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Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
Health Care Friend and Marital Dispute Consultant
(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार)
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85619-55619 (10 AM to 10 PM)
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स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।
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लाइलाज एलर्जी (Incurable Allergy) का इलाज
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राजस्थान के जिला भरतपुर की बयाना तहसील के पास गाँव के एलर्जी से 8-9 वर्षों से पीड़ित 1 व्यक्ति के चार चित्र यहां प्रस्तुत हैं। जो उपचार हेतु मेरे पास आने से पहले एक दिन छोड़कर इंजेक्शन लगवाता था। इसके बाद भी उसकी दशा अत्यधिक खराब थी। जिसे 23.10.2017 के चित्र को जूम करके देखकर समझा जा सकता है। वह दिनभर खुजाता रहता था। उसके जख्मों पर मक्खियां भिनभिनाती रहती थी। अत: हमेशा मक्खियों को उड़ाता रहता था। रोगी ने बताया कि कभी-कभी उसके सारे शरीर में भयंकर सोजन आ जाती थी। जख्मों से रक्त निकलता रहता था। अनेक बार उसके लिये चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता था। इस कारण उसका जीवन अत्यधिक कष्टमय था। लोग उसे देखकर नफरत करते थे। उसके पास बैठना पसंद नहीं करते थे। इस कारण वह किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाता था। इस दौरान उसने बयाना, भरतपुर एवं मथुरा में अनेकों डॉक्टरों से इलाज करवाने में अपनी कड़ी मेहनत का बहुत सा रुपया खर्च किया। लेकिन सभी डॉक्टर्स ने अंत में यही कहा कि एलर्जी का कोई स्थायी इलाज सम्भव नहीं। उपरोक्त हालातों में पीड़ित व्यक्ति ने दिनांक: 23.10.17 को निदान हेतु मुझ से संपर्क किया। उसने बताया कि वह करीब 45-50 साल से बीड़ी पीने का आदी है। चूंकि धूम्रपान करने वालों को होम्योपैथिक दवाई असर नहीं करती हैं।
अत: सबसे पहले बीड़ी छोड़ने हेतु उसका होम्योपैथिक उपचार किया गया। पीड़ित व्यक्ति के सहयोग से मात्र 5 दिन में उनकी बीड़ी पीने की आदत छुड़वा दी गयी। दिनांक: 28.10.17 से पीड़ित व्यक्ति की एलर्जी का निदान शुरु किया गया। आॅर्गेनिक देशी-जड़ी बूटियों एवं दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक दवाइयों के उपचार से 15.11.17 तक अनुमान से बहुत पहले एलर्जी नियंत्रित हो गयी। दिनांक: 24.12.17 तक अर्थात 2 माह में शरीर और चेहरे के सभी जख्म मिट गये। दिनांक: 30.01.18 तक, अर्थात 3 महिने में रोगी ऊपरी तौर पर एलर्जी से पूर्णत: स्वस्थ हो गया एवं खुजली बंद हो गयी। लेकिन फिर से तकलीफ न हो इसलिये कम से कम अगले 3 महिने तक रोगी का आंतरिक उपचार किया जायेगा। जिसमें उनकी रक्तशुद्धि भी की जायेगी। यह सब हमारे निरोगधाम पर पैदा की जा रही शुद्ध-ताजा आॅर्गेनिक जड़ी-बूटियों तथा अमृततुल्य एवं दुष्प्रभाव रहित जर्मन होम्योपैथिक-बॉयोकैमिक तत्वों-दवाईयों का सुखद परिणाम है। उक्त रोगी का विवरण जैसे ही मैंने अपनी वेब साईट website www.healthcarefriend.in पर प्रकाशित किया तो एलर्जी, दाद, खाज, खुजली आदि त्वचा/चर्म रोगों से पीड़ित लोगों के फोन आने का सिलसिला शुरू हो गया। हजारों काल आ चुके हैं। जो यह संशोधित नोट डाले जाने तक जारी है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि समयाभाव के चलते तथा हमारे निरोगधाम पर पैदा की जा रही शुद्ध-ताजा आॅर्गेनिक जड़ी-बूटियों की उपलब्धता सीमित होने के कारण मैं सीमित संख्या में ही कुछेक रोगियों का ही उपचार कर पाता हूं।
नोट: देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये गये हैं। जो बेशक कुछ महंगे अवश्य हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों को "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है और चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम लगातार जारी है। तुरन्त, गारंटेड और शर्तिया इलाज चाहने वाले माफ करें।
Online Dr. PL Meena (डॉ. पुरुषोत्तम मीणा): Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 09.04.2018
एलर्जी-Allergy सहित सभी शारीरिक एवं मानसिक कष्टों का आॅनलाइन निदान

एलर्जी से 8-9 वर्षों से पीड़ित एक व्यक्ति के चार चित्र यहां प्रस्तुत हैं। जो हमारे पास आने से पहले एक दिन छोड़कर इंजेक्शन लगवाता था। इसके बाद भी उनकी दशा अत्यधिक खराब थी। जिसे 23.10.2017 के चित्र को देखकर समझा जा सकता है। दिनभर खुजाता रहता था। उसके जख्मों पर मक्खियां भिनभिनाती रहती थी। अत: हमेशा मक्खियों को उड़ाता रहता था। रोगी ने बताया कि कभी-कभी उसके सारे शरीर में भयंकर सोजन आ जाती थी। जख्मों से रक्त निकलता रहता था। अनेक बार उसके लिये चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता था। इस कारण उसका जीवन अत्यधिक कष्टमय था। लोग उसे देखकर नफरत करते थे। लोग उसके पास बैठना पसंद नहीं करते थे। इस कारण वह किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाता था। इस दौरान उसने अनेकों डॉक्टरों से इलाज करवाने में अपनी कड़ी मेहनत का बहुत सा रुपया खर्च किया। लेकिन सभी डॉक्टर्स ने अंत में यही कहा कि एलर्जी का स्थायी इलाज नहीं हो सकता।
उपरोक्त हालातों में पीड़ित व्यक्ति ने दिनांक: 23.10.17 को निदान हेतु मुझ संपर्क किया। उसने बताया कि वह करीब 45-50 साल से बीड़ी पीने का आदी है। चूंकि धूम्रपान करने वालों को होम्योपैथिक दवाई असर नहीं करती हैं। अत: सबसे पहले बीड़ी छोड़ने हेतु उनका होम्योपैथिक उपचार किया गया। पीड़ित व्यक्ति के सहयोग से मात्र 5 दिन में उनकी बीड़ी पीने की आदत छुड़वा दी गयी। दिनांक: 28.10.17 से पीड़ित व्यक्ति की एलर्जी का निदान शुरु किया गया। आयुर्वेदिक एवं होम्योपैथिक उपचार से दिनांक: 15.11.17 तक एलर्जी नियंत्रित हो गयी। दिनांक: 24.12.17 तक अर्थात 2 माह में शरीर और चेहरे के सभी जख्म मिट गये। दिनांक: 30.01.18 तक, अर्थात 3 महिने में रोगी ऊपरी तौर पर एलर्जी से पूर्णत: स्वस्थ हो गया एवं खुजली बंद हो गयी। अगले 3 महिने तक रोगी का आंतरिक उपचार किया जायेगा। जिसमें उनकी रक्तशुद्धि भी की जायेगी। यह सब हमारे निरोगधाम पर पैदा की जा रही शुद्ध-ताजा आॅर्गेनिक जड़ी-बूटियों तथा अमृततुल्य एवं दुष्प्रभाव रहित जर्मन होम्योपैथिक-बॉयोकैमिक तत्वों-दवाईयों का कमाल है।
उक्त रोगी का विवरण जैसे ही सोशल मीडिया पर मेरे द्वारा प्रसारित किया तो मेरे मोबाईल नम्बर: 9875066111 पर एलर्जी, दाद, खाज, खुजली आदि त्वचा रोगों से पीड़ित लोगों के फोन आने का सिलसिला शुरू हो गया। हजारों काल आ चुके हैं। जो यह संशोधित नोट डाले जाने तक जारी है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि समयाभाव के चलते तथा हमारे निरोगधाम पर पैदा की जा रही शुद्ध-ताजा आॅर्गेनिक जड़ी-बूटियों की सीमित मात्रा-उपलब्धता के कारण मैं सीमित संख्या में ही कुछेक रोगियों का ही उपचार कर पाता हूं।
रजिस्ट्रेशन-फ्री: यदि आप लाइलाज (Incurable) समझी जाने वाली किसी बीमारी का इलाज करवा-करवाकर थक चुके/चुकी हैं और आपकी बीमारी ठीक नहीं हो रही हैं तो इसकी की अनदेखी नहीं करें स्वास्थ्य परामर्श या इलाज हेतु अभी और इसी समय 85-619-55-619 पर अपनी समस्या लिखकर वाट्सएप करें और फ्री रजिस्ट्रेशन करवायें। जिससे बहुत कम खर्चे में आपका घर-बैठे इलाज-समाधान हो सके। Online Dr. PL Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant, (स्वास्थ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार) तथा संचालक-निरोगधाम (लाइलाज का इलाज)।
अत: एलर्जी सहित किसी भी तकलीफ से पीड़ित लोगों को अवगत करवाना जरूरी समझता हूं कि यदि आपकी तकलीफ का किसी स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से आरोग्य (Health Restoration) अर्थात उपचार संभव है तो कृपया पहले आप उन्हीं से सम्पर्क करें। मुझ से वही पीड़ित और परेशान व्यक्ति सम्पर्क करें, जो अपनी तकलीफ का स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवा-करवाकर अपना बहुत सा धन तथा वक्त खर्च-बर्बाद करके थक चुके हैं, लेकिन अभी भी उनकी पीड़ा-तकलीफ का निदान नहीं हुआ है। क्योंकि पहले से ही मेरे यहां अनेकों रोगियों के केस लम्बित-पेंडिंग हैं। इसकी मूल वजह यह है कि मेरे द्वारा पहले रोगी से व्यक्तिगत रूप से लाक्षणिक पूछताछ की जाती है और उसके बाद प्रत्येक रोगी की तकलीफों का अध्ययन एवं विश्लेषण करके उसके स्थायी निदान करने का प्रयास किया जाता है। जिसमें बहुत सा समय लगता है। अत: हो सके तो उपचार हेतु किसी स्थानीय डॉक्टर से सम्पर्क करें। यद्यपि किसी भी पीड़ित व्यक्ति की सेवा के लिये मैं हमेशा उपलब्ध हूं।
Online Dr. PL Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant, Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619, Mobile No.: 9875066111 (10AM to 10 PM)
उपशीर्षक:
Allergy,
आयुर्वेदिक,
एलर्जी,
एलर्जी-Allergy,
दुष्प्रभाव,
बीड़ी,
होम्योपैथिक
Friday, February 02, 2018
घरेलु दवाई : जीरे के दुष्प्रभाव-साइड इफेक्ट्स
हम अनेक बार घरेलु उपचार के नाम पर अनेक औषधियों का आंख बंद करके सेवन करने लगते हैं। जिससे अनेक बार फायदे के बजाय शारीरिक दुष्प्रभाव भी देखने को मिलते हैं। ऐसा ही आंख बन्द करके जीरे का सेवन करने के बाद होता देखा गया है। माना कि जीरा भोजन में अरुचि, पेट फूलना, अपच आदि जैसे पाचन संबंधी अनेक समस्याओं से निजात दिलाता है। लेकिन जीरे के कई प्रकार के दुष्प्रभाव भी होते हैं। अत: उपचार से पहले किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना सदैव उचित रहता है।
आइये जानते हैं-जीरे के दुष्प्रभावों के बारे में:-
1. गर्भपात का खतरा : जीरे का मतलब ज्यादा मात्रा में जीरे के सेवन करने से गर्भपात या समय से पहले डिलीवरी होने की आंशका बढ़ जाती है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को जीरे के अधिक सेवन से बचना चाहिए।
3. डायबिटीज रोगियों के लिए अस्वास्थ्यकर : डायबिटीज रोगियों को अपने ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रण में रखने की जरूरत होती है। उन्हें स्वस्थ रहने के लिए ब्लड शुगर का स्तर सामान्य रखना होता है। ब्लड शुगर के स्तर में उतार-चढ़ाव डायबिटीज रोगियों के लिए अच्छा नहीं होता। जैसा की आप जानते हैं कि जीरे के सेवन से ब्लड शुगर के स्तर में बहुत जल्दी कमी आने लगती है और यह लो ब्लड शुगर स्तर का कारण बन सकता है। इसलिए डायबिटीज से पीड़ित लोगों को जीरे के अधिक सेवन से बचना चाहिए।
4. डकार की समस्या : जीरे के वातहर गुण या प्रभाव के कारण जीरा अत्यधिक डकार उत्पन्न करने का कारण बन सकता है। कभी-कभी डकार में अधिक आंत्र पथ में गैस दके माध्यम से बाहर निकलती है। और तो और कभी-कभी डकार से अजीब से गंध और विशेष ध्वनि भी आने लगती हैं। हालांकि वास्तविक अर्थों में यह कोई समस्या नहीं है, लेकिन डकार निश्चित रूप से शर्मिंदगी का कारण बन सकती है।
5. मादक प्रभाव : जीरे में मादक/नशे गुण मौजूद होते हैं। इसलिए जीरे का सेवन सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, क्योंकि यह नशे की लत बन सकता है।
6. स्तनपान कराने वाली माताओं को नुकसानदेह : जीरा ब्रेस्टफीडिंग करवाने वाली महिलाओं के लिए अच्छा नहीं होता। इसलिए स्तनपान कराने वाली महिलाओं को जीरे के अत्यधिक मात्रा में सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि इससे दूध का उत्पादन कम होने लगता है।
7. भारी माहवारी चक्र : जीरा मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव का कारण बन सकता है। इसलिए महिलाओं को पीरियड्स के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव से बचने के लिए जीरे का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिये।
10. एलर्जी की समस्या : जीरा आयरन का सबसे अच्छा स्रोत है। इसे नियमित रूप से खाने से खून की कमी दूर हो जाती है। और त्वचा पर निखार आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जीरे का इस्तेमाल त्वचा पर चकत्ते और एलर्जी भी पैदा कर सकता है। इसलिए त्वचा में एलर्जी से परेशान लोगों को जीरे का सेवन कम से कम मात्रा में करना चाहिए।
11. अन्य : जीरे के अन्य दुष्प्रभावों में मानसिक समस्याएं, उनींदापन और मतली जैसी समस्याएं भी शामिल है।
परामर्श समय : 10 AM से 10 PM के बीच। Mob & Whats App No. : 9875066111
सभी लेखों में लिखी गयी दवाईयों का विवरण जनहित में स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में जागरूकता के लिए लिखा गया है। पाठक कृपया स्वयं अपना इलाज करने का खतरा मोल नहीं लें।
कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें।
सभी लेखों में लिखी गयी दवाईयों का विवरण जनहित में स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में जागरूकता के लिए लिखा गया है। पाठक कृपया स्वयं अपना इलाज करने का खतरा मोल नहीं लें।
कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें।
Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your doctor.
हमारे 95 फीसदी रोगियों को व्यक्तिगत रूप से हम से आकर मिलने की जरूरत नहीं पड़ती। यद्यपि रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें। (Due to the high number of patients, you may have to wait. Please patiently collaborate.)
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक, 9875066111
परामर्श समय : 10 AM से 10 PM के बीच। Mob & Whats App No. : 9875066111
उपशीर्षक:
एलर्जी,
गर्भपात,
जीरा,
डकार,
डायबिटीज,
दुष्प्रभाव,
लीवर,
साइड इफेक्ट्स,
स्तनपान
Saturday, January 07, 2017
एलर्जी का उपचार
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>>>>>एलर्जी (Allergy) एवं अतिसंवेदनशीलता (Oversentiveness) : किसी भी वस्तु का अनुभव करना संवेदनशीलता कहलाता है और जो व्यक्ति अधिक संवेदनशील होता है, उसे छोटी सी व्स्तु भी बहुत बड़ी महसूस होती है, अधिक संवेदनशीलता होने के कारण रोग ग्रस्त स्थान पर हल्का सा छू देने से भी तेज दर्द होता है और छू जाने के डर से भी रोगी काँप उठता है। इस तरह हल्का सा छूने से उत्पन्न दर्द आदि को ही अतिसंवेदनशीलता कहते है।
>>>>>कभी-कभी संवेदनशीलता गंभीर परेशानी का सबब बन जाती है, जब हमारा शरीर किसी पदार्थ के प्रति अतिसंवेदनशीलता दर्शाता है तो इसे एलर्जी कहा जाता है और जिस पदार्थ के प्रति प्रतिक्रिया दर्शाई जाती है, उसे एलर्जेन [Allergens= A substance (पदार्थ) that causes an allergic reaction (एलर्जी की प्रतिक्रिया)] कहा जाता है। इस रोग के कारण रोगी के शरीर पर छोटे-छोटे दाने निकल आते है और कभी-कभी तो इन दानों के साथ शरीर में खुजली भी मचने लगती है। इस रोग के कारण कभी-कभी रोगी के गाल तथा शरीर की त्वचा शुष्क हो जाती है।
एलर्जी की प्रतिक्रियाएं :
>>>>>अस्थमा (asthma), राइनाइटिस (Rainaitis/नासा शोध), एक्जिमा (Eczema/शरीर पर दाग धब्बे निकल जाना), माइग्रेन (आधे सर का दर्द ), पाचन संबंधी विकार (भोजन पचने में परेशानी)। इसके अलावा इस रोग के कारण व्यक्तियों को अन्य अनेक प्रकार की बीमारियां भी होती देखी जाती हैं, जो की हृदय रोग, अल्सर, दमा, एक्जिमा व मधुमेह आदि, एलर्जी के कारण रोगी एनाफाएजेटिक शॉक में भी जा सकता है और आपात्कालीन स्थिति निर्मित हो सकती है।
एलर्जी होने के कारण :
1. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार एलर्जी उन लोगों को होती है, जिनके शरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है।
2. यह रोग नशीले पदार्थों के सेवन, हानिकारक पदार्थ का पेट में चले जाना, पेट में कीड़े होना तथा रसायन युक्त भोजन का सेवन, सोंदर्य प्रसाधनों, किसी विशेष प्रकार का भोजन ग्रहण करने के कारण हो सकता है।
3. औषधियों का अधिक प्रयोग करने के कारण भी एलर्जी हो सकती है।
4. चीनी का अधिक सेवन करना या इससे बनी मिठाइयों का सेवन करने से भी एलर्जी रोग हो सकता है।
5. सिंथेटिक कपडे पहनने तथा अत्यधिक मानसिक तनाव हो जाने के कारण भी एलर्जी रोग हो सकता है।
6. बीमारी की हालत में अधिक सेक्स करने से भी एलर्जी रोग हो सकता है।
7. अधिक सोड़े वाला साबुन उपयोग करने से भी एलर्जी रोग हो सकता है।
8. कुछ लोगों में एलर्जी का कारण खाद्य पदार्थ होता है-जैसे दूध, दही, मछली, अंडे, गिरीदार फल आदि।
9. एलर्जी गेहू का आटा या चॉकलेट खाने से भी एलर्जी हो सकती है।
10. एंटीबायोटिक दवाइयों का प्रयोग करना तथा ज्वेलरी आदि से भी एलर्जी हो सकती है.
स्थानानुसार एलर्जी के लक्षण :
1. नाक की एलर्जी-नाक में खुजली होना, छीकें आना, नाक बहना, नाक बंद होना या बार बार जुकाम होना आदि।
2. आँख की एलर्जी-आखों में लालिमा, पानी आना, जलन होना, खुजली आदि।
3. श्वसन संस्थान की एलर्जी-इसमें खांसी, साँस लेने में तकलीफ एवं अस्थमा जैसी गंभीर समस्या हो सकती हैं।
4. त्वचा की एलर्जी-त्वचा की एलर्जी काफी कॉमन है और बारिश का मौसम त्वचा की एलर्जी के लिए बहुत ज्यादा मुफीद है, त्वचा की एलर्जी में त्वचा पर खुजली होना, दाने निकलना, एक्जिमा, पित्ती उछलना आदि होता है।
5. खान पान से एलर्जी-बहुत से लोगों को खाने पीने की चीजों जैसे दूध, अंडे, मछली, चॉकलेट आदि से एलर्जी होती है।
6. सम्पूर्ण शरीर की एलर्जी-कभी कभी कुछ लोगों में एलर्जी से गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है और सारे शरीर में एक साथ गंभीर लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ऐसी स्तिथि में तुरंत हॉस्पिटल लेकर जाना चाहिए।
8. अंग्रेजी दवाओं से एलर्जी-कई अंग्रेजी दवाएं भी एलर्जी का सबब बन जाती हैं। जैसे पेनिसिलिन का इंजेक्शन जिसका रिएक्शन बहुत खतरनाक होता है और मौके पर ही मौत हो जाती है। इसके अलावा दर्द की गोलियां, सल्फा ड्रग्स एवं कुछ एंटीबायोटिक दवाएं भी सामान्य से गंभीर एलर्जी के लक्षण उत्पन्न कर सकती हैं।
9. मधु मक्खी ततैया आदि का काटना–इनसे भी कुछ लोगों में सिर्फ त्वचा की सूजन और दर्द की परेशानी होती है, जबकि कुछ लोगों को इमर्जेन्सी में जाना पड़ जाता है।
एलर्जी से बचाव/Avoidance of Allergens :
>>>>>एलर्जी से बचाव ही एलर्जी का सर्वोत्तम इलाज है। इसलिए एलर्जी से बचने के लिए इन उपायों का पालन करना चाहिए। य़दि आपको एलर्जी है तो सर्वप्रथम ये पता करें की आपको किन—किन चीजों से एलर्जी है। इसके लिए आप ध्यान से अपने खान-पान और रहन-सहन को वाच करें।
>>>>>एलर्जी से बचाव ही एलर्जी का सर्वोत्तम इलाज है। इसलिए एलर्जी से बचने के लिए इन उपायों का पालन करना चाहिए। य़दि आपको एलर्जी है तो सर्वप्रथम ये पता करें की आपको किन—किन चीजों से एलर्जी है। इसके लिए आप ध्यान से अपने खान-पान और रहन-सहन को वाच करें।
1. घर के आस पास गंदगी ना होने दें।
2. घर में अधिक से अधिक खुली और ताजा हवा आने का मार्ग प्रशस्त करें।
3. जिन खाद्य पदार्थों से एलर्जी है, उन्हें न खाएं।
4. एकदम गरम से ठण्डे और ठण्डे से गरम वातावरण में ना जाएं।
5. बाइक चलाते समय मुंह और नाक पर रुमाल बांधे, आँखों पर धूप का अच्छी क़्वालिटी का चश्मा लगायें।
6. गद्दे, रजाई, तकिये के कवर एवं चद्दर आदि समय—समय पर गरम पानी से धोते रहें।
7. रजाई, गद्दे, कम्बल आदि को समय—समय पर धूप दिखाते रहें।
8. पालतू जानवरों से एलर्जी है तो उन्हें घर में ना रखें।
9. ज़िन पौधों के पराग कणों से एलर्जी है, उनसे दूर रहें।
10. घर में मकड़ी वगैरह के जाले ना लगने दें। समय—समय पर साफ सफाई करते रहें।
11. धूल मिट्टी से बचें, यदि धूल मिट्टी भरे वातावरण में काम करना ही पड़ जाये तो फेस मास्क पहन कर काम करें।
एलर्जी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार/Naturopathy Treatment of Allergies :
1-एलर्जी रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को 4-5 दिनों तक निम्बू पानी, नारियल पानी, सब्जियों का रस और फलों के रसों का सेवन करके उपवास रखना चाहिए। इसके बाद एक सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन का सेवन करना चाहिए।
2-इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी डिब्बाबंद खाद्य,नमक तथा चीनी का सेवन सेवन नहीं करना चाहिए, क्योकि इससे रोग गंभीर हो सकता है।
3-एलर्जी से पीड़ित रोगी को सोयाबीन दूध में डालकर पीना चाहिए, इसका प्रतिदिन सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
4-एलर्जी के रोगी व्यक्ति कुछ दिनों तक सुबह खाली पेट नीम के पत्तों को पीसकर पानी में मिलाकर पीना चाहिए तथा आधे घंटे तक कुछ भी नहीं खाना चाहिए।
5-प्रतिदिन आंवले के चूर्ण में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर पानी के साथ सेवन करने से एलर्जी रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।
6-एलर्जी के रोगी को सूर्यतृप्त नीली बोतल का पानी पीना चाहिए।
एलर्जी का होमोयोपेथिक उपचार/Homeopathic Treatment of Allergies :
1. Apis Mellifica : कीट-पतंगों से एलजीं होने तथा सूजन आने पर पर ‘एपिस’ 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
2. अर्जेन्टम नाइट्रिकम/Argentum nitricum 200 : कोई चीज खाने से एलर्जी के लक्षण दिखाई दे तो उपचार के इस औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। इस औषधि का प्रयोग श्लेष्मिक झिल्ली तथा शरीर के किसी भी अंग पर विशेष कर फेफड़ों पर एलर्जी के प्रभाव को ठीक करने के लिए किया जाता है।
3. ऐसेरम यूरोपम/Asarum Europaeum 200 : कभी-कभी रोगी को आवाज के प्रति संवेदनशीलता आ जाती है, रोगी हलकी आवाजें भी बर्दाश्त नहीं कर पाता, रोगी को हर समय ठण्ड लगती है।
4. आर्सेनिक एल्बम/Arsenic Album 200 : पुराने जुकाम, नजला, छींक आना, नाक से गर्म स्त्राव होना, ठण्ड लगना, समुद्र के किनारे जाने से रोग का बढ़ जाना आदि में उपयोग होता है।
5. आर्सेनिक एल्बम/Arsenic Album 200+3-नक्स-वोमिका/ Nux Vomica-30 : खाद्य पदार्थों से एलर्जी होने पर ‘आर्सेनिक’ 30 शक्ति में व ‘नक्सवोमिका’ 30 शक्ति में।
6. बेलाडोना/Belladonna-30/200 : रोगी को हल्की सी आवाज भी बर्दाश्त नहीं होती, शोर से रोगी गुस्सा हो जाता है। चेहरा लाल पड़ने पर।
7. ब्रोमीन-30 : धूल से एलर्जी होने पर ‘ब्रोमीन’ 30 शक्ति में।
8. कैमोमिला/Chamomilla 30 : इस औषधि का सेवन करने से रोगी में दर्द सहन करने की शक्ति बढ़ती है।
9. काफ़िया/Coffea 200 : किसी भी अंग में होने वाले तेज दर्द जिसे रोगी बिलकुल बर्दाश्त नही कर पाता, रोगी दर्द वाले स्थान पर छू जाने का अनुभव करके ही डर जाता है।
10. डल्कामारा/Dulcamara 30 : शरीर पर पित्ती उछलने पर ‘डल्कामारा’ 30 शक्ति में ।
11. इग्नेशिया/Ignatia Amara 30 या 200 : तम्बाकू व धुएं से एलर्जी होने पर ‘इग्नेशिया’ 30 या 200 शक्ति में।
12. नैट्रम म्यूर/Natrum Muriaticum 200 : फूल की गंध, अंडे, प्याज, गेहूं, शहद, दूध, मांस आदि से एलर्जी होने पर इस औषधि का सेवन किया जा सकता है।
13. नैट्रम म्यूर/Natrum Muriaticum 200 : अत्यधिक छींक आने पर नाक टपकने पर ‘नेट्रमम्यूर’ 200 की एक खुराक व ‘एलियम सीपा’ 30 शक्ति में।
14. नक्स-वोमिका/Nux Vomica 200 : संवेदनशीलता में ऐसे लक्षण जिसमें रोगी किसी भी प्रकार के बाहरी अनुभूति से संवेदनशील हो जाता है। जिसके कारण रोगी छोटी-छोटी बातों पर भी ग़ुस्सा हो जाता है।
15. सोरिनम/Psorinum 200 : गेहूं से एलर्जी होने पर।
16. ट्यूबरकुलीनम/Tuberculinum : जिस व्यक्ति को दूध, दही, दूध से बने पदार्थों, अंडा, मछली या मांस से किसी भी प्रकार की कोई एलर्जी हो तो पहले इस औषधि की 200 शक्ति का सेवन सप्ताह में एक बार दो सप्ताह तक ले। इससे लाभ न हो तो सल्फर औषधि की 1m/1000 का सेवन करें।
17. सल्फर/Sulphur 200 : चॉकलेट से एलर्जी होने पर।
18. अर्टिका युरेन्स/Urtica Urens 200 : दूध पीने से पित्ती उछलने के लक्षण में इस औषधि के मूलार्क का सेवन करना चाहिए।
19. पायोस 200 : धूल-मिटटी के कारण दमा रोग होना भी एक प्रकार की एलर्जी है। इस तरह के लक्षण में यह औषधि उपयोगी होती है।
20. अर्टिका युरेन्स/Urtica Urens-Q : शरीर पर चकत्ते पड़ने पर ‘आर्टिका यूरेंस’ औषधि मूल अर्क में लें। शैल फिश (एक प्रकार की मछली) खाने से होने वाली एलर्जी में भी यह लाभकारी है।
उपशीर्षक:
Allergy,
Homeopathic,
एक्जिमा,
एलर्जी,
खुजली,
छीकें,
जलन,
नाक,
पित्ती,
होम्योपैथिक
Friday, December 16, 2016
(Neem Health Benefits in Hindi)
May 15, 2016 Piyush Rathor
http://www.gyanpanti.com/kadve-neem-ke-hazaro-fayde-hindi-neem-health-benefits/
कडवे नीम के लाभ
नीम के पत्ते भारत से बाहर 34 देशों को निर्यात किए जाते हैं। इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ने वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं। इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है
इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य की शक्ति से ही चलता है…..सूर्य की ऊर्जा से जन्मे तमाम जीवों में नीम ने ही उस ऊर्जा को सबसे ज्यादा ग्रहण किया है। इसीलिए इसे रोग-निवारक समझा जाता है – किसी भी बीमारी के लिए नीम रामबाण दवा है। नीम के एक पत्ते में 150 से ज्यादा रासयानिक रूप या प्रबंध होते हैं। इस धरती पर मिलने वाले पत्तों में सबसे जटिल नीम का पत्ता ही है। नीम की केमिस्ट्री सूर्य से उसके लगाव का ही नतीजा है।
नीम के वृक्ष की ठंण्डी छाया गर्मी से राहत देती है तो पत्ते फल-फूल, छाल का उपयोग घरेलू रोगों में किया जाता है, नीम के औषधीय गुणों को घरेलू नुस्खों में उपयोग कर स्वस्थ व निरोगी बना जा सकता है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है, लेकिन इसके फ़ायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली हैं और उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :-
1. चर्म रोग : नीम के तेल से मालिश करने से विभिन्न प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।
May 15, 2016 Piyush Rathor
http://www.gyanpanti.com/kadve-neem-ke-hazaro-fayde-hindi-neem-health-benefits/
कडवे नीम के लाभ
नीम के पत्ते भारत से बाहर 34 देशों को निर्यात किए जाते हैं। इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ने वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं। इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है
इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य की शक्ति से ही चलता है…..सूर्य की ऊर्जा से जन्मे तमाम जीवों में नीम ने ही उस ऊर्जा को सबसे ज्यादा ग्रहण किया है। इसीलिए इसे रोग-निवारक समझा जाता है – किसी भी बीमारी के लिए नीम रामबाण दवा है। नीम के एक पत्ते में 150 से ज्यादा रासयानिक रूप या प्रबंध होते हैं। इस धरती पर मिलने वाले पत्तों में सबसे जटिल नीम का पत्ता ही है। नीम की केमिस्ट्री सूर्य से उसके लगाव का ही नतीजा है।
नीम के वृक्ष की ठंण्डी छाया गर्मी से राहत देती है तो पत्ते फल-फूल, छाल का उपयोग घरेलू रोगों में किया जाता है, नीम के औषधीय गुणों को घरेलू नुस्खों में उपयोग कर स्वस्थ व निरोगी बना जा सकता है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है, लेकिन इसके फ़ायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली हैं और उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :-
1. चर्म रोग : नीम के तेल से मालिश करने से विभिन्न प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।
2. मच्छर भगाये : नीम के तेल का दिया जलाने से मच्छर भाग जाते है और डेंगू , मलेरिया जैसे रोगों से बचाव होता है
3. मुंह की दुर्गंध रोधक : नीम की दातुन करने से दांत व मसूढे मज़बूत होते है और दांतों में कीडा नहीं लगता है, तथा मुंह से दुर्गंध आना बंद हो जाता है।
4. मंजन : इसमें दोगुना पिसा सेंधा नमक मिलाकर मंजन करने से पायरिया, दांत-दाढ़ का दर्द आदि दूर हो जाता है।
3. मुंह की दुर्गंध रोधक : नीम की दातुन करने से दांत व मसूढे मज़बूत होते है और दांतों में कीडा नहीं लगता है, तथा मुंह से दुर्गंध आना बंद हो जाता है।
4. मंजन : इसमें दोगुना पिसा सेंधा नमक मिलाकर मंजन करने से पायरिया, दांत-दाढ़ का दर्द आदि दूर हो जाता है।
5. दाँत दर्द : नीम की कोपलों को पानी में उबालकर कुल्ले करने से दाँतों का दर्द जाता रहता है।
6. रक्त शोधन : नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और चमकदार होती है।
7. चेचक : नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर और पानी ठंडा करके उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं, और ये ख़ासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
8. चेचक : चेचक होने पर रोगी को नीम की पत्तियों बिछाकर उस पर लिटाएं।
9. मलेरिया : नीम की छाल के काढे में धनिया और सौंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से मलेरिया रोग में जल्दी लाभ होता है।
10. मच्छर नष्ट : नीम मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों को दूर रखने में अत्यन्त सहायक है। जिस वातावरण में नीम के पेड़ रहते हैं, वहाँ मलेरिया नहीं फैलता है। नीम के पत्ते जलाकर रात को धुआं करने से मच्छर नष्ट हो जाते हैं और विषम ज्वर (मलेरिया) से बचाव होता है।
11. नीम तेल : नीम के फल (छोटा सा) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
12. बाल कम झड़ते हैं : नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
12. बाल कम झड़ते हैं : नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
13. बाल झड़ना : नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबालें, ठंण्डा होने पर इससे बाल धोयें, स्नान करें कुछ दिनों तक प्रयोग करने से बाल झडने बन्द हो जायेगें व बाल काले व मज़बूत रहेंगें।
14. आंख आने की बीमारी : नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी (कंजेक्टिवाइटिस) समाप्त हो जाती है।
14. आंख आने की बीमारी : नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी (कंजेक्टिवाइटिस) समाप्त हो जाती है।
15. पीलिया : नीम की पत्तियों के रस और शहद को 2:1 के अनुपात में पीने से पीलिया में फ़ायदा होता है, और इसको कान में डालने से कान के विकारों में भी फ़ायदा होता है।
16. पसीना और जलन : नीम के तेल की 5-10 बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फ़ायदा होता है।
17. बवासीर : नीम के बीजों के चूर्ण को ख़ाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।
18. कब्ज : नीम की निम्बोली का चूर्ण बनाकर एक-दो ग्राम रात को गुनगुने पानी से लें कुछ दिनों तक नियमित प्रयोग करने से कब्ज रोग नहीं होता है एवं आंतें मज़बूत बनती है।
19. लू का प्रभाव शांत : गर्मियों में लू लग जाने पर नीम के बारीक पंचांग (फूल, फल, पत्तियां, छाल एवं जड) चूर्ण को पानी मे मिलाकर पीने से लू का प्रभाव शांत हो जाता है।
20. बिच्छू ज़हर : बिच्छू के काटने पर नीम के पत्ते मसल कर काटे गये स्थान पर लगाने से जलन नहीं होती है और ज़हर का असर कम हो जाता है।
21. फोडा-फुंसी, घाव : नीम के 25 ग्राम तेल में थोडा सा कपूर मिलाकर रखें यह तेल फोडा-फुंसी, घाव आदि में उपयोग रहता है।
22. गठिया की सूजन : गठिया की सूजन पर नीम के तेल की मालिश करें।
23. कीड़े नाशक : नीम के पत्ते कीढ़े मारते हैं, इसलिये पत्तों को अनाज, कपड़ों में रखते हैं।
24. हैजा़ : नीम की 20 पत्तियाँ पीसकर एक कप पानी में मिलाकर पिलाने से हैजा़ ठीक हो जाता है।
24. हैजा़ : नीम की 20 पत्तियाँ पीसकर एक कप पानी में मिलाकर पिलाने से हैजा़ ठीक हो जाता है।
25. जलने का घाव : निबोरी नीम का फल होता है, इससे तेल निकला जाता है। आग से जले घाव में इसका तेल लगाने से घाव बहुत जल्दी भर जाता है।
26. पेट के रोग : नीम का फूल तथा निबोरियाँ खाने से पेट के रोग नहीं होते।
26. पेट के रोग : नीम का फूल तथा निबोरियाँ खाने से पेट के रोग नहीं होते।
27. बुखार : नीम की जड़ को पानी में उबालकर पीने से बुखार दूर हो जाता है।
28. दाग़ तथा चर्म रोग : छाल को जलाकर उसकी राख में तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर लगाने से दाग़ तथा अन्य चर्म रोग ठीक होते हैं।
29. मधुमेह, एड्स, कैंसर आदि नाशक : विदेशों में नीम को एक ऐसे पेड़ के रूप में पेश किया जा रहा है, जो मधुमेह से लेकर एड्स, कैंसर और न जाने किस-किस तरह की बीमारियों का इलाज कर सकता है।
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नीम का वृक्ष अनेक औषधीय गुणों की खान है। नीम, हमारे शरीर, त्वचा और बालों के लिये बहुत फायदेमंद है। नीम सर्व कीटनाशक, कीटमार नाशक और फफूंदनाशकों के रूप में प्रयोग किया जाता है।
नीम का संस्कृत नाम (Sanskrit Name of Neem): नीम को संस्कृत में अरिष्ट भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।
नीम के फायदे (Benefits of Neem in Hindi): नीम का उपयोग कई तरीकों से किया जाता है। यह एक बेहतरीन प्राकृतिक प्रदार्थ है जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। इसके उपयोग निम्न हैं:
बालझड़ (Baldness)- यदि किसी कारण सर झरने लगे, परन्तु अभी अवस्था बिगड़ी न हो तो नीम और बेरी के पत्तो को पानी में उबालकर बालो को धोना चाहिए। इससे झड़ना रुक जाता है, कालीमा कायम रहती है और थोड़े थोरे ही दिनों में बाल खूब लम्बे होने लगते है। इससे जुए भी मर जाती है।
नेत्र खुजली (Itching)- नीम के पत्ते छाया में सुखा ले और किसी बर्तन में डाल कर जलाये। ज्योही पत्ते जल जाये, बर्तन का मुँह ढक दे। बर्तन ठण्डा होने पर पत्ते निकाल कर सुरमे तरह पीस ले। अब इस रख में नीबू का ताजा रस डालकर छह घंटे तक खरल करे और खुश्क शीशी में रखे। रोजाना प्रातः व सायं सलाई द्धारा सुरमे के सामान उपयोग करे।
आँख का अंजन (Home Remedies for Itchy Eyes)- नीम के फूल छाँव में खुश्क कर बराबर वजन कलमी शोर मिलाकर बारीक़ पीस ले और कपरछन करे। अनजान के रूप में रात्रि को सोते समय सलाई द्धारा उपयोग करे, नेत्र-ज्योति बढ़ता है।
कान बहना (Neem in Ear Problems)- नीम का तेल गर्म कर इसमे सोलहवाँ भाग माँ डाले, जब पिघल जाये तो आच पर से उतार कर इसमें आठवाँ भाग चूर्ण फिटकरी (खील) मिलाकर सुरक्षित रखे। यदि कान बहना बन्द न होता हो तो इस दवा को आवश्य आजमाए।
कान में घाव (Neem in Ear Problems)- यदि कान में घाव हो जाये तो बड़ी कठिनाई से ठीक होता है। लिए निम्न नुस्ख अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ है - नीम का रस तीन माशे, शुद्ध मधु मशो। दोनों मिश्रित करे, तथा थोड़ा गरम कर के मधु के 2-4 बूंद टपकाये। कुछ ही दिन में घाव ठीक होकर स्वस्थ लाभ होगा।
नजला - जुखाम (Uses of Neem in Common Cold) - नीम के पत्ते एक टोला, काली मिर्च छह हसो- दोनों नीम के डंडे से कुटे और नीम के एक एक पत्ते से गोलिया बनाये। इस गोलिया को छाव में सुख कर सीसी में कर के रखना चाहिए। तीन-चार गोलिया प्रातः व सय कुनकुने पानी के साथ लेना चाहिए, नजला-जुखाम के लिए उत्तम है। नीम की निम्बैली एक तोला, लाहैरी नमक एक तोला, खिल फिटकरी एक तोला- तीनो बारीक़ से पीस कर मंजन रूप में दांत पर मलिये, दांत पीड़ा के लिए बिसेसकर लाभदायक है। दांत मोती के सामान चमक उठते है।
कै - दो तोले नीम के पत्ते आध पाव पानी में ठंडाई के समान घोट- छानकर रोगी को पिलाये। सभी प्रकार की कै रुक जाती है।
पुराने दस्त (Home Remedies of Diarrhea) - नीम के बीज की गिरी एक माशा में थोड़ी चीनी मिलकर उपयोग करने से पुराने दस्त बंद होते है। आहार केवल चावल ही रखे।
बारी का ज्वर - नीम की भीतरी नरम छाल छाव में खुश्क कर बारीक़ पीस ले और एक एक माशा पानी के साथ दिन में तीन बार उपयोग करे। तीन दिन में ही दवा जादू का काम करती है तथा बारी का ज्वर फिर नही होता। नीम के पंचांग जलाकर बत्तीस गुना पानी डालकर एक घड़े में रखे और नित्य हिलाते रहे। तीन दिन पशचात पानी निथार कर कपरछन करे और लोहे की कड़ाही में डालकर आँच पर रखे। जब सारा जल सुख जाये और नमक जैसा पदार्थ बाकि रह जाये (यह नीम का क्षर है ) तो इसे शीशी में सुरक्षित रख ले। मात्रा- आधी से एक रत्ती तक। सब प्रकार के ज्वर, विशेषकर मलेरिया की अचूक औषधि है दिन में तीन-चार बार उपयोग की जा सकती है।
ज्वर-तोड़- आधा छटांक नीम के हरे पत्ते और दो दाने काली मिर्च-दोनों आधा पाव पानी में घोटकर तथा चन कर पिने से बरी का ज्वर ठीक हो जाता है। यह एक अत्यंत भरोसे की दवा है। नीम के ताजा पत्ते एक तोला, शवेत ओहितकारी छह माशो - दोनों बारीक़ पीस कर पानी द्वारा चने के बराबर गोलियाँ बना ले। नित्य तथा बरी से चढ़ने वाले सब प्रकार के ज्वर ठीक करने में चमत्कारी है।
पुराना ज्वर - इक्कीस नीम के पत्ते और इक्कीस डेन काली मिर्च - दोनों की मलमल के कपड़े में पोटली बाँधकर आधा सेर पानी में उबले। जब पानी चौथाई भाग रह जाये तो उतार कर ठण्डा होने दे। फिर प्रातः व सांय पिलाने से निशचय ही लाभ होगा।
तपेदिक का बढ़िया इलाज (Home Remedies of TB in Hindi) - छिलका नीम दो सेर, आवले की जड़ दो सेर, पुराना गुड़ चार सेर, हरड़, आँवला बहेड़ा प्रत्येक आधा सेर, सौफ आधा सेर और सोए आधा सेर और सोए आधा सेर - समस्त सामग्री मजबूत बर्तन में बन्द कर ग्रीष्म ऋतु में पांच शरद ऋतु में बारह दिन तक किसी गर्म स्थान पर - गेहूँ या भूसे में रखे। तत्पशचात दो बोतल अर्क निकले। मात्रा - पहले दिन एक तोला, दूसरे दिन डेढ़ तोला तथा तत्पशचात दो तोला तक रोजाना गुलाब अर्क के साथ पिलाये। यह नुस्खा एक सन्यासी साधु से प्राप्त हुआ है।
गर्मी ज्वर - प्रायः ज्वरो में और विशेषकर गर्मी के ज्वर में प्यास बंद नही होती। ऐसी स्थिति में नीम की पतली टहनियाँ (पत्तो रहित) लेकर पानी में डाले और थोरे देर पसगचत यह पानी रोगी को पिलाये, तुरंत प्यास को आराम होगा, घबराहट दूर होगी और ज्वर में लाभ होगा।
पेट के कीड़े - दो तोले नीम की छाल एक सेर पानी में पकाये, चौथाई भाग पानी रहने पर मलकर छाने और प्रातः व सांय पि लिया करे। इससे पेट कीड़े जाते है और फिर नही होते। यदि पेट में कीड़े पड़ जाये तो नीम के पत्तो का रस दो-तीन दिन पिलाये, कीड़े मर कर निकल जायेगे। तत्पशचात दो-तीन दिन कलई का बुझा हुआ पानी पिलाये, दोबारा पेट में कीड़े नही पड़ेंगे।
बवासीर (Remedies of Bawasir)- नीम के बीज बीज गिरी तोला, धरेक के बीज की गिरी एक तोला, धरेक के बीज की गिरी एक तोला, रसौत एक तोला, हरड़ (गुठली रहित) तीन तोला - कूटकर कपरछन करे। छह-छह माशाप्रातः व सांय ठण्डे दूध या पानी के साथ सेवन करे, अवश्य लाभ होगा।
कब्जनाशक गोलियाँ (Home Remedies for Constipation) - पांच तोले विशुद्ध रसौत, काली मिर्च दो तोले और नीम के बीज की गिरी पांच तोले - समस्त सामग्री पीसकर नीम के पत्ते के रस में घोट ले अच्छी प्रकार बारीक़ हो जाने पर काबुली चने के बराबर गोलिया बना ले। एक गोली प्रातः ताजा जल से उपयोग करे तथा एक गोली पानी में धिसकर शौच-निवती पर मस्सो में लगाये। लगाते ही बवासीर से छुटकारा मिल जायेगा।
नीम की गिरी एक छटांक, शुद्ध रसौत एक चटक-दोंनों अच्छी प्रकार कूटकर मिलाये और जंगली बेर के बराबर गोलियाँ बना ले। एक गोली नित्य प्रातः पानी के साथ एक मास तक निरंतर उपयोग करे, बवसीर में आराम होगा।
पथरी (Remedies of Stone)- नीम के पत्ते जलाकर साधारण विधि से शर तैयार करे - दो-दो माशे ठण्ढे जल से दिन में तीन बार उपयोग करने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी ठीक हो जाती है।
खुजली (Uses of Neem in Hindi)- नीम की नरम कोपले, ढाई तोला नित्य ठंडाई के रूप में घोटकर पिने से खुजली दूर होती है।
बढ़िया मरहम- रक्त विकार के कारण प्रायः फोड़े-फुंसियाँ निकलती रहती है और कई बार ये इतनि बिगड़ घाव साफ करने के लिए नीम के पत्तो मरहम बनाई जाती है जो कभी असफल नही होती|
See : http://health.raftaar.in/healthcare/health-and-tips_miracles-of-neem
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नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है
Friday, 18 April 2014
नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। आयुर्वेदमें इसे वैद्य भी कहा गया है। इसके औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेदिक मेडिसिनमें पिछले चार हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। नीम कोसंस्कृत में अरिष्ट भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, श्रेष्ठ, पूर्ण औरकभी खराब न होने वाला।
नीम का रस डायबिटीज, बैक्ट्रिया और वायरस खत्म करने के गुण पाए जाते हैं।नीम के तने, जड़, छाल और कच्चे फलों में मियादी रोगों से लड़ने का गुण भीपाया जाता है। इसकी छाल खासतौर पर मलेरिया और त्वचा संबंधी रोगों में बहुतउपयोगी होती है।
नीम की तासीर ठंडी होती है। इसीलिए गर्मी में इसकी पत्तियों का सेवन शरीर केलिए विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है। चैत्र के महीने में रोज सुबह खालीपेट नीम के कोमल पत्ते चबाने से सालभर बीमारियां दूर रहती हैंं। चलिए आजजानते हैं नीम के ऐसे ही कुछ औषधीय गुणों के बारे में...
- - नीम की पत्तियों का रस पीने से शरीर की गंदगी निकल जाती है। इससे बालकाले, घने और चमकदार हो जाते हैं। त्वचा की कांति बढ़ जाती है।
- - निबौलियों को पीसकर रस तैयार करके बालों पर लगाया जाए तो जूएं मर जातीहैं।
- - घमौरियों से छुटकारा पाने के लिए नीम की छाल को घिसकर लेप बना लें। इसलेप को घमौरियों और फुंसियों पर लगाएं, आराम मिलेगा।
- - पानी में थोड़ी-सी नीम की पत्तियां डालकर नहाने से भी घमौरियां दूर हो जातीहैं।
- - नीम का महीने में 10 दिन तक सेवन करते रहने से कभी हार्ट अटैक नहीं होता।नीम के रस का उपयोग मलेरिया रोग में भी किया जाता है। नीम वाइरस कोपनपने नहीं देता और लिवर की कार्यक्षमता बढ़ाता है।
- नीम का पत्तियों का लेप बालों पर लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़तेहैं।
- - नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबालकर इस पानी से बाल धोने से बालझड़ना बंद हो जाते हैं।
- - निंबोली का चूर्ण बनाकर एक-दो ग्राम मात्रा रात को गुनगुने पानी से लें। यहनुस्खा कब्ज की समस्या में रामबाण है।
- - बिच्छू के काटने पर नीम के पत्ते मसल कर काटे गए स्थान पर लगाने से जलननहीं होती है। साथ ही, ज़हर का असर कम हो जाता है।
- - डांग में आदिवासी लगभग 200 ग्राम नीम की पत्तियों को 2 लीटर पानी मेंउबालते हैं। जब पानी का रंग हरा हो जाता है, तब उस पानी को बोतल में छान कररख लेते हैं। नहाते समय बाल्टी में 75 से 100 मिलीलीटर नीम के इस पानी कोडाल लिया जाता है। जानकारों के अनुसार नहाने का यह पानी संक्रमण, मुंहासेऔर शरीर से पुराने दाग-धब्बों से छुटकारा दिलाता है।
- नीम के गुलाबी कोमल पत्तों को चबाकर रस चूसने से डायबिटीज रोग मे आराममिलता है।
- - नीम का जूस डायबिटीज रोगियों के लिए बहुत लाभदायक है। रोजाना नीम का जूस पीने से ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है।
- - कुछ आदिवासी नीम की पत्तियों के रस में दालचीनी का चूर्ण मिला कर डायबिटीज के रोगियों को देते हैं। उसके परिणाम भी काफी अच्छे मिले हैं। हालांकि, इसका कोई क्लिनिकल और वैज्ञानिक प्रमाण अब तक देखने को नहीं मिला। फिर भी इस पारंपरिक नुस्खे को आजमाने में कोई बुराई नहीं है।
- - नीम के रस की दो बूंदें आंखों में डालने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। यदि किसीको कंगज्वाइटिस हो गया है, तो वह भी जल्द ठीक हो जाता है।
- बवासीर जैसे कष्टकारी रोग के इलाज के लिए नीम और कनेर के पत्ते की समान मात्रा लेकर लेप की सलाह देते हैं। इनका मानना है कि ये लेप लगातार एक सप्ताह तक लगाने से कष्ट कम होता जाता है।
- - मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के कोरकु आदिवासी मलेरिया में नीम के (तने के अंदर की) छाल को कूटकर कांसे के बर्तन में पानी के साथ कुछ देर के लिए उबालते हैं। फिर इसे एक कपड़े से छान लेते हैं। इन आदिवासियों के अनुसार, इस पानी को दिन में तीन बार मलेरिया के रोगी को दिया जाए तो मलेरिया दूर हो जाता है।
- गर्मियों में लू लग जाने पर नीम के फूल, फल, पत्तियां, छाल और जड़ के चूर्ण कोपानी मे मिलाकर पीने से लू का प्रभाव खत्म हो जाता है।
- - नीम के 25 ग्राम तेल में थोड़ा-सा कपूर मिलाकर यह तेल फुंसी या घाव आदिपर लगाने से घाव जल्दी भर जाता है।
- - गठिया की सूजन पर नीम के तेल की मालिश करें, लाभ होगा।
- - नीम के पत्ते कीड़े मारते हैं, इसलिए पत्तों को अनाज में रखते हैं।
- नीम के पत्ते और मकोय के फलों का रस समान मात्रा में लेकर पलकों पर लगानेसे आंखों में लाली दूर हो जाती है।
- - डिलिवरी के समय लेबर पेन में आराम पाने के लिए नीम के रस से मसाज करना चाहिए। दर्द कम महसूस होता है।
- - गले की सूजन दूर करने के लिए (5 ग्राम) नीम की पत्तियां, 4 काली मिर्च, 2लौंग और चुटकी भर नमक को मिलाकर काढ़ा बनाकर लें। इसका सेवन दिन मेंतीन बार करें। गुजरात के आदिवासी इस नुस्खे को रामबाण मानते हैं।
- - नीम की 20 पत्तियां पीसकर एक कप पानी में मिलाकर पीने से हैजा ठीक होजाता है।
- - निंबोली का तेल लगाने से जलने का घाव जल्दी भर जाता है।
- - नीम का फूल तथा निंबोलियां खाने से पेट के रोग नहीं होते।
- - नीम की जड़ को पानी में उबालकर पीने से बुखार दूर हो जाता है।
- - छाल को जलाकर उसकी राख में तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर लगाने सेदाग-धब्बे दूर हो जाते हैं।
- नीम के तेल से मालिश करने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। नीम का लेप भी सभीप्रकार के चर्म रोगों के निवारण में सहायक है।
- - नीम की दातुन करने से दांत व मसूढ़े मजबूत होते हैं और दांतों में कीड़ा नहींलगता है। मुंह से दुर्गंंध आना बंद हो जाता है।
- - नीम के रस में सेंधा नमक मिलाकर मंजन करने से पायरिया, दांत-दाढ़ का दर्दआदि दूर हो जाता है।
- - नीम की कोंपलों को पानी में उबालकर कुल्ला करने से दांतों का दर्द दूर हो जाताहै।
See : http://laxmanramjakhardharasar.blogspot.in/2014/04/blog-post_4636.html
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नीम जूस पीने का गुणकारी फायदा By: Purnima Updated: Tuesday, September 16, 2014, 12:52 [IST]
नीम एक आयुर्वेदिक दवाई है, जिसके कई सारे स्वास्थ्यवर्धक फायदे हैं। नीम, हमारे शरीर, त्वचा और बालों के लिये बहुत फायदेमंद है। इसका कडुआ स्वाद बहुत से लोगो को खराब लगता है इसलिये वे इसे चाह कर भी नहीं खा पाते। इसी कारण नीम का रस पीना ज्यादा आसान होता है। आइये जानते हैं इस गुणकारी नीम के रस का फायदा। नीम का जूस कैसे पिएं? 1. नीम का रस बहुत कडुआ होता है, जिसे पीना बहुत मुश्किल होता है। अगर आपको इसके फायदे चाहिये तो इसे एक ग्लास में डाल कर इसको दवा समझ कर पूरा एक साथ पी लें। इसके अलावा ये भी देखिये की नीम के रस को और किस-किसी प्रकार से पिया जा सकता है। नीम त्वचा के लिए अमृत होती है
2. नीम के रस में थोड़ा मसाला डाल दें जिससे उसमें स्वाद आ जाए। इसको पीने से पहले उसमें नमक या काली मिर्च और या फिर दोनों ही डाल दें। 3. कई लोगो को नीम की महक अच्छी नहीं लगती। इसलिये जब रस निकाल लें तब उसको फ्रिज में 15-20 मिनट के लिये रखें या फिर उसमें बर्फ के कुछ क्यूब डाल दें और फिर पिएं। लेकिन सबसे अच्छा होगा कि नीम के रस को निकाल कर तुरंत ही पी लिया जाए। इसको 30 मिनट से ज्यादा स्टोर कर के नहीं रखना चाहिये। 4. नीक का रस पीने से पहले अपनी नाक को दबा लें, इससे जूस को पीने में आसानी होगी। अगर आपको नीम जूस का पूरा फायदा उठाना है, तो इसमें चीनी बिल्कुल भी न मिलाएं। 5. नीम का रस हमेशा सुबह-सुबह पिएं। इसकी कडुआहट को कम करने के लिये इसमें नमक मिलाएं और हल्का सा पानी भी।
1. मुंहासों से मुक्ती नीम में एंटी इंफ्लेमेट्री तत्व पाए जाते हैं, नीम का अर्क पिंपल और एक्ने से मुक्ती दिलाने के लिये बहुत अच्छा माना जाता है। इसके अलावा नीम जूस शरीर की रंगत निखारने में भी असरदार है।
2. पीलिया में फायदा नीम की पत्तियों के रस और शहद को २:१ के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है, और इसको कान में डालने से कान के विकारों में भी फायदा होता है।
3. शरीर की गंदगी साफ करे नीम जूस पीने से, शरीर की गंदगी निकल जाती है। जिससे बालों की क्वालिटी, त्वचा की कामुक्ता और डायजेशन अच्छा हो जाता है।
4. मधुमेह रोगियों के लिये भी फायदेमंद अगर आप रोजाना नीम जूस पिएंगे तो आपका ब्लड़ शुगर लेवल बिल्कुल कंट्रोल में हो जाएगा।
5. आंखों की रौशनी बढ़ाए नीम के रस की दो बूंदे आंखो में डालने से आंखो की रौशनी बढ़ती है और अगर कन्जंगक्टवाइटिस हो गया है, तो वह भी जल्द ठीक हो जाता है।
6. चिकन पॉक्स के निशान मिटाए शरीर पर चिकन पॉक्स के निशान को साफ करने के लिये, नीम के रस से मसाज करें। इसके अलावा त्वचा संबधि रोग, जैसे एक्जिमा और स्मॉल पॉक्स भी इसके रस पीने से दूर हो जाते हैं।
7. खून साफ करे नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कैलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में 10 दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है।
8. पायरिया में लाभदायक मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर नीम के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है। इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं। नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है। नीम का दातुन नित्य करने से दांतों के अन्दर पाये जाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं। दाँत चमकीला एवं मसूड़े मजबूत व निरोग होते हैं। इससे चित्त प्रसन्न रहता है।
9. मलेरिया रोग में फायदेमंद नीम के रस का फायदा मलेरिया रोग में किया जाता है। नीम वाइरस के विकास को रोकता है और लीवर की कार्यक्षमता को मजबूत करता है।
10. प्रेगनेंसी में प्रेगनेंसी के दौरान नीम का रस योनि के दर्द को कम करता है। कई प्रेगनेंट औरते लेबर पेन से मुक्ती पाने के लिये नीम के रस से मसाज करती हैं। प्रसूता को बच्चा जनने के दिन से ही नीम के पत्तों का रस कुछ दिन तक नियमित पिलाने से गर्भाशय संकोचन एवं रक्त की सफाई होती है, गर्भाशय और उसके आस-पास के अंगों का सूजन उतर जाता है, भूख लगती है, दस्त साफ होता है, ज्वर नहीं आता, यदि आता भी है तो उसका वेग अधिक नहीं होता।
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[Edited by: भूमिका राय]
नई दिल्ली, 01 अगस्त 2015, अपडेटेड 17:43 IST
अगर आपके घर के सामने नीम का पेड़ है तो आप वाकई बहुत भाग्यशाली हैं. गर्मी में ठंडी हवा देने के साथ ही ये एक ऐसा पेड़ है जिसका हर हिस्सा किसी न किसी बीमारी के इलाज में कारगर है. इतना ही नहीं विभिन्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में भी नीम को प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है.
नीम के फायदे:
1. जल जाने पर : अगर आप खाना बनाते वक्त या किसी दूसरे कारण से अपना हाथ जला बैठी हैं तो तुरंत उस जगह पर नीम की पत्तियों को पीसकर लगा लें. इसमें मौजूद एंटीसेप्टिक गुण घाव को ज्यादा बढ़ने नहीं देता है.
2. कान दर्द में : अगर आपके कान में दर्द रहता है तो नीम का तेल इस्तेमाल करना काफी फायदेमंद रहेगा. कई लोगों में कान बहने की भी बीमारी होती है, ऐसे लोगों के लिए भी नीम का तेल एक कारगर उपाय है.
3. दांतों के लिए : कुछ वक्त पहले तक नीम की दातुन, ब्रश की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय थी. एक ओर जहां दांतों और मसूड़ों की देखभाल के लिए हम तरह-तरह के महंगे टूथपेस्ट इस्तेमाल करते हैं वहीं नीम की दातुन अपने आप में पर्याप्त होती है. नीम की दातुन पायरिया की रोकथाम में भी कारगर होती है.
4. बालों के लिए भी है फायदेमंद : नीम एक बहुत अच्छा कंडीशनर है. इसकी पत्तियों को पानी में उबालकर उसके पानी से बाल धोने से रूसी और फंगस जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं.
5. फोड़े और दूसरे जख्मों पर लगाने के लिए : कई बार ऐसा होता है कि खून साफ न होने की वजह से समय-समय पर फोड़े हो जाते हैं. ऐसे में नीम की पत्ती को पीसकर प्रभावित जगह पर लगाने से फायदा होगा. साथ ही इसके पानी से चेहरा साफ करने पर मुंहासे नहीं होते हैं.
See : http://aajtak.intoday.in/story/5-benefits-of-neem-1-825765.html
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नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। यहाँ तक कि इसको भारत में ‘गांव का दवाखाना’ कहा जाता है। यह अपने औषधीय गुणों की वजह से आयुर्वेदिक मेडिसिन में पिछले चार हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। नीम को संस्कृत में ‘अरिष्ट’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, ‘श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।’
नीम के अर्क में मधुमेह यानी डायबिटिज, बैक्टिरिया और वायरस से लड़ने के गुण पाए जाते हैं। नीम के तने, जड़, छाल और कच्चे फलों में शक्ति-वर्धक और मियादी रोगों से लड़ने का गुण भी पाया जाता है। इसकी छाल खासतौर पर मलेरिया और त्वचा संबंधी रोगों में बहुत उपयोगी होती है।
नीम के पत्ते भारत से बाहर 34 देशों को निर्यात किए जाते हैं। इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ने वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं।
इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है।
नीम के बारे में उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों में इसके फल, बीज, तेल, पत्तों, जड़ और छिलके में बीमारियों से लड़ने के कई फायदेमंद गुण बताए गए हैं। प्राकृतिक चिकित्सा की भारतीय प्रणाली ‘आयुर्वेद’ के आधार-स्तंभ माने जाने वाले दो प्राचीन ग्रंथों ‘चरक संहिता’ और ‘सुश्रुत संहिता’ में इसके लाभकारी गुणों की चर्चा की गई है। इस पेड़ का हर भाग इतना लाभकारी है कि संस्कृत में इसको एक यथायोग्य नाम दिया गया है – “सर्व-रोग-निवारिणी” यानी ‘सभी बीमारियों की दवा।’ लाख दुखों की एक दवा!
सद्गुरु:
“इस धरती की तमाम वनस्पतियों में से नीम ही ऐसी वनस्पति है, जो सूर्य के प्रतिबिम्ब की तरह है।”
इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य की शक्ति से ही चलता है…..सूर्य की ऊर्जा से जन्मे तमाम जीवों में नीम ने ही उस ऊर्जा को सबसे ज्यादा ग्रहण किया है। इसीलिए इसे रोग-निवारक समझा जाता है – किसी भी बीमारी के लिए नीम रामबाण दवा है। नीम के एक पत्ते में 150 से ज्यादा रासयानिक रूप या प्रबंध होते हैं। इस धरती पर मिलने वाले पत्तों में सबसे जटिल नीम का पत्ता ही है। नीम की केमिस्ट्री सूर्य से उसके लगाव का ही नतीजा है।
नीम के पत्तों में जबरदस्त औषधीय गुण तो है ही, साथ ही इसमें प्राणिक शक्ति भी बहुत अधिक है। अमेरिका में आजकल नीम को चमत्कारी वृक्ष कहा जाता है। दुर्भाग्य से भारत में अभी लोग इसकी ओर नहीं दे हैं। अब वे नीम उगाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि नीम को अनगिनत तरीकों से इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर आपको मानसिक बिमारी है, तो भारत में उसको दूर करने के लिए नीम के पत्तों से झाड़ा जाता है। अगर आपको दांत का दर्द है, तो इसकी दातून का इस्तेमाल किया जाता है। अगर आपको कोई छूत की बीमारी है, तो नीम के पत्तों पर लिटाया जाता है, क्योंकि यह आपके सिस्टम को साफ कर के उसको ऊर्जा से भर देता है। अगर आपके घर के पास, खास तौर पर आपकी बेडरूम की खिड़की के करीब अगर कोई नीम का पेड़ है, तो इसका आपके ऊपर कई तरह से अच्छा प्रभाव पड़ता है।
बैक्टीरिया से लड़ता नीम :
दुनिया बैक्टीरिया से भरी पड़ी है। हमारा शरीर बैक्टीरिया से भरा हुआ है। एक सामान्य आकार के शरीर में लगभग दस खरब कोशिकाएँ होती हैं और सौ खरब से भी ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं। आप एक हैं, तो वे दस हैं। आपके भीतर इतने सारे जीव हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इनमें से ज्यादातर बैक्टीरिया हमारे लिए फायदेमंद होते हैं। इनके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो हमारे लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। अगर आप नीम का सेवन करते हैं, तो वह हानिकारक बैक्टीरिया को आपकी आंतों में ही नष्ट कर देता है।
आपके शरीर के भीतर जरूरत से ज्यादा बैक्टीरिया नहीं होने चाहिए। अगर हानिकारक बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा हो गई तो आप बुझे-बुझे से रहेंगे, क्योंकि आपकी बहुत-सी ऊर्जा उनसे निपटने में नष्ट हो जाएगी। नीम का तरह-तरह से इस्तेमाल करने से बैक्टीरिया के साथ निपटने में आपके शरीर की ऊर्जा खर्च नहीं होती।
आप नहाने से पहले अपने बदन पर नीम का लेप लगा कर कुछ वक्त तक सूखने दें, फिर उसको पानी से धो डालें। सिर्फ इतने से ही आपका बदन अच्छी तरह से साफ हो सकता है – आपके बदन पर के सारे बैक्टीरिया नष्ट हो जाएंगे। या फिर नीम के कुछ पत्तों को पानी में डाल कर रात भर छोड़ दें और फिर सुबह उस पानी से नहा लें।
एलर्जी के लिए नीम :
नीम के पत्तों को पीस कर पेस्ट बना लें, उसकी छोटी-सी गोली बना कर सुबह-सुबह खाली पेट शहद में डुबा कर निगल लें। उसके एक घंटे बाद तक कुछ भी न खाएं, जिससे नीम ठीक तरह से आपके सिस्टम से गुजर सके। यह हर प्रकार की एलर्जी–त्वचा की, किसी भोजन से होनेवाली, या किसी और तरह की–में फायदा करता है। आप सारी जिंदगी यह ले सकते हैं, इससे कोई नुकसान नहीं होगा। नीम के छोटे-छोटे कोमल पत्ते थोड़े कम कड़वे होते हैं, वैसे किसी भी तरह के ताजा, हरे पत्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
बीमारियों के लिए नीम :
नीम के बहुत-से अविश्वसनीय लाभ हैं, उनमें से सबसे खास है–यह कैंसर-कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। हर किसी के शरीर में कैंसर वाली कोशिकाएं होती हैं, लेकिन वे एक जगह नहीं होतीं, हर जगह बिखरी होती हैं। किसी वजह से अगर आपके शरीर में कुछ खास हालात बन जाते हैं, तो ये कोशिकाएं एकजुट हो जाती हैं। छोटे-मोटे जुर्म की तुलना में संगठित अपराध गंभीर समस्या है, है कि नहीं? हर कस्बे-शहर में हर कहीं छोटे-मोटे मुजरिम होते ही हैं। यहां-वहां वे जेब काटने जैसे छोटे-मोटे जुर्म करते हैं, यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन किसी शहर में अगर ऐसे पचास जेबकतरे एकजुट हो कर जुर्म करने लगें, तो अचानक उस शहर का पूरा माहौल ही बदल जाएगा। फिर हालत ये हो जाएगी कि आपका बाहर सड़क पर निकलना खतरे से खाली नहीं होगा। शरीर में बस ऐसा ही हो रहा है। कैंसर वाली कोशिकाएं शरीर में इधर-उधर घूम रही हैं। अगर वे अकेले ही मस्ती में घूम रही हैं, तो कोई दिक्कत नहीं। पर वे सब एक जगह इकट्ठा हो कर उधम मचाने लगें, तो समस्या खड़ी हो जाएगी। हमें बस इनको तोड़ना होगा और इससे पहले कि वे एकजुट हो सकें, यहां-वहां इनमें से कुछ को मारना होगा। अगर आप हर दिन नीम का सेवन करें तो ऐसा हो सकता है; इससे कैंसर वाली कोशिकाओं की तादाद एक सीमा के अंदर रहती है, ताकि वे हमारी प्रणाली पर हल्ला बोलने के लिए एकजुट न हो सकें। इसलिए नीम का सेवन बहुत लाभदायक है।
नीम में ऐसी भी क्षमता है कि अगर आपकी रक्त धमनियों (आर्टरी) में कहीं कुछ जमना शुरु हो गया हो तो ये उसको साफ कर सकती है। मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों के लिए भी हर दिन नीम की एक छोटी-सी गोली खाना बहुत फायदेमंद होता है। यह उनके अंदर इंसुलिन पैदा होने की क्रिया में तेजी लाता है।
साधना के लिए नीम :
नीम आपके सिस्टम को साफ रखने के साथ उसको खोलने में भी खास तौर से लाभकारी होता है। इन सबसे बढ़ कर यह शरीर में गर्मी पैदा करता है। शरीर में इस तरह की गर्मी हमारे अंदर साधना के द्वारा तीव्र और प्रचंड ऊर्जा पैदा करने में बहुत मदद करती है।
See : http://hindi.speakingtree.in/blog/content-254084
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नीम के पत्ते खाने के फायदे – नीम के गुण
Posted on 1 month ago by अनुभवी G.P.Singh 0 Comments0
परिचय :
1. इसे निम्ब (संस्कृत), नीम (हिन्दी), निम (बंगाली), कडूलिंब (मराठी), लीमड़ो (गुजराती), बेंबु (तमिल), बेया (तेलुगु), आजाद दरख्त (अरबी) तथा मेलिया एजाडिरेक्टा (लैटिन) कहते हैं।
2. नीम का वृक्ष 40-50 फुट ऊँचा, अनेक शाखा-प्रशाखाओं से युक्त और सघन होता है। तने की लकड़ी सरल होती है। छाल काली, मोटी और खुरदरी होती है। पत्ते छोटी टहनियों के अन्त में लम्बी सींकों पर नुकीले, कंगूरेदार, 3-4 अंगुल लम्बे व 1-1 अंगुल चौड़े होते हैं। नये पत्ते निकलने के साथ छोटे-छोटे, पीले-सफेद रंग के फूल आकर लद जाते हैं (बौर, निम्बमंजरी) इसके फल खिरनी के आकार के छोटे, हरे रंग के तथा पकने पर पीले होते हैं। फल में एक बीज होता है।
3. यह भारत में सर्वत्र पाया जाता है।
रासायनिक संघटन : नीम की छाल में कडुवा, रालमय सत्त्व, मार्गोसीन उड़नशील तेल, गोंद, श्वेतसार, शर्करा तथा टैनिन होते हैं। पत्तों में कडुवा पदार्थ कम होता है। बीज में मार्गोसा आइल 40 प्रतिशत गन्धक के अंश से युक्त रहता है। मद्य (ताड़ी) में कडुवा पदार्थ 60 प्रतिशत होता है। नीम के सब अंगों से तेल अधिक कार्यकारी होता है।
नीम के गुण : यह स्वाद में कडुवा, कसैला, पचने पर कटु तथा हल्का होता है। इसका मुख्यत: त्वचा-ज्ञानेन्द्रिय पर कण्डूध्न (त्वचा-रोगहर) प्रभाव पड़ता है। यह कीटाणुनाशक, शोथहर, उदर कृमिहर, व्रण-रोपण (घाव भरनेवाला), पीड़ा-शामक, रुचिकर, रक्तशोधक, कफहर, मूत्रविकारनाशक, गर्भाशयउत्तेजक, दाह-प्रशामक, ज्वरघ्न, नेत्र के लिए हितकारक तथा बलकारक होता हैं।
नीम का प्रयोग
1. विषमज्वर : नीम की पत्ती की सींकें 21 और काली मिर्च 21 नग लेकर उन्हें 6 तोला पानी में पीस-छानकर कुछ गर्म करके पिलाने से दो-तीन दिनों में विषमज्वर उतर जाता है।
2. वमन : ज्वर में वमन होता हो, तो नीम की लकड़ी जलाकर पानी में बुझाकर वही पानी पिलाइये। इससे कफ की कै रुक जाती है।
3. दाह : ज्वर में दाह हो तो नीम के पत्ते पीसकर शहद मिला पानी में घोलकर पिलायें। इससे ज्वरदाह कम हो जाता और वमन भी रुक जाता है।
4. मसूरिका : नीम के मुलायम पत्ते और काली मिर्च सम परिमाण में पीसकर चने के बराबर गोली बना लें। चेचक के दिनों में प्रात: 1 गोली पानी के साथ लेने पर चेचक नहीं निकलती। बराबर दो सप्ताह के सेवन से फोड़ा-फुन्सी भी नहीं निकलते।
5. कामला : नीम की छाल के रस में शहद मिलाकर सुबह सेवन करने से कामला में आराम होता है।
6. वातरक्त : नीम-पत्र और पटोल-पत्र का क्वाथ शहद मिलाकर पीने से वातरक्त (गाउट) में आराम होता हैं।
7. कृमिरोग : नीम-पत्र का रस मधु के साथ पीने से उदरस्थ कृमियों का नाश होता है।
8. शीतपित्त : नीम-पत्र को घी में भूनकर आँवला मिलाकर खाने से शीतपित्त, फोड़े, घाव, अम्लपित और रक्तविकार में निश्चित लाभ होता है।
9. दन्तरोग : नीम की जड़ की छाल का काढ़ा लेने से दन्तरोग नहीं होता। पायोरिया में यह विशेष लाभकर हैं।
10. खालित्य-पालित्य : नीम-बीजों के तेल का 1 मास तक नस्य लेने और केवल दूध का सेवन करने से बाल काले होते एवं गिरे बाल उग आते हैं।
11. विष-प्रतिकार : नीम-फलों की गिरी को गर्म जल के साथ देने से विष का असर तुरन्त मिट जाता है।
12. अर्श : 10-12 नीम-फलों की गिरी को पीसकर दही के साथ लें, पहले गिरी खाकर दही खायें या गिरी को गुड़ में मिला गोली बनाकर खा लें। इससे दो दिनों में बवासीर में रक्त का आना बन्द हो जाता है। यह प्रयोग शतशः अनुभूत है।
13. बाल-ज्वर : नीम के सूखे पत्रों के साथ घी मिलाकर धूप देने से बच्चों का ज्वर छूट जाता है।
14. कुष्ठ : नीम के पत्र पीसकर जल के साथ लगातार ६ मास लेने से सब प्रकार के कुष्ठ दूर हो जाते हैं। इसके साथ घी का सेवन अवश्य करें।
15. योनि-पिच्छलता : गाढ़े स्राव से योनि गीली रहती हो तो नीम के पत्ते उबालकर उस पानी से धोयें (डूसिंग करें)। फिर नीम-छाल को आग पर जलाकर उसका धुआँ दें। इससे योनि की पिच्छलता दूर होकर बदबू मिटती और वह कड़ी हो जाती है।
16. योनिशूल : नीम के बीजों को भिगोकर तथा पीसकर पोटली बना योनि पर रखने से योनि-शूल मिट जाता है।
17. शोधन : जब फोड़ा पक जाय तथा मुँह छोटा हो, तब नीम के पत्तों को पीसकर पुल्टिस बाँधने से शोधन हो जाता है।
See : http://www.homeopathicmedicine.info/neem-ke-fayde-gun-upyog/
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परामर्श : 10 AM से 10 PM के बीच। Mob & Whats App No. : 9875066111
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कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें।
निवेदन : रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-9875066111.
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उपशीर्षक:
एलर्जी,
कीड़े,
खुजली,
ज्वर,
नीम-azadirachta indica,
पथरी,
बवासीर,
बैक्टीरिया,
रामबाण
Sunday, November 27, 2016
: शॉर्ट नोट्स :
1. सदाफूली/सदाबहार/सदा सुहागन बारहों महीने खिलने वाले फूलों का एक पौधा है।
2. इसका वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस/Catharanthus Roseus है। भारत में पाई जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस है।
3. सदाबहार पौधा बारूद-जैसे विस्फोटक पदार्थों को पचाकर उन्हें निर्मल कर देता है।
4. सदाबहार पौधों के आस-पास कीट, पतंगे, बिच्छू तथा सर्प आदि नहीं फटकते।
5. ध्यान रहे: कड़वा स्वाद होने के कारण इसे खाली पेट लेने से उल्टी हो सकती है।
6. प्रयोग का तरीका: इसके पत्तों को सुखाकर चूर्ण बना लें व रोजाना नाश्ते के बाद आधा ग्राम चूर्ण को सादा पानी से लें।
7. इनका सेवन स्वस्थ लोग भी कर सकते हैं। इससे उनका प्रतिरोधक तंत्र मजबूत होता है।
8. अन्य रोगों में भी प्रभावी: डायबिटीज के मरीजों में ये एंटीडायबिटिक का काम करती हैं।
9. पत्तियां कैंसररोधी हैं। ये रोग बढ़ाने वाली कोशिकाओं के विकास को रोकती हैं साथ ही इस दौरान क्षतिग्रस्त हो गई कोशिकाओं को फिर से सेहतमंद बनाने का काम करती हैं। आयुर्वेद शोधकर्ताओं ने सफेद फूल वाले सदाबहार पौधे को इस बीमारी में प्रभावी माना है।
10. सदाबहार की पत्तियाँ मृदा/मिट्टी में उपस्थित हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट कर देती हैं।
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नई दिल्ली. सदाफूली, सदाफली या सदाबहार या सदा सुहागन बारहों महीने खिलने वाले फूलों का एक पौधा है। इसकी आठ जातियां हैं। इनमें से सात मेडागास्कर में तथा आठवीं भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस है। भारत में पाई जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस (Catharanthus Roseus) है। सदाफूली में सबसे चमत्कृत करने वाली बात है कि यह बारूद जैसे पदार्थ को भी निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है। मेडागास्कर मूल की यह फूलदार झाड़ी भारत में कितनी लोकप्रिय है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि लगभग हर भारतीय भाषा में इसको अलग नाम दिया गया है- उड़िया में अपंस्कांति, तमिल में सदाकाडु मल्लिकइ, तेलुगु में बिल्लागैत्रेर्स, पंजाबी में रतनजोत, बांग्ला में नयनतारा या गुलफिरंगी, मराठी में सदाफूली और मलयालम में उषामालारि।
कई बिमारियों में करता है चिकित्सा का काम : विकसित देशों में रक्तचाप शमन की खोज से पता चला कि सदाबहार झाड़ी में यह क्षार अच्छी मात्रा में होता है। इसलिए अब यूरोप, भारत, चीन और अमेरिका के अनेक देशों में इस पौधे की खेती होने लगी है। अनेक देशों में इसे खांसी, गले की खराश और फेफड़ों के संक्रमण की चिकित्सा में इस्तेमाल किया जाता है। सबसे रोचक बात यह है कि इसे मधुमेह के उपचार में भी उपयोगी पाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सदाबहार में दर्जनों क्षार ऐसे हैं जो रक्त में शकर की मात्रा को नियंत्रित रखते है। जब शोध हुआ तो सदाबहार के अनेक गुणों का पता चला - सदाबहार पौधा बारूद - जैसे विस्फोटक पदार्थों को पचाकर उन्हें निर्मल कर देता है। यह कोरी वैज्ञानिक जिज्ञासा भर शांत नहीं करता, बल्कि व्यवहार में विस्फोटक-भंडारों वाली लाखों एकड़ जमीन को सुरक्षित एवं उपयोगी बना रहा है।
पौधा करेगा संजीवनी बूटी का काम : भारत में ही केंद्रीय औषधीय एवं सुगंध पौधा संस्थान द्वारा की गई खोजों से पता चला है कि सदाबहार की पत्तियों में विनिकरस्टीन नामक क्षारीय पदार्थ भी होता है जो कैंसर, विशेषकर रक्त कैंसर (ल्यूकीमिया) में बहुत उपयोगी होता है। आज यह विषाक्त पौधा संजीवनी बूटी का काम कर रहा है। बगीचों की बात करें तो 1980 तक यह फूलोंवाली क्यारियों के लिए सबसे लोकप्रिय पौधा बन चुका था, लेकिन इसके रंगों की संख्या एक ही थी-गुलाबी। 1998 में इसके दो नए रंग ग्रेप कूलर (बैंगनी आभा वाला गुलाबी जिसके बीच की आंख गहरी गुलाबी थी) और पिपरमिंट कूलर (सफेद पंखुरियां, लाल आंख) विकसित किए गए। वर्ष 1991 में रॉन पार्कर की कुछ नई प्रजातियां बाज़ार में आईं। इनमें से प्रिटी इन व्हाइट और पैरासॉल को आल अमेरिका सेलेक्शन पुरस्कार मिला। इन्हें पैन अमेरिका सीड कंपनी द्वारा उगाया और बेचा गया। इसी वर्ष कैलिफोर्निया में वॉलर जेनेटिक्स ने पार्कर ब्रीडिंग प्रोग्राम की ट्रॉपिकाना श्रृंखला को बाज़ार में उतारा।
अंग्रेजी में भी है कई नाम : इन सदाबहार प्रजातियों के फूलों में नए रंग तो थे ही, आकार भी बड़ा था और पंखुरियं एक दूसरे पर चढ़ी हुई थीं। 1993 में पार्कर र्जमप्लाज्म ने पैसिफका नाम से कुछ नए रंग प्रस्तुत किए। जिसमें पहली बार सदाबहार को लाल रंग दिया गया। इसके बाद तो सदाबहार के रंगों की झड़ी लग गई और आज बाजार में लगभग हर रंग के सदाबहार पौधों की भरमार है। यह फूल सुंदर तो है ही आसानी से हर मौसम में उगता है, हर रंग में खिलता है और इसके गुणों का भी कोई जवाब नहीं, शायद यही सब देखकर नेशनल गार्डेन ब्यूरो ने सन 2002 को इयर आफ़ विंका के लिए चुना। विंका या विंकारोजा, सदाबहार का अंग्रेजी नाम है।
स्रोत: http://m.dailyhunt.in/news/india/hindi/haribhoomi-epaper-hari/kainsar-samet-kai-bimariyo-ki-ek-dava-hai-sada-suhagan-janie-isaki-khasiyat-newsid-54802002
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औषधीय गुणों का भण्डार सजावटी पौधा सदाबहार
DrZakir Ali Rajnish 6 अप्रैल 2015
Catharanthus Roseus (Sadabahar) Medicinal Uses in Hindi
सदाबहार नाम के अनुसार ही सदाबहार (Evergreen) पौधा है, जिसको उगाने से आस-पास में सदैव हरियाली बनी रहती है। कसैले स्वाद के कारण तृष्णभोजी जानवर (herbivores) इस पौधे का तिरस्कार करते हैं। सदाबहार पौधों के आस-पास कीट, पतंगे, बिच्छू तथा सर्प आदि नहीं फटकते (शायद सर्पगंधा समूह के क्षारों की उपस्थिति के कारण) जिससे पास-पड़ोस में सफाई बनी रहती है। सदाबहार की पत्तियाँ विघटन के दौरान मृदा में उपस्थित हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट कर देती हैं।
औषधीय गुणों का भण्डार सजावटी पौधा सदाबहार
-डॉ. अरविन्द सिंह
क्या है सदाबहार? सदाबहार एकवर्षीय या बहुवर्षीय शाकीय वनस्पति है जिसे भारत में आमतौर से बाग-बगीचों में सजावटी पौधे के रूप में गमलों अथवा भूमि पर उगाया जाता है। यह पौधा अफ्रिका महाद्वीप के मेडागास्कर देश का मूल निवासी है, जहाँ यह उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन में जंगली अवस्था में उगता है। विराट जैवविविधता (megadiversity) वाले देश मेडागास्कर में इस वनस्पति की लगातार गिरती जनसंख्या के कारण अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (आ.यू.सी.एन.) ने इसे संकटग्रस्त (Endangered) घोषित कर लाल ऑकड़ा किताब (Red Data Book) में सूचीबद्ध किया है। स्थानान्तरी कृषि इसकी गिरती जनसंख्या का प्रमुख कारण है।
सदाबहार का वैज्ञानिक नाम कैथरेन्थस रोसीय्स (Catharanthus roseus) है। यह पुष्पीय पौधों के एपोसाइनेसी (Apocynaceae) कुल का सदस्य है। सदाबहार इसका हिन्दी नाम है जबकि अंग्रेजी में यह पेरिविन्कल (Periwinkle) नाम से जाना जाता है। हिन्दी में इसे सदाफली नाम से भी जाना जाता है। सदाबहार की अधिकतम ऊँचाई 1 मीटर तक होती है। पौधे की पत्तियाँ हरी एवं चमकदार होती हैं। इसके पुष्प गुलाबी, बैंगनी अथवा सफेद रंग के होते हैं। फल फालिकल (follicle) प्रकार का होता है, तथा एक फल में कई बीज होते हैं। आमतौर से सदाबहार को बागवानी हेतु बीज तथा कटिंग द्वारा तैयार किया जाता है।
पर्यावरणीय महत्व: सदाबहार नाम के अनुसार ही सदाबहार (Evergreen) पौधा है जिसको उगाने से आस-पास में सदैव हरियाली बनी रहती है। कसैले स्वाद के कारण तृष्णभोजी जानवर (herbivores) इस पौधे का तिरस्कार करते हैं। सदाबहार पौधों के आस-पास कीट, पतंगे, बिच्छू तथा सर्प आदि नहीं फटकते (शायद सर्पगंधा समूह के क्षारों की उपस्थिति के कारण) जिससे पास-पड़ोस में सफाई बनी रहती है। सदाबहार की पत्तियाँ विघटन के दौरान मृदा में उपस्थित हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट कर देती हैं।
आमतौर से विदेशी मूल के पौधे अपने आप को तेजी से विस्तारित कर खर-पतवार का रूप धारण कर लेते हैं, जिसके कारण बहुधा इन्हें ‘जैव प्रदूषक’ (biological pollutants) कहा जाता है, लेकिन सदाबहार में इस प्रकार की प्रवृत्ति नहीं पायी गयी है। अतः सदाबहार अन्य विदेशी मूल के पौधों की तरह पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक नहीं है। सदाबहार अपने पास पड़ोस में देसी अथवा स्थानीय पौधों की प्रजातिओं को पनपने देता है। जिससे जैवविविधता (bio-diversity) पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है।
औषधीय गुण एवं उपयोग:
आमतौर से औषधीय गुण सम्पूर्ण पौधे में पाया जाता है, लेकिन इसके जड़ों की छाल औषधीय दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण भाग होती है।- इस पौधे में विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण क्षार (alkaloids) पाये जाते हैं, जिनमें एजमेलीसीन (Ajmalicine), सरपेन्टीन (Serpentine), रेर्स्पीन (Reserpene), विण्डोलीन (Vindoline), विनक्रिस्टीन (Vincristine) तथा विनब्लास्टिन (Vinblastin) प्रमुख हैं।
- एजमेलीसीन, सरपेन्टीन तथा रेसर्पीन क्षार सर्पगन्धा समूह से सम्बन्धित हैं।
सदाबहार की जड़ों में रक्त शर्करा को कम करने की विशेषता होती है। अतः पौधे का उपयोग मधुमेह के उपचार में किया जा सकता है।दक्षिण अफ्रीका में पौधे का उपयोग घरेलू नुस्खा (Folk Remedy) के रूप में मधुमेह के उपचार में होता रहा है।पत्तियों के रस का उपयोग हड्डा डंक/ततयै का डंक (Wasp Sting) के उपचार में होता है।जड़ का उपयोग उदर टानिक के रूप में भी होता है।पत्तियों का सत्व मेनोरेजिया (Menorrhagia) नामक बिमारी के उपचार में दिया जाता है। इस बिमारी में असाधारण रूप से अधिक मासिक धर्म होता है।एजमेलीसीन, सरपेन्टीन तथा रेसर्पीन नामक क्षारों में शामक तथा स्वापक गुण पाये जाते हैं। इनमें केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र को शान्त करने की क्षमता होती है।अतः पौधे की जड़ों की छाल का उपयोग उच्चरक्तचाप तथा मानसिक विकारों जैसे अनिद्रा, अवसाद, पागलपन तथा चिन्तारोग (Anxiety) के उपचार में किया जा सकता है।इसके अतिरिक्त इनमें मांशपेशियों को खिंचाव को कम करने की क्षमता होती है। अतः जड़ की छाल को दर्दनाशक के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है।इन क्षारों में हैजा रोग के जीवाणु वाइब्रो कालेरी (Vibrio cholorae) के विकास को अवरूद्ध करने की क्षमता होती है।क्षारों में जीवाणुनाशक गुण पाये जाते हैं। इसलिए पत्तियों का सत्व का उपयोग ‘स्टेफाइलोकाकल’ (Staphylococcal) तथा ‘स्टेप्टोकाकल’ (Streptococcal) संक्रमण के उपचार में होता है। आमतौर से ये दोनों प्रकार के संक्रमण मनुष्य में गले (Throat) एवं फेफड़ों (Lungs) को प्रभावित करते हैं।- पत्तियों में मौजूद विण्डोलीन नामक क्षार डीप्थिरिया के जीवाणु कारिनेबैक्टिीरियम डिप्थेरी Corynebacterium Diptherae) के खिलाफ सक्रिय होता है। अतः पत्तियों के सत्व का उपयोग डिप्थिीरिया रोग के उपचार में किया जा सकता है।
- पौधे के जड़ का उपयोग सर्प, बिच्छू तथा कीट विषनाशक (antidote) के रूप में किया जा सकता है।
- उपर्युक्त के अतिरिक्त आज सदाबहार ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है क्योंकि इसमें कैंसररोधी (Anticancer) गुण पाये जाते हैं। सदाबहार से प्राप्त विनक्रिस्टीन तथा विनब्लास्टीन नामक क्षारों का उपयोग रक्त कैंसर (Leukaemia) के उपचार में किया जा रहा है।
निष्कर्ष:
सदाबहार विदेशी मूल का पौधा होने के कारण भारत में जंगली अवस्था में नहीं पाया जाता और इसका उपयोग केवल सजावटी पौधे के रूप में विशेषकर देश के शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में न तो यह पौधा उगाया जाता है न ही इस पौधे के औषधीय महत्व के विषय में कोई विशेष जानकारी है। यहाँ तक कि शहरी क्षेत्रों में भी इस पौधे को उगाने वाले लोगों को इसके औषधीय गुणों के ज्ञान का सर्वथा अभाव है।
आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों में इस औषधीय पादप के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। जिससे इस पौधे को कृषि के जरिए विस्तार मिल सके, क्योंकि यह पौधा देश में सर्पगन्धा (Rauvolfia serpentina) का आदर्श विकल्प बनने की क्षमता रखता है जो संकटग्रस्त प्रजाति होने के कारण दुर्लभ है।

सर्पगंधा की खेती की तुलना में सदाबहार की खेती सुगमता से की जा सकती है। अतः सदाबहार का औषधीय उपयोग सर्पगन्धा के विकल्प के तौर पर उच्च रक्तचाप, मानसिक विकार (चिन्तारोग, अनिद्रा, अवसाद, पागलपन) आदि के उपचार के साथ-साथ विषनाशक के रूप में भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, सदाबहार मधुमेह, डिप्थिरीया, हैजा जैसी बिमारियों के उपचार में भी कारगर साबित हो सकता है।
स्रोत : http://www.scientificworld.in/2015/04/sadabahar-medicinal-plant-hindi.html
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लेखक परिचय:
डॉ. अरविंद सिंह वनस्पति विज्ञान विषय से एम.एस-सी. और पी-एच.डी. हैं। आपकी विशेषज्ञता का क्षेत्र पारिस्थितिक विज्ञान है। आप एक समर्पित शोधकर्ता हैं और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में अब तक आपके 4 दर्जन से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से प्रभावित भूमि का पुनरूत्थान आपके शोध का प्रमुख विषय है। इसके अतिरिक्त आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मुख्य परिसर की वनस्पतियों पर भी अनुसंधान किया है। आपके अंग्रेज़ी में लिखे विज्ञान विषयक आलेख 'Science Log'पर पढ़े जा सकते हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है- 
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Patrika news network Posted: 2015-10-12 11:16:28 IST Updated: 2015-11-05 11:46:01 IST
संक्षिप्त विवरण:
कैंसर ऐसी बीमारी है, जिसका पता सामान्यत: रोग बढऩे के बाद ही चल पाता है। इस स्थिति में सर्जरी ही बीमारी के विकल्प के रूप में सामने आती है। आयुर्वेद शोधकर्ताओं ने सफेद फूल वाले सदाबहार पौधे को इस बीमारी में प्रभावी माना है।
जयपुर: कैंसर ऐसी बीमारी है जिसका पता सामान्यत: रोग बढऩे के बाद ही चल पाता है। इस स्थिति में सर्जरी ही बीमारी के विकल्प के रूप में सामने आती है। आयुर्वेद शोधकर्ताओं ने सफेद फूल वाले सदाबहार पौधे को इस बीमारी में प्रभावी माना है।
इस तरह हैं कैंसर में लाभकारी: ये पत्तियां कैंसररोधी हैं। ये रोग बढ़ाने वाली कोशिकाओं के विकास को रोकती हैं साथ ही इस दौरान क्षतिग्रस्त हो गई कोशिकाओं को फिर से सेहतमंद बनाने का काम करती हैं। यदि इसकी पत्तियों से बने रस को कैंसर की पहली स्टेज वाले मरीज को दिया जाए तो उसके रोग के बढऩे की आशंका कम हो जाती है। वहीं दूसरी व आखिरी स्टेज के दौरान इसके प्रयोग से मरीज की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होकर उसके जीवित रहने की अवधि बढ़ सकती है।
अन्य रोगों में भी प्रभावी: डायबिटीज के मरीजों में ये एंटीडायबिटिक का काम करती हैं। ये रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखती हैं। इनका सेवन स्वस्थ लोग भी कर सकते हैं। इससे उनका प्रतिरोधक तंत्र मजबूत होता है। सामान्य तासीर का होने की वजह से इसकी पत्तियों का प्रयोग हृदय व हाई बीपी के मरीज भी कर सकते हैं।
- डॉ. गौरी शंकर शर्मा, प्रधानाचार्य, राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, उदयपुर
स्रोत : http://rajasthanpatrika.patrika.com/story/health/health-benifits-and-medicinal-values-of-sadabahar-1373835.html
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घरों में उगाये जाने एक साधारण से पोधे जिसे हम सदाबहार भी बोलते है अपने आप में औषधि होता है. सभी आयुर्वेद के जानकार या हर्बल जानकार इसके बहत सारे गुण बताते है आइये जानते है सदाबहार (periwinkle plant) के कुछ अनसुने health tips
benefits of periwinkle plant in hindi
sadabahar ka podha - ब
स्रोत : http://ayurveda.vastu-shastra.org/2016/03/sadabahar-plant-ke-fayde.html
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Tuesday, 26 August 2014
मधुमेह रोग से राहत पाने के लिए सदाबहार
मधुमेह के लिए घरेलू उपचार
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1- खीरा, करेला, और टमाटर एक-एक की संख्या में लेकर जूस निकालकर, सुबह खाली पेट पीने से मधुमेह नियन्त्रित होता है।
2- जामुन की गुठली का पॉवडर करके, एक-एक चम्मच सुबह-शाम खाली पेट पानी के साथ लेने से मधुमेह नियन्त्रित होता है।
3-नीम के 7 पत्ते सुबह खाली पेट चबाकर अथवा पीसकर पानी के साथ लेने से मधुमेह में आराम मिलता है|
साथ में कपालभांति प्राणायाम व मण्डूकासन भी अवश्य करें , शीघ्र लाभ होगा|
स्रोत : http://drinkeatright.blogspot.in/2014/08/blog-post_54.html
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क्या आप ल्यूकेमिया (leukemia) और लिम्फोमा (lymphoma) जैसे कैंसर का शिकार हैं?
Editorial Team Dec 15, 2015 at 01:30 pm
Read this in English.
स्वास्थ्य लाभ:
विंका फूल का कैंसर के कुछ प्रकार जैसे ल्यूकेमिया (leukemia) और लिम्फोमा (lymphoma) के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है। इस फूल से साइटोटोक्सिक (Cytotoxic) प्रभाव पड़ता है, जो इसे कैंसर के खिलाफ प्रभावी बनाता है। इसे अन्य दवाओं में मिलाकर कीमोथेरेपी (Chemotherapy) में भी प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग एंटी-माइक्रोबियल (Anti-Microbial), एंटी हाइपरटेंसिव (Anti-Hypertensive) और एंटी डायबिटीक (Anti-Diabetic) के खिलाफ किया जाता है।
इसका उपयोग कैसे करें? विंका अल्कालोइड (Vinca Alkaloid) दवा टिंचर के रूप में उपलब्ध होती है। इस दवा का उपयोग केवल डॉक्टर की देखरेख में किया जाना चाहिए, क्योंकि ये दवा अत्यधिक प्रभावशाली होती है और इसे ज्यादा मात्रा में लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
सक्रिय तत्व: विंका में एल्कालोइड्स (alkaloids) जैसे कई तत्व शामिल होते हैं। ये तत्व हैं- विनब्लाटिन (vinblastine), विन्क्रिस्टाईन (vincristine), विनराइडिन (vineridine), विनकैमजिन (vincamajine), विनबरनाइन (vinburnine) और विनकैमिनल (vincaminol)।
साइड इफेक्ट : सदाबहार में कई सारे गुण होते हैं, लेकिन इसके साथ कुछ साइड इफेक्ट भी होते हैं। इसके उपयोग के बाद कई बार उल्टी, सिर दर्द, मतली, खून बहना और थकान आदि समस्याएं भी हो सकती हैं।
मूल स्रोत - Vinca: Health benefits and side effects
अनुवादक – Usman Khan
चित्र स्रोत – Shutterstock
स्रोत : http://www.thehealthsite.com/hindi/diseases-and-conditions-article-in-hindi-health-benefits-and-side-effects-of-vinca-in-hindi-u1215/
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सदाबहार व नयनतारा नाम से लोकप्रिय यह फूल न केवल सुंदर और आकर्षक है, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर माना गया है। इसे कई देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। पूरे भारत और संभवतः पाया जाने वाला यह अत्यंत दृढ़ प्रकृति व क्षमता वाला पौधा है। उत्तरी भारत में इसे सदाबहार व नयनतारा कके नाम से जाना जाता है। सदाबहार छोटा झाड़ीनुमा पौधा है इसके गोल पत्ते थोड़ी लम्बाई लिए अंडाकार व अत्यंत चमकदार व चिकने होते हैं। एक बार पौधा उगने के बाद आसपास अन्य पौधे अपने आप उगने लगते है। । पत्तो व फल की सतह थोड़ी मोटी होती है । इसके चिकने मोटे पत्तों के कारण ही पानी का वाष्पीकरण कम होता है और पानी की आवश्यकता बहुत कम होती है। सदाबहार का फूल सुंदर होने मुंह व नाक से रक्तस्नव होने पर इसके प्रयोग की सलाह दी जाती है। अंगों की जकड़न में इसका प्रयोग किया जाता है। वैसे स्कर्वी, अतिसार, गले में दर्द, टांसिल्स में सूजन, रक्तस्नव आदि रोगों में इसका प्रयोग किया जाता है। भारत में प्राकृतिक चिकित्सक मधुमेह रोगियों को इसके श्वेत फूल का प्रयोग सुबह खाली पेट करने की सलाह देते हैं।
औषधीय गुण- सदाबहार का उपयोग खांसी, गले की खराश और फेफड़ों के संक्रमण में उपयोग किया जाता है । इसे मधुमेह के उपचार में उपयोगी पाया गया है, क्योंकि इसमें दर्जनों क्षार ऐसे पाए गए हैं जो कि उनसे रक्त शकरा की मात्रा को नियत्रिंत किया जा सकता है। सदाबहार की पत्तियों में विनिकरस्टीन नामक क्षारीय पदार्थ होता है जो कैंसर, विशेषकर रक्त कैंसर में बहुत उपयोगी होता है। आज यह विषाक्त पौधा संजीवनी बूटी का काम कर रहा है तथा फूलों वाली क्यारियों के लिए सबसे लोकप्रिय पौधा बन चुका है। यह फूल सुंदर तो है ही आसानी से हर मौसम में उगता है।
December 13th, 2014
स्रोत : http://www.divyahimachal.com/2014/12/%E0%A4%94%E0%A4%B7%E0%A4%A7%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%BE/
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Allergy,
Diabetes,
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सदाफूली,
सदाबहार
Sunday, September 04, 2016
--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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अतिसार
अतिसार-Diarrhea
अतृप्त
अतृप्त दाम्पत्य
अत्यंत असहिष्णुता
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अदरख
अंधश्रृद्धा
अध्ययन
अनिद्रा
अपच
अपराजिता
अपराधबोध
अफरा
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अमरूद
अमृता
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अरणी
अरण्ड
अरण्डी
अरलू
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अर्श रोग-बवासीर-Hemorrhoids-Piles
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असली
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अस्थमा-दमा-Asthma
आइरन
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आत्महत्या
आंत्र कृमि
आंत्रकृमि-Helminth
आंत्रिक ज्वर-टायफाइड-Typhoid fever
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आधासीसी
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आमला
आमवात
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आयुर्वेद
आयुर्वेदिक
आयुर्वेदिक उपचार
आयुर्वेदिक औषधियां
आयुर्वेदिक सीरप-Ayurvedic Syrup
आयुर्वेदिक-Ayurvedic
आरोग्य
आँव
आंव
आंवला
आंवला जूस
आंवला रस
आशावादी-Optimistic
आसन
आसान प्रसव-Easy Delivery
आहार चार्ट
आहार-Food
आॅपरेशन
आॅर्गेनिक
आॅर्गेनिक कौंच
इच्छा-शक्ति
इन्द्रायण
इन्फ्लुएंजा
इमर्जेंसी में होम्योपैथी
इमली-Tamarind Tree
इम्युनिटी
इलाज
इलाज का कुल कितना खर्चा
इलायची
उच्च रक्तचाप
उच्च रक्तचाप-High Blood Pressure-Hypertension
उत्तेजक
उत्तेजना
उदर शूल-Abdominal Haul
उदासी
उन्माद-Mania
उपवास
उम्र
उल्टी
ऊर्जा
एक्जिमा
एक्यूप्रेशर
एग्जिमा
एजिंग-Aging
एंटी ऑक्सीडेंट्स
एंटी-ओक्सिडेंट
एंटीऑक्सीडेंट
एण्टी-आॅक्सीडेंट
एनजाइना
एनीमिया
एमिनो एसिड
एरंड
एलर्जी
एलर्जी-Allergy
एलोवेरा
एलोवेरा जूस
एल्यूमीनियम
ऐंठन
ऐलोपैथ
ऐसीडिटी
ऑर्गेनिक
ओमेगा 3 के स्रोत
ओमेगा-3
ओर्गेनिक
औषध-Drug
औषधि सूची-Drug List
औषधियों के नुकसान-Loss of drugs
कचनार
कचनार-Bauhinia Purpurea
कटुपर्णी
कड़वाहट
कंडोम
कद्दू
कनेर
कपास-COTTON
कपिकच्छू
कपूरीजड़ी
कफ
कब्ज
कब्ज़
कब्ज-कोष्ठबद्धता-Constipation
कब्ज. Cucumber
कब्जी
कमजोरी
कमर
कमर दर्द
कमेड़ा
करेला
कर्ण वेदना
कर्णरोग
कष्टार्तव-Dysmenorrhea
कांच निकलना
काजू
कान
कानून सम्मत
काम
काम शक्ति
कामवाण पाउडर
कामशक्ति
कामशक्ति-Sexual power
कामेच्छा
कामोत्तेजना
कायाकल्प
कार्बोहाइड्रेट
कार्बोहाइड्रेट-Carbohydrates
काला जीरा
काला नमक
काली जीरी
काली तुलसी
काली मिर्च
काले निशान
कास-खांसी-Cough
किडनी
किडनी संक्रमण
किडनी स्टोन
कीड़े
कीमोथेरेपी
कुकरौंधा
कुकुंदर
कुटकी-Black Hellebore
कुबडापन
कुमेड़ा
कुल्थी
कुल्ला
कुष्ट
कुष्ठ
कृमि
केला
केसर
कैफीन-Caffeine
कैलोरी
कैलोरी चार्ट
कैलोरी-Calories
कैवांच
कैविटी
कैंसर
कॉफी
कॉफ़ी
कॉलेस्ट्रॉल
कोंडी घास
कोढ़
कोबरा
कोलेस्ट्रॉल
कोलेस्ट्रॉल-Cholesterol
कोलेस्ट्रोल
कौंच
कौमार्य
क्रियाशीलता
क्रोध
क्षय रोग-Tuberculosis
क्षारीय तत्व
क्षुधानाश
खजूर
खजूर की चटनी
खनिज
खरबूजा-Musk melon
खरेंटी
खरैंटी शिलाजीत
खाज
खांसी
खिरेंटी
खिरैटी
खीप
खीरा
खुजली
खुशी-Joy
खुश्की
खुश्बू
खोया
गंजापन-Baldness
गठिया
गठिया-Arthritis
गठिया-Gout
गड़तुम्बा
गंडा-ताबीज
गंध
गन्ने का रस
गरमा गरम
गर्भ निरोधक
गर्भधारण
गर्भपात
गर्भवती
गर्भवती कैसे हों?
गर्भावस्था
गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy
गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy
गर्भाशय
गर्भाशय भ्रंश
गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy
गर्म पानी
गर्मी
गर्मी-Heat
गलगण्ड
गाजर
गाजवां
गांठ
गाँठ-Knot
गारंटी
गारण्टेड इलाज
गाल ब्लैडर
गिलोय
गिल्टी
गुड़हल
गुंदा
गुदाद्वार
गुदाभ्रंश
गुम्मा
गुर्दे
गुलज़ाफ़री
गुस्सा
गृध्रसी
गृह-स्वामिनी
गेदुआ की छाछ
गैस
गैस्ट्रिक
गैहूं का जवारा
गोक्षुरादि चूर्ण
गोखरू
गोखरू (LAND CALTROPS)
गोंद कतीरा-Hog-Gum
गोंदी
गोभी-Cabbage
गोरख मुंडी
गोरखगांजा
गोरखबूटी
गोरखमुंडी
ग्रीन-टी
घमोरी
घरेलु नुस्खे
घाघरा
घाव
चकवड़
चक्कर
चपाती
चमत्कारिक सब्जियां
चरित्र
चर्बी
चर्म
चर्म रोग
चर्मरोग
चाय
चाय-Tea
चालीस के पार-Forty Across
चिकनगुनिया
चिकित्सकीय
चिटकन
चिंतित
चिरायता-Absinth
चिरोटा
चुंबन
चोक
चौलाई
छपाकी
छरहरी काया
छाछ
छाजन बूटी
छाले
छींक
छीकें
छुअ
छुआरा
छुहारा
छोटा गोखरू
छोटा धतूरा
छोटी हरड़
जंक फूड
जकवड़
जख्म
जंगली तिल्ली
जंगली तुलसी
जंगली पेड़
जंगली मिर्ची
जंगली-कटीली चौलाई
जटामांसी-Spikenard
जलजमनी
जलन
जलोदर रोग-Ascites Disease
जवारा
जवारे
जवासा-Alhag
जहर
जामुन का जूस
जायफल
जिगर
जीरा
जीवन रक्षक
जीवनी शक्ति
जुएं
जुकाम
जुदाई
जुलाब
जूएं
जूस
जोड़ों के दर्द
जोड़ों में दर्द
जौ
ज्यूस
ज्योति
ज्वर
ज्वर-Fiver
झाइयाँ
झांईं
झाड़-फूंक
झुर्रियाँ
झुर्रियां
झुर्री
झूठे दर्द
टमाटर का रस
टमाटर-Tomatoes
टाइफाइड
टाटबडंगा
टायफायड
टूटी हड्डी
टॉन्सिल
टोटला
ट्यूमर
ठंड
ठंडापन
ठेकेदार डॉक्टर
डकार
डकारें
डायबिटीज
डायरिया
डिग्री फ़ारेनहाइट
डिग्री सेल्सियस
डिजिसेक्सुअल
डिटॉक्सीफाई
डिटॉक्सीफिकेशन
डिनर
डिप्रेशन
डिब्बाबंद भोजन
डिलेवरी
डीकामाली
डीगामाली
डेंगू
डेंगू-Dengue
डॉ. निरंकुश
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
डॉ. मीणा
ढकार
ढीलापन
ढीली योनि
तकलीफ का सही इलाज
तंत्र-मंत्र
तम्बाकू
तरबूज-Watermelon
तलाक
ताकत
तिल
तिल्ली
तुंबा
तुंबी
तुम्बा
तुलसी
तेल
त्रिदोषनाशक
त्रिफला
त्वचा
त्वचा रोग
थकान
थाईरायड
थायरायड-Thyroid
थायरॉइड
दण्डनीय अपराध
दंत वेदना
दन्तकृमि
दन्तरोग
दमा
दर वेदना
दरार
दर्द
दर्द निवारक
दर्द निवारक दवा
दर्दनाक
दस्त
दही
दाग-धब्बे-Stains-Spots
दाढ़
दांत
दांतो में कैविटी-Teeth Cavity
दाद
दाम्पत्य
दाम्पत्य विवाद सलाहकार
दाम्पत्य-Conjugal
दाल
दालचीनी
दालें
दिमांग
दिल
दीर्घायु
दु:खी
दुर्गंध
दुर्बलता
दुष्प्रभाव
दुष्प्रभावरहित
दूध
दूध वृद्धि
दूधी
दूधी-Milk Hedge
दृष्टिदोष
दो मन
द्रोणपुष्पी
द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes
धड़कन
धनिया बीज
धनिया-Coriander
धमासा
धात
धातु
धातु पतन
धार्मिक
धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं?
धैर्यहीन
नज़ला
नपुंसक
नपुंसकता
नाइट्रिक एसिड
नाक
नाखून
नागबला
नागरमोथा
नाडी हिंगु
नाड़ी हिंगु (डिकामाली)
नामर्दी
नारकीय पीड़ा
नारियल
नाश्ता
निमोनिया
निम्न रक्तचाप
निम्बू
नियासिन
निराश
निरोगधाम
निर्गुण्डी
निर्गुन्डी
निष्कपट स्नेह
निष्ठा
निसोरा
नींद
नींबू
नींबू-Lemon
नीम-azadirachta indica
नुस्खे
नुस्खे-Tips
नेगड़
नेत्र रोग
नेुचरल
नैतिक
नॉर्मल डिलेवरी
नोनिया
नौसादर
न्युमोनिया-Pneumonia
न्यूरॉन्स
पक्षघात
पंचकर्म
पढ़ने में मन लगेगा
पंतजलि
पत्तागोभी-CABBAGE
पत्थर फोड़ी
पत्थरचट्टा
पत्नी
पथरी
पदार्थ
पनीर
पपीता
पपीता-CARICA PAPPYA
पमाड
परदेशी लांगड़ी
परम्परागत चिकित्सा
परहेज
पराठा
परामर्श
परिस्थिति
पवाड़
पवाँर
पाइल्स
पाक-कला
पाचक
पाचन
पाचनतंत्र
पाचनशक्ति
पाठक संख्या 16 लाख पार
पाठक संख्या पंद्रह लाख
पायरिया
पारदर्शिता
पारिजात
पालक
पालक-Spinach
पित्त
पित्ताशय
पित्ती
पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne
पिरामिड
पीलिया
पीलिया-Jaundice
पीलिया-कामला-Jaundice
पुआड़
पुदीना
पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava
पुरुष
पुंसत्व
पेचिश
पेट के कीड़े
पेट दर्द
पेट में गैस
पेट रोग
पेड़
पेद दर्द
पेरिकिटो सेसिल
पेशाब
पेशाब में रुकावट
पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy
पोष्टिक लड्डू
पौधे
पौरुष
पौरुष ग्रंथि
पौष्टिक रागी रोटी
प्याज-Onion
प्यास
प्रजनन
प्रतिरक्षा
प्रतिरक्षा प्रणाली
प्रतिरोधक
प्रतिरोधक-Resistance
प्रदर
प्रमेह
प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery
प्रसव
प्रसव सुरक्षा चक्र
प्रसव-पीड़ा
प्रसूति
प्राणायाम
प्रेग्नेंसी-Pregnancy
प्रेम
प्रेमरस
प्रेमिका
प्रेमी
प्रोटीन
प्रोटीन का कार्य
प्रोटीन के स्रोत
प्रोस्टेट
प्रोस्टेट कैंसर
प्रोस्टेट ग्रंथि
प्रोस्टेट ग्रन्थि
प्लीहा
प्लूरिसी-Pleurisy
प्लेटलेट्स
फंगल
फटन
फफूंद-Fungi
फरास
फल
फाइबर
फिटकरी
फुंसी-Pimples
फूलगोभी-CAULIFLOWER
फेंफड़े
फेरम फॉस
फैट
फैटी लीवर
फोटोफोबिया
फोड़ा
फोड़े-Boils
फोरप्ले
फोलिक एसिड
फ्लू
फ्लू-Flu
फ्लेक्स सीड्स
बकायन
बकुल
बड़ी हरड़
बथुआ
बथुआ पाउडर
बथुआ-White Goose Foot
बदबू
बंध्यापन
बबूल-ACACIA
बरसाती बीमारियाँ
बरसाती बीमारियां
बलगम
बलवृद्धि
बला
बलात्कार
बवासीर
बहरापन
बहुनिया
बहुमूत्रता-
बांझपन
बादाम-Almonds
बादाम.
बाल
बाल झड़ना
बाल झडऩा-Hair Falling
बिना सिजेरियन मां बनें
बिवाई
बीजबंद
बीड़ी
बीमारियों के अनुसार औषधियां
बीमारी
बील
बुखार
बूंद-बूंद पेशाब
बेल
बेली
बैक्टीरिया
बॉयोकैमी
ब्रह्मदण्डी
ब्रेस्ट ग्रोथ
ब्लड प्रेशर
ब्लैक मेलिंग
ब्लॉकेज
भगंदर
भगंदर-Fistula-in-ano
भगनासा
भगन्दर
भगोष्ठ
भड़भांड़
भय
भविष्य
भस्मक रोग
भावनात्मक
भुई आंवला-Phyllanthus Niruri
भूई आमला
भूई आंवला
भूख
भूख बढ़ाने
भूत-प्रेत
भूमि
भूमि आंवला
भोजनलीवर
मकोय
मकोय-Soleanum nigrum
मक्का
मक्का के भुट्टे
मंजीठ
मटर-PEA
मंद दृष्टि
मंदाग्नि
मदार
मधुमेह
मधुमेह-Diabetes
मन्दाग्नि-Dyspepsia
मरुआ
मरोड़
मर्द
मर्दाना
मलाशय
मलेरिया
मलेरिया (Malaria)
मवाद
मसाले
मस्तिष्क
मस्से
मस्से-WARTS
महंगा इलाज
महत्वपूर्ण लेख
महाबला
माइग्रेन
माईग्रेन
माईंड सैट
माजूफल
मानवव्यवहार
मानसिक
मानसिक लक्षण
मानसिक-Mental
मानिसक तनाव-Mental Stress
मायोपिया
मासिक
मासिक-धर्म
मासिकधर्म
मासिकस्राव
माहवारी
मिनरल
मिर्गी
मिर्च-Chili
मीठा खाने की आदत
मुख मैथुन-ओरल सेक्स-Oral Sex
मुख्य लक्षण
मुधमेह
मुलहठी
मुलेठी
मुहाँसे
मूँगफली
मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders
मूत्र
मूत्र असंयमितता
मूत्र में जलन-Burning in Urine
मूत्ररोग
मूत्राशय
मूत्रेन्द्रिय
मूर्च्छा (Unconsciousness)
मूली
मूली कर रस
मृत्यु
मृत्युदण्ड
मेथी
मेथी दाना
मेंहदी
मैथुन
मोगरा (Mogra)
मोटापा
मोटापा-Obesity
मोतियाबिंद
मौत
मौलसिरी
मौसमी बीमारियां
यकृत
यकृत प्लीहा
यकृत वृद्धि-Liver Growth
यकृत-लीवर-जिगर-Lever
यूपेटोरियम परफोलियेटम
यूरिक एसिड लेबल
योग विज्ञापन
योन
योन संतुष्टि
योनि
योनि ढीली
योनि शिथिल
योनि शूल-Vaginal Colic
योनि संकोचन
योनिद्वारा
योनिभ्रंश
योनी
योनी संकोचन
यौन
यौन आनंद
यौन उत्तेजक पिल्स (sexual stimulant pills)
यौन क्षमता
यौन दौर्बल्य
यौन शक्तिवर्धक
यौन शिक्षा
यौन समस्याएं
यौनतृप्ति
यौनशक्ति
यौनशिक्षा
यौनसुख
यौनानंद
यौनि
रक्त प्रदर (Blood Pradar)
रक्त रोहिड़ा-TECOMELLA UNDULATA
रक्तचाप
रक्तपित्त
रक्तशोधक
रक्ताल्पता
रक्ताल्पता (एनीमिया)-Anemia
रस-juices
रातरानी Night Blooming Jasmine/Cestrum nocturnum
रामबाण
रामबाण औषधियाँ-Panacea Medicines
रुक्षांश
रूढिवादी
रूसी
रूसी मोटापा
रेचक
रेठु
रोग प्रतिरोधक
रोबोट सेक्स
रोमांस
लकवा
लक्षण
लक्ष्मी
लंच
लसोड़ा
लस्सी
लहसुन
लहसुन-Garlic
लाइलाज
लाइलाज का इलाज
लाक्षणिक इलाज
लाक्षणिक जानकारी
लाभ
लिंग
लिंग प्रवेश
लिसोड़ा
लीकोरिया
लीवर
लीवर सिरोसिस
लीवर-Liver
लू-hot wind
लैंगिक
लोनिया
लौकी
लौंग की चाय
ल्युकोरिया
ल्यूकोरिया
ल्यूज योनी
वजन
वज़न
वजन कम
वजन बढाएं-Weight Increase
वन तुलसी
वन/जंगली तुलसी
वनौषधियाँ
वमन
वमन विकृति-Vomiting Distortion
वसा
वात
वात श्लैष्मिक ज्वर
वात-Rheumatism
वायरल
वायरल फीवर
वायरल बुखार-Viral Fever
वासना
विचारतंत्र
विटामिन
विधारा
वियाग्रा-Viagra
वियोग
विरह वेदना
विलायती नीम
विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध
विवाहेत्तर सम्बंध
विश्वास
विष
विष हरनी
विषखपरा
वीर्य
वीर्य वृद्धि
वीर्यपात
वृक्कों (गुर्दों) में पथरी-Renal (Kidney) Stone
वृक्ष
वैज्ञानिक
वैधानिक
वैवाहिक जीवन
वैवाहिक जीवन-Marital
वैवाहिक रिश्ते
वैश्यावृति
व्याकुल
व्यायाम
व्रण
शंखपुष्पी
शरपुंखा
शराब
शरीफा-सीताफल-Custard apple
शर्करा
शलगम-Beets
शल्यक्रिया
शहद
शहद-Honey
शारीरिक
शारीरिक रिश्ते
शिथिलता
शीघ्र पतन
शीघ्रपतन
शीस
शुक्राणु
शुक्राणु-Sperm
शुक्राणू
शुगर
शोक
शोथ
शोध
श्योनाक
श्रेष्ठतर
श्वास
श्वांस
श्वेत प्रदर
श्वेत प्रदर-Leucorrhea
श्वेतप्रदर
षड़यंत्र
संकुचन
संकोच
संक्रमण
संक्रमित
संक्रामक
संखाहुली
सगतरा
संतरा-Orange
संतान
संतुष्टि
सत्यानाशी
सदा सुहागन
सदाफूली
सदाबहार
सदाबहार चूर्ण
सनबर्न
सफ़ेद दाग
सफेद पानी
सफेद मूसली
सब्जि
सब्जी
संभालू
संभोग
समर्पण-Dedication
सरकार को सुझाव
सरफोंका
सरहटी
सर्दी
सर्दी-जुकाम
सर्पक्षी
सर्पविष
सलाद
संवाद
संवेदना
सहदेई
सहदेवी
सहानभूति
साइटिका
साइटिका-Sciatica
साइड इफेक्ट्स
साबूदाना-Sago
सायटिका
सिगरेट
सिजेरियन
सिर दर्द
सिर वेदना
सिरका
सिरदर्द
सिरोसिस
सी-सेक्शन
सीजर डिलेवरी
सुगर
सुदर्शन
सुहागा
सूखा रोग
सूजन
सेक्स
सेक्स उत्तेजक दवा
सेक्स परामर्श-Sex Counseling
सेक्स पार्टनर
सेक्स पावर
सेक्स समस्या
सेक्स हार्मोन
सेक्स-Sex
सेंधा नमक
सेब
सेमल-Bombax Ceiba
सेल्स
सोजन-सूजन
सोंठ
सोना पाठा
सोयाबीन
सोयाबीन (Soyabean)
सोयाबीन-Soyabean
सोराइसिस
सोरियासिस-Psoriasis
सौंठ
सौंदर्य
सौंदर्य-Beauty
सौन्दर्य
सौंफ
सौंफ की चाय
सौंफ-Fennel
स्किन
स्खलन
स्तन
स्तन वृद्धि
स्तनपान
स्तम्भन
स्त्री
स्त्रीत्व
स्त्रैण
स्पर्श
स्मृति-लोप
स्वप्न दोष
स्वप्नदोष
स्वप्नदोष-Night Fall
स्वभाव
स्वभावगत
स्वरभंग
स्वर्णक्षीरी
स्वस्थ
स्वास्थ्य
स्वास्थ्य परामर्श
स्वास्थ्य रक्षक सखा
हजारदानी
हड़जोड़
हड्डी
हड्डी में दर्द
हड्डी संक्रमण
हड्डीतोड़ ज्वर
हड्डीतोड़ बुखार
हरड़
हरसिंगार
हरी दूब-CREEPING CYNODAN
हरीतकी
हर्टबर्न
हस्तमैथुन
हस्तमैथुन-Masturbation
हाई बीपी
हाथ-पैर नहीं कटवायें
हारसिंगार
हालात
हिचकी
हिचकी-Hiccup
हिमोग्लोबिन-hemoglobin
हिस्टीरिया
हिस्टीरिया-Hysteria
हींग
हीनतर
हुरहुर
हुलहुल
हृदय
हृदय-Heart
हेपेटाइटिस
हेपेटाईटिस
हेल्थ टिप्स-Health-Tips
हेल्थ बुलेटिन
हैजा
हैपीनेस-Happiness
हैल्थ
होम केयर टिप्स-Home Care Tips
होम्यापैथ
होम्योपैथ
होम्योपैथिक
होम्योपैथिक इलाज
होम्योपैथिक उपचार
होम्योपैथी
होम्योपैथी-Homeopathy


