकार के दर्द: अरण्ड के पेड़ की जड़, सोंठ, कंटकारी, कटेरी, बिजौरा नींबू की जड़, पाषाणभेद और त्रिकुटा की जड़ों को अच्छी तरह पीसकर बारीक चूर्ण को 20 ग्राम की मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें, इस बने काढ़े में जवाखार, हींग, सेंधानमक और अरण्ड का तेल मिलाकर सेवन करने से आमजशूल, दिल का दर्द (हृदय शूल), स्तनशूल, लिंग शूल यानी लिंग (शिश्न) का दर्द और अनेक प्रकार के दर्द समाप्त हो जाते हैं।
92 : स्तनों की रसौली (गांठे): अरण्ड के तेल से स्त्री के स्तनों की मालिश करें और एरंड के पत्तों को स्तन पर बाँधे। इससे स्तन में होने रसूली (गांठें, गिल्टी) धीरे-धीरे कम होकर समाप्त हो जाती हैं। इसके साथ ही साथ स्तनों के आकार में बढ़ोत्तरी होती जाती है।
93 : पेट में दर्द होने पर:
- अरण्ड का तेल 10 ग्राम दूध में मिलाकर पीने से कब्ज के कारण होने वाला पेट का दर्द समाप्त हो जाता है।
- अरण्ड के तेल में हींग को बारीक पीसकर मिलाकर पेट के ऊपर लेप करने से पेट के दर्द में आराम मिलता है।
- अरण्ड के पत्तों को निचोड़कर प्राप्त हुए रस में थोड़ी-सी मात्रा में सेंधानमक मिलाकर प्रयोग करें।
- अरण्ड के तेल में जवाखार मिलाकर सेवन करने से `कफोदर´ को समाप्त होता है।
94 : आसान प्रसव (बच्चे का जन्म आसानी से होना):
- अरण्ड का तेल नाभि पर मलने से बच्चा आसानीपूर्वक हो जाता है।
- लगभग 20 से 25 मिलीलीटर अरण्ड का तेल गर्म दूध के साथ प्रसव (डिलीवरी) के पूर्व पिलाने से प्रसव (डिलीवरी) आसानी से होता है।
- अरण्ड का तेल 50 मिलीलीटर गर्म दूध में मिलाकर पिला दें।
- अगर प्रसव में दर्द हो तो दर्द तेज होकर बंद हो जायेगा।
95 : बंद पेशाब खुल जायें: 1 छोटा चम्मच अरण्ड का तेल बच्चे को पिलाने से बंद पेशाब खुल जाता है।
96 : योनि की जलन और खुजली: अरण्ड का तेल लगभग 7 मिलीलीटर से लेकर 14 मिलीलीटर को 100-250 मिलीलीटर दूध के साथ 1 दिन में सुबह और शाम पीने से योनि की खुजली मिटती है।
97 : चेहरे की झांई के लिए: अरण्ड के तेल में बेसन मिलाकर लगाने से चेहरा साफ होकर खूबसूरत बनता है।
98 : घट्टा रोग: सुबह-शाम अरण्ड का तेल मलते रहने से घट्टे ठीक हो जाते हैं। तेल में कपड़ा भिगोकर पट्टी बांधे। इसका प्रयोग 2 महीनों तक करने से घट्टे ठीक हो जाते हैं।
99 : हाथ-पैरों की अकड़न:
- अरण्ड के तेल से हाथ व पैरों पर 2 से 3 मिनट तक धीरे-धीरे मालिश करने से ठंड के कारण उत्पन्न अकड़न खत्म हो जाती है।
- 25 ग्राम अरण्ड की जड़ का छिलका (छाल) को कूटकर 500 ग्राम पानी में उबालें। पानी आधा रह जाने पर उसको छानकर इसमें 125 ग्राम तिल का तेल डालकर फिर गर्म करें। पानी जल जाने पर ठंडाकर कम गर्म तेल से पैरों के जोड़ों पर मालिश करने से लाभ मिलता है।
100 : हाथ-पैरों की जलन:
- 30 ग्राम शुद्ध अरण्ड के तेल को 100 ग्राम गाय के पेशाब में मिलाकर पीने से हाथ-पैरों की ऐंठन दूर हो जाती है।
- अरण्ड के तेल को बकरी के दूध में मिलाकर हाथ-पैरों पर मालिश करने से लाभ मिलता है।
- पैरों के तलवों की जलन दूर करने के लिए अरण्ड के बीज और गिलोय को पीसकर लगाने से लाभ होता है।
101 : दिल की बीमारी के लिए:
- अरण्ड तेल में भुना हुआ हरीतकी फल मज्जाचूर्ण 1 से 3 ग्राम, अंगूर, शर्करा, परूषक फल व शहद बराबर मात्रा में लेकर, दिन में 2 बार सेवन करना चाहिए।
- अरण्ड तेल में भुनी हुई हरीतकी फल मज्जा 20 ग्राम, सेंधानमक 10 ग्राम, श्वेत जीरा का बारीक पिसा हुआ चूर्ण एक भाग मिलायें। इसे 2 से 6 ग्राम की मात्रा में 5 से 10 ग्राम शर्करा के साथ दिन में 2 बार सेवन करना चाहिए।
102 : चेहरे के लकवा के रोग: 10 से 20 ग्राम अरण्ड के तेल को पकाकर गर्म दूध में मिलाकर सुबह और शाम रोगी को दें अगर रोगी को पैखाना (टट्टी) साफ आने लगे तो सिर्फ एक बार दें। इसके सेवन करने से पक्षाघात, चेहरे का लकवा ठीक हो जाता है। यह शरीर में शक्ति पैदा करता है।
103 : नासूर (पुराने घाव): अरण्ड के पौधे के नये पत्तों को पानी में पीसकर नासूर पर लगाने से रोगी को लाभ मिलता है।
104 : फीलपांव (गजचर्म):
- 20 ग्राम अरण्ड का तेल और 20 ग्राम हरड़ का चूर्ण को 250 ग्राम गाय के पेशाब में मिलाकर 7 दिन तक सेवन करने से फीलपांव का रोग ठीक होता है।
- अरण्ड के तेल में छोटी हरड़ भूनकर चूर्ण बना लें। 6 ग्राम दवा को 100 ग्राम गाय के पेशाब के साथ पीने से फीलपांव का रोगी ठीक हो जाता है।
105 : तुंडिका शोथ (टांसिल): 10-10 ग्राम अरण्ड, शहतूत की पत्तियां और निर्गुण्डी तीनों को लेकर 400 ग्राम पानी में उबालकर उसकी भाप लेने से गले की सूजन समाप्त होती है।
106 : सिर का दाद: बराबर मात्रा में अरण्ड और शुद्ध नारियल के तेल को मिलाकर इसमें नीम की पत्तियों को डालकर औंटायें और पानी से सिर को धोकर इस मिश्रण को सिर पर लगाने से सिर के दाद में काफी आराम मिलता है।
107 : फोड़े-फुंसियां: अरण्ड, मालकांगनी और सज्जीक्षार के बीज को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसमें पानी डालकर गर्म-गर्म लेप कर फोड़े-फुंसियों पर लगाने से लाभ होता है।
108 : कुष्ठ (कोढ़): अरण्ड के पत्तों को मट्ठे (लस्सी) में पीसकर मालिश करने से हर प्रकार का `कोढ़´ दूर हो जाता है। सफेद फूलों वाली अरण्ड की जड़ को रविवार के दिन लाकर पीसकर रोजाना 10 ग्राम पीने से सफेद कोढ़ ठीक हो जाता है।
109 : शरीर की जलन: अरण्ड के बीज के भीतर के भाग को पीसकर बकरी के दूध में मिलाकर पैरों के तलवों में मालिश करने से रोगी के शरीर की जलन दूर हो जाती है। अरण्ड के तेल से भी मालिश करने से रोगी को लाभ मिलता है।
110 : डब्बा रोग: बच्चे के पेट पर अरण्ड के तेल की मालिश करके ऊपर से बकायन की पत्ती गर्म करके बांधने से डब्बा रोग (पसली चलना) ठीक हो जाता है।
111 : मानसिक उन्माद (पागलपन): 20 ग्राम अरण्ड के तेल को दूध के साथ रात को सोते समय पिलाने से कब्ज के उत्पन्न मानसिक उन्माद ठीक हो जाता है।
112 : साइटिका (गृध्रसी): 6-6 ग्राम अरण्ड की जड़, बेलगिरी, बड़ी कटेरी तथा छोटी कटेरी को 320 ग्राम पानी में उबालें। 40 ग्राम पानी शेष रहने पर उतार लें और छानकर थोड़ा-सा काला नमक मिलाकर पीयें। अरण्ड के बीज की गिरी 10 ग्राम, को दूध में पकाकर खीर बनाकर खिलाने से गृध्रसी, कमर दर्द, आमवात में लाभ होता है।
113 : पृष्टार्बुद (गर्दन के पिछले हिस्से में से मवाद निकलना): पृष्टार्बुद (गर्दन के पिछले हिस्से में से मवाद निकलना) के ऊपर रीठा का लेप करने से आराम आता है।
114 : लिंग दोष: तिल, अरण्ड, अजवायन, मालकंधनी, बादाम रोगन, लौंग, मछली और दालचीनी का तेल 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर एक साथ मिला लें। उसके बाद 2-4 बूंद लिंग पर डालकर मालिश कर ऊपर से पान के पत्ते रखकर धागे से लिंग पर थोड़ा ढीला बांध दें। इससे लिंग से सम्बंधित सभी दोष दूर हो जाते हैं।
115 : नाड़ी का दर्द: अरण्ड तेल में और तारपीन का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर मालिश करने से नाड़ी का दर्द कम होता है।
116 : शरीर में सूजन:
- अरण्ड के पत्तों पर सरसों का गर्म तेल लगाकर सूजन वाले अंग पर बांधने से सूजन दूर हो जाती है।
- अरण्ड के तेल को हल्का गर्म करके मालिश करने से घुटनों का दर्द और सूजन दूर हो जाती है।
- छिले हुए अरण्ड के बीजों और गोधूम को पीसकर चूर्ण बना लें, और इस चूर्ण को घी में मिलाकर दूध में उबालें, और गर्म-गर्म इस मिश्रण को लेप की तरह से शरीर पर लगाने से बदन की सूजन दूर हो जाती है।
117 : बच्चों के विभिन्न रोग:
- बच्चे के पेट पर अरण्ड का तेल मलकर, उसके ऊपर बकायन की पत्तियां गर्म करके बांधने से `डब्बे का रोग´ (पसली का रोग) दूर हो जाता है।
- लाल अरण्ड की जड़ को पीसकर चावलों के पानी में मिलाकर लेप करने से गलगण्ड रोग ठीक हो जाता है।
- लाल फूलों वाली अरण्ड की जड़ को पीसकर चावल के पानी में मिलाकर सुबह और शाम लेप करने से घेंघा रोग ठीक हो जाता है।
118 : गर्दन में दर्द: अरण्ड के बीज की मींगी को दूध में पीसकर रोगी को पिलाने से गर्दन और कमर दोनों जगह का दर्द चला जाता है।
119 : जुलाब: अरण्डी के तेल को मुख्यतः जुलाब लेने के लिए उपयोग में लिया जाता है। एक कप दूध में 2 चम्मच तेल डालकर सोते समय पीना चाहिए। बच्चों को आधा चम्मच दें। गोद के शिशु को 8-10 बूँद दें। असर न होने पर इसकी मात्रा दूसरे दिन बढ़ाकर लेना चाहिए। इस जुलाब से कमजोर व्यक्ति, रोगी या गर्भवती स्त्री को कोई खतरा नहीं रहता।
120 : आँव: आँव में चिकना, चीठा मल निकलता है और मल विर्सजन के समय पेट में हल्की-हल्की मरोड़ भी होती है। आँव का जल्दी इलाज न हो तो यही आगे चलकर आमातिसार, आमवात, सन्धिवात, अमीबायोसिस आदि रोगों को उत्पन्न कर देती है। रात को एक गिलास दूध में आधा चम्मच पिसी सोंठ डालकर खूब उबालें फिर उतारकर ठण्डा करके इसमें 2 चम्मच केस्टर/अरण्ड ऑइल डालकर सोते समय पिएँ। 2-3 दिन यह प्रयोग करने पर पेट की सारी आँव मल के साथ निकल जाती है।
स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।
Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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कुष्ट
कुष्ठ
कृमि
केला
केसर
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कॉफी
कॉफ़ी
कॉलेस्ट्रॉल
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कोबरा
कोलेस्ट्रॉल
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कोलेस्ट्रोल
कौंच
कौमार्य
क्रियाशीलता
क्रोध
क्षय रोग-Tuberculosis
क्षारीय तत्व
क्षुधानाश
खजूर
खजूर की चटनी
खनिज
खरबूजा-Musk melon
खरेंटी
खरैंटी शिलाजीत
खाज
खांसी
खिरेंटी
खिरैटी
खीप
खीरा
खुजली
खुशी-Joy
खुश्की
खुश्बू
खोया
गंजापन-Baldness
गठिया
गठिया-Arthritis
गठिया-Gout
गड़तुम्बा
गंडा-ताबीज
गंध
गन्ने का रस
गरमा गरम
गर्भ निरोधक
गर्भधारण
गर्भपात
गर्भवती
गर्भवती कैसे हों?
गर्भावस्था
गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy
गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy
गर्भाशय
गर्भाशय भ्रंश
गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy
गर्म पानी
गर्मी
गर्मी-Heat
गलगण्ड
गाजर
गाजवां
गांठ
गाँठ-Knot
गारंटी
गारण्टेड इलाज
गाल ब्लैडर
गिलोय
गिल्टी
गुड़हल
गुंदा
गुदाद्वार
गुदाभ्रंश
गुम्मा
गुर्दे
गुलज़ाफ़री
गुस्सा
गृध्रसी
गृह-स्वामिनी
गेदुआ की छाछ
गैस
गैस्ट्रिक
गैहूं का जवारा
गोक्षुरादि चूर्ण
गोखरू
गोखरू (LAND CALTROPS)
गोंद कतीरा-Hog-Gum
गोंदी
गोभी-Cabbage
गोरख मुंडी
गोरखगांजा
गोरखबूटी
गोरखमुंडी
ग्रीन-टी
घमोरी
घरेलु नुस्खे
घाघरा
घाव
चकवड़
चक्कर
चपाती
चमत्कारिक सब्जियां
चरित्र
चर्बी
चर्म
चर्म रोग
चर्मरोग
चाय
चाय-Tea
चालीस के पार-Forty Across
चिकनगुनिया
चिकित्सकीय
चिटकन
चिंतित
चिरायता-Absinth
चिरोटा
चुंबन
चोक
चौलाई
छपाकी
छरहरी काया
छाछ
छाजन बूटी
छाले
छींक
छीकें
छुअ
छुआरा
छुहारा
छोटा गोखरू
छोटा धतूरा
छोटी हरड़
जंक फूड
जकवड़
जख्म
जंगली तिल्ली
जंगली तुलसी
जंगली पेड़
जंगली मिर्ची
जंगली-कटीली चौलाई
जटामांसी-Spikenard
जलजमनी
जलन
जलोदर रोग-Ascites Disease
जवारा
जवारे
जवासा-Alhag
जहर
जामुन का जूस
जायफल
जिगर
जीरा
जीवन रक्षक
जीवनी शक्ति
जुएं
जुकाम
जुदाई
जुलाब
जूएं
जूस
जोड़ों के दर्द
जोड़ों में दर्द
जौ
ज्यूस
ज्योति
ज्वर
ज्वर-Fiver
झाइयाँ
झांईं
झाड़-फूंक
झुर्रियाँ
झुर्रियां
झुर्री
झूठे दर्द
टमाटर का रस
टमाटर-Tomatoes
टाइफाइड
टाटबडंगा
टायफायड
टूटी हड्डी
टॉन्सिल
टोटला
ट्यूमर
ठंड
ठंडापन
ठेकेदार डॉक्टर
डकार
डकारें
डायबिटीज
डायरिया
डिग्री फ़ारेनहाइट
डिग्री सेल्सियस
डिजिसेक्सुअल
डिटॉक्सीफाई
डिटॉक्सीफिकेशन
डिनर
डिप्रेशन
डिब्बाबंद भोजन
डिलेवरी
डीकामाली
डीगामाली
डेंगू
डेंगू-Dengue
डॉ. निरंकुश
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
डॉ. मीणा
ढकार
ढीलापन
ढीली योनि
तकलीफ का सही इलाज
तंत्र-मंत्र
तम्बाकू
तरबूज-Watermelon
तलाक
ताकत
तिल
तिल्ली
तुंबा
तुंबी
तुम्बा
तुलसी
तेल
त्रिदोषनाशक
त्रिफला
त्वचा
त्वचा रोग
थकान
थाईरायड
थायरायड-Thyroid
थायरॉइड
दण्डनीय अपराध
दंत वेदना
दन्तकृमि
दन्तरोग
दमा
दर वेदना
दरार
दर्द
दर्द निवारक
दर्द निवारक दवा
दर्दनाक
दस्त
दही
दाग-धब्बे-Stains-Spots
दाढ़
दांत
दांतो में कैविटी-Teeth Cavity
दाद
दाम्पत्य
दाम्पत्य विवाद सलाहकार
दाम्पत्य-Conjugal
दाल
दालचीनी
दालें
दिमांग
दिल
दीर्घायु
दु:खी
दुर्गंध
दुर्बलता
दुष्प्रभाव
दुष्प्रभावरहित
दूध
दूध वृद्धि
दूधी
दूधी-Milk Hedge
दृष्टिदोष
दो मन
द्रोणपुष्पी
द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes
धड़कन
धनिया बीज
धनिया-Coriander
धमासा
धात
धातु
धातु पतन
धार्मिक
धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं?
धैर्यहीन
नज़ला
नपुंसक
नपुंसकता
नाइट्रिक एसिड
नाक
नाखून
नागबला
नागरमोथा
नाडी हिंगु
नाड़ी हिंगु (डिकामाली)
नामर्दी
नारकीय पीड़ा
नारियल
नाश्ता
निमोनिया
निम्न रक्तचाप
निम्बू
नियासिन
निराश
निरोगधाम
निर्गुण्डी
निर्गुन्डी
निष्कपट स्नेह
निष्ठा
निसोरा
नींद
नींबू
नींबू-Lemon
नीम-azadirachta indica
नुस्खे
नुस्खे-Tips
नेगड़
नेत्र रोग
नेुचरल
नैतिक
नॉर्मल डिलेवरी
नोनिया
नौसादर
न्युमोनिया-Pneumonia
न्यूरॉन्स
पक्षघात
पंचकर्म
पढ़ने में मन लगेगा
पंतजलि
पत्तागोभी-CABBAGE
पत्थर फोड़ी
पत्थरचट्टा
पत्नी
पथरी
पदार्थ
पनीर
पपीता
पपीता-CARICA PAPPYA
पमाड
परदेशी लांगड़ी
परम्परागत चिकित्सा
परहेज
पराठा
परामर्श
परिस्थिति
पवाड़
पवाँर
पाइल्स
पाक-कला
पाचक
पाचन
पाचनतंत्र
पाचनशक्ति
पाठक संख्या 16 लाख पार
पाठक संख्या पंद्रह लाख
पायरिया
पारदर्शिता
पारिजात
पालक
पालक-Spinach
पित्त
पित्ताशय
पित्ती
पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne
पिरामिड
पीलिया
पीलिया-Jaundice
पीलिया-कामला-Jaundice
पुआड़
पुदीना
पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava
पुरुष
पुंसत्व
पेचिश
पेट के कीड़े
पेट दर्द
पेट में गैस
पेट रोग
पेड़
पेद दर्द
पेरिकिटो सेसिल
पेशाब
पेशाब में रुकावट
पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy
पोष्टिक लड्डू
पौधे
पौरुष
पौरुष ग्रंथि
पौष्टिक रागी रोटी
प्याज-Onion
प्यास
प्रजनन
प्रतिरक्षा
प्रतिरक्षा प्रणाली
प्रतिरोधक
प्रतिरोधक-Resistance
प्रदर
प्रमेह
प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery
प्रसव
प्रसव सुरक्षा चक्र
प्रसव-पीड़ा
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प्राणायाम
प्रेग्नेंसी-Pregnancy
प्रेम
प्रेमरस
प्रेमिका
प्रेमी
प्रोटीन
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प्रोटीन के स्रोत
प्रोस्टेट
प्रोस्टेट कैंसर
प्रोस्टेट ग्रंथि
प्रोस्टेट ग्रन्थि
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मोतियाबिंद
मौत
मौलसिरी
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यकृत
यकृत प्लीहा
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यकृत-लीवर-जिगर-Lever
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यूरिक एसिड लेबल
योग विज्ञापन
योन
योन संतुष्टि
योनि
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योनि शिथिल
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योनिभ्रंश
योनी
योनी संकोचन
यौन
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यौन शक्तिवर्धक
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यौन समस्याएं
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यौनशक्ति
यौनशिक्षा
यौनसुख
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यौनि
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रक्तचाप
रक्तपित्त
रक्तशोधक
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रक्ताल्पता (एनीमिया)-Anemia
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रामबाण
रामबाण औषधियाँ-Panacea Medicines
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रूसी
रूसी मोटापा
रेचक
रेठु
रोग प्रतिरोधक
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रोमांस
लकवा
लक्षण
लक्ष्मी
लंच
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लस्सी
लहसुन
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लाक्षणिक इलाज
लाक्षणिक जानकारी
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लिंग प्रवेश
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वज़न
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वात
वात श्लैष्मिक ज्वर
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वायरल
वायरल फीवर
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वासना
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विलायती नीम
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विवाहेत्तर सम्बंध
विश्वास
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विष हरनी
विषखपरा
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वीर्य वृद्धि
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वैधानिक
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व्यायाम
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शरपुंखा
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शहद-Honey
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शीघ्रपतन
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श्रेष्ठतर
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