Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
Health Care Friend and Marital Dispute Consultant
(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार)
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85619-55619 (10 AM to 10 PM)
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स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।
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आंतरिक एवं बाहरी ताकत हेतु मूंग की दाल के पोष्टिक लड्डू
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
परामर्श-8561955619 (10AM-10PM)
वर्तमान समय में जबकि लोगों को प्रकृति प्रदत्त शुद्ध आॅक्सीजन तक से महरूम होना पड़ रहा है। अधिकतर लोग विभिन्न प्रकार के नशों करने के आदी हो चुके हैं। सब्जी, फल और अनाज भी अस्वास्थ्यकर उर्वरकों तथा जहरीले कीट नाशसकों के बेजा उपयोग से पैदा किये जा रहे हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि के कारण, उन्हें पाने की लालसा एवं प्रतिस्पर्धा अपने आप में अनेक बीमारियों का कारण है। कार्यालयीन कार्यों का दबाव और अति आवश्यक संसाधनों की अप्राप्ति एवं अभाव लोगों में मानसिक तनाव एवं अवसाद को जन्म देते हैं। शारीरिक श्रम के प्रति हेय दृष्टिकोंण तथा खेलकूद के लिये समय नहीं निकालना भी अनेक बीमारियों को निमंत्रण देना है।
इन हालातों में अधिकतर लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति लगातार कमजोरी होती जा रही है। जिसके चलते स्त्रियों और पुरुषों को अनेकों प्रकार की आंतरिक एवं बाहरी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। जिनमें कब्ज, एलर्जी, माईग्रेन, बवासीर, भगंदर, रक्तचाप, मधुमेह, गुदाभ्रंश, अस्थमा, योनिभ्रंश, प्रमेह, प्रदर, आमवात, गठिया, चर्मरोग, एक्जीमा, कमजोर प्रजजन, शुक्राणुओं की कमी, बंध्यापन, नपुंसकता आदि प्रमुख तकलीफें होती देखी जाती हैं। जिनका सही समय पर शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों तथा अमृत तुल्य होम्योपैथिक दवाइयों से उपचार किया जाये तो प्रारम्भ में ही रोगमुक्ति एवं आरोग्य संभव है। अन्यथा कालांतर में उक्त सभी तकलीफें शरीर में अपनी जड़ जमा लेती हैं और पीड़ित व्यक्ति को पल-पल व्यथित जीवन जीने को विवश कर देती हैं।
मेरे लम्बे अनुभव में मैंने पाया है कि अधिकतर लोगों की पाचनक्रिया ठीक नहीं होती है। इस कारण उनको अधिकतर औषधियां काम ही नहीं करती हैं। जो लोग गुटका, तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी, जर्दा, शराब आदि का सेवन करते हैं, उन्हें होम्योपैथिक दवाइयां वांछित परिणाम नहीं दे पाती हैं। इसके अलावा अनेक लोगों को बार-बार डॉक्टर बदलने की बीमारी भी होती है। ऐसे लोगों को धैर्य एवं विश्वासपूर्वक उपचार लेना रास नहीं आता। अत: वे जीवनभर भुगतते रहते हैं।
इस सबके बावजूद भी व्यक्ति को निराश नहीं होना चाहिये। अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग बने रहना जरूरी है। कम से कम सर्दी के मौसम में बलवर्धक ताकत के मूंग की दाल के लड्डू बनाकर अवश्य प्रतिवर्ष खाने चाहिये। जिससे स्वस्थ शरीर में साल भर की ऊर्जा संचित हो सके। जिन लोगों का पेट खराब रहता है, उन्हें ताकत के लड्डूओं का सेवन शुरू करने से पहले कम से कम 10 दिन दूध में उबालकर मुनक्का/दाख सेवन करनी चाहिये। उसके बाद हल्का जुलाब लें। इसके 4-5 दिन बाद लड्डओं का सेवन शुरू करें। मूंग की दाल के लड्डूओं की सामग्री प्रस्तुत है। श्रृेष्ठ परिणाम हेतु यथासंभव शुद्ध, ताजा और आॅर्गेनिक औषधि/सामग्री का ही उपयोग करें। लेकिन अधिकतर लोगों की यही सबसे बड़ी समस्या है। मेरे यहां पर भी समस्त सामग्री आॅर्गेनिक उपलब्ध नहीं हैं। रोगियों को उपलब्ध करवाने हेतु मेरी ओर से कुछ औषधियां आॅर्गेनिक रीति से पैदा/संग्रहित की जा रही हैं, जबकि शेष ताजा एवं विश्वसनीय स्रोतों से मंगवाई जाती हैं। जो तुलनात्मक रूप से बहुत मंहगी होती हैं।
मूंग की दाल के लड्डूओं की सामग्री।
01. मूंग की धुली दाल 1 किलो।
02. शुद्ध देशी घी 1 किलो।
03. शुद्ध देशी बूरा/रवा 1.250 किलो।
04. बला 10 ग्राम।
05. अतिबला 10 ग्राम।
06. महाबला 10 ग्राम।
07. लाजवंती 10 ग्राम।
08. लोंग 5 ग्राम।
09. दालचीनी बाहरी बकल 10 ग्राम।
10. इलायची 10 ग्राम।
11. काली मूसली 10 ग्राम।
12. मुलैठी जड़ 10 ग्राम।
13. दक्षिणी गोखरू बीज 30 ग्राम।
14. शुद्ध सफेद मूसली 20 ग्राम।
15. शुद्ध शतावरी 30 ग्राम।
16. शुद्ध सेमल मूसली 30 ग्राम।
17. शुद्ध शोधित कौंच के बीज 100 ग्राम।
18. किसमिश 100 ग्राम।
19. काजू टुकड़ी 100 ग्राम।
20. कागजी बादाम की गिरी 100 ग्राम।
21. उटंगन के बीज 10 ग्राम।
22. शुद्ध वंशलोचन 10 ग्राम।
23. बबूल की फली 10 ग्राम।
24. बबूल का गोंद 10 ग्राम।
25. पिस्ता 10 ग्राम।
नोट: किसी कारण से उक्त सामग्री कम ज्यादा हो तो ध्यान रखें कि क्रम 04 से 25 तक की कुल सामग्री 500 ग्राम से 700 ग्राम तक होनी चाहिये।
नोट: उक्त लड्डू किसी दक्ष व्यक्ति/हलवाई से बनवाये जा सकते हैं। क्योंकि दाल को धीमी-धीमी आंच पर सिकाई करने के बाद उसमें सभी सामग्री का अलग-अलग बनाया गया पाउडर मिलाया जाकर लड्डू बनाये जाते हैं। अत: बेहतर यही होगा कि किसी अनुभवी व्यक्ति का सहयोग लिया जावे।
सेवन: सुबह खाली पेट 100 ग्राम से 250 ग्राम तक। अपनी पचानक्रिया के अनुसार।
लाभ: उक्त लड्डू उपरोक्त सभी बीमारियों, शारीरिक एवं मानसिक कमजोरी, प्रजनन क्षमता, यौन क्षमता आदि में आश्चर्यजनक रूप से परिणाम देते हैं। बशर्ते कोई पुरानी बीमारी नहीं हो। यदि बीमारी हो तो पहले उसका उपचार जरूरी है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', 14.11.2018
>>>>> नोट: किसी भी पुरानी या लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी से पीड़ित लोगों को, अपनी बीमारी को अपनी नियति मानकर निराश या हताश (Frustrated or Depressed) होने की जरूरत नहीं है। देशी जड़ी बूटियों और होम्योपैथी में इलाज संभव है। अपने आपपास के किसी अनुभवी डॉक्टर से सम्पर्क किया जा सकता है। देशभर में अनेकानेक अनुभवी तथा योग्य होम्योपैथ/आयुर्वेद के डॉक्टर उपलब्ध हैं।
>>>>> *हां अनेकानेक स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों की जानकारी और रोगियों के अनुभवों की जानकारी हेतु मेरी निम्न वेबसाइट/Facebook Page पर विजिट/क्लिक कर सकते हैं:-*
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>>>>>> Only Online Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार) Dr. P. L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा) Mobile & WhatsApp No.: 8561955619, *Fix Time to Call: Between 10 AM to 10 PM Only.+2nd Mobile: 9875066111*
कोई भी डॉक्टर यह दावा नहीं कर सकता कि उसके इलाज से 100 % रोगी ठीक हो सकते हैं?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
स्वास्थ्य परामर्श हेतु हेल्थ वाट्सएप
8561955619 (10AM to 10PM)
>>>>>किसी भी देश के बड़े से बड़े अस्पताल और बड़े से बड़े डॉक्टर द्वारा यह दावा नहीं किया जा सकता कि उनके यहां आने वाले सभी पेशेंट/रोगी गारण्टी के साथ ठीक/स्वस्थ कर दिये जाते हैं। बावजूद इसके भी 21वीं शताब्दी में भी ऐसे डॉक्टरों की कमी नहीं है, जो सभी कानूनों का धता बताकर शर्तिया इलाज करने का दावा करते हैं। कानून की धज्जियां उड़ाकर रोगियों का गारण्टी के साथ इलाज करने का दावा करने वाले विज्ञापन भी करते हैं, लेकिन ऐसे कथित एक्सपर्ट डॉक्टरों के इलाज से 20% रोगी भी ठीक नहीं हो पाते हैं। बल्कि ऐसे डॉक्टरों के यहां अपना वक्त और धन बर्बाद करके अनेक अंत में ऐसे रोगी इलाज हेतु आयुर्वेद या होम्यापैथ डॉक्टरों के पास ही आते हैं। मगर उनकी मनोदशा इस प्रकार की बन चुकी होती है कि वे आयुर्वेद या होम्यापैथ डॉक्टरों से भी गारण्टेड इलाज की उम्मीद करते हैं। बार-बार समझाने के बाद भी उनको गारण्टी ही चाहिये होती है। ऐसे रोगी हर माह में 2-4 डॉक्टर बदलते रहते हैं। यही नहीं उन्हें झटपट इलाज भी चाहिये होता है। कम से कम मैं ऐसे रोगियों का इलाज नहीं करता हूं।
>>>>>मगर यहां पर मुझे यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में तुरंत परिणाम सामने आते हैं। जैसे दवाई लेने के तुरंत बाद बुखार या दर्द कम हो सकते हैं। मगर जिन जटिल एवं पुरानी तकलीफों में तुरंत प्रभाव करने वाली दवाइयां स्थायी असर/आरोग्य नहीं कर पाती हैं, उन मामलों में रोगी अनेकों वर्षों तक इलाज लेकर भी परेशान रहने/होने के बाद या आॅपरेशन के डर से आयुर्वेद और, या होम्योपैथी डॉक्टरों की शरण में आते देखे जाते हैं। ऐसे रोगियों को इस बात को समझना चाहिये कि वर्षों पुरानी तथा अनेक नकारात्मक दवाइयों के जरिये अंदर दबा दिये गये या बिगाड़ दिये गये रोगों को तुरत-फुरत या गारण्टी के साथ कैसे ठीक किया जा सकता है? कोई भी होम्यापैथ या आयुर्वेद का डॉक्टर अपनी ओर से केवल प्रयास ही कर सकता है। मगर अधिकर रोगी इस बात को न तो समझते हैं और न ही समझना चाहते हैं। इस कारण भी ऐसे रोगियों की लुटाई भी खूब होती है।
>>>>>उदाहरण के लिये-
- कोष्ठबद्धता, कब्ज या मलावरोधता (Constipation or Costiveness)
- अपच (Indigestion/Dyspepsia)
- एसिडिटी (Acidity/Sourness)
- क्षुधानाश/भूख न लगना (Loss of Appetite)
- फैटी लीवर (Fatty Liver)
- हैपेटाइटिस/यकृतशोथ (Hepatitis)
- लीवर संक्रमण (Liver Infection)
- तिल्ली में सूजन (Swelling in the Spleen)
- मरोड़+आंव के साथ मलत्याग, पेचिश/आमातिसार (Dysentery)
- हैपेटाइटिश
- बवासीर (Hemorrhoids or Piles)
- गुदाभ्रंश (Rectal Prolapse)
- फिशर/भगन्दर/फिस्टुला (Fissure/Fistula)
- योनिभ्रंश (Uterine Prolapse)
- रक्ताल्पता (Anemia)
- प्रदर (Leucorrhoea)
- प्रमेह/सूजाक (Gonorrhea)
- शीघ्रपतन (Early or Premature Ejaculation)
- यौन कमजोरी (Sexual Weakness)
- अनिद्रा/उन्निद्रता (Insomnia)
- हड्डी संक्रमण (Bone Infection)
- गठिया/आर्थराइटिस/संधिशोथ (Arthritis)
>>>>>आदि जटिल रोगों से पीड़ित 99% रोगी हमारे पास इलाज हेतु तब आते हैं, जबकि वे उक्त रोगों का वर्षों तक नाकाम इलाज करवा-करवा कर, जटिल और लाइलाज जैसा बना चुके होते हैं। इसके बाद वे हम से तुरंत तथा गारंटेड इलाज (Instant and Guaranteed Treatment) की उम्मीद करते हैं! यह असंभव है। हां यदि इन तकलीफों से पीड़ित रोगी शुरू में ही किसी अनुभवी होम्यापैथ या आयुर्वेद के डॉक्टर से सम्पर्क करता है तो तुलनात्मक रूप से श्रृेष्ठ परिणामों की उम्मीद की जा सकती है। इन हालातों में मेरे जैसा व्यक्ति सिर्फ इतना ही कह सकता है कि ''मुझ से तुरंत और गारंटेड इलाज की उम्मीद नहीं करें। हां मैं, मेरी ओर से 100% कोशिश अवश्य करूंगा।''
>>>>>अंत में यही लिखना चाहूंगा कि जटिल तकलीफों से पीड़ित रोगियों को गारण्टी की उम्मीद करने के बजाय धैर्यपूर्वक किसी अनुभवी होम्योपैथ या आयुर्वेद के डॉक्टर से इलाज करवाना चाहिये। क्योंकि कोई भी डॉक्टर यह दावा नहीं कर सकता कि उसके इलाज से 100 के 100% रोगी ठीक हो ही जाते है?-सोमवार, 29 अक्टूबर, 2018, 07.28 बजे।
>>>>> नोट: किसी भी पुरानी या लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी से पीड़ित लोगों को, अपनी बीमारी को अपनी नियति मानकर निराश या हताश (Frustrated or Depressed) होने की जरूरत नहीं है। देशी जड़ी बूटियों और होम्योपैथी में इलाज संभव है। अपने आपपास के किसी अनुभवी डॉक्टर से सम्पर्क किया जा सकता है। देशभर में अनेकानेक अनुभवी तथा योग्य होम्योपैथ/आयुर्वेद के डॉक्टर उपलब्ध हैं।
>>>>> *हां अनेकानेक स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों की जानकारी और रोगियों के अनुभवों की जानकारी हेतु मेरी निम्न वेबसाइट/Facebook Page पर विजिट/क्लिक कर सकते हैं:-*
>>>>> *Online Doctor*
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निरोगधाम पर 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच
हमारा मकसद है रोगियों का आरोग्य अर्थात रोगमुक्ति। यह तब ही सम्भव है, जबकि उनको सही, शुद्ध और ताजा दवाईयां उपलब्ध हों। वर्तमान में बड़े-बड़े नाम वाले बाबाओं तक की औषधियां निर्धारित मानदण्डों पर खरी नहीं उतर रही हैं। ऐसे में रोगी करें भी तो करें क्या?
ऐसे में हम कम से कम हमारे सम्पर्क में आने वाले रोगियों को तो 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियां उपलब्ध करवाने की कौशिश कर रहे हैं। इस दिशा में हमने छोटी सी शुरूआत की है। हमने हमारे फॉर्म पर कुछ अति महत्वपूर्ण औषधियों की खेती शुरू की है। जिनमें यौन रोगों के निवारण तथा यौन क्षमता बढाने के लिये सुप्रषिद्ध——कौंच——नामक औषधि भी शामिल है। पिछले वर्ष भी हमने 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच की खेती की थी। कौंच के पाउडर से अकल्पनीय परिणाम सामने आये हैं। यद्यपि हम रोगियों की जरूरत पूरी करने में असफल रहे। इस कारण इस बार हमने पिछले साल की तुलना में 100 गुणा अधिक कौंच के पौधे लगाये हैं। कौंच के पौधों का रोपण वर्षाकाल के शुरू होने से बहुत पहले ही कर दिया था। अत: अब बेल छोड़ रहे हैं। जिनके ओरिजनल चित्र प्रस्तुत हैं।
कौंच सहित महत्वपूर्ण औषधियों की पैदावार करना इस कारण भी जरूरी हो गया, क्योंकि बाजार में सड़ी—गली और अनुपयोगी औषधियां मिलती हैं। जिनसे सही परिणाम नहीं मिलने पर आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों का विश्वास टूटता है और उपचार करने वाला चिकित्सक बदनाम होते हैं। साथ ही रोगी के धन का भी अपव्यय होता है। रोगी का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिये हमारा लेख—''कौंच : सड़ी-गली-पुरानी अनुपयोगी आयुर्वेदिक औषधियां!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश''' पढा जा सकता है।
यहां पर हमारे फॉर्म पर रोपे गये कौंच की बेलों के नवीनतम 11 जनू, 2017 के चित्र प्रस्तुत हैं।
कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते हैं। इसकी पत्तियों, बीजों व शाखाओं का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है। ज्यादातर कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक यौन—शक्ति बरकरार रखने के लिए किया जता है। आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि कौंच के बीज अमेरिका की प्रसिद्ध सेक्स शक्ति वर्धक दवा वियग्रा से भी 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली होते है। मेरा अपना अनुभव है कि 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच को सही तरीके से शोधन करके अन्य 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक दवाईयों के साथ सेवन करने से निम्न तकलीफों में अकल्पनीय परिणाम मिलते हैं:
1 लिंग की कमजोरी।
लिंग की नसों की कमजोरी
2 वीर्य का पतलापन।
3 नपुंसकता/नामर्दी।
4 शीघ्रपतन/शीघ्रस्खलन।
5 उत्तेजना में कमी।
6 बदन दर्द/गठिया दर्द।
7 पेट/गैस की तकलीफे।
8 मधुमेह/डायबिटीज।
9 पुराना बुखार।
10 बदन में सूजन।
12 श्वेत प्रदर/ल्यूकोरिया।
13 मासिकधर्म की तकलीफें।
14 स्तन वृद्धि।
15 खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव।
16 शारीरिक बलवृद्धि।
17 वजन बढ़ाना।
18 पुरानी खांसी।
19 उदर कृमि नष्ट।
20 शुक्राणुओं की कमी।
इत्यादि।
नोट: हमें खेद है कि हमारे पास उपलब्ध सौ फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों की उपलब्धता में कमी के कारण हम, हम से सम्पर्क करने वाले सभी आयुर्वेद प्रेक्टिशनर्स को औषधियां उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। क्योंकि हमारी पहली प्राथमिकता हम से सम्पर्क करने वाले रोगियों का उपचार करना है।
नोट: हमें खेद है कि हमारे पास उपलब्ध सौ फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों की उपलब्धता में कमी के कारण हम, हम से सम्पर्क करने वाले सभी आयुर्वेद प्रेक्टिशनर्स को औषधियां उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। क्योंकि हमारी पहली प्राथमिकता हम से सम्पर्क करने वाले रोगियों का उपचार करना है।
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परामर्श समय : 10 AM से 10 PM के बीच।
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यदि हां तो आप से उम्मीद की जाती है कि-
1. आप मेरे वाट्सएप नम्बर: 85-619-55-619 को अपने मोबाईल में सेव करें।
2. आप मेरे वाट्सएप नम्बर: 85-619-55-619 पर हेल्थ बुलेटिन प्राप्त करने हेतु
या स्वास्थ्य परामर्थ हेतु रिक्वेस्ट भेज सकते हैं।
3. आपका परिचय जानने के बाद आपकी स्वास्थ्य रक्षा हेतु
हेल्थ बुलेटिन भेजा जाने लगेगा।
लेकिन याद रहे उक्त वाट्सएप पर अन्य कोई सामग्री नहीं भेजें।
अन्यथा आपके नम्बर को ब्लॉक कर दिया जायेगा।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
आॅन लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा
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लसोड़ा
लसोड़ा का चूर्ण शरीर के लिए लाभदायक
लसोड़ा को हिन्दी में ‘गोंदी’ और ‘निसोरा’ भी कहते हैं। इसके फल सुपारी के बराबर होते हैं। कच्चा लसोड़़ा का साग और आचार भी बनाया जाता है। पके हुए लसोड़े मीठे होते हैं तथा इसके अन्दर गोंद की तरह चिकना और मीठा रस होता है। लसोड़ा मध्यभारत के वनों में देखा जा सकता है, यह एक विशाल पेड़ होता है, जिसके पत्ते चिकने होते है, आदिवासी अक्सर इसके पत्तों को पान की तरह चबाते हैं। इसकी लकड़ी इमारती उपयोग की होती है। इसे रेठु के नाम से भी जाना जाता है, हालांकि इसका वानस्पतिक नाम कार्डिया डाईकोटोमा है। आदिवासी लसोड़ा का इस्तेमाल अनेक रोगनिवारणों के लिए करते हैं, चलिए जानते हैं लसोड़ा के बारे में..
लसोड़ा की छाल को पानी में घिसकर प्राप्त रस को अतिसार से पीड़ित व्यक्ति को पिलाया जाए तो आराम मिलता है। छाल के रस को अधिक मात्रा में लेकर इसे उबाला जाए और काढ़ा बनाकर पिया जाए तो गले की तमाम समस्याएं खत्म हो जाती है। लसोड़े की छाल को पानी में उबालकर छान लें। इस पानी से गरारे करने से गले की आवाज खुल जाती है। इसके बीजों को पीसकर दाद-खाज और खुजली वाले अंगों पर लगाया जाए आराम मिलता है।
डांग-गुजरात के आदिवासी लसोड़ा के फलों को सुखाकर चूर्ण बनाते हैं और मैदा, बेसन और घी के साथ मिलाकर लड्डू बनाते हैं, इनका मानना है कि इस लड्डू के सेवन शरीर को ताकत और स्फ़ूर्ती मिलती है। लसोड़ा के पत्तों का रस प्रमेह और प्रदर दोनों रोगों के लिए कारगर होता है। लसोड़ा की छाल का काढा तैयार कर माहवारी की समस्याओं से परेशान महिला को दिया जाए तो आराम मिलता है। इसकी छाल की लगभग 200 ग्राम मात्रा लेकर इतने ही मात्रा पानी के साथ उबाला जाए और जब यह एक चौथाई शेष रहे तो इससे कुल्ला करने से मसूड़ों की सूजन, दांतो का दर्द और मुंह के छालों में आराम मिल जाता है। छाल का काढ़ा और कपूर का मिश्रण तैयार कर सूजन वाले हिस्सों में मालिश की जाए तो फायदा होता है।
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ताकत बढ़ाता है और भी कई रोगों में रामबाण है ये पौधा
लसोड़ा को हिन्दी में 'गोंदी' और 'निसोरा' भी कहते हैं। इसके फल सुपारी के बराबर होते हैं। कच्चा लसोड़़ा का साग और आचार भी बनाया जाता है। पके हुए लसोड़े मीठे होते हैं तथा इसके अन्दर गोंद की तरह चिकना और मीठा रस होता है। लसोड़ा मध्यभारत के वनों में देखा जा सकता है, यह एक विशाल पेड़ होता है जिसके पत्ते चिकने होते है, आदिवासी अक्सर इसके पत्तों को पान की तरह चबाते हैं। इसकी लकड़ी इमारती उपयोग की होती है। इसे रेठु के नाम से भी जाना जाता है, हलाँकि इसका वानस्पतिक नाम कार्डिया डाईकोटोमा है। आदिवासी लसोड़ा का इस्तमाल अनेक रोगनिवारणों के लिए करते हैं, चलिए आज जानते हैं लसोड़ा के बारे में..
लसोड़ा के संदर्भ में रोचक जानकारियों और परंपरागत हर्बल ज्ञान का जिक्र कर रहें हैं डॉ दीपक आचार्य (डायरेक्टर-अभुमका हर्बल प्रा. लि. अहमदाबाद)। डॉ. आचार्य पिछले 15 सालों से अधिक समय से भारत के सुदूर आदिवासी अंचलों जैसे पातालकोट (मध्यप्रदेश), डाँग (गुजरात) और अरावली (राजस्थान) से आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान को एकत्रित कर उन्हें आधुनिक विज्ञान की मदद से प्रमाणित करने का कार्य कर रहें हैं।
1. लसोड़ा की छाल को पानी में घिसकर प्राप्त रस को अतिसार से पीड़ित व्यक्ति को पिलाया जाए तो आराम मिलता है।
2. छाल के रस को अधिक मात्रा में लेकर इसे उबाला जाए और काढ़ा बनाकर पिया जाए तो गले की तमाम समस्याएं खत्म हो जाती है।
लसोड़े की छाल को पानी में उबालकर छान लें| इस पानी से गरारे करने से गले की आवाज खुल जाती है|
3. इसके बीजों को पीसकर दाद-खाज और खुजली वाले अंगो पर लगाया जाए आराम मिलता है।
4. डाँग- गुजरात के आदिवासी लसोड़ा के फलों को सुखाकर चूर्ण बनाते है और मैदा, बेसन और घी के साथ मिलाकर लड्डु बनाते हैं, इनका मानना है कि इस लड्डु के सेवन शरीर को ताकत और स्फ़ूर्ती मिलती है।
5. लसोड़ा के पत्तों का रस प्रमेह और प्रदर दोनों रोगों के लिए कारगर होता है। लसोड़ा की छाल का काढा तैयार कर माहवारी की समस्याओं से परेशान महिला को दिया जाए तो आराम मिलता है।
6. इसकी छाल की लगभग 200 ग्राम मात्रा लेकर इतने ही मात्रा पानी के साथ उबाला जाए और जब यह एक चौथाई शेष रहे तो इससे कुल्ला करने से मसूड़ों की सूजन, दांतो का दर्द और मुंह के छालों में आराम मिल जाता है।
7. छाल का काढ़ा और कपूर का मिश्रण तैयार कर सूजन वाले हिस्सों में मालिश की जाए तो फायदा होता है।
स्रोत: भास्कर डॉट कॉम, साभार: डॉ दीपक आचार्य
--https://www.facebook.com/aryavartbksanskriti/posts/245470698935955:0
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लसोड़ा (NEROLIBD SEPISTAR)
परिचय :Nerolibd Sepistar(Lasoda)
लसोड़े के पेड़ बहुत बड़े होते हैं इसके पत्ते चिकने होते हैं। दक्षिण, गुजरात और राजपूताना में लोग पान की जगह लसोड़े का उपयोग कर लेते हैं। लसोड़ा में पान की तरह ही स्वाद होता है। इसके पेड़ की तीन से चार जातियां होती है पर मुख्य दो हैं जिन्हें लमेड़ा और लसोड़ा कहते हैं। छोटे और बड़े लसोडे़ के नाम से भी यह काफी प्रसिद्ध है। लसोड़ा की लकड़ी बड़ी चिकनी और मजबूत होती है। इमारती काम के लिए इसके तख्ते बनाये जाते हैं और बन्दूक के कुन्दे में भी इसका प्रयोग होता है। इसके साथ ही अन्य कई उपयोगी वस्तुएं बनायी जाती हैं।
इसके फल सुपारी के बराबर होते हैं। कच्चा लसोड़ा का साग और आचार भी बनाया जाता है। पके हुए लसोड़े मीठे होते हैं तथा इसके अन्दर गोंद की तरह चिकना और मीठा रस होता है, जो शरीर को मोटा बनाता है।
विभिन्न भाषाओं में लसोड़ा का नाम :
संस्कृत श्लेश्मातक, लघुश्लेश्मातक।
हिन्दी गोंदी, निसोरा, बहुवार लसोड़ा।
अंग्रेजी नेरोलिब्ड सेपिस्टर।
मराठी गोंधड़ी, भोंकर, शेलवट।
गुजराती गुदी या मोटी गुन्दी।
कनाड़ी दोड्डचल्लू, बीकेगेड, माणाडीकेएल्ले मारा, स्रणचलु।
तैलिगी पोद्दनाकेंरू।
तमिल कोरियानारूविलि।
फारसी सिफिस्तान, दबक।
लैटिन कार्डियाऐग्सिटफोलिया, कर्डिया मिस्का |
रंग : लसोड़ा के कच्चे फल हरे रंग के और पके फल गुलाबी रंग के होते हैं।
स्वाद : कच्चे लसोडे़ फीके और पके मीठे लगते हैं।
स्वरूप : लसोडे़ के पेड़ जंगलों और वनों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके पत्ते गोल-गोल थोडे़ लंबे होते हैं और इसके फूल अलूचे की तरह गोल रसीले गुच्छों में लगते हैं।
स्वभाव : इसका स्वभाव शीतल होता है।
हानिकारक : लसोड़ा का अधिक मात्रा में उपयोग मेदा (आमाशय) और जिगर के लिए हानिकारक हो सकता है।
दोषों को दूर करने वाला : इसके दोषों को दूर करने के लिए दाना उन्नाव और गुलाब के फूल मिलाकर लसोड़े का उपयोग करना चाहिए।
तुलना : इसकी तुलना खतमी से कर सकते हैं।
मात्रा : लसोड़ा को 20 दाना की मात्रा में सेवन कर सकते हैं।
गुण : लसोड़ा पेट और सीने को नर्म करता है और गले की खरखराहट व सूजन में लाभदायक है। यह पित्त के दोषों को दस्तों के रास्ते बाहर निकाल देता है और बलगम व खून के दोषों को भी दूर करता है। यह पित्त और खून की तेजी को मिटाता है और प्यास को रोकता है। लसोहड़ा पेशाब की जलन, बुखार, दमा और सूखी खांसी तथा छाती के दर्द को दूर करता है। इसकी कोपलों को खाने से पेशाब की जलन और सूजाक रोग मिट जाता है।
यह कडुवा, शीतल, कषैला, पाचक और मधुर होता है। इसके उपयोग से पेट के कीड़े, दर्द, कफ, चेचक, फोड़ा, विसर्प (छोटी-छोटी फुंसियों का दल) और सभी प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं। इसके फल शीतल, मधुर, कड़वे और हल्के होते हैं।
इसके पके फल मधुर, शीतल और पुष्टिकारक हैं, यह रूखे, भारी और वात को खत्म करने वाले होते हैं।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
आॅन लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा
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अतिबला:
अतिबला का सामान्य परिचय: बला नामक औषधि की एक प्रजाति है-"अतिबला"। अतिबला को खिरैटी/खरेंटी भी कहा जाता है। यह पौष्टिक गुणों से भरपूर है। यह आयुर्वेद में बाजीकरण के रूप में भी प्रयुक्त की जाती है। धातु सम्बंधित रोग में इसका प्रयोग कारगर है। यह यौन दौर्बल्य-धातु क्षीणता-नपुंसकता तथा शारीरिक दुर्बलता दूर करने के अलावा अन्य व्याधियों को भी दूर करने की अच्छी औषधि है।
रजिस्ट्रेशन-फ्री: यदि आप लाइलाज (Incurable) समझी जाने वाली किसी बीमारी का इलाज करवा-करवाकर थक चुके/चुकी हैं और आपकी बीमारी ठीक नहीं हो रही हैं तो इसकी की अनदेखी नहीं करें स्वास्थ्य परामर्श या इलाज हेतु अभी और इसी समय 85-619-55-619 पर अपनी समस्या लिखकर वाट्सएप करें और फ्री रजिस्ट्रेशन करवायें। जिससे बहुत कम खर्चे में आपका घर-बैठे इलाज-समाधान हो सके। Online Dr. PL Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant, (स्वास्थ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार) तथा संचालक-निरोगधाम (लाइलाज का इलाज)।
इसकी और भी कई जातियां हैं, पर बला, राजबला, नागबला और महाबला सभी प्रकार की बला शीतवीर्य, मधुर रसयुक्त, बलकारक, कान्ति वर्द्धक, वात रक्त पित्त, रक्त विकार और व्रण को दूर करने वाली होती हैं। इसके जड़ और बीज को उपयोग में लिया जाता है।
अतिबला (खरैटी) को विभिन्न भाषाओं में निम्न नामों से जाना जाता हैं:
संस्कृत: वला, वाट्यालिका, वाट्या, वाट्यालक
हिंदी: खरैटी, वरयारी, वरियार
बंगाली: श्वेतवेडेला
मराठी: लघुचिकणा, खिरहंटी
गुजराती: खपाट बलदाना
तेलगू: मुपिढी
लैटिन: सिडकार्सि फोलिया
अंग्रेजी: हॉर्नडिएमव्ड सिडा।
Common English Name: Country Mallow
Part Used: Leaves-पत्तियां, Root-जड़, Fruits-फल, Seeds-बीज, Bark-छाल।
Medicinal Use: This plant is useful in gout, tuberculosis, ulcers, bleeding disorders, and worms. It cures burning sensation. Decoction-काढ़ा used in a toothache and tender-नाज़ुक gums-मसूढे. Leaves are locally applied to boils and ulcers. Roots are used in fever, chest affection and urethritis-मूत्रमार्ग का प्रदाह. Antipyretic-ज्वरनाशक, Laxative-दस्तावर, Carminative-वायुनाशी-अग्निवर्धक, Anodyne-वेदनाहर-पीड़ा-नाशक, Cardiac Tonic-हृदय टॉनिक, Nervine Tonic-स्नायविक विकार को दूर करने वाली ओषधि, Antidiabetic-मधुमेहनिवारक and hypoglycaemic-रक्तशर्करा कम हो जाना,
Medicinal Properties: It is digestive, laxative, expectorant, diuretic, astringent, analgesic, anti-inflammatory, anthelmintic, demulcent and aphrodisiac.
औषधीय गुण: यह पाचन, रेचक, कफेलदार-बलगम निकालने वाली, मूत्रवर्धक-मूत्रल, कसैले-संकोचक, एनाल्जेसिक-पीड़ाहर-दर्दनिवारक, सोजन निवारक, कृमिनाशक, शांतिदायक और कामोद्दीपक है।
अतिबला (खरैटी) के 37 अद्भुत फायदे
1. पेशाब का बार-बार आना: खरैटी की जड़ की छाल का चूर्ण यदि चीनी के साथ सेवन करें तो पेशाब के बार-बार आने की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
2. प्रमेह (वीर्य प्रमेह): अतिबला के बारीक चूर्ण को यदि दूध और मिश्री के साथ सेवन किया जाए तो यह प्रमेह को नष्ट करती है। महाबला मूत्रकृच्छू को नष्ट करती है।
3. गीली खांसी: अतिबला, कंटकारी, बृहती, वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। इसे 14 से 28 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।
4. सीने में घाव (उर:क्षत): बलामूल का चूर्ण, अश्वगंधा, शतावरी, पुनर्नवा और गंभारी का फल समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार लेते हैं। इसे 1 से 3 ग्राम की मात्रा में 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से उर:क्षत नष्ट हो जाता है।
5. मलाशय का गिरना: अतिबला (खिरेंटी) की पत्तियों को एरंडी के तेल में भूनकर मलाशय पर रखकर पट्टी बांध दें।
6. बांझपन दूर करना: अतिबला के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान (मासिक-धर्म) के बाद, दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।
7. मसूढ़ों की सूजन: अतिबला (कंघी) के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन 3 से 4 बार कुल्ला करें। रोजाना प्रयोग करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।
8. नपुंसकता (नामर्दी): अतिबला के बीज 4 से 8 ग्राम सुबह-शाम मिश्री मिले गर्म दूध के साथ खाने से नामर्दी में पूरा लाभ होता है।
9. दस्त: अतिबला (कंघी) के पत्तों को देशी घी में मिलाकर दिन में 2 बार पीने से पित्त के उत्पन्न दस्त में लाभ होता है।
10. पेशाब के साथ खून आना: अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।
11. बवासीर: अतिबला (कंघी) के पत्तों को पानी में उबालकर उसे अच्छी तरह से मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े में उचित मात्रा में ताड़ का गुड़ मिलाकर पीयें। इससे बवासीर में लाभ होता है।
12. रक्तप्रदर: खिरैंटी और कुशा की जड़ के चूर्ण को चावलों के साथ पीने से रक्तप्रदर में फायदा होता है।
13. रक्त प्रदर-1: खिरेंटी के जड़ का मिश्रण (कल्क) बनाकर उसे दूध में डालकर गर्म करके पीने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।
14. रक्त प्रदर-2: रक्तप्रदर में अतिबला (कंघी) की जड़ का चूर्ण 6 ग्राम से 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चीनी और शहद के साथ देने से लाभ मिलता है।
15. रक्त प्रदर-3: अतिबला की जड़ का चूर्ण 1-3 ग्राम, 100-250 मिलीलीटर दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर में लाभ मिलता है।
16. श्वेतप्रदर: अतिबला की जड़ को पीसकर चूर्ण बनाकर शहद के साथ 3 ग्राम की मात्रा में दूध में मिलाकर सेवन करने से श्वेतप्रदर में लाभ प्राप्त होता है।
17. प्रदर: खिरैटी की जड़ की राख दूध के साथ देने से प्रदर में आराम मिलता है।”
18. दर्द व सूजन: दर्द भरे स्थानों पर अतिबला से सेंकना फायदेमंद होता है।
19. पित्त ज्वर: खिरेटी की जड़ का शर्बत बनाकर पीने से बुखार की गर्मी और घबराहट दूर हो जाती है।
20. रुका हुआ मासिक-धर्म: खिरैटी, चीनी, मुलहठी, बड़ के अंकुर, नागकेसर, पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल इनको दूध में पीसकर घी और शहद मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिकस्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।
21. पेट में दर्द होने पर: खिरैंटी, पृश्नपर्णी, कटेरी, लाख और सोंठ को मिलाकर दूध के साथ पीने से `पित्तोदर´ यानी पित्त के कारण होने वाले पेट के दर्द में लाभ होगा।
22. मूत्ररोग: अतिबला के पत्तों या जड़ का काढ़ा लेने से मूत्रकृच्छ (सुजाक) रोग दूर होता है। सुबह-शाम 40 मिलीलीटर लें। इसके बीज अगर 4 से 8 ग्राम रोज लें तो लाभ होता है।
23. पेशाब खुलना: खिरैटी के पत्ते घोटकर छान लें, इसमें मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब खुलकर आता है।
24. मूत्रकृच्छ: खिरैटी के बीजों के चूर्ण में मिश्री मिलाकर दूध के साथ लेने से मूत्रकृच्छ मिट जाती है।
25. फोड़ा (सिर का फोड़ा): अतिबला या कंघी के फूलों और पत्तों का लेप फोड़ों पर करने से लाभ मिलता है।
26. शरीर को शक्तिशाली बनाना: शरीर में कम ताकत होने पर खिरैंटी के बीजों को पकाकर खाने से शरीर में ताकत बढ़ जाती है।
27. शक्ति का विकास: खिरैंटी की जड़ की छाल को पीसकर दूध में उबालें। इसमें घी मिलाकर पीने से शरीर में शक्ति का विकास होता है।
28. धातु गाढ़ी और शुक्रमेह बंद: शुक्रमेह के लिए खरैटी की ताजी जड़ का एक छोटा टुकड़ा लगभग 5-6 ग्राम एक कप पानी के साथ कूट-पीस और घोंट-छानकर सुबह खाली पेट पीने से कुछ दिनों में शुक्र धातु गाढ़ी हो जाती है और शुक्रमेह होना बंद हो जाता है।
29. श्वेत प्रदर (Leukorrhea): महिला को श्वेत प्रदर (Leukorrhea ) रोग हो तो बला के बीजों का बारीक पिसा और छना चूर्ण एक एक चम्मच सुबह-शाम शहद में मिलाकर कर दे और फिर ऊपर से मीठा दूध हल्का गर्म पी लें।
30. बल वीर्य तथा ओज बढ़ता है: शरीरिक कमजोरी के लिए आधा चम्मच की मात्रा में इसकी जड़ का महीन पिसा हुआ चूर्ण सुबह-शाम मीठे हल्के गर्म दूध के साथ लेने और भोजन में दूध-चावल की खीर शामिल कर खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है शरीर सुडौल बनता है सातों धातुएं पुष्ट व बलवान होती हैं तथा बल वीर्य तथा ओज बढ़ता है।
31. मूत्रातिसार: खरैटी के बीज और छाल समान मात्रा में लेकर कूट-पीस-छानकर महीन चूर्ण कर लें तथा एक चम्मच चूर्ण घी-शकर के साथ सुबह-शाम लेने से वस्ति और मूत्रनलिका की उग्रता दूर होती है और मूत्रातिसार होना बंद हो जाता है।
32. बवासीर: बवासीर के रोगी को मल के साथ रक्त भी गिरे तो इसे रक्तार्श यानी खूनी बवासीर कहते हैं। बवासीर रोग का मुख्य कारण खानपान की बदपरहेजी के कारण कब्ज बना रहना होता है। बला के पंचांग को मोटा-मोटा कूटकर डिब्बे में भरकर रख लें और प्रतिदिन सुबह एक गिलास पानी में दो चम्मच यानी कि लगभग 10 ग्राम यह जौकुट चूर्ण डालकर उबालें और जब चौथाई भाग पानी बचे तब उतारकर छान लें फिर ठण्डा करके एक कप दूध मिलाकर पी पाएं-इस उपाय से बवासीर का खून गिरना बंद हो जाता है।
33. पेशाब में खून का आना बंद: अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।
34. मसूढ़ों के रोग: अतिबला के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन तीन से चार बार कुल्ला करें ये प्रयोग रोजाना करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।
35. मासिकधर्म की परेशानी: जिनको मासिक धर्म रुक जाता है या अनियमित आता है उनको खिरैटी+चीनी+मुलहठी+बड़ के अंकुर+ नागकेसर+पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल लेकर इनको दूध में पीसकर घी और शहद में मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिक स्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।
36. गीली खांसी: अतिबला+कंटकारी+बृहती+वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। फिर इसे 15 से 30 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।
37. दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न होता है: अतिबला (खिरैटी) के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान के बाद दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।
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अतिबला
खूनी बवासीर: रोजाना 10 ग्राम पंचांग का काढा पियें।
मसूढों की सूजन: पत्तों का काढा बनाकर रोजाना तीन बार कुल्ला करें।
गांठ या अनपके फोड़े: अतिबला के कोमल पत्तों को पीसकर इसकी पुल्टीस बाँधकर ऊपर पानी के छींटे मारते रहे। इस से गांठ या फोड़ा बिना चीरा लगाए पककर फूट जाता है।
दुर्बलता: आधा चम्मच अतिबला की जड़ का बारीक चूर्ण सुबह-शाम मीठे दूध के साथ लेने से शरीर का दुबलापन दूर हो जाता है।
खूनी बवासीर: अतिबला के पंचांग को मोटा कूठकर उसका चूर्ण बना लें। सुबह शाम 10 ग्राम चूर्ण एक गिलास पानी में उबालें। चौथाई पानी रहे हो जाए तब उतारकर छान दें। ठंडा करके पानी को एक कप दूध में मिलाकर पीने से शीघ्र खुनी बवासीर लाभ होता है।
स्वरभेद: आधा चम्मच गुलाब की जड़ का चूर्ण, शहद में मिलाकर सुबह-शाम चाटने से आवाज ठीक हो जाती है।
तृषा: बला की जड़ का काढ़ा आदर्श 10 ग्राम पीने से तृषा शांत होती है।
शुक्रमेह: बला की ताजा जड़ 6 ग्राम, एक कप पानी के साथ घोटकर वो छानकर सुबह खाली पेट पीने से लाभ होता है।
श्वेत प्रदर: बला के बीजों का बारीक चूर्ण, एक चम्मच सुबह शाम शहद में मिलाकर लेने से तथा ऊपर से मीठा दूध पीने से श्वेत प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
दाह: अतिबला की छाल का रस निकालकर शरीर पर लेप करने से जलन कम हो जाती है।
बिच्छू दंश: बला के पत्तों का रस बिच्छू द्वारा काटी गई जगहों पर लगाकर मसलने से दर्द दूर हो जाता है।
अतिबला (Atibala) का प्रयोग निम्नलिखित बीमारियों, स्थितियों और लक्षणों के उपचार, नियंत्रण, रोकथाम और सुधार के लिए किया जाता है:
दर्द
माइक्रोबियल संक्रमण
कब्ज
मलेरिया
घाव
सूजन
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सहदेई
संस्कृत में: महबला, सहदेवी, सहदेवा, डंडोत्पला, गोवन्दनी, विष्मज्वर्णशनी, विश्वदेवा
हिंदी में: सहदेवी, सदोई, सदोडी
सहदेई/सहदेवी का पौधा-साभार
बंगला में: पीत पुष्प,कुक्षिप,बेडेला, कला जीरा
गुजराती: सेदर्ड़ी, सहदेवी, कालो सेदड़ो
मराठी: भांवुर्डी, सदोड़ी, सहदेवी
पंजाब: सहदेवी
तमिल: सहदेवी
इंग्लिश: Ash-Coloured Fleabane ( एस कलर्ड फ्लीबेन )
लेटिन: Bernini’s cinema (वर्नोनिया सिनेरा)
प्रयोजन अंग: मूल पुष्प बीज एव पंचांग
स्वाद: तीखा
गुण: स्वेदजन्न कृमिघ्र शोथघ्र
उपयोग इसके मूल का प्रयोग जलोधर तथा विषम ज्वर में लाभ करी पुष्पों का प्रयोग नेत्र रोगों में लाभकारी इसके बीज कृमि रोग में लाभकारी।
मात्रा: स्वरस 6 माशा से 1 तोला और बीज 4 रत्ती से एक माशा क्वाथ 20 मिली से 30 मिली
विवरण: सहदेवी एक छोटा सा कोमल पौधा होता है जो एक फुट से साढ़े तीन फुट तक की ऊँचाई का होता है। पौधा भले ही कोमल हो पर तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में ये किसी महारथी से कम नहीं है।
अपने दिव्य गुणों के कारण आयुर्वेद के ग्रंथों में इसका उल्लेख कोई बड़ी बात नहीं है, परन्तु इसमें कई दिव्य गुण हैं, जिसके कारण इसे देवी पद मिला और इसका नाम सहदेवी पड़ा।
विवरण-सहदेई की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका फीका होता है। यह रेतीली और पहाड़ी भूमी पर होती है। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।
सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है।
सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक का शीतला नहीं निकलती।
सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीडा शाँत होती है।
सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कड़वी तोमड़ी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोटें। सूख जावे तो सूंघने को दें तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है।
सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर शिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है।
सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है।
सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है।
अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है।
इसकी जड तेले में पीस कर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है।
इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है।
इसकी जड़ शिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है।
सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।
सहदेवी का छोटा सा पौधा हर जगह खरपतवार की तरह पाया जाता है। इसके नन्हें-नन्हें जामुनी रंग के फूल होते हैं। इसका पौधा अधिक से अधिक एक मीटर तक ऊंचा हो सकता है। सहदेवी का पौधा नींद न आने वाले मरीजों के लिए सबसे अच्छा है। इसे सुखाकर तकिये के नीचे रखने से अच्छी नींद आती है। इसके नन्हे पौधे गमले में लगाकर सोने के कमरे में रख दें। बहुत अच्छी नींद आएगी।
यह बड़ी कोमल प्रकृति का होता है। बुखार होने पर यह बच्चों को भी दिया जा सकता है। इसका 1-3 ग्राम पंचांग और 3-7 काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बना कर सवेरे शाम लें। यह लीवर के लिए भी बहुत अच्छा है।
अगर रक्तदोष है, खाज खुजली है, त्वचा की सुन्दरता चाहिए तो 2 ग्राम सहदेवी का पावडर खाली पेट लें। अगर आँतों में संक्रमण है, अल्सर है या फ़ूड poisoning हो गई है, तो 2 ग्राम सहदेवी और 2 ग्राम मुलेटी/मुलैठी को मिलाकर लें। केवल मुलेटी भी पेट के अल्सर ठीक करती है। अगर मूत्र संबंधी कोई समस्या है तो एक ग्राम सहदेवी का काढ़ा लिया जा सकता है।
सहदेई की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका तीखा होता है। यह सभी जगह पाया जाता है, पर ज्यादा तर बलुई मिटटी वाले भूमि पर ज्यादा पाया जाता है। सिर्फ इसकी पहचान होनी चाहिए इसकी कई जातीयां होती हैं। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है। सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है। सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक का शीतला नहीं निकलती सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीडा शाँत होती है। सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कडवी तोमडी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोटे सुख जावे तो सुंघने के दे तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है। सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर शिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है। सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है। सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है। अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है। इसकी जड़ तेल में पीसकर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है। इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है। इसकी जड़ सिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है। सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।
सहदेवी एक छोटा सा कोमल पौधा होता है, जो एक फुट से साढ़े तीन फुट तक की ऊँचाई का होता है। पौधा भले ही कोमल हो पर तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में ये किसी महारथी से कम नहीं है। अपने दिव्य गुणों के कारण आयुर्वेद के ग्रंथों में इसका उल्लेख्य कोई बड़ी बात नहीं है, परन्तु इसमें कई दिव्य गुण हैं। जिसके कारण इसे देवी पद मिला और इसका नाम सहदेवी पड़ा। सहदेवी की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका तीखा होता है। यह सभी जगह पाया जाता है पर ज्यादा तर बलुई मिटटी वाले भूमि पर ज्यादा पाया जाता है। सिर्फ इसकी पहचान होनी चाहिए इसकी कई जातीय होती है। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।

1. ज्वर में पसीना लाने के लिये इसका काढ़ा या स्वरस पिलाते हैं।
2. बिस्फोटक में सहदेई के पंचांग का कल्क बना कर लेप करने से सर्व प्रकार के विस्फोटकों का नाश होता है।
3. मूत्रदाह रोग में इसका स्वरस पिलाते हैं।
4. उद्वेष्टन रोग में इसका स्वरस पिलाते हैं।
5. शोथयुक्त भाग पर इसका स्वरस लेप करने से लाभ होता है।
6. कृमि रोग में इसके बीज शहद में साथ देने से कृमियों का नाश होता है।
7. अर्श (बवासीर) में इसके पंचांग से लाभ होता है।
8. सहदेई का मूल (जड़ या डाली) सर के पास रख कर सोने से निद्रा आ जाती है।
9. अश्मरी (पथरी) में इसके पत्तों का स्वरस और 3-4 तुलसी के पत्तों का स्वरस दिन में तीन बार सेवन करने से एक सप्ताह में अश्मरी टूट कर बाहर आ जाती है।
10. मुख रोग में इसके मूल का क्वाथ (काढ़ा) बना कर कुल्ला करने से लाभ होता है।
11. ज्वर में इसके मूल का क्वाथ बना कर पिलाने से पसीना आता है और ज्वर उतर जाता है।
12. कुष्ट रोग में पीत पुष्प वाली सहदेई का स्वरस पीने से लाभ होता है।
13. सहदेवी पौधे की जड़ के सात टुकड़े करके कमर में बांधने से अतिसार रोग मिट जाता है।
14. इसके नन्हें पौधे गमले में लगाकर सोने के कमरे में रख दें। बहुत अच्छी नींद आएगी।
15. यह बड़ी कोमल प्रकृति का होता है। बुखार होने पर यह बच्चों को भी दिया जा सकता है।
16. इसका 1-3 ग्राम पंचांग और 3-7 काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बना कर सवेरे शाम लें। यह लीवर के लिए भी बहुत अच्छा है।
17. अगर रक्तदोष है, खाज खुजली है, त्वचा की सुन्दरता चाहिए तो 2 ग्राम सहदेवी का पावडर खाली पेट लें।
18. कंठमाला रोग में इसकी जड़ गले में बांधने से शीघ्र रोग मुक्ति होती है।
19. यदि कोई स्त्री मासिक-धर्म से पांच दिन पूर्व तथा पांच दिन बाद तक गाय के घी में सहदेवी का पंचाग सेवन करे तो अवश्य गर्भ स्थिर होता है।
20. इसको दूध में पीस कर नस्य लेने/सूंघने से स्वस्थ संतान पैदा होती है।
21. प्रसव-वेदना निवारक इसकी जड़ तेल मे घिसकर जन्नेद्रिये पर लेप कर दें अथवा स्त्री की कमर मे बांध दें, तो वह प्रसव-पीढा से मुक्त हो जाती हैं।
22. सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है।
23. सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक को शीतला नहीं निकलती है।
24. सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीड़ा शाँत होती है।
25. सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कड़वी तोमड़ी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोंटे सूख जावे तो सूंघने को दें तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है।
26. सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर सिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है।
27. सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है।
28. सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है।
29. अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है।
30. इसकी जड़ तेले में पीस कर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है।
31. इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है।
32. इसकी जड़ सिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है।
33. सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।
34. इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।
35. सहदेई का पंचांग पीने से श्वेत प्रदर रोग दूर होता है।
36. हरिताल के साथ इसकी जड़ के लेप करने से श्लीपद (हाथीपांव) रोग में लाभ होता है।
संस्कृत में: महबला, सहदेवी, सहदेवा, डंडोत्पला, गोवन्दनी, विष्मज्वर्णशनी, विश्वदेवा
हिंदी में: सहदेवी, सदोई, सदोडी
सहदेई/सहदेवी का पौधा-साभार
बंगला में: पीत पुष्प,कुक्षिप,बेडेला, कला जीरा
गुजराती: सेदर्ड़ी, सहदेवी, कालो सेदड़ो
मराठी: भांवुर्डी, सदोड़ी, सहदेवी
पंजाब: सहदेवी
तमिल: सहदेवी
इंग्लिश: Ash-Coloured Fleabane ( एस कलर्ड फ्लीबेन )
लेटिन: Bernini’s cinema (वर्नोनिया सिनेरा)
प्रयोजन अंग: मूल पुष्प बीज एव पंचांग
स्वाद: तीखा
गुण: स्वेदजन्न कृमिघ्र शोथघ्र
उपयोग इसके मूल का प्रयोग जलोधर तथा विषम ज्वर में लाभ करी पुष्पों का प्रयोग नेत्र रोगों में लाभकारी इसके बीज कृमि रोग में लाभकारी।
मात्रा: स्वरस 6 माशा से 1 तोला और बीज 4 रत्ती से एक माशा क्वाथ 20 मिली से 30 मिली
विवरण: सहदेवी एक छोटा सा कोमल पौधा होता है जो एक फुट से साढ़े तीन फुट तक की ऊँचाई का होता है। पौधा भले ही कोमल हो पर तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में ये किसी महारथी से कम नहीं है।
अपने दिव्य गुणों के कारण आयुर्वेद के ग्रंथों में इसका उल्लेख कोई बड़ी बात नहीं है, परन्तु इसमें कई दिव्य गुण हैं, जिसके कारण इसे देवी पद मिला और इसका नाम सहदेवी पड़ा।
विवरण-सहदेई की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका फीका होता है। यह रेतीली और पहाड़ी भूमी पर होती है। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।
सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है।
सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक का शीतला नहीं निकलती।
सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीडा शाँत होती है।
सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कड़वी तोमड़ी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोटें। सूख जावे तो सूंघने को दें तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है।
सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर शिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है।
सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है।
सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है।
अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है।
इसकी जड तेले में पीस कर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है।
इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है।
इसकी जड़ शिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है।
सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।

सहदेवी का छोटा सा पौधा हर जगह खरपतवार की तरह पाया जाता है। इसके नन्हें-नन्हें जामुनी रंग के फूल होते हैं। इसका पौधा अधिक से अधिक एक मीटर तक ऊंचा हो सकता है। सहदेवी का पौधा नींद न आने वाले मरीजों के लिए सबसे अच्छा है। इसे सुखाकर तकिये के नीचे रखने से अच्छी नींद आती है। इसके नन्हे पौधे गमले में लगाकर सोने के कमरे में रख दें। बहुत अच्छी नींद आएगी।
यह बड़ी कोमल प्रकृति का होता है। बुखार होने पर यह बच्चों को भी दिया जा सकता है। इसका 1-3 ग्राम पंचांग और 3-7 काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बना कर सवेरे शाम लें। यह लीवर के लिए भी बहुत अच्छा है।
अगर रक्तदोष है, खाज खुजली है, त्वचा की सुन्दरता चाहिए तो 2 ग्राम सहदेवी का पावडर खाली पेट लें। अगर आँतों में संक्रमण है, अल्सर है या फ़ूड poisoning हो गई है, तो 2 ग्राम सहदेवी और 2 ग्राम मुलेटी/मुलैठी को मिलाकर लें। केवल मुलेटी भी पेट के अल्सर ठीक करती है। अगर मूत्र संबंधी कोई समस्या है तो एक ग्राम सहदेवी का काढ़ा लिया जा सकता है।
सहदेई की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका तीखा होता है। यह सभी जगह पाया जाता है, पर ज्यादा तर बलुई मिटटी वाले भूमि पर ज्यादा पाया जाता है। सिर्फ इसकी पहचान होनी चाहिए इसकी कई जातीयां होती हैं। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है। सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है। सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक का शीतला नहीं निकलती सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीडा शाँत होती है। सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कडवी तोमडी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोटे सुख जावे तो सुंघने के दे तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है। सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर शिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है। सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है। सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है। अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है। इसकी जड़ तेल में पीसकर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है। इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है। इसकी जड़ सिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है। सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।
सहदेवी एक छोटा सा कोमल पौधा होता है, जो एक फुट से साढ़े तीन फुट तक की ऊँचाई का होता है। पौधा भले ही कोमल हो पर तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में ये किसी महारथी से कम नहीं है। अपने दिव्य गुणों के कारण आयुर्वेद के ग्रंथों में इसका उल्लेख्य कोई बड़ी बात नहीं है, परन्तु इसमें कई दिव्य गुण हैं। जिसके कारण इसे देवी पद मिला और इसका नाम सहदेवी पड़ा। सहदेवी की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका तीखा होता है। यह सभी जगह पाया जाता है पर ज्यादा तर बलुई मिटटी वाले भूमि पर ज्यादा पाया जाता है। सिर्फ इसकी पहचान होनी चाहिए इसकी कई जातीय होती है। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।

1. ज्वर में पसीना लाने के लिये इसका काढ़ा या स्वरस पिलाते हैं।
2. बिस्फोटक में सहदेई के पंचांग का कल्क बना कर लेप करने से सर्व प्रकार के विस्फोटकों का नाश होता है।
3. मूत्रदाह रोग में इसका स्वरस पिलाते हैं।
4. उद्वेष्टन रोग में इसका स्वरस पिलाते हैं।
5. शोथयुक्त भाग पर इसका स्वरस लेप करने से लाभ होता है।
6. कृमि रोग में इसके बीज शहद में साथ देने से कृमियों का नाश होता है।
7. अर्श (बवासीर) में इसके पंचांग से लाभ होता है।
8. सहदेई का मूल (जड़ या डाली) सर के पास रख कर सोने से निद्रा आ जाती है।
9. अश्मरी (पथरी) में इसके पत्तों का स्वरस और 3-4 तुलसी के पत्तों का स्वरस दिन में तीन बार सेवन करने से एक सप्ताह में अश्मरी टूट कर बाहर आ जाती है।
10. मुख रोग में इसके मूल का क्वाथ (काढ़ा) बना कर कुल्ला करने से लाभ होता है।
11. ज्वर में इसके मूल का क्वाथ बना कर पिलाने से पसीना आता है और ज्वर उतर जाता है।
12. कुष्ट रोग में पीत पुष्प वाली सहदेई का स्वरस पीने से लाभ होता है।
13. सहदेवी पौधे की जड़ के सात टुकड़े करके कमर में बांधने से अतिसार रोग मिट जाता है।
14. इसके नन्हें पौधे गमले में लगाकर सोने के कमरे में रख दें। बहुत अच्छी नींद आएगी।
15. यह बड़ी कोमल प्रकृति का होता है। बुखार होने पर यह बच्चों को भी दिया जा सकता है।
16. इसका 1-3 ग्राम पंचांग और 3-7 काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बना कर सवेरे शाम लें। यह लीवर के लिए भी बहुत अच्छा है।
17. अगर रक्तदोष है, खाज खुजली है, त्वचा की सुन्दरता चाहिए तो 2 ग्राम सहदेवी का पावडर खाली पेट लें।
18. कंठमाला रोग में इसकी जड़ गले में बांधने से शीघ्र रोग मुक्ति होती है।
19. यदि कोई स्त्री मासिक-धर्म से पांच दिन पूर्व तथा पांच दिन बाद तक गाय के घी में सहदेवी का पंचाग सेवन करे तो अवश्य गर्भ स्थिर होता है।
20. इसको दूध में पीस कर नस्य लेने/सूंघने से स्वस्थ संतान पैदा होती है।
21. प्रसव-वेदना निवारक इसकी जड़ तेल मे घिसकर जन्नेद्रिये पर लेप कर दें अथवा स्त्री की कमर मे बांध दें, तो वह प्रसव-पीढा से मुक्त हो जाती हैं।
22. सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है।
23. सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक को शीतला नहीं निकलती है।
24. सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीड़ा शाँत होती है।
25. सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कड़वी तोमड़ी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोंटे सूख जावे तो सूंघने को दें तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है।
26. सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर सिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है।
27. सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है।
28. सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है।
29. अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है।
30. इसकी जड़ तेले में पीस कर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है।
31. इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है।
32. इसकी जड़ सिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है।
33. सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।
34. इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।
35. सहदेई का पंचांग पीने से श्वेत प्रदर रोग दूर होता है।
36. हरिताल के साथ इसकी जड़ के लेप करने से श्लीपद (हाथीपांव) रोग में लाभ होता है।
उपशीर्षक:
Ash-coloured Fleabane,
Bernini’s Cinema,
अल्सर,
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प्रदर,
सहदेई,
सहदेवी
Friday, March 31, 2017
सब मर्जों की एक दवा : माजूफल
प्रेषित समय :10:14:15 AM / Thu, Apr 10th, 2014
हमारा देश आयुर्वेद का जनक है और यहां ऐसी हज़ारों जड़ी-बूटियां है जिनसे असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं. उन्हीं में से एक है माजूफल.
विभिन्न रोगों में सहायक:
1. बवासीर में दर्द का होना और मलद्वार का निकलना: 1 गिलास पानी में माजूफल पीसकर डालें और 10 मिनट तक उबाल लें, ठंडी होने के बाद इससे मलद्वार को धोयें. इससे मलद्वार का बाहर निकलना और बवासीर का दर्द दूर होता है.
2. अंडकोष के रोग: 12 ग्राम माजूफल और 6 ग्राम फिटकरी को पानी में पीसकर अंडकोष पर लेप करें. 15 दिन लेप करने से अण्डकोषों में भरा पानी सही हो जाता है.
3. अंडकोष की सूजन: 10-10 ग्राम माजूफल और असगंध लेकर पानी के साथ पीस लें, फिर इसे थोड़ा-सा गर्म करके अण्डकोष पर बांधें. इससे अंडकोष की सूजन मिट जाती है.
4. दांतों का दर्द:
- (1) 1 माजूफल एवं 1 सुपाड़ी को आग पर भून लें तथा 1 कच्चे माजूफल के साथ मिलाकर बारीक पाउडर बनाकर मंजन बना लें. इससे रोजाना 2 बार मंजन करने से दांतों का दर्द ठीक हो जाता है.
- (2) फिटकरी को फुला लें. माजूफल और हल्दी के साथ फूली हुई फिटकरी को बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक पीसकर पाउडर बना लें. इससे मंजन करने पर दांतों की पीड़ा शांत होती है.
- (3) दांतों में तेज दर्द होने पर माजूफल को पीसकर दांतों के नीचे दबाकर रखें. इससे तेज दर्द में जल्द आराम मिलता है तथा दांतों से खून का आना बंद हो जाता है.
5. आंखों की खुजली: माजूफल और छोटी हरड़ को पीसकर आंखों में लगाने से आंखों की खुजली समाप्त होती है.
6. मसूढ़ों का रोग: माजूफल को बारीक पीसकर और छानकर सुबह-शाम मसूढ़ों पर मालिश करने से मसूढ़ों के सारे रोग समाप्त हो जाते हैं.
7. दांतों से खून आना: दांतों से खून निकल रहा हो तो माजूफल को बारीक पीसकर मंजन बना लें. इससे मंजन करने से दांतों से खून का निकलना बंद हो जाता है.
8. दांत मजबूत करना: 5 ग्राम माजूफल, 4 ग्राम भुनी फिटकरी, सफेद कत्था 6 ग्राम और 1 ग्राम नीलाथोथा भुना हुआ को बारीक पीसकर मंजन बना लें. इससे रोजाना मंजन करने से दांत मजबूत होते हैं.
9. दांतों में ठंडी लगना: माजूफल को बारीक पीसकर मंजन बना लें. इसे दांतों में लगाने से दांतों में पानी का लगना और खून निकलना बंद हो जाता है तथा दांत मजूबत होते हैं.
10. पायरिया:
11. कांच निकलना (गुदाभ्रंश):
- (1) 2 ग्राम भुनी फिटकरी को 2 माजूफल के साथ पीसकर 100 ग्राम पानी में मिलाकर घोल बना लें. इस घोल में रूई को भिगोकर गुदा पर लगाएं और गुदा को अन्दर कर लंगोट बांध दें. लगातार 4-5 दिन तक इसका प्रयोग करने से गुदाभ्रंश (कांच निकलना) बंद हो जाता है.
- (2) माजूफल और फिटकरी का पाउडर बनाकर गुदा पर छिड़कने से दर्द में आराम आता है.
- (3) 1 गिलास पानी में 2 माजूफल को पीसकर डालें और आग पर उबाल लें. ठंडी होने पर उस पानी से मलद्वार को धोने से गुदा का बाहर आना बंद हो जाता है.
- (4) 10-10 ग्राम माजूफल, फिटकरी तथा त्रिफला चूर्ण को लेकर पानी में भिगो दें. 1 से 2 घंटे भिगोने के बाद पानी को कपड़े से छानकर मलद्वार को धोने से गुदाभ्रंश ठीक हा जाता है.
12. गर्भधारण: 60 ग्राम माजूफल को पीसकर छान लें. इसे 10-10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद 3 दिनों तक गाय के दूध से सेवन करना चाहिए. इससे गर्भ स्थापित होता है.
13. मुंह के छाले:
1-माजूफल के टुकड़े को सुपारी की तरह चबाते रहने से मुंह के छाले और दाने आदि खत्म हो जाते हैं.
2-5-5 ग्राम माजूफल, कत्था, वंशलोचन तथा छोटी इलायची के दाने लेकर पीसकर और छानकर चूर्ण बना लें. इस 1 चुटकी चूर्ण को बच्चे के मुंह में सुबह-शाम छिड़कने से बच्चों के मुंह के छाले खत्म हो जाते हैं.
14. मुंह का रोग: 10 ग्राम माजूफल, 10 ग्राम फिटकरी और 10 ग्राम कत्था को पीसकर व कपड़े में छानकर चूर्ण बना लें. रोजाना 2 से 3 बार इस चूर्ण को मुंह में छिड़कने से मुंह के रोगों में आराम मिलता है.
15. दस्त: माजूफल को घिसकर या पीसकर बने चूर्ण को 3 से 6 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खुराक के रूप में सेवन करने से अतिसार (दस्त) में लाभ मिलता है.
16. कान का बहना:
1-5 ग्राम माजूफल को पीसकर और कपड़े में छानकर 50 ग्राम शराब में मिला लें. इसकी 2-2 बंदे कान को साफ करके सुबह-शाम डालने से कान से मवाद बहना बंद होता है.
2-माजूफल को बारीक पीसकर सिरके में डालकर उबाल लें. उबलने के बाद इसे छानकर कान में डालने से कान में से मवाद बहना बंद हो जाता है.
17. घाव: माजूफल को जलाकर उसकी राख एकत्र कर लें. इस राख को कपड़े से छानकर घाव पर छिड़कने से घाव ठीक हो जाता है.
माजूफल को पानी में पीसकर घाव पर पट्टी बांधने से लाभ मिलता है. इससे घाव जल्दी ठीक हो जाता है और घाव से खून भी आना बंद हो जाता है.
माजूफल को पीसकर और छानकर पानी में पीसकर घाव पर लगाकर पट्टी बांध लें. इससे खून बहना बंद हो जायगा, घाव भी भर जाएगा और हड्डी भी जुड़ जाती है.
18. श्वेतप्रदर: 1-2 ग्राम की मात्रा में माजूफल का चूर्ण ताजे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से श्वेतप्रदर ठीक हो जाता है.
19. रक्तप्रदर: 25 ग्राम माजूफल को लेकर 200 ग्राम पानी में मिलाकर काढ़ा बना लें. फिर उसमें 3-3 ग्राम रसौत, फिटकरी मिलाकर योनि को साफ करने से रक्तप्रदर में लाभ मिलता है.
20. नकसीर: माजूफल को पीसकर और किसी कपड़े में छानकर नाक से सूंघने से नकसीर (नाक से खून बहना) ठीक हो जाती है.
21. तंग योनि को शिथिल करना:
1-योनि ढीली करना: 10 ग्राम माजूफल को पीसकर रख लें, फिर इसमें आधा ग्राम कपूर का चूर्ण और शहद मिलाकर योनि पर लगायें. इससे योनि शिथिल (ढीली) हो जाती है.
2-योनि में दर्द नहीं होता: माजूफल को पानी के साथ पीसकर लुगदी बना लें. फिर इसमें रूई को भिगोकर स्त्री की योनि में संभोग (सहवास) करने से पहले रख दें, इसके बाद संभोग करने से योनि में दर्द नहीं होता हैं. ध्यान रहे कि इसका प्रयोग गर्भ को रोकने के लिए भी प्रयोग किया जाता है, इसलिए सोच समझकर ही इस्तेमाल करें.
23. योनि का संकोचन:
1-योनि संकुचित हो जाती है: माजूफल, शहद और कपूर को एक साथ पीसकर मिला लें, फिर इसे अंगुली की मदद से योनि में लगाने से योनि संकुचित हो जाती है.
2-योनि छोटी हो जाती है: माजूफल, धाय के फूल, फिटकरी को पीसकर बेर के आकार की गोली बनाकर योनि के अन्दर रखने से योनि छोटी हो जाती है.
24. होठ को पतला करना: माजूफल को पीसकर दूध या पानी में पीसकर रात को सोते समय होठों पर लगातार 1 सप्ताह तक लगाने से होठ पतले हो जाते हैं.
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गुदाभ्रंश,
प्रदर,
बवासीर,
माजूफल,
योनि ढीली,
योनि शिथिल,
योनि संकोचन
Friday, September 30, 2016
--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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आसन
आसान प्रसव-Easy Delivery
आहार चार्ट
आहार-Food
आॅपरेशन
आॅर्गेनिक
आॅर्गेनिक कौंच
इच्छा-शक्ति
इन्द्रायण
इन्फ्लुएंजा
इमर्जेंसी में होम्योपैथी
इमली-Tamarind Tree
इम्युनिटी
इलाज
इलाज का कुल कितना खर्चा
इलायची
उच्च रक्तचाप
उच्च रक्तचाप-High Blood Pressure-Hypertension
उत्तेजक
उत्तेजना
उदर शूल-Abdominal Haul
उदासी
उन्माद-Mania
उपवास
उम्र
उल्टी
ऊर्जा
एक्जिमा
एक्यूप्रेशर
एग्जिमा
एजिंग-Aging
एंटी ऑक्सीडेंट्स
एंटी-ओक्सिडेंट
एंटीऑक्सीडेंट
एण्टी-आॅक्सीडेंट
एनजाइना
एनीमिया
एमिनो एसिड
एरंड
एलर्जी
एलर्जी-Allergy
एलोवेरा
एलोवेरा जूस
एल्यूमीनियम
ऐंठन
ऐलोपैथ
ऐसीडिटी
ऑर्गेनिक
ओमेगा 3 के स्रोत
ओमेगा-3
ओर्गेनिक
औषध-Drug
औषधि सूची-Drug List
औषधियों के नुकसान-Loss of drugs
कचनार
कचनार-Bauhinia Purpurea
कटुपर्णी
कड़वाहट
कंडोम
कद्दू
कनेर
कपास-COTTON
कपिकच्छू
कपूरीजड़ी
कफ
कब्ज
कब्ज़
कब्ज-कोष्ठबद्धता-Constipation
कब्ज. Cucumber
कब्जी
कमजोरी
कमर
कमर दर्द
कमेड़ा
करेला
कर्ण वेदना
कर्णरोग
कष्टार्तव-Dysmenorrhea
कांच निकलना
काजू
कान
कानून सम्मत
काम
काम शक्ति
कामवाण पाउडर
कामशक्ति
कामशक्ति-Sexual power
कामेच्छा
कामोत्तेजना
कायाकल्प
कार्बोहाइड्रेट
कार्बोहाइड्रेट-Carbohydrates
काला जीरा
काला नमक
काली जीरी
काली तुलसी
काली मिर्च
काले निशान
कास-खांसी-Cough
किडनी
किडनी संक्रमण
किडनी स्टोन
कीड़े
कीमोथेरेपी
कुकरौंधा
कुकुंदर
कुटकी-Black Hellebore
कुबडापन
कुमेड़ा
कुल्थी
कुल्ला
कुष्ट
कुष्ठ
कृमि
केला
केसर
कैफीन-Caffeine
कैलोरी
कैलोरी चार्ट
कैलोरी-Calories
कैवांच
कैविटी
कैंसर
कॉफी
कॉफ़ी
कॉलेस्ट्रॉल
कोंडी घास
कोढ़
कोबरा
कोलेस्ट्रॉल
कोलेस्ट्रॉल-Cholesterol
कोलेस्ट्रोल
कौंच
कौमार्य
क्रियाशीलता
क्रोध
क्षय रोग-Tuberculosis
क्षारीय तत्व
क्षुधानाश
खजूर
खजूर की चटनी
खनिज
खरबूजा-Musk melon
खरेंटी
खरैंटी शिलाजीत
खाज
खांसी
खिरेंटी
खिरैटी
खीप
खीरा
खुजली
खुशी-Joy
खुश्की
खुश्बू
खोया
गंजापन-Baldness
गठिया
गठिया-Arthritis
गठिया-Gout
गड़तुम्बा
गंडा-ताबीज
गंध
गन्ने का रस
गरमा गरम
गर्भ निरोधक
गर्भधारण
गर्भपात
गर्भवती
गर्भवती कैसे हों?
गर्भावस्था
गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy
गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy
गर्भाशय
गर्भाशय भ्रंश
गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy
गर्म पानी
गर्मी
गर्मी-Heat
गलगण्ड
गाजर
गाजवां
गांठ
गाँठ-Knot
गारंटी
गारण्टेड इलाज
गाल ब्लैडर
गिलोय
गिल्टी
गुड़हल
गुंदा
गुदाद्वार
गुदाभ्रंश
गुम्मा
गुर्दे
गुलज़ाफ़री
गुस्सा
गृध्रसी
गृह-स्वामिनी
गेदुआ की छाछ
गैस
गैस्ट्रिक
गैहूं का जवारा
गोक्षुरादि चूर्ण
गोखरू
गोखरू (LAND CALTROPS)
गोंद कतीरा-Hog-Gum
गोंदी
गोभी-Cabbage
गोरख मुंडी
गोरखगांजा
गोरखबूटी
गोरखमुंडी
ग्रीन-टी
घमोरी
घरेलु नुस्खे
घाघरा
घाव
चकवड़
चक्कर
चपाती
चमत्कारिक सब्जियां
चरित्र
चर्बी
चर्म
चर्म रोग
चर्मरोग
चाय
चाय-Tea
चालीस के पार-Forty Across
चिकनगुनिया
चिकित्सकीय
चिटकन
चिंतित
चिरायता-Absinth
चिरोटा
चुंबन
चोक
चौलाई
छपाकी
छरहरी काया
छाछ
छाजन बूटी
छाले
छींक
छीकें
छुअ
छुआरा
छुहारा
छोटा गोखरू
छोटा धतूरा
छोटी हरड़
जंक फूड
जकवड़
जख्म
जंगली तिल्ली
जंगली तुलसी
जंगली पेड़
जंगली मिर्ची
जंगली-कटीली चौलाई
जटामांसी-Spikenard
जलजमनी
जलन
जलोदर रोग-Ascites Disease
जवारा
जवारे
जवासा-Alhag
जहर
जामुन का जूस
जायफल
जिगर
जीरा
जीवन रक्षक
जीवनी शक्ति
जुएं
जुकाम
जुदाई
जुलाब
जूएं
जूस
जोड़ों के दर्द
जोड़ों में दर्द
जौ
ज्यूस
ज्योति
ज्वर
ज्वर-Fiver
झाइयाँ
झांईं
झाड़-फूंक
झुर्रियाँ
झुर्रियां
झुर्री
झूठे दर्द
टमाटर का रस
टमाटर-Tomatoes
टाइफाइड
टाटबडंगा
टायफायड
टूटी हड्डी
टॉन्सिल
टोटला
ट्यूमर
ठंड
ठंडापन
ठेकेदार डॉक्टर
डकार
डकारें
डायबिटीज
डायरिया
डिग्री फ़ारेनहाइट
डिग्री सेल्सियस
डिजिसेक्सुअल
डिटॉक्सीफाई
डिटॉक्सीफिकेशन
डिनर
डिप्रेशन
डिब्बाबंद भोजन
डिलेवरी
डीकामाली
डीगामाली
डेंगू
डेंगू-Dengue
डॉ. निरंकुश
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
डॉ. मीणा
ढकार
ढीलापन
ढीली योनि
तकलीफ का सही इलाज
तंत्र-मंत्र
तम्बाकू
तरबूज-Watermelon
तलाक
ताकत
तिल
तिल्ली
तुंबा
तुंबी
तुम्बा
तुलसी
तेल
त्रिदोषनाशक
त्रिफला
त्वचा
त्वचा रोग
थकान
थाईरायड
थायरायड-Thyroid
थायरॉइड
दण्डनीय अपराध
दंत वेदना
दन्तकृमि
दन्तरोग
दमा
दर वेदना
दरार
दर्द
दर्द निवारक
दर्द निवारक दवा
दर्दनाक
दस्त
दही
दाग-धब्बे-Stains-Spots
दाढ़
दांत
दांतो में कैविटी-Teeth Cavity
दाद
दाम्पत्य
दाम्पत्य विवाद सलाहकार
दाम्पत्य-Conjugal
दाल
दालचीनी
दालें
दिमांग
दिल
दीर्घायु
दु:खी
दुर्गंध
दुर्बलता
दुष्प्रभाव
दुष्प्रभावरहित
दूध
दूध वृद्धि
दूधी
दूधी-Milk Hedge
दृष्टिदोष
दो मन
द्रोणपुष्पी
द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes
धड़कन
धनिया बीज
धनिया-Coriander
धमासा
धात
धातु
धातु पतन
धार्मिक
धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं?
धैर्यहीन
नज़ला
नपुंसक
नपुंसकता
नाइट्रिक एसिड
नाक
नाखून
नागबला
नागरमोथा
नाडी हिंगु
नाड़ी हिंगु (डिकामाली)
नामर्दी
नारकीय पीड़ा
नारियल
नाश्ता
निमोनिया
निम्न रक्तचाप
निम्बू
नियासिन
निराश
निरोगधाम
निर्गुण्डी
निर्गुन्डी
निष्कपट स्नेह
निष्ठा
निसोरा
नींद
नींबू
नींबू-Lemon
नीम-azadirachta indica
नुस्खे
नुस्खे-Tips
नेगड़
नेत्र रोग
नेुचरल
नैतिक
नॉर्मल डिलेवरी
नोनिया
नौसादर
न्युमोनिया-Pneumonia
न्यूरॉन्स
पक्षघात
पंचकर्म
पढ़ने में मन लगेगा
पंतजलि
पत्तागोभी-CABBAGE
पत्थर फोड़ी
पत्थरचट्टा
पत्नी
पथरी
पदार्थ
पनीर
पपीता
पपीता-CARICA PAPPYA
पमाड
परदेशी लांगड़ी
परम्परागत चिकित्सा
परहेज
पराठा
परामर्श
परिस्थिति
पवाड़
पवाँर
पाइल्स
पाक-कला
पाचक
पाचन
पाचनतंत्र
पाचनशक्ति
पाठक संख्या 16 लाख पार
पाठक संख्या पंद्रह लाख
पायरिया
पारदर्शिता
पारिजात
पालक
पालक-Spinach
पित्त
पित्ताशय
पित्ती
पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne
पिरामिड
पीलिया
पीलिया-Jaundice
पीलिया-कामला-Jaundice
पुआड़
पुदीना
पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava
पुरुष
पुंसत्व
पेचिश
पेट के कीड़े
पेट दर्द
पेट में गैस
पेट रोग
पेड़
पेद दर्द
पेरिकिटो सेसिल
पेशाब
पेशाब में रुकावट
पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy
पोष्टिक लड्डू
पौधे
पौरुष
पौरुष ग्रंथि
पौष्टिक रागी रोटी
प्याज-Onion
प्यास
प्रजनन
प्रतिरक्षा
प्रतिरक्षा प्रणाली
प्रतिरोधक
प्रतिरोधक-Resistance
प्रदर
प्रमेह
प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery
प्रसव
प्रसव सुरक्षा चक्र
प्रसव-पीड़ा
प्रसूति
प्राणायाम
प्रेग्नेंसी-Pregnancy
प्रेम
प्रेमरस
प्रेमिका
प्रेमी
प्रोटीन
प्रोटीन का कार्य
प्रोटीन के स्रोत
प्रोस्टेट
प्रोस्टेट कैंसर
प्रोस्टेट ग्रंथि
प्रोस्टेट ग्रन्थि
प्लीहा
प्लूरिसी-Pleurisy
प्लेटलेट्स
फंगल
फटन
फफूंद-Fungi
फरास
फल
फाइबर
फिटकरी
फुंसी-Pimples
फूलगोभी-CAULIFLOWER
फेंफड़े
फेरम फॉस
फैट
फैटी लीवर
फोटोफोबिया
फोड़ा
फोड़े-Boils
फोरप्ले
फोलिक एसिड
फ्लू
फ्लू-Flu
फ्लेक्स सीड्स
बकायन
बकुल
बड़ी हरड़
बथुआ
बथुआ पाउडर
बथुआ-White Goose Foot
बदबू
बंध्यापन
बबूल-ACACIA
बरसाती बीमारियाँ
बरसाती बीमारियां
बलगम
बलवृद्धि
बला
बलात्कार
बवासीर
बहरापन
बहुनिया
बहुमूत्रता-
बांझपन
बादाम-Almonds
बादाम.
बाल
बाल झड़ना
बाल झडऩा-Hair Falling
बिना सिजेरियन मां बनें
बिवाई
बीजबंद
बीड़ी
बीमारियों के अनुसार औषधियां
बीमारी
बील
बुखार
बूंद-बूंद पेशाब
बेल
बेली
बैक्टीरिया
बॉयोकैमी
ब्रह्मदण्डी
ब्रेस्ट ग्रोथ
ब्लड प्रेशर
ब्लैक मेलिंग
ब्लॉकेज
भगंदर
भगंदर-Fistula-in-ano
भगनासा
भगन्दर
भगोष्ठ
भड़भांड़
भय
भविष्य
भस्मक रोग
भावनात्मक
भुई आंवला-Phyllanthus Niruri
भूई आमला
भूई आंवला
भूख
भूख बढ़ाने
भूत-प्रेत
भूमि
भूमि आंवला
भोजनलीवर
मकोय
मकोय-Soleanum nigrum
मक्का
मक्का के भुट्टे
मंजीठ
मटर-PEA
मंद दृष्टि
मंदाग्नि
मदार
मधुमेह
मधुमेह-Diabetes
मन्दाग्नि-Dyspepsia
मरुआ
मरोड़
मर्द
मर्दाना
मलाशय
मलेरिया
मलेरिया (Malaria)
मवाद
मसाले
मस्तिष्क
मस्से
मस्से-WARTS
महंगा इलाज
महत्वपूर्ण लेख
महाबला
माइग्रेन
माईग्रेन
माईंड सैट
माजूफल
मानवव्यवहार
मानसिक
मानसिक लक्षण
मानसिक-Mental
मानिसक तनाव-Mental Stress
मायोपिया
मासिक
मासिक-धर्म
मासिकधर्म
मासिकस्राव
माहवारी
मिनरल
मिर्गी
मिर्च-Chili
मीठा खाने की आदत
मुख मैथुन-ओरल सेक्स-Oral Sex
मुख्य लक्षण
मुधमेह
मुलहठी
मुलेठी
मुहाँसे
मूँगफली
मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders
मूत्र
मूत्र असंयमितता
मूत्र में जलन-Burning in Urine
मूत्ररोग
मूत्राशय
मूत्रेन्द्रिय
मूर्च्छा (Unconsciousness)
मूली
मूली कर रस
मृत्यु
मृत्युदण्ड
मेथी
मेथी दाना
मेंहदी
मैथुन
मोगरा (Mogra)
मोटापा
मोटापा-Obesity
मोतियाबिंद
मौत
मौलसिरी
मौसमी बीमारियां
यकृत
यकृत प्लीहा
यकृत वृद्धि-Liver Growth
यकृत-लीवर-जिगर-Lever
यूपेटोरियम परफोलियेटम
यूरिक एसिड लेबल
योग विज्ञापन
योन
योन संतुष्टि
योनि
योनि ढीली
योनि शिथिल
योनि शूल-Vaginal Colic
योनि संकोचन
योनिद्वारा
योनिभ्रंश
योनी
योनी संकोचन
यौन
यौन आनंद
यौन उत्तेजक पिल्स (sexual stimulant pills)
यौन क्षमता
यौन दौर्बल्य
यौन शक्तिवर्धक
यौन शिक्षा
यौन समस्याएं
यौनतृप्ति
यौनशक्ति
यौनशिक्षा
यौनसुख
यौनानंद
यौनि
रक्त प्रदर (Blood Pradar)
रक्त रोहिड़ा-TECOMELLA UNDULATA
रक्तचाप
रक्तपित्त
रक्तशोधक
रक्ताल्पता
रक्ताल्पता (एनीमिया)-Anemia
रस-juices
रातरानी Night Blooming Jasmine/Cestrum nocturnum
रामबाण
रामबाण औषधियाँ-Panacea Medicines
रुक्षांश
रूढिवादी
रूसी
रूसी मोटापा
रेचक
रेठु
रोग प्रतिरोधक
रोबोट सेक्स
रोमांस
लकवा
लक्षण
लक्ष्मी
लंच
लसोड़ा
लस्सी
लहसुन
लहसुन-Garlic
लाइलाज
लाइलाज का इलाज
लाक्षणिक इलाज
लाक्षणिक जानकारी
लाभ
लिंग
लिंग प्रवेश
लिसोड़ा
लीकोरिया
लीवर
लीवर सिरोसिस
लीवर-Liver
लू-hot wind
लैंगिक
लोनिया
लौकी
लौंग की चाय
ल्युकोरिया
ल्यूकोरिया
ल्यूज योनी
वजन
वज़न
वजन कम
वजन बढाएं-Weight Increase
वन तुलसी
वन/जंगली तुलसी
वनौषधियाँ
वमन
वमन विकृति-Vomiting Distortion
वसा
वात
वात श्लैष्मिक ज्वर
वात-Rheumatism
वायरल
वायरल फीवर
वायरल बुखार-Viral Fever
वासना
विचारतंत्र
विटामिन
विधारा
वियाग्रा-Viagra
वियोग
विरह वेदना
विलायती नीम
विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध
विवाहेत्तर सम्बंध
विश्वास
विष
विष हरनी
विषखपरा
वीर्य
वीर्य वृद्धि
वीर्यपात
वृक्कों (गुर्दों) में पथरी-Renal (Kidney) Stone
वृक्ष
वैज्ञानिक
वैधानिक
वैवाहिक जीवन
वैवाहिक जीवन-Marital
वैवाहिक रिश्ते
वैश्यावृति
व्याकुल
व्यायाम
व्रण
शंखपुष्पी
शरपुंखा
शराब
शरीफा-सीताफल-Custard apple
शर्करा
शलगम-Beets
शल्यक्रिया
शहद
शहद-Honey
शारीरिक
शारीरिक रिश्ते
शिथिलता
शीघ्र पतन
शीघ्रपतन
शीस
शुक्राणु
शुक्राणु-Sperm
शुक्राणू
शुगर
शोक
शोथ
शोध
श्योनाक
श्रेष्ठतर
श्वास
श्वांस
श्वेत प्रदर
श्वेत प्रदर-Leucorrhea
श्वेतप्रदर
षड़यंत्र
संकुचन
संकोच
संक्रमण
संक्रमित
संक्रामक
संखाहुली
सगतरा
संतरा-Orange
संतान
संतुष्टि
सत्यानाशी
सदा सुहागन
सदाफूली
सदाबहार
सदाबहार चूर्ण
सनबर्न
सफ़ेद दाग
सफेद पानी
सफेद मूसली
सब्जि
सब्जी
संभालू
संभोग
समर्पण-Dedication
सरकार को सुझाव
सरफोंका
सरहटी
सर्दी
सर्दी-जुकाम
सर्पक्षी
सर्पविष
सलाद
संवाद
संवेदना
सहदेई
सहदेवी
सहानभूति
साइटिका
साइटिका-Sciatica
साइड इफेक्ट्स
साबूदाना-Sago
सायटिका
सिगरेट
सिजेरियन
सिर दर्द
सिर वेदना
सिरका
सिरदर्द
सिरोसिस
सी-सेक्शन
सीजर डिलेवरी
सुगर
सुदर्शन
सुहागा
सूखा रोग
सूजन
सेक्स
सेक्स उत्तेजक दवा
सेक्स परामर्श-Sex Counseling
सेक्स पार्टनर
सेक्स पावर
सेक्स समस्या
सेक्स हार्मोन
सेक्स-Sex
सेंधा नमक
सेब
सेमल-Bombax Ceiba
सेल्स
सोजन-सूजन
सोंठ
सोना पाठा
सोयाबीन
सोयाबीन (Soyabean)
सोयाबीन-Soyabean
सोराइसिस
सोरियासिस-Psoriasis
सौंठ
सौंदर्य
सौंदर्य-Beauty
सौन्दर्य
सौंफ
सौंफ की चाय
सौंफ-Fennel
स्किन
स्खलन
स्तन
स्तन वृद्धि
स्तनपान
स्तम्भन
स्त्री
स्त्रीत्व
स्त्रैण
स्पर्श
स्मृति-लोप
स्वप्न दोष
स्वप्नदोष
स्वप्नदोष-Night Fall
स्वभाव
स्वभावगत
स्वरभंग
स्वर्णक्षीरी
स्वस्थ
स्वास्थ्य
स्वास्थ्य परामर्श
स्वास्थ्य रक्षक सखा
हजारदानी
हड़जोड़
हड्डी
हड्डी में दर्द
हड्डी संक्रमण
हड्डीतोड़ ज्वर
हड्डीतोड़ बुखार
हरड़
हरसिंगार
हरी दूब-CREEPING CYNODAN
हरीतकी
हर्टबर्न
हस्तमैथुन
हस्तमैथुन-Masturbation
हाई बीपी
हाथ-पैर नहीं कटवायें
हारसिंगार
हालात
हिचकी
हिचकी-Hiccup
हिमोग्लोबिन-hemoglobin
हिस्टीरिया
हिस्टीरिया-Hysteria
हींग
हीनतर
हुरहुर
हुलहुल
हृदय
हृदय-Heart
हेपेटाइटिस
हेपेटाईटिस
हेल्थ टिप्स-Health-Tips
हेल्थ बुलेटिन
हैजा
हैपीनेस-Happiness
हैल्थ
होम केयर टिप्स-Home Care Tips
होम्यापैथ
होम्योपैथ
होम्योपैथिक
होम्योपैथिक इलाज
होम्योपैथिक उपचार
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