Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)

Health Care Friend and Marital Dispute Consultant

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बवासीर/पाइल्स-Hemorrhoids/Piles:

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।




मुख्यत: बवासीर दो प्रकार को होता है-खूनी बवासीर और बादी बवासीर। यदि मल के साथ खून बूंद-बूंद कर आये तो उसे खूनी बवासीर कहते हैं। यदि मलद्वार के बाहर या मलद्वार के आसपास की नसों में या मलद्वार के अंदर सूजन हो और मटर या अंगूर के दानों के समान मस्से बाहर निकलने लगें या गुदा में अंदर मस्से या सोजन अनुभव होने लगे। ऐसे मस्से जो मलत्याग के समय गुदा से बाहर भी आ जाते हों। ऐसी स्थिति में मल के साथ खून न आए तो सामान्यत: इसे बादी बवासीर कहा जाता है।

जब बवासीर में मलद्वार पर मस्से निकल आते हैं और उनमें सूजन और जलन होने के साथ अधिक पीड़ा भी होती हो। बैठने-उठने पर मस्सों में तेज दर्द होता हो। उनमें से रक्त या चिकना सा पदार्थ निकलने लगे। अनेक बार बिना दर्द के भी मल के साथ या ​मलत्योग के बाद या उठने-बैठने पर गुदाद्वार से रक्त निकलने लगे तो सामान्यत: इसे खूनी बवासीर कहते हैं। बवासीर होने पर उचित एवं सही उपचार के अभाव में गुदाद्वारा में जख्म/फोड़ा भी हो सकता है। गुदाद्वार में दरारें आ सकती हैं। जिनमें मलत्याग के समय असहनीय पीड़ा होती है। यदि बवासीर का समय रहते उचित उपचार नहीं करवाया जाये तो यह कुछ मामलों में भगंदर और, या गुदाभ्रंश में भी परिवर्तित हो सकता है।

इस असहनीय दर्दनाक पीड़ा से भयभीत होकर कुछ रोगी नासमझी में बवासीर, भगंदर या ग्रदाभ्रंश का ऑपरेशन करवा लेते हैं। इसके बाद वाकई ये तलीफें लाइलाज बन जाती हैं। ऑपरेशन के बाद, फिर ऑपरेशन यह सिलसिला। लोगों की जिंदगी को जीते जी नर्क बना देता है।

इसका भी कारण समझना जरूरी है। जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।

इसलिये यदि कोई सामान्य विवेक का व्यक्ति भी इस बात पर विचार करेगा तो उसे आसानी से समझ में आ जायेगा कि जब तक पाचन तंत्र ठीक नहीं होगा। जब तक सख्त और कठोर मल बनना बंद नहीं होगा। बाहरी ऑपरेशन करने के बाद भी बवासीर को ठीक कैसे किया जा सकता है? यही स्थिति गुर्दे की पथरी की भी होती है। जिसको ऑपरेशन से निकाल देना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि वास्तविक उपचार पथरी का शरीर में बनना बंद करना असली उपचार है। इसके बाद भी हमारे देश में हर दिन बवासीर के हजारों रोगियों के ऑपरेशन किये जा रहे हैं।

बवासीर का उपचार:
बवासीर से पीड़ित अधिकतर लोग शर्म-संकोच के चलते अपनी तकलीफ को परिवार के सदस्यों तक से छिपाते हैं और इधर-उधर ​की दवाइयां लेते रहते हैं। या किसी अनुभवी डॉक्टर से नियमित रूप से उपचार नहीं लेते हैं। अधिकतर रोगियों को तो यह बात ही समझ में नहीं आती कि वर्षों/दशकों तक पेट खराब रहने और कब्ज रहने के बाद जन्मी बवासीर की तकलीफ का बिना कब्ज को ठीक किये सफल उपचार कैसे सम्भव है?

अत: सबसे पहली जरूरत होती है, रोगी के पाचनतंत्र और कब्ज को ठीक करना। जिसके लिये पहले से कोई सुनिश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती। क्योंकि रोगी का स्वस्थ होना केवल दवाइयों पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि कुछ बातें हैं, जिनके कारण उपचार में कम या अधिक समय लग सकता है। जैसे-पहले लिये गये उपचार के रोगी के दुष्प्रभाव, रोगी की जीवनचर्या, खान-पान की आदतें, लीवर की स्थिति, रोगी के जीवन में चिंता-तनवा और अवसाद की स्थिति, वंशानुगत पाचनतंत्र की क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता, रोगी द्वारा दवा पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता इत्यादि। इस सब के बावजूद अधिकतर रोगी डॉक्टर्स से इलाज की निश्चित समय सीमा तथा गारंटेड इलाज की उम्मीद करते हैं। जो व्यावहारिक एवं कानूनी तौर गलत एवं असंभव है, फिर भी रोगी की जेब से पैसे निकलवाने के चक्कर में धन के लोभी अनेक निष्ठुर तथा असंवेदनशील डॉक्टर रोगी की भाषा बोलने लगे हैं। जिसके परिणाम या दुष्परिणाम ऐसे गारंटी मांगने वाले रोगी ही जानते हैं।

मेरा अनुभव तो यही है कि बवासीर का मूल कब्ज है। अत: बवासीर के उपचार के लिये सबसे पहले कब्ज को ठीक करने के लिये सरल, सौम्य तथा उचित दवाइयों का, उचित मात्रा में स्वस्थ होने तक नियमित रूप ये सेवन करना पहली और अंतिम जरूरत है। ठीक होना या नहीं होना, डॉक्टर, रोगी तथा रोग की स्थिति एवं दवाइयों के साथ-साथ प्रकृति पर भी निर्भर करता है। क्योंकि अंतिम सत्य यही है कि डॉक्टर केवल दवाई देता है, रोगी को पूर्णत: स्वस्थ प्रकृति ही करती है।
उपचार हेतु निकट के किसी आयुर्वेद और, या होम्योपैथी के डॉक्टर से सम्पर्क करें। स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिक जानकारी हेतु: http://www.healthcarefriend.in पर विजिट/क्लिक करें।

नोट:---->>>>>>>>>>---- ऑर्गेनिक (Organic) देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त अनमोल ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान हमने अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये हैं। जो बेशक कुछ गरीब या स्वास्थ्य के प्रति कंजूस लोगों को महंगे लग सकते हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों की "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक शारीरिक तथा मानसिक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है। चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम हमारी वेब साइट स्वास्थ्य रक्षक सखा के जरिये हर दिन देशभर में जारी है। लेकिन-गारण्टी की उम्मीद करना खुद को धोखा देना और डॉक्टर को झूठ बोलने हेतु उकसाने जैसा है, क्योंकि इलाज में गारण्टी देना असम्भव और गैर कानूनी है। अतः तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज की उम्मीद नहीं करें।
-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 8561955619 (10AM to 10 PM), 07.06.2018.
बवासीर, गुदाभ्रंश और भगंदर (Piles, Rectum Collapse & Fissure) आॅपरेशन अंतिम विकल्प


बवासीर, गुदाभ्रंश और भगंदर (Piles, Rectum Collapse & Fissure) मुख्यत: पाचन क्रिया की गड़बड़ी (Digestive System disorder) से जुड़ी ऐसी तकलीफें हैं, जिन्हें अधिकतर पीड़ित लोग लम्बे समय तक किसी को नहीं बताते हैं। स्त्रियों में योनिभ्रंश (Colpoptosis/Elytroptosis) भी इसी श्रेणी की तकलीफ है। जिसे भी अकसर छिपाया जाता है। शर्म-संकोच इन सभी तकलीफों को बढाने और दुष्कर (Incurable) बनाने में सहायक होते हैं। योनिभ्रंश का इलाज नहीं करवाने पर स्त्रियों के यौन जीवन का अंत और दाम्पत्य जीवन में बिखराब या विवाहेत्तर यौन सम्बन्धों का कारण बन सकता है। अत: अपनी शारीरिक तकलीफों को छिपायें नहीं, बल्कि तुरंत नजदीकतम डॉक्टर को दिखायें और नियमित रूप से ठीक होने तक इलाज करवायें। डॉक्टर द्वारा आॅपरेशन की सलाह देने पर, आॅपरेशन करवाने की जल्दबाजी नहीं करें। एक से अधिक डॉक्टर से सलाह करें। अन्य चिकित्सा पद्धति के डॉक्टर्स से सलाह करें। डॉक्टर के कहने पर भी आॅपरेशन को प्रथम नहीं, बल्कि अंतिम विकल्प (Last option) के रूप में अपनायें।



मई, 2017 में गुजरात के एक 40 वर्षीय व्यक्ति का काल आया और संकुचाते हुए बताया-"पिछले 15 साल से मेरी गुदा का द्वारा बाहर निकलता है। मैंने 10 साल तक किसी को नहीं बताया। अब जब गुदा द्वारा को अंदर धकेलने में असहनीय तकलीफ और बहुत मुश्किल होने लगी तो मैंने अनेक डॉक्टर्स से इलाज करवाया। अंत में आॅपरेशन की सलाह दी। मुझे आॅपरेशन नहीं करवाना है। कृपया मुझे ठीक कर दें।''


पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि उसे बचपन से कब्ज की शिकायत थी, जिसका उचित उपचार करने के बजाय दस्तावर दवाई ली जाती रही और दस्तावर चूर्ण का भी लम्बे समय तक सेवन किया। उसका मल सूख गया। अंत में गुदाद्वारा बाहर निकलने लगा और गुदाभ्रंश हो गया। ऐसे मामलों में अधिकतर रोगी 1-1 महिने में बार-बार डॉक्टर बदलते रहते हैं। इस कारण बीमारी बढती जाती है। जबकि धैर्यपूर्वक नियमित रूप से उपचार लेना जरूरी होता है।


उक्त पेशेंट का इलाज शुरू किया गया। पाचन क्रिया में 15 दिन में ही सुधार दिख गया, लेकिन 5 महिने तक गुदाभ्रंश में कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। छठवें-सातवें महिने में कुछ लाभ दिखा। अब तकरीबन 10 महिने के उपचार के बाद रोगी स्वस्थ हो रहा है। रोगी को लगता है कि उसकी पाचन क्रिया और गुदाभ्रंश की तकलीफ ठीक हो चुकी है। लेकिन अभी भी उसे 2 से 5 महिने तक दवाईयों के सेवन की जरूरत हो सकती है। बहुत कम मामलों में ऐसा होता है। अधिकतर रोगी 6 से 8 महीने में ठीक हो जाते हैं।


इस प्रकरण में रोगी की भयंकर कब्ज तो सबसे बड़ी समस्या थी ही, साथ ही साथ मलद्वार के ज्ञान-तंतु इतने शिथिल हो चुके थे। जिसके कारण अनेक बार रोगी को पता ही नहीं चलता था कि उसका मलद्वारा और मल कब निकल गया। अत: इस स्थिति की रिकवरी में लम्बा समय लगा।


अन्तिम महत्वपूर्ण बात: खानपीन पर ध्यान रखें और अपनी पाचन क्रिया को दुरुस्त रखें। पाचन क्रिया में होने वाली गड़बड़ी की अनदेखी नहीं करें। स्वास्थ्य से बढकर कुछ भी नहीं है। लेकिन गुदाद्वारा या प्रजनन अंगों से जुड़ी किसी भी तकलीफ में आॅपरेशन करवाने से पहले जल्दबाजी नहीं करें। एक नहीं 100 बार सोचें। दूसरे-तीसरे डॉक्टर्स की राय लें और सभी चिकित्सा पद्धतियों को आजमा लेने के बाद अंतिम उपाय/विकल्प (Last option) के रूप में ही आॅपरेश को चुनें।

Online Dr. PL Meena (डॉ. पुरुषोत्तम मीणा): Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 05.04.2018
*बवासीर, गुदाभ्रंश और भगन्दर की पीड़ा क्यों?*



वर्तमान में जबकि हमारी जबान और खानपान दोनों अनियंत्रित होते जा रहे हैं। अधिकतर लोगों (82%+) का हाजमा बिगड़ा हुआ है और, या बिगड़ता जा रहा है। *दुष्परिणामस्वरूप* बड़ी संख्या में लोग *बवासीर-पाइल्स, गुदाभ्रंश और फिशर-भगन्दर* की असहनीय पीड़ा झेलने को विवश हो चुके हैं। इससे भी दुःखद बात यह है कि इनमें से बहुतेरे *आधुनिक चिकित्सकों से शल्य चिकित्सा करवाकर अपना स्वास्थ्य बरबाद कर चुके या कर रहे हैं। जबकि ऑपरेशन के कुछ समय बाद फिर-फिर ऑपरेशन...! आखिर कितनी बार ऑपरेशन? सबसे दर्दनाशक तो यह कि ऑपरेशन के बाद भी समाधान नहीं! जबकि परम्परागत चिकित्सा पद्धति से उपचार सम्भव है।*

*मेरा अपना अनुभव:-जब तक आप अपना हाजमा ठीक नहीं करेंगे, इन पीड़ाओं से मुक्ति असम्भव है?*


रजिस्ट्रेशन-फ्री: यदि आप लाइलाज (Incurable) समझी जाने वाली किसी बीमारी का इलाज करवा-करवाकर थक चुके/चुकी हैं और आपकी बीमारी ठीक नहीं हो रही हैं तो इसकी की अनदेखी नहीं करें स्वास्थ्य परामर्श या इलाज हेतु अभी और इसी समय 85-619-55-619 पर अपनी समस्या लिखकर वाट्सएप करें और फ्री रजिस्ट्रेशन करवायें। जिससे बहुत कम खर्चे में आपका घर-बैठे इलाज-समाधान हो सके। Online Dr. PL Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant, (स्वास्थ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार) तथा संचालक-निरोगधाम (लाइलाज का इलाज)।

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Online Dr. PL Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant, Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619, Mobile No.: 9875066111 (10AM to 10 PM)

पेट दर्द का प्रोपर इलाज नहीं करवाना घातक हो सकता है! 

भारत में ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है, जिन्हें कोई न कोई पाचन अर्थात् डाईजेशन सम्बन्धी समस्या लगातार बनी ही रहती है। इनमें बच्चे, जवान, वयस्क और वृद्ध सभी शामिल हैं। जिसके कारण उन्हें भूख में कमी, पेट दर्द, डकारें, गैस, कब्ज, कभी कब्ज कभी दस्त, मरोड़-पेचिश, अपच, मिचली, उबकाई, आतों में छाले, बवासीर, सिरदर्द, बदन में सोजन, इत्यादि में से एक या एकाधिक तकलीफें हो सकती हैं।





सामान्यत: ऐसे व्यथित लोगों का प्रस्तुत चित्र में दर्शाये गये अंगों में से लीवर, तिल्ली/स्पलीन, छोटी-बड़ी आतों में कोई न कोई अंग अफेक्टेड हो सकता है। इनमें से फैटी लीवर होना बहुत आम और बड़ी समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार संसार में 32 फीसदी लोग इससे पीड़ित हैं। अत: समय रहते अपनी तकलीफ का पता लगाकर, उसका प्रोपर इलाज नहीं करवाना घातक हो सकता है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' स्वास्थ्य रक्षक सखा, हेल्थ वाट्सएप 8561955619, मो. 9875066111, 29.11.2017
निरोगधाम: पर 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक मकोय
आयुर्वेद शास्त्रियों का कहना है कि मकोय का पौधा इस पृथ्वी पर यकृत के रोगों व हृदय रोगों की सबसे अच्छी औषधि कही जाती है। मकोय पीलिया (जॉन्डिस) की अचूक दवा है और इसका सेवन किसी भी रूप में किया जाए स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही होता है। मकोय भूख को बढ़ाने वाला फल है। इसकी कार्य क्षमता इतनी है कि इसका 10 प्रतिशत भाग भी सही रहे अर्थात् शुद्ध रहे तो भी यह काम करती रहेगी। वर्तमान समय की कड़वी हकीकत यह है कि बहुत कम आयुर्वेदिक औषधियां सही और शुद्ध मिलती हैं। इस कारण अनेक चिकित्सक विद्वानों का ऐसा अनुभव रहा है कि यदि मकोय 10 फीसदी शुद्ध हो तो भी कुछ न कुछ काम अवश्य करती है। 
कल्पना करें कि यदि खतपतवार नाशक कीटनाशकों की मार झेलने के बाद भी खेत में शेष बची मकोय को किसानों द्वारा खेत से काटकर मेड़ के आसपास जो मकोय फेंकी जाती है। वही मकोय जब सूख सड़—गल जाती है और धूप में सूख जाती। ऐसी मकोय को पंसारियों के द्वारा बेचा जायेगा, तो मकोय के सेवन से स्वस्थ होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? दूसरी ओर इस देश का दुर्भाग्य है कि बाजरा, ज्वार जैसी बहुत सस्ती फसल प्राप्त करने के लिये किसानों द्वारा मकोय जैसी महौषधि को नष्ट किया जा रहा है। मकोय के पौधे में अनेक रोगों को नष्ट करने के गुण होते हैं। जैसे—

चर्म रोग, पीलिया, गठिया, बवासीर, सूजन, कोढ़, दिल के रोग, आंखों की बीमारी, खांसी, कफ, स्वर शोधक, रसायन, वीर्य उत्पादक और वीर्यवर्द्धक, प्रमेह नाशक, ज्वर नाशक, वमन को दूर करती, नेत्रों रोगों में हितकर है। मकोय यकृत/लीवर एवं हृदय के रोगों को हरने वाली औषधि है। मकोय त्रिदोषनाशक अर्थात वात,पित्त व कफ तीनों दोषों का शमन करने वाली महौषधि है। इसके अलावा भी मकोय अनेको रोगों को ठीक करती है। 
यकृत की क्रिया विधि जब बिगड़ जाती है तो शरीर में अनेक उपद्रव यथा सूजन, पतले दस्त व पीलिया जैसे रोगों के अलाबा कई बार बवासीर जैसे रोग होने लगते हैं। इन रोगों में मकोय का सेवन बहुत ही लाभ करता है। यह औषधि यकृत की क्रियाविधि को धीरे-धीरे सुदृढ करके लीवर सम्बन्धी सभी रोगों को जड़ से नष्अ कर देती है। कुछ अन्य औषधियों के साथ इस औषधि के प्रयोग से यकृत सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं। भूख बढ जाती है। शरीर पुष्ट हो जाता है। इस औषधि के पत्तों का रस/पाउडर आँतों में पहुँचकर वहाँ इकठ्ठे विषों को नष्ट कर देता है और विषैले द्रव्य पेशाब के मार्ग से शरीर से बाहर निकल जाते हैं। खूनी बबासीर में या मुँह के किसी भी हिस्से से रक्त स्त्राव में मकोय के पत्तों का रस लाभप्रद है। यदि शरीर में खुजली की शिकायत हो तथा वह किसी भी दवाई से मिट नहीं रही हो। तो मकोय के रस की 25 से 50 ग्राम की मात्रा लेते रहने से यह मिट जाऐंगी। इससे शरीर का रक्त शुद्ध हो जाता है और रक्त से जुड़े सभी रोग मिट जाते हैं।
उपरोक्त विवरण एक आम व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है कि मकोय कितनी उपयोगी और अमूल्य औषधि है। अत: हमने जयुपर स्थित हमारे निरोगधाम पर पिछले वर्ष से मकोय की 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक खेती की शुरूआत की है। जिससे मकोय का शुद्ध पाउडर रोगियों को उपलब्ध करवाया जाता है। एक दुर्घटना का शिकार हो जाने के कारण पिछले साल तो हम मकोय का मात्र 5 किलो शुद्ध पाउडर ही उपलब्ध करवा पाये थे। इस वजह से अनेक रोगियों को पर्याप्त मात्रा में मकोय पाउडर उपलब्ध नहीं करवा सके। जिसका हमें खेद है। इस महने वर्ष मकोय की खेती बढा दी है। ​हमारा लक्ष्य है कि इस बार हम मकोय, श्योनाक, शरफुंका, पुनर्नवा, भूई आंवला आदि दर्जनों 100 फीसदी शुद्ध औषधियों के सहयोग से हम कम से कम 2000 ऐसे रोगियों को स्वस्थ कर सकेंगे, जिनको जीवन लीवर या लीवर सम्बन्धी बवासीर, अपच, कब्ज, भगंदर आदि बीमारियों ने परेशान किया हुआ है।

नोट: यहां पर मकोय के जितने भी चित्र दिये गये हैं। सभी हमारे निरोगधाम पर लहलहाती मकोय के हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
85-619-55-619, 25.06.2017


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अतिबला:
अतिबला का सामान्य परिचय: बला नामक औषधि की एक प्रजाति है-"अतिबला"। अतिबला को खिरैटी/खरेंटी भी कहा जाता है। यह पौष्टिक गुणों से भरपूर है। यह आयुर्वेद में बाजीकरण के रूप में भी प्रयुक्त की जाती है। धातु सम्बंधित रोग में इसका प्रयोग कारगर है। यह यौन दौर्बल्य-धातु क्षीणता-नपुंसकता तथा शारीरिक दुर्बलता दूर करने के अलावा अन्य व्याधियों को भी दूर करने की अच्छी औषधि है।

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इसकी और भी कई जातियां हैं, पर बला, राजबला, नागबला और महाबला सभी प्रकार की बला शीतवीर्य, मधुर रसयुक्त, बलकारक, कान्ति वर्द्धक, वात रक्त पित्त, रक्त विकार और व्रण को दूर करने वाली होती हैं। इसके जड़ और बीज को उपयोग में लिया जाता है।



अतिबला (खरैटी) को विभिन्न भाषाओं में निम्न नामों से जाना जाता हैं:



संस्कृत: वला, वाट्यालिका, वाट्या, वाट्यालक

हिंदी: खरैटी, वरयारी, वरियार
बंगाली: श्वेतवेडेला
मराठी: लघुचिकणा, खिरहंटी
गुजराती: खपाट बलदाना
तेलगू: मुपिढी
लैटिन: सिडकार्सि फोलिया
अंग्रेजी: हॉर्नडिएमव्ड सिडा।
Common English Name: Country Mallow
Part Used: Leaves-पत्तियां, Root-जड़, Fruits-फल, Seeds-बीज, Bark-छाल।
Medicinal Use: This plant is useful in gout, tuberculosis, ulcers, bleeding disorders, and worms. It cures burning sensation. Decoction-काढ़ा used in a toothache and tender-नाज़ुक gums-मसूढे. Leaves are locally applied to boils and ulcers. Roots are used in fever, chest affection and urethritis-मूत्रमार्ग का प्रदाह. Antipyretic-ज्वरनाशक, Laxative-दस्तावर, Carminative-वायुनाशी-अग्निवर्धक, Anodyne-वेदनाहर-पीड़ा-नाशक, Cardiac Tonic-हृदय टॉनिक, Nervine Tonic-स्नायविक विकार को दूर करने वाली ओषधि, Antidiabetic-मधुमेहनिवारक and hypoglycaemic-रक्तशर्करा कम हो जाना, 

Medicinal Properties: It is digestive, laxative, expectorant, diuretic, astringent, analgesic, anti-inflammatory, anthelmintic, demulcent and aphrodisiac. 

औषधीय गुण: यह पाचन, रेचक, कफेलदार-बलगम निकालने वाली, मूत्रवर्धक-मूत्रल, कसैले-संकोचक, एनाल्जेसिक-पीड़ाहर-दर्दनिवारक, सोजन निवारक, कृमिनाशक, शांतिदायक और कामोद्दीपक है।


अतिबला (खरैटी) के 37 अद्भुत फायदे



1. पेशाब का बार-बार आना: खरैटी की जड़ की छाल का चूर्ण यदि चीनी के साथ सेवन करें तो पेशाब के बार-बार आने की बीमारी से छुटकारा मिलता है।

2. प्रमेह (वीर्य प्रमेह): अतिबला के बारीक चूर्ण को यदि दूध और मिश्री के साथ सेवन किया जाए तो यह प्रमेह को नष्ट करती है। महाबला मूत्रकृच्छू को नष्ट करती है।
3. गीली खांसी: अतिबला, कंटकारी, बृहती, वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। इसे 14 से 28 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।
4. सीने में घाव (उर:क्षत): बलामूल का चूर्ण, अश्वगंधा, शतावरी, पुनर्नवा और गंभारी का फल समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार लेते हैं। इसे 1 से 3 ग्राम की मात्रा में 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से उर:क्षत नष्ट हो जाता है।
5. मलाशय का गिरना: अतिबला (खिरेंटी) की पत्तियों को एरंडी के तेल में भूनकर मलाशय पर रखकर पट्टी बांध दें।
6. बांझपन दूर करना: अतिबला के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान (मासिक-धर्म) के बाद, दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।
7. मसूढ़ों की सूजन: अतिबला (कंघी) के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन 3 से 4 बार कुल्ला करें। रोजाना प्रयोग करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।
8. नपुंसकता (नामर्दी): अतिबला के बीज 4 से 8 ग्राम सुबह-शाम मिश्री मिले गर्म दूध के साथ खाने से नामर्दी में पूरा लाभ होता है।
9. दस्त: अतिबला (कंघी) के पत्तों को देशी घी में मिलाकर दिन में 2 बार पीने से पित्त के उत्पन्न दस्त में लाभ होता है।
10. पेशाब के साथ खून आना: अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।
11. बवासीर: अतिबला (कंघी) के पत्तों को पानी में उबालकर उसे अच्छी तरह से मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े में उचित मात्रा में ताड़ का गुड़ मिलाकर पीयें। इससे बवासीर में लाभ होता है।
12. रक्तप्रदर: खिरैंटी और कुशा की जड़ के चूर्ण को चावलों के साथ पीने से रक्तप्रदर में फायदा होता है।
13. रक्त प्रदर-1: खिरेंटी के जड़ का मिश्रण (कल्क) बनाकर उसे दूध में डालकर गर्म करके पीने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।
14. रक्त प्रदर-2: रक्तप्रदर में अतिबला (कंघी) की जड़ का चूर्ण 6 ग्राम से 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चीनी और शहद के साथ देने से लाभ मिलता है।
15. रक्त प्रदर-3: अतिबला की जड़ का चूर्ण 1-3 ग्राम, 100-250 मिलीलीटर दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर में लाभ मिलता है।
16. श्वेतप्रदर: अतिबला की जड़ को पीसकर चूर्ण बनाकर शहद के साथ 3 ग्राम की मात्रा में दूध में मिलाकर सेवन करने से श्वेतप्रदर में लाभ प्राप्त होता है।
17. प्रदर: खिरैटी की जड़ की राख दूध के साथ देने से प्रदर में आराम मिलता है।”
18. दर्द व सूजन: दर्द भरे स्थानों पर अतिबला से सेंकना फायदेमंद होता है।
19. पित्त ज्वर: खिरेटी की जड़ का शर्बत बनाकर पीने से बुखार की गर्मी और घबराहट दूर हो जाती है।
20. रुका हुआ मासिक-धर्म: खिरैटी, चीनी, मुलहठी, बड़ के अंकुर, नागकेसर, पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल इनको दूध में पीसकर घी और शहद मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिकस्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।
21. पेट में दर्द होने पर: खिरैंटी, पृश्नपर्णी, कटेरी, लाख और सोंठ को मिलाकर दूध के साथ पीने से `पित्तोदर´ यानी पित्त के कारण होने वाले पेट के दर्द में लाभ होगा।
22. मूत्ररोग: अतिबला के पत्तों या जड़ का काढ़ा लेने से मूत्रकृच्छ (सुजाक) रोग दूर होता है। सुबह-शाम 40 मिलीलीटर लें। इसके बीज अगर 4 से 8 ग्राम रोज लें तो लाभ होता है।
23. पेशाब खुलना: खिरैटी के पत्ते घोटकर छान लें, इसमें मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब खुलकर आता है।
24. मूत्रकृच्छ: खिरैटी के बीजों के चूर्ण में मिश्री मिलाकर दूध के साथ लेने से मूत्रकृच्छ मिट जाती है।
25. फोड़ा (सिर का फोड़ा): अतिबला या कंघी के फूलों और पत्तों का लेप फोड़ों पर करने से लाभ मिलता है।
26. शरीर को शक्तिशाली बनाना: शरीर में कम ताकत होने पर खिरैंटी के बीजों को पकाकर खाने से शरीर में ताकत बढ़ जाती है।
27. शक्ति का विकास: खिरैंटी की जड़ की छाल को पीसकर दूध में उबालें। इसमें घी मिलाकर पीने से शरीर में शक्ति का विकास होता है।
28. धातु गाढ़ी और शुक्रमेह बंद: शुक्रमेह के लिए खरैटी की ताजी जड़ का एक छोटा टुकड़ा लगभग 5-6 ग्राम एक कप पानी के साथ कूट-पीस और घोंट-छानकर सुबह खाली पेट पीने से कुछ दिनों में शुक्र धातु गाढ़ी हो जाती है और शुक्रमेह होना बंद हो जाता है।
29. श्वेत प्रदर (Leukorrhea): महिला को श्वेत प्रदर (Leukorrhea ) रोग हो तो बला के बीजों का बारीक पिसा और छना चूर्ण एक एक चम्मच सुबह-शाम शहद में मिलाकर कर दे और फिर ऊपर से मीठा दूध हल्का गर्म पी लें।
30. बल वीर्य तथा ओज बढ़ता है: शरीरिक कमजोरी के लिए आधा चम्मच की मात्रा में इसकी जड़ का महीन पिसा हुआ चूर्ण सुबह-शाम मीठे हल्के गर्म दूध के साथ लेने और भोजन में दूध-चावल की खीर शामिल कर खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है शरीर सुडौल बनता है सातों धातुएं पुष्ट व बलवान होती हैं तथा बल वीर्य तथा ओज बढ़ता है।
31. मूत्रातिसार: खरैटी के बीज और छाल समान मात्रा में लेकर कूट-पीस-छानकर महीन चूर्ण कर लें तथा एक चम्मच चूर्ण घी-शकर के साथ सुबह-शाम लेने से वस्ति और मूत्रनलिका की उग्रता दूर होती है और मूत्रातिसार होना बंद हो जाता है।
32. बवासीर: बवासीर के रोगी को मल के साथ रक्त भी गिरे तो इसे रक्तार्श यानी खूनी बवासीर कहते हैं। बवासीर रोग का मुख्य कारण खानपान की बदपरहेजी के कारण कब्ज बना रहना होता है। बला के पंचांग को मोटा-मोटा कूटकर डिब्बे में भरकर रख लें और प्रतिदिन सुबह एक गिलास पानी में दो चम्मच यानी कि लगभग 10 ग्राम यह जौकुट चूर्ण डालकर उबालें और जब चौथाई भाग पानी बचे तब उतारकर छान लें फिर ठण्डा करके एक कप दूध मिलाकर पी पाएं-इस उपाय से बवासीर का खून गिरना बंद हो जाता है।


33. पेशाब में खून का आना बंद: अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।



34. मसूढ़ों के रोग: अतिबला के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन तीन से चार बार कुल्ला करें ये प्रयोग रोजाना करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।

35. मासिकधर्म की परेशानी: जिनको मासिक धर्म रुक जाता है या अनियमित आता है उनको खिरैटी+चीनी+मुलहठी+बड़ के अंकुर+ नागकेसर+पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल लेकर इनको दूध में पीसकर घी और शहद में मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिक स्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।
36. गीली खांसी: अतिबला+कंटकारी+बृहती+वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। फिर इसे 15 से 30 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।

37. दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न होता है: अतिबला (खिरैटी) के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान के बाद दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।
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अतिबला
खूनी बवासीर: रोजाना 10 ग्राम पंचांग का काढा पियें।


मसूढों की सूजन: पत्तों का काढा बनाकर रोजाना तीन बार कुल्ला करें।



गांठ या अनपके फोड़े: अतिबला के कोमल पत्तों को पीसकर इसकी पुल्टीस बाँधकर ऊपर पानी के छींटे मारते रहे। इस से गांठ या फोड़ा बिना चीरा लगाए पककर फूट जाता है।



दुर्बलता: आधा चम्मच अतिबला की जड़ का बारीक चूर्ण सुबह-शाम मीठे दूध के साथ लेने से शरीर का दुबलापन दूर हो जाता है।



खूनी बवासीर: अतिबला के पंचांग को मोटा कूठकर उसका चूर्ण बना लें। सुबह शाम 10 ग्राम चूर्ण एक गिलास पानी में उबालें। चौथाई पानी रहे हो जाए तब उतारकर  छान दें। ठंडा करके पानी को एक कप दूध में मिलाकर पीने से शीघ्र खुनी बवासीर लाभ होता है।



स्वरभेद: आधा चम्मच गुलाब की जड़ का चूर्ण, शहद में मिलाकर सुबह-शाम चाटने से आवाज ठीक हो जाती है।



तृषा: बला की जड़ का काढ़ा आदर्श 10 ग्राम पीने से तृषा शांत होती है।



शुक्रमेह: बला की ताजा जड़ 6 ग्राम, एक कप पानी के साथ घोटकर वो छानकर सुबह खाली पेट पीने से लाभ होता है।



श्वेत प्रदर: बला के बीजों का बारीक चूर्ण, एक चम्मच सुबह शाम शहद में मिलाकर लेने से तथा ऊपर से मीठा दूध पीने से श्वेत प्रदर रोग ठीक हो जाता है।



दाह: अतिबला की छाल का रस निकालकर शरीर पर लेप करने से जलन कम हो जाती है।



बिच्छू दंश: बला के पत्तों का रस बिच्छू द्वारा काटी गई जगहों पर लगाकर मसलने से दर्द दूर हो जाता है।



अतिबला (Atibala) का प्रयोग निम्नलिखित बीमारियों, स्थितियों और लक्षणों के उपचार, नियंत्रण, रोकथाम और सुधार के लिए किया जाता है:

दर्द
माइक्रोबियल संक्रमण
कब्ज
मलेरिया
घाव

सूजन
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Online Dr. PL Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant, Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619, Mobile No.: 9875066111 (10AM to 10 PM)

डीकामाली, डीगामाली-Dikamali/Gardenia Gummifera
NADIHINGU (Gardenia gummifera)

: NOTES :

Indication :

1. Wounds
2. Pain
3. Toothache
4. Testless
5. Indigetion-(अपच indigestion, dyspepsia), (अजीर्ण-indigestion), (बदहजमी-indigestion), (अग्निमांद्य-indigestion)
6. Loss of Appetite (भूख में कमी)
7. Constipation (कब्ज, कोष्ठबद्धता, क़ब्ज़ियत, मलावरोध)
8. Abdominal Distension
9. Worms
10. Heart Related Problems
11. Cough
12. Asthma
13. Hiccups
14. Skin Related Problems
15. Obesity
AND
For the Treatment of-
Fever,
Wounds,
Piles
Skin Diseases
and
Pain in abdomen due to Intestinal Worm (आंतों के कृमि) or Constipation.
Indigestion and Lack of Appetite.
Flatulence/पेट फूलना

संकेत:
1. घाव
2. दर्द
3. दांत दर्द
4. परीक्षण रहित
5. इंडाईजेशन
6. भूख की हानि
7. कब्ज
8. पेट का वितरण
9. कीड़े
10. हृदय संबंधी समस्याएं
11. खांसी
12. अस्थमा
13. हिचकोप्स
14. त्वचा संबंधित समस्याएं
15. मोटापा
तथा
उपचार के लिए-
बुखार,
खट्टी डकार,
घावों,
बवासीर
चर्म रोग
तथा
आंतों की जड़ (आंतों की कृमि) या कब्ज के कारण पेट में दर्द
अपच और भूख की कमी
फ़्लैट्युलेंस / पेट फूलना
DOSE : 300-500 mg is Dissolved in Water or Buttermilk (छाछ)

Name of Dikamali:

  • English Name: Gummy Gardenia, Cambi Gum Tree
  • Hindi Name: Dikamali
  • Sanskrit Name: Nadi Hingu, Gandharaj, Hingunadika, Pindava
  • Asamiya Name: If You Know This Plant Name Suggest Us.
  • Bengali Name: Dikamali, Narihingu, Ban Anjir, Bhurro, Barabhutra
  • Gujarati Name: Kamarri, Dikamali
  • Kannada Name: Dikkemalli, Bhickygidda, Bikke, Bikkegidha, Dickygidda, Dikkamalli, Kambimena, Sittubikke, Yerbhicky
  • Marathi Name: Dikamali, Kamarri, Karmarri, Dikamali, Dikemaali
  • Malayalam Name: Gandharajan, Somanadikayam
  • Oriya Name: Kotranga, Bryddhikoli
  • Punjabi Name: If You Know This Plant Name Suggest Us.
  • Tamil Name: Dikkamalli, Kambil, Kampilippisin, Sinnakkambil, Sirukkambil, Tikkamalli, Dika-Malli, Kumbai, Tikka.
  • Telugu Name: Bikki, Sittamalli, Garaga, Karinga, Karinguva, Manjibikki, Sinnabikki, Sirubikki, Sittamatta, Sittim



Nadihingu Gardenia Gummifera: Benefits, Remedies, Research, Side Effects:-

नाडी हिंगु गार्डनिया गमीफाफे: लाभ, उपचार, अनुसंधान, साइड इफेक्ट्स
Nadi hingu- Gardenia Gummifera is a herb mentioned in the ayurvedic pharmacopoeia/औषधकोश for the treatment of fever, indigestion, wounds, skin diseases and pain in abdomen due to intestinal worm (आंतों के कृमि) or constipation.-नाडी हिंगू- गार्डनिया गमीफाफे एक जड़ी बूटी है जो आयुर्वेदिक फार्माकोपिया में बुखार, अपच, घावों, त्वचा रोगों और आंतों की जड़ या कब्ज के कारण पेट में दर्द के उपचार के लिए वर्णित है।
Latin name- Gardenia gummifera Linn.
Family- Rubiaceae
Names in different languages:
Hindi Name- Dikamali
English Name- Cambia gum or resin
Kannada Name- Bikke, Bukke, Dikkemalli
Tamil Name- Dikamalapi, Sinna kambil
Telugu Name- Telbampa
Sanskrit Synonyms of Nadihingu:
Janthuka- Effective against intestinal worms
Pinda- It can be rolled to bolus form after collection
Ramatha, Palasha, Vamshapatra, Venupatri, Hingushivatika, Hingupatri, Pindahva,

It is to be noted that Nadi hingu and Hingu are different herbs told in Ayurveda. Some of the synonyms given for Nadi hingu and Hingu are similar due to its similar properties and availability.-यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि नाडी हिंगु और हिंगु अलग आयुर्वेद में बताया गया है। नादी हिंगु और हिंगु के लिए दिए गए कुछ समानार्थक शब्द समान गुण और उपलब्धता की वजह से समान हैं।

Nadi hingu is a big shrub or small tree growing to a height of 2 to 3 m and is found in the plains of India. The flowers of the plant are white in color which later turns to pale yellow. Fruits are found in the month of June to August. Resin (राल) is obtained by making a cut on the stem (Stem=तना/डंठल) or branches of the plant and the resin resembles the gum (राल गोंद जैसा दिखता है) of asafetida in color and odor (गंध).-नाडी हिंगु एक बड़ा वृक्ष या छोटा पेड़ है जो 2 से 3 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ रहा है और भारत के मैदानी इलाकों में पाया जाता है। पौधे के फूल सफेद रंग में होते हैं, जो बाद में पीले पीले हो जाते हैं। फल जून से अगस्त महीने में पाए जाते हैं राल संयंत्र के स्टेम या शाखाओं पर कटौती करके प्राप्त किया जाता है और राल रंग में असफ़ेटिडा का गम जैसा होता है और गंध।

Gardenia gummifera Properties:
Rasa (Taste) – Katu (Pungent), Tikta (Bitter)
Guna (Qualities) – Laghu (Light for digestion), Ruksha (Dry in nature), Teekshna (Strong)
Vipaka – – Katu (Undergoes Pungent taste after digestion)
Veerya (Potency) – Ushna (Hot)
Karma (Actions) – Kaphavata shamaka (reduces vitiated kapha and vata dosha)

Part used- Resin/Gum
Dosage- 250-500 mg of resin powder

Gardenia gummifera Chemical constituents: The gum contains flavones like gardenin, nevadensin, wogonins, isocutellarein, apigenin and de- MeO- sudachitin.

Nadi hingu has been used to treat the wide range of gastrointestinal (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल-जठरांत्रिय) ailments, especially due to vitiated vata (विकृत वात), through ages. It is one of the herbs mentioned in all ancient scriptures (शास्त्र) of Ayurveda and has various synonyms like jantuka, hingupatri, venupatri, hingusivatika, vamsa patri, suvirya, panga etc, It is traditionally geven to children of infants, particularly in digestive disorders and dental problems during the eruption. Nadihingu was held in high esteem/उच्च सम्मान by the ancient sages (प्राचीन ऋषियों) of India.-नाडी हिंगु का प्रयोग गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (गैस्ट्रोइंटेस्टिनल-जीठरांत्रि) रोगों के इलाज के लिए किया गया है, खासकर विचलित वात के कारण (विकृत वात), उम्र के माध्यम से यह आयुर्वेद के सभी प्राचीन ग्रंथों (शास्त्र) में वर्णित जड़ी-बूटियों में से एक है और इसमें जंतुक, हिंगपुत्र, हिरूपित्री, हिंगुवातीका, वामसा पितृ, सुविया, पंगा आदि जैसे विभिन्न समानार्थक शब्द हैं, यह शिशुओं के बच्चों के लिए परंपरागत रूप से ज्वलनशील है, विशेष रूप से पाचन विकारों में और विस्फोट के दौरान दंत समस्याओं नंदीवन उच्च सम्मान में आयोजित किया गया था / उच्च सम्मान प्राचीन ऋषियों (प्राचीन ऋषियों) द्वारा भारत का।

The plant grows all over India, in deciduous forests, especially in Maharashtra, Gujarat, Bihar and South India. An unarmed shrub grows 1.5-2 meters tall and has twisted branches, brownish black in color. The leaves, simple, rather sessile, elliptic, oblong, 4-8 cm long and shining. The flowers are yellowish, 4-7 cm in length, solitary and axillary. The leaves resemble those of guava leaves, On plucking the leaves or incising the bark, yellow gum is secreted on the surface of the bark. The resin is transparent, greenish yellow in color, with a sharp pungent taste and offensive odor. The gum is non-soluble in saliva. It is marketed in the form of tears or cakes.पौधे पूरे भारत में पर्णपाती जंगलों में, विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार और दक्षिण भारत में बढ़ता है। एक निहत्थे झाड़ी 1.5-2 मीटर ऊंची होती है और मुड़ा शाखाओं, भूरे रंग के काले रंग में। पत्तियां, सरल, बल्कि स्याही, अण्डाकार, आयताकार, 4-8 सेमी लंबे और चमकते हैं। फूल पीले होते हैं, 4-7 सेंटीमीटर लम्बाई, अकेले और कक्षाएं। पत्तियां अमरूद की पत्तियों के समान होती हैं, पत्तियों को तोड़ने या छाल की चपेट में, छाल की सतह पर पीले गम को स्रावित किया जाता है। राल पारदर्शी, हरे रंग का पीला रंग है, तेज तीखे स्वाद और आक्रामक गंध के साथ। लार में गम गैर-घुलनशील है यह आँसू या केक के रूप में विपणन किया जाता है

The botanical name of Nadihingu is Gardenia gummifera and it belongs to family rubiaceae. The plant has been reported to contain resin, steam volatile oil, a coloring matter-gardening etc. The gum yielded gardenin, desmethyl tangeretin and nevadensin. From stem bark oleanonic aldehyde, sitosterol, D-mannitol, erythrodiol, and a new compound – 19a – hydroxyerythrodiol isolated and characterized. Gardenin and 5-demithyltangeretine isolated from gum. Two new flavones – 3, 4 – dihydroxywogonin and 3, 4 , 5 – trihydroxywogonin – isolated from gum in addition to isoscutellarein, apigenin, 4- hydroxywogonin and demethoxysudachitin.-नाडी हिंगु का वनस्पति नाम गल्डिया गमीफाफे है और यह परिवार की रूबिया के अंतर्गत आता है। पौधे को राल, वाष्प वाष्पशील तेल, एक रंग का पदार्थ-बागवानी आदि शामिल करने की सूचना दी गई है। गम ने बागिन, डेस्मेटिल टेंजेरेटीन और नेवाडेनसिन उत्पन्न किया था। स्टेम छाल ओलेनोनिक एल्डिहाइड, सिटेस्टोरोल, डी-मनिटोल, एरिथ्रोडियोल और एक नए संयुग्म से - 1 9 ए - हाइड्रॉक्सीरीथ्रोडिओल पृथक और लक्षणित। गर्दनिन और 5-डिमथाइलैटेजेरेटिन गम से अलग। दो नए flavones - 3, 4 - dihydroxywogonin और 3, 4, 5 - trihydroxywogonin - isoscutellarein, एपिजेनिन, 4- हाइड्रॉक्सीवागोनिन और डेमटॉक्सिसचिकित्टीन के अलावा गम से अलग।

Ayurvedic Properties

Nadihingu is pungent in taste, pungent in the post digestive effect and has hot potency. It alleviates Kapha and Vata doshas. It possesses light, dry and sharp attributes. It facilitates the Vata through intestines and helps to remove the obstruction and constipation. It is useful in flatulence and constipation.-नडिंघु स्वाद में तेज़ है, पाचन प्रभाव के बाद तीखे और गर्म शक्ति है। यह कफ़ और वात दोषों को कम करती है। इसमें प्रकाश, शुष्क और तेज गुण हैं। यह आंतों के माध्यम से वात की सुविधा देता है और रुकावट और कब्ज को दूर करने में मदद करता है। यह पेट फूलना और कब्ज में उपयोगी है।

Uses:


The gum resin of Nadihingu has great medicinal value and is used for medicinal purpose, externally as well as internally. The gum powder mixed with honey is used to massage the gums in teething troubles. It is also an effective painkiller, antiseptic as well as a wound healer, used in the dental aches and infections. The paste of gum has salutary effect on swellings, allocated with pain. In flatulence, the external application of the paste of Nadihingu gum, hingu (asafetida) and elua bola – dried extract of kumari (Aloe indica), together and slightly warmed, eliminates Vata in facilitates micturition and defecation. This is an effective remedy form infants also. The gum matted in water is applied topically on poles to relieve the throbbing pain and itching.-नाडी हिंगु के गम राल में बहुत ही औषधीय मूल्य होता है और इसका प्रयोग औषधीय प्रयोजन के लिए किया जाता है, बाह्य रूप से आंतरिक रूप से भी। शहद के साथ मिलाया गम पाउडर मस्तिष्क को परेशानियों में मालिश करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह एक प्रभावी दर्द निवारक, एंटीसेप्टिक और साथ ही एक घाव रोगाकारी है, दंत दर्द और संक्रमण में इस्तेमाल किया जाता है। गम का पेस्ट सूखने पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, दर्द के साथ आवंटित। फुफ्फुस में, नडिंघुम गम, हिंगु (asafetida) और एलावा बोला के पेस्ट के बाह्य अनुप्रयोग - कुमारी (एलो इंडिका) के सूखे निकालने, एक साथ और थोड़ा गर्म, सूक्ष्मता और शौच की सुविधा में वाटा को समाप्त करता है। यह एक प्रभावी उपाय है शिशुओं को भी। पानी में गद्देदार गम धब्बेों पर खरोंच के दर्द और खुजली को दूर करने के लिए ऊपरी तौर पर लागू किया जाता है।

Internally, Nadihingu is useful in vast range of diseases. This plant is a special remedy for digestive disorders, associated with high vata, viz. flatulent, dyspepsia, anorexia, poles. Worm infestations and ascites. In round worms, it is given along with milk in a dose 50 mg for infants and upto 3 gm for adults. It relieves constipation and flatulence, but in higher doses, causes diarrhea. As it alleviates the kapha dosha, it is a valuable remedy for cough, asthma and hiccup. Vomiting due to indigestion is alleviated with Nadihingu, given along with lemon juice. One gram of the gum is given three times daily, to alleviate fever. Nadihingu, as an adjunct, works well in various skin diseases. It is beneficial in the treatment of obesity, because of its medo pacaka property. In enlargement of spleen due to vitiation of kapha and vata, Nadihingu is benevolent. Also, it works as complementary medicine in cardiac problems. Nadihingu enjoys an important place among medicinal herbs, used for digestive ailments.-आंतरिक रूप से, नंदी हिंगु रोगों के विशाल रेंज में उपयोगी है। यह पौधे पाचन विकारों के लिए एक विशेष उपाय है, उच्च वात से संबंधित है, अर्थात फूला हुआ, अपच, आहार, पोल कृमि इनेस्टेशन और एसिटेशस गोल कीड़े में, यह दूध के साथ-साथ 50 मिलीग्राम के लिए वयस्कों के लिए और वयस्कों के लिए 3 ग्राम की खुराक में दिया जाता है। यह कब्ज और पेट फूलना से राहत देता है, लेकिन उच्च खुराक में, दस्त का कारण बनता है। कफ डोशा को कम करते हुए यह खांसी, अस्थमा और हिचकी के लिए एक बहुमूल्य उपाय है। अपच के कारण उल्टी नडिफिंग के साथ कम है, नींबू के रस के साथ दिया जाता है। बुखार को कम करने के लिए गम का एक ग्राम रोजाना तीन बार दिया जाता है। नंदीहु, एक सहायक के रूप में, विभिन्न त्वचा रोगों में अच्छी तरह से काम करता है। मोटापे के इलाज में यह फायदेमंद है क्योंकि इसकी मेडोक पकाक संपत्ति है कफ और वावट के विचलन के कारण प्लीहा के विस्तार में, नडिंघु उदार है। इसके अलावा, यह हृदय संबंधी समस्याओं में पूरक चिकित्सा के रूप में काम करता है नडिफिंग औषधीय जड़ी बूटियों के बीच एक महत्वपूर्ण स्थान का आनंद लेता है, पाचन रोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

Uses of Nadi hingu-नाडी हिंगु का उपयोग:
  • The paste or the resin of Gardenia gummifera is applied over the wounds and area with pain. It is then tied with clean bandage cloth to reduce the complaints.-दर्द या दर्द के साथ घावों और क्षेत्र पर गार्डिया गमीफाफे का पेस्ट या राल लगाया जाता है। फिर शिकायतों को कम करने के लिए यह साफ पट्टी के कपड़े से बंधा हुआ है।
  • The resin of the plant is kept over the tooth or gum affected with dental caries and inflammation of the gums.-पौधे के राल को दांतों या दांतों से सूजन और गंध की सूजन से प्रभावित दांत या गम पर रखा जाता है।
  • The resin in a dose of 200mg is dissolved in water or buttermilk and is given to patients suffering from indigestion and lack of appetite.-200 मिलीग्राम की खुराक में राल पानी या छाछ में भंग कर दिया जाता है और अपच से पीड़ित रोगियों और भूख की कमी के कारण दिया जाता है।
  • The dried resin of the plant Gardenia gummifera is dissolved in water and given to patients suffering from intestinal worms (आंतों के कृमि), distention of abdomen, constipation and piles.-पौधे की सूखी राल गार्डनिया गमीफाफे पानी में भंग कर दी जाती है और आंतों की कीड़े, पेट, कब्ज और बवासीर से ग्रस्त रोगियों को दी जाती है।
  • Nadi hingu is given in a dose of 300- 500 mg to treat fever arising due to indigestion.-नाड़ी हिंगु को 300- 500 मिलीग्राम की खुराक में दिया जाता है ताकि अपच के कारण पैदा होने वाले बुखार का इलाज किया जा सके।
  • Dissolved resin of the plant is given along with warm water to treat dyspnea and cough.-डिस्पिनिया और खांसी के इलाज के लिए संयंत्र के घोल राल को गर्म पानी के साथ दिया जाता है।
  • The gum is given in a dose of 500 mg to treat skin disease.-त्वचा रोग के इलाज के लिए गम 500 मिलीग्राम की खुराक में दिया जाता है।
Balances Kapha and Vata Dosha
Deepana – improves digestion strength
Indicated in
Vibandha – constipation
Anaha – bloating, fullness

Adverse reaction: The resin should not be given in empty stomach as it may cause hyperacidity and nausea.

Formulations containing Nadi hingu:
Though there are many formulations containing Hingu, there are minimum formulations containing Nadi hingu.

Balant kada No.2: It is a proprietary medicine in decoction form used by women just after delivery for improving the appetite and digestion. It also helps in relieving tiredness and gives strength to the woman.

Research articles about Gardenia gummifera:
Anti- oxidant property: The antioxidant activity was determined by 2,2-diphenyl-1-picrylhydrazyl (DPPH) assay, superoxide radical scavenging assay, reducing power assay, cerium (IV) amaranth dye assay, Ferric Reducing Antioxidant Property (FRAP) assay and total antioxidant capacity. In all the assays, the ethanolic extract of Gardenia gummifera Linn. is more effective in free radical scavenging activity than that of other two extracts.-एंटी ऑक्सीडेंट संपत्ति: एंटीऑक्सिडेंट गतिविधि 2,2-डीफिनील-1-पिकालेलहाइड्राजिल (डीपीपीएच) परख, सुपरऑक्साइड क्रांतिकारी स्केवेन्गिंग परख, पावर परख को कम करने, सेरियम (IV) ऐमारैन्थश डाई परख, फेरिक रिड्यूइंग एंटीऑक्सिडेंट प्रॉपर्टी (एफआरएपी) परख द्वारा निर्धारित किया गया था। और कुल एंटीऑक्सीडेंट क्षमता सभी assays में, गार्डनिया gummifera लिइन के इथेनॉल का अर्क अन्य दो अर्क के मुकाबले मुक्त कट्टरपंथी सफाई गतिविधि में अधिक प्रभावी है।

Hepato protective action: The studies substantiate the use of Gardenia gummifera in folklore medicine for the treatment of liver disorders. The GGME at a dose of 300 mg/kg b.w. exhibited a significant hepato protective effect and BTF, BAF were found to have potential protective effects at a dose of 50 and 100 mg/kg. The hepato protective effect BAF was well comparable to that of Silymarin (50 mg/kg). The two selected bioactive fractions were found to possess an antioxidant property, which strongly supports their hepato protective effect. The hepato protective effects of the extracts were supported by their effect in shortening the sleeping time and decrease the liver weight in rats.-हेपेटो सुरक्षात्मक कार्रवाई: अध्ययन यकृत विकारों के उपचार के लिए लोककाली चिकित्सा में गार्डनिया गमीफाफे के उपयोग को सिद्ध करता है। 300 एमजी / किग्रा बी.डब्ल्यू की खुराक पर जीजीएमई। एक महत्वपूर्ण हेपेटो सुरक्षात्मक प्रभाव और बीटीएफ का प्रदर्शन किया, बीएएफ को 50 और 100 मिलीग्राम / किग्रा की खुराक पर संभावित सुरक्षात्मक प्रभाव पाए गए। हेपेटो सुरक्षात्मक प्रभाव BAF सिलीमारिन (50 मिलीग्राम / किग्रा) की तुलना में अच्छी तरह से तुलनीय था। दो चयनित बायोएक्टिव अंशों में एक एंटीऑक्सिडेंट की संपत्ति थी, जो अपने हेपेटो सुरक्षात्मक प्रभाव का समर्थन करती है। अर्क के हेपेटो सुरक्षात्मक प्रभाव उनके प्रभाव से नींद के समय को छोटा करने और चूहों में यकृत का वजन कम करने में सहायता करते हैं।

Anti-bacterial activity: Present study was aimed at evaluating antibacterial activity of ethanolic and chloroform extracts of G.gummifera using agar well diffusion method. The activity spectrum was tested against different types of Gram positive (B. subtilis and S. aureus) and Gram negative (E. coli and P. aeruginosa) bacterial strains. The activity of both the extracts was compared using Amoxycillin as standard. Chloroform extract showed significant activity against all pathogens when compared with ethanolic extract of G. gummifera.-एंटी बैक्टीरिया गतिविधि: वर्तमान अध्ययन का उद्देश्य जीरमिफ़ेरा के एग्रो अच्छी तरह से प्रसार पद्धति का उपयोग करते हुए ईथेनोलिक और क्लोरोफॉर्म अर्क के जीवाणुरोधी गतिविधि का मूल्यांकन करना था। गतिविधि के स्पेक्ट्रम को विभिन्न प्रकार के ग्राम पॉजिटिव (बी। सब्लिटीस और एस। ऑरियस) और ग्राम नेगेटिव (ई। कोली और पी। एरीगिनोसा) बैक्टीरियल उपभेदों के खिलाफ परीक्षण किया गया था। दोनों अर्क की गतिविधि को अमोनसिलीन द्वारा मानक के रूप में तुलना की गई थी। क्लोरोफॉर्म निकालने जी। गमीफ़ेरा के इथेनोलिस निकालने की तुलना में सभी रोगजनकों के खिलाफ महत्वपूर्ण गतिविधि दिखाते हैं।

Classical categorization:
Dhanvantari Nighantu- Shatapushpadi varga
Raja Nighantu- Pippalyadi varga
संस्कृत : नाडीहिंगू Nadihingu
Plant Part Used : Extracts
Indication :

1. Wounds
2. Pain
3. Toothache
4. Testless
5. Indigetion
6. Loss of Appetite
7. Constipation
8. Abdominal Distension
9. Worms
10. Heart Related Problems
11. Cough
12. Asthma
13. Hiccups
14. Skin Related Problems
15. Obesity
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Botanical Name: Gardenia gummifera


Uses:-


  • 1-It is Stimulates Heart, Liver and Spleen for proper functioning.-यह दिल, जिगर/लीवर और तिल्ली/स्पलीन को उचित तरीके से कार्य करने को उत्तेजित अर्थात प्रोत्साहित करता है।
  • 2-Paste-it is used in washing wounds and also in reducing pain from the affected part.
  • इसके पेस्ट का उपयोग घावों को धोने और प्रभावित हिस्से से दर्द को कम करने में भी किया जाता है।
  • 3-Gardenia Gummifera Powder-
  • (1) it is used in regularizing the digestive system.-यह पाचन तंत्र को नियमित करने में उपयोग/प्रयोग किया जाता है।
  • (2) It curbs infection from the body.-यह शरीर से संक्रमण को रोकता/नियंत्रित करता है।
  • (3) It stimulates heart, liver, and spleen for proper functioning..यह दिल, जिगर/लीवर और तिल्ली/स्पलीन को उचित तरीके से कार्य करने को उत्तेजित अर्थात प्रोत्साहित करता है।
  • (4) It also maintains the respiratory tract.-यह श्वसन मार्ग का रखरखाव की करता है।
  • (5) It prevents pus formation on the wounds.-यह घावों में पस/मवाद बनने को रोकता है।
  • (6) It is helpful in controlling the worm infestation in the body.-यह शरीर में कीड़ों के संक्रमण को नियंत्रित करने में सहायक है।
  • (7) It suppresses the fever and maintains the normal body temperature.-यह बुखार को का यामन करता है और शरीर के तापमान को सामान्य बनाये रखता है।
Sanskrit Name: Nadi hingu
English Name: Cambi gum
Common Names: Dikamali
Drug Class: Antiseptic, carminative, expectorant, stimulant, vermifuge, insect repellent
Indication: Sore throat, spasm,
Parts Used: 
Gum
Medicinal Uses
The plant pacifies vitiated kapha and vata doshas in the body. It is an excellent painkiller and acts as an antiseptic for healing wounds. The paste of the gum is applied to reduce pain and swellings. It is also used for the treatment of diseases like skin disease, indigestion, worm infestation, and diarrhea. In addition to that it in known to relieve cough, asthma and hiccup, constipation and flatulence.
It is found in hilly areas. In India it is found in maharashtra, central India, southern part of India and Bihar.-संयंत्र शांततापूर्वक शरीर में कफ और वात दोषों को विचलित कर रहा था। यह एक उत्कृष्ट दर्द निवारक दवा है और चिकित्सा घाव के लिए एक एंटीसेप्टिक के रूप में कार्य करता है। दर्द और सूजन को कम करने के लिए गम का पेस्ट लागू किया जाता है। यह भी त्वचा रोग, अपच, कृमि संक्रमण और दस्त जैसी बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है। कहते हैं कि इसमें खाँसी, दमा और हिचकी, कब्ज और पेट फूलना राहत देने के लिए जाना जाता है के अलावा।
यह पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है भारत में यह महाराष्ट्र, मध्य भारत, भारत के दक्षिणी भाग और बिहार में पाया जाता है।
Morphology:
It is 3 to 5 inch tall bush. Leaves are 3 to 5inch long which is thick and triangular in shape. Flowers are 5 to 7 inch long. There are present in bunches of two or three flowers. Flowers are of purple color with whitish shades inside. Fruit is 0.8 inch long and 1 ½ inch in diameter. It bears thorns on its surface and is bent at the edges. Thorns are less sharp and is a mere adaptation of the plant to save it self from animals. When the fruit ripes, it burst open to spread its seeds. Seeds are yellowish to brown in color. The plant flowers in summer season and fruits by winters.
-आकृति विज्ञान
यह 3 से 5 इंच लंबा झाड़ी है। पत्तियां 3 से 5 इंच लंबे होते हैं जो आकार में मोटी और त्रिकोणीय हैं। फूल 5 से 7 इंच लंबा हैं दो या तीन फूलों के गुच्छे में मौजूद हैं फूलों में सफेद रंगों के साथ बैंगनी रंग के होते हैं। फल 0.8 इंच लंबा और व्यास में 1½ इंच है। यह अपनी सतह पर कांटों को धारण करता है और किनारों पर झुका हुआ है। कांटे कम तेज हैं और पौधों के स्वभाव से स्वयं को बचाने के लिए संयंत्र का मात्र अनुकूलन है। जब फल पोंछे, यह अपने बीज फैलाने के लिए खुला फट। बीज रंग में भूरे रंग के लिए पीले होते हैं। गर्मियों के मौसम और फलों में सर्दियों द्वारा फूलों के फूल
Chemical Constituents
It contains 89.9 % resins, 0.1 % volatile oils and a coloring agent gardenin. Besides these it contains certain alkaloids and minerals.-
रासायनिक घटक:
इसमें 89.9% रेजिन, 0.1% वाष्पशील तेल और एक रंग एजेंट एजेंट हैं। इनके अलावा इसमें कुछ अल्कोलॉइड और खनिज शामिल हैं।

Pharmacology
It is kapha and vata suppressant-दमनकारी. It is an excellent anti wormal properties. It is also anti bacterial and hence used in curbing any infection-संक्रमण को रोकने in the body and wounds. It is a good anti inflammatory and pain reliever. It helps in normalizing the digestion and improves peristaltic movements. It stimulates heart for normal functioning. It is also a checks the size of liver and spleen. It is very effective in respiratory disorders. It is helpful in skin related ailments. It also is very helpful in reducing fever.
According to ayurveda it contains
Gunna (properties) – laghu (light), ruksh (dry) and tikshan (sharp)
Rasa (taste) – tickta (bitter), katu (pungent)
Virya (potency) – ushan (hot)

फार्माकोलॉजी

यह कफ और वात सप्रेसर है यह एक उत्कृष्ट विरोधी वॉर्मल गुण है यह बैक्टीरिया भी विरोधी है और इसलिए शरीर और घावों में किसी भी संक्रमण को रोकने में उपयोग किया जाता है। यह एक अच्छा विरोधी भड़काऊ और दर्द निवारक है। यह पाचन को सामान्य बनाने में मदद करता है और पेस्टलेटिक आंदोलनों में सुधार करता है। यह सामान्य कामकाज के लिए दिल को उत्तेजित करता है यह यकृत और प्लीहा का आकार भी जांचता है श्वसन विकारों में यह बहुत प्रभावी है। यह त्वचा संबंधी बीमारियों में सहायक है बुखार को कम करने में भी यह बहुत सहायक है
आयुर्वेद के अनुसार इसमें शामिल हैं
गुना (गुण) - लघू (प्रकाश), रुक्ष (सूखा) और तीखे (तेज)
रस (स्वाद) - टिकता (कड़वा), कटु (तीखे)
विर्या (शक्ति) - यूहान (गर्म)
स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।

Online Dr. P.L. Meena
(डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार)
Mobile & WhatsApp No.: 85619-55619 Time to Call Between 10 AM to 10 PM
आपके पाचन को सुधारने और उम्र बढ़ाने के लिए टॉप टिप्स
Top Tips for Improving your Digestion and Aging

सेवासुत डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
किसी भी देश या समाज का वर्तमान और भविष्य उस देश के लोगों के वर्तमान और भविष्य पर पर निर्भर करता है। जबकि लोगों का वर्तमान तथा भविष्य उनके स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। यदि लोगों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं होगा, तो लोगों के पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय क्रियाकलाप भी अच्छे नहीं हो सकते। अत: 'स्वास्थ्य रक्षक सखा' नाम से हमारी ओर से एक वेब साईट संचालित की जा रही है। जिसका मूल मकसद लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है।



पाचन अच्छा तो सब कुछ अच्छा : विश्व स्वाथ्य संगठन का कहना है कि विश्व में 32 फीसदी लोगों को कोई न कोई लीवर सम्बन्धी तकलीफ/बीमारी है। अविकसित और भारत जैसे विकासशील देशों में स्थिति और भी खराब है। भारत में किये गये एक अघ्ययन के अनुसार अशिक्षा और अनियमित खानपीन की आदतों के चलते भारत में सत्तर फीसदी से अधिक लोग—अपच, कब्जी, गैस, डकार, बवासीर, पेट के अल्सर, भगंदर, आदि बीमारियों से ग्रस्त हैं।




इन सभी बीमारियों के मूल में लीवर दोष है। लीवर में सूजन या अन्य किसी कारण से लीवर का ठीक से काम नहीं करना, असल वजह है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि अपच, कब्जी और गैस के कारण पुरुषों में असमय नपुंसकता तथा स्त्रियों में श्वेत प्रदर की समस्या उत्पन्न होती देखी जा रही है। अध्ययन में इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया गया ​है कि भारत में उच्च पदस्थ और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों तक को अपनी पेट सम्बन्धी तकलीफों के प्रति अज्ञानता है। लीवर विकृति का मूल कारण खानपीन सम्बन्धी गलत आदतें या गलत खानपीन है। जिसका समय रहते गलत आदतों और खानपीन में सुधार के साथ तत्काल उपचार जरूरी है। लेकिन उपचार भी पूरी तरह से तब ही कारगर होगा, जबकि हम अपनी खाने—पीने की आदतों को सुधारें। अत: उपचार से बेहतर, आदतों में सुधार हो सकता है। पाचन अच्छा तो सब कुछ अच्छा, क्योंकि पाचन क्रिया पर ही इंसान की जीवनी शक्ति (Vitality) और अन्तत: यह निर्भर करता है कि किसी व्यक्ति का जीवन कितना लम्बा या छोटा होगा। अत: पाचन क्रिया को सुधारने और आयु को बढ़ाने के लिए 15 टिप्स/सूत्र प्रस्तुत हैं, जो अनेक देशों के ख्याति प्राप्त डाइटीशियंस के अनुभवों और गहन वैज्ञानिका शोधों पर आधारित हैं। इन पर अमल करके हम अपने स्वास्थ्य में आमूलचूल सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।




आपके पाचन को सुधारने और उम्र बढ़ाने के लिए टॉप टिप्स
Top Tips for Improving your Digestion and Aging


  • 1. नाश्ते से पहले सुबह में एक कप उबला हुआ पानी पियें। यह पेट को साफ करता है और अक्सर अद्भुत काम करता है। (Drink a cup of boiled water in the morning before breakfast. This cleanse the stomach and often works wonders.)
  • 2-धीरे धीरे और चबाकर खायें। अपच के मुख्य कारणों में से एक है-चबाये बिना भोजन करना। (Eat slowly and chewing. One of the main causes of indigestion food without chewing.)
  • 3. "गरमा गरम" भोजन नहीं खायें। (Don’t eat food “PIPING HOT”.)
  • 4. हमारा पेट गर्म खाद्य पदार्थों के लिये नहीं बनाया गया है। (Our stomach is not designed for hot foods.)
  • 5. याद रखने के लिए यह एक उपयोगी बात यह है कि-अगर खाना मुंह में गर्म है, तो यह पेट में भी गर्म ही रहेगा। इसमें चाय और कॉफी भी शामिल है। (This is a useful thing to remember that-If the food is hot in the mouth, then It will remain in the stomach too hot. It includes tea and coffee.)
  • 6. गर्म खाद्य और पेय पदार्थों का सेवन एंजाइम्स को गड़बड़ कर सकते हैं और पेट की आन्तरिक सतह को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। [Hot food and beverage consumption may disrupt enzymes And also injure lining of the stomach (the inner surface)]
  • 7. अत: हमेशा भोजन और पेय पदार्थों के ठण्डा होने की प्रतीक्षा करें। (So, always wait for it to cool of food and beverage.)
  • 8. भोजन को जानवरों की भांति जल्दी-जल्दी नहीं ठूंसें, बल्कि स्वाद लेकर और इत्मीनान खायें। (Do not eat food fastly like animals, but eat with tastes and leisurely.)
  • 9. यदि आप चलते फिरते खाते हैं, तो वहाँ अधिक संभावना है कि, पाचन शुरू ही नहीं हो पाये। (If you eat on the move, there is more chance that digestion will not begin.)
  • 10. भोजन के साथ फल खाने से बचें। (Avoid eating fruit with the meal.)
  • 11. यदि पेट फूलने की लगातार समस्या है तो अपने भोजन में बदलाव लाएं और हल्का भोजन लें। (If flatulence is a persistent problem, try to changes your diet and take light meals.)
  • 12. एक बार में बहुत सारा भोजन खाने के बजाय, भोजन को टुकड़ों में खायें। (Instead of eating a lot of food at once, eat the food into pieces.)
  • 13. उदाहरण के लिए, प्रोटीन को पचाने के लिए एंजाइम अम्लीय पाचक रस की जरूरत होती है। जबकि कार्बोहाइड्रेट को पचाने के लिए एंजाइम क्षारीय पाचक रस की जरूरत होती है। (For example, proteins needed to digest-enzyme acidic digestive juices. While the carbohydrates are required to digest enzyme alkaline digestive juices .)
  • 14. भोजन करने से आधा घंटा पहले एक गिलास पानी अवश्य पियें। (Be sure to drink a glass of water half an hour before meals.)
  • 15. सुनिश्चित करें कि आप दिन में पर्याप्त पानी पीते हैं, लेकिन भोजन के दौरान पानी नहीं पियें। (Make sure you drink enough water during the day, But Do not drink water during meals.)



कृपया उपरोक्त टिप्स/स्वास्थ्य सूत्रों को पढकर और अमल में लाकर अपने अनुभवों और विचारों से अवश्य अवगत करवायें। अगले आलेख में अस्वस्थ लीवर और लीवर सम्बन्धी समस्याओं के समाधान पर प्रकाश डाला जायेगा।
सेवासुत डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
परम्परागत एवं होम्यौपथ चिकित्सक
परामर्श समय : 10 AM से 10 PM तक
मो. एवं वाट्स एप नम्बर : 9875066111
Saturday, Dt. : 24.12.2016/15.32 Hrs.


परामर्श समय : 10 AM से 10 PM के बीच। Mob & Whats App No. : 9875066111
Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your doctor. 
कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें। 
निवेदन : रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-9875066111. 
Request : Due to the high number of patients, you may have to wait. Please patiently collaborate.--Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'-9875066111

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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Cucumber कब्जी कमजोरी कमर कमर दर्द कमेड़ा करेला कर्ण वेदना कर्णरोग कष्टार्तव-Dysmenorrhea कांच निकलना काजू कान कानून सम्मत काम काम शक्ति कामवाण पाउडर कामशक्ति कामशक्ति-Sexual power कामेच्छा कामोत्तेजना कायाकल्प कार्बोहाइड्रेट कार्बोहाइड्रेट-Carbohydrates काला जीरा काला नमक काली जीरी काली तुलसी काली मिर्च काले निशान कास-खांसी-Cough किडनी किडनी संक्रमण किडनी स्‍टोन कीड़े कीमोथेरेपी कुकरौंधा कुकुंदर कुटकी-Black Hellebore कुबडापन कुमेड़ा कुल्थी कुल्ला कुष्ट कुष्ठ कृमि केला केसर कैफीन-Caffeine कैलोरी कैलोरी चार्ट कैलोरी-Calories कैवांच कैविटी कैंसर कॉफी कॉफ़ी कॉलेस्ट्रॉल कोंडी घास कोढ़ कोबरा कोलेस्ट्रॉल कोलेस्ट्रॉल-Cholesterol कोलेस्ट्रोल कौंच कौमार्य क्रियाशीलता क्रोध क्षय रोग-Tuberculosis क्षारीय तत्व क्षुधानाश खजूर खजूर की चटनी खनिज खरबूजा-Musk melon खरेंटी खरैंटी शिलाजीत खाज खांसी खिरेंटी खिरैटी खीप खीरा खुजली खुशी-Joy खुश्की खुश्बू खोया गंजापन-Baldness गठिया गठिया-Arthritis गठिया-Gout गड़तुम्बा गंडा-ताबीज गंध गन्ने का रस गरमा गरम गर्भ निरोधक गर्भधारण गर्भपात गर्भवती गर्भवती कैसे हों? गर्भावस्था गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy गर्भाशय गर्भाशय भ्रंश गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy गर्म पानी गर्मी गर्मी-Heat गलगण्ड गाजर गाजवां गांठ गाँठ-Knot गारंटी गारण्टेड इलाज गाल ब्लैडर गिलोय गिल्टी गुड़हल गुंदा गुदाद्वार गुदाभ्रंश गुम्मा गुर्दे गुलज़ाफ़री गुस्सा गृध्रसी गृह-स्वामिनी गेदुआ की छाछ गैस गैस्ट्रिक गैहूं का जवारा गोक्षुरादि चूर्ण गोखरू गोखरू (LAND CALTROPS) गोंद कतीरा-Hog-Gum गोंदी गोभी-Cabbage गोरख मुंडी गोरखगांजा गोरखबूटी गोरखमुंडी ग्रीन-टी घमोरी घरेलु ​नुस्खे घाघरा घाव चकवड़ चक्कर चपाती चमत्कारिक सब्जियां चरित्र चर्बी चर्म चर्म रोग चर्मरोग चाय चाय-Tea चालीस के पार-Forty Across चिकनगुनिया चिकित्सकीय चिटकन चिंतित चिरायता-Absinth चिरोटा चुंबन चोक चौलाई छपाकी छरहरी काया छाछ छाजन बूटी छाले छींक छीकें छुअ छुआरा छुहारा छोटा गोखरू छोटा धतूरा छोटी हरड़ जंक फूड जकवड़ जख्म जंगली तिल्ली जंगली तुलसी जंगली पेड़ जंगली मिर्ची जंगली-कटीली चौलाई जटामांसी-Spikenard जलजमनी जलन जलोदर रोग-Ascites Disease जवारा जवारे जवासा-Alhag जहर जामुन का जूस जायफल जिगर जीरा जीवन रक्षक जीवनी शक्ति जुएं जुकाम जुदाई जुलाब जूएं जूस जोड़ों के दर्द जोड़ों में दर्द जौ ज्यूस ज्योति ज्वर ज्वर-Fiver झाइयाँ झांईं झाड़-फूंक झुर्रियाँ झुर्रियां झुर्री झूठे दर्द टमाटर का रस टमाटर-Tomatoes टाइफाइड टाटबडंगा टायफायड टूटी हड्डी टॉन्सिल टोटला ट्यूमर ठंड ठंडापन ठेकेदार डॉक्टर डकार डकारें डायबिटीज डायरिया डिग्री फ़ारेनहाइट डिग्री सेल्सियस डिजिसेक्सुअल डिटॉक्सीफाई डिटॉक्सीफिकेशन डिनर डिप्रेशन डिब्बाबंद भोजन डिलेवरी डीकामाली डीगामाली डेंगू डेंगू-Dengue डॉ. निरंकुश डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' डॉ. मीणा ढकार ढीलापन ढीली योनि तकलीफ का सही इलाज तंत्र-मंत्र तम्बाकू तरबूज-Watermelon तलाक ताकत तिल तिल्ली तुंबा तुंबी तुम्बा तुलसी तेल त्रिदोषनाशक त्रिफला त्वचा त्वचा रोग थकान थाईरायड थायरायड-Thyroid थायरॉइड दण्डनीय अपराध दंत वेदना दन्तकृमि दन्तरोग दमा दर वेदना दरार दर्द दर्द निवारक दर्द निवारक दवा दर्दनाक दस्त दही दाग-धब्बे-Stains-Spots दाढ़ दांत दांतो में कैविटी-Teeth Cavity दाद दाम्पत्य दाम्पत्य विवाद सलाहकार दाम्पत्य-Conjugal दाल दालचीनी दालें दिमांग दिल दीर्घायु दु:खी दुर्गंध दुर्बलता दुष्प्रभाव दुष्प्रभावरहित दूध दूध वृद्धि दूधी दूधी-Milk Hedge दृष्टिदोष दो मन द्रोणपुष्पी द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes धड़कन धनिया बीज धनिया-Coriander धमासा धात धातु धातु पतन धार्मिक धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं? धैर्यहीन नज़ला नपुंसक नपुंसकता नाइट्रिक एसिड नाक नाखून नागबला नागरमोथा नाडी हिंगु नाड़ी हिंगु (डिकामाली) नामर्दी नारकीय पीड़ा नारियल नाश्ता निमोनिया निम्न रक्तचाप निम्बू नियासिन निराश निरोगधाम निर्गुण्डी निर्गुन्डी निष्कपट स्नेह निष्ठा निसोरा नींद नींबू नींबू-Lemon नीम-azadirachta indica नुस्खे नुस्खे-Tips नेगड़ नेत्र रोग नेुचरल नैतिक नॉर्मल डिलेवरी नोनिया नौसादर न्युमोनिया-Pneumonia न्यूरॉन्स पक्षघात पंचकर्म पढ़ने में मन लगेगा पंतजलि पत्तागोभी-CABBAGE पत्थर फोड़ी पत्थरचट्टा पत्नी पथरी पदार्थ पनीर पपीता पपीता-CARICA PAPPYA पमाड परदेशी लांगड़ी परम्परागत चिकित्सा परहेज पराठा परामर्श परिस्थिति पवाड़ पवाँर पाइल्स पाक-कला पाचक पाचन पाचनतंत्र पाचनशक्ति पाठक संख्या 16 लाख पार पाठक संख्या पंद्रह लाख पायरिया पारदर्शिता पारिजात पालक पालक-Spinach पित्त पित्ताशय पित्ती पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne पिरामिड पीलिया पीलिया-Jaundice पीलिया-कामला-Jaundice पुआड़ पुदीना पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava पुरुष पुंसत्व पेचिश पेट के कीड़े पेट दर्द पेट में गैस पेट रोग पेड़ पेद दर्द पेरिकिटो सेसिल पेशाब पेशाब में रुकावट पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy पोष्टिक लड्डू पौधे पौरुष पौरुष ग्रंथि पौष्टिक रागी रोटी प्याज-Onion प्यास प्रजनन प्रतिरक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिरोधक प्रतिरोधक-Resistance प्रदर प्रमेह प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery प्रसव प्रसव सुरक्षा चक्र प्रसव-पीड़ा प्रसूति प्राणायाम प्रेग्नेंसी-Pregnancy प्रेम प्रेमरस प्रेमिका प्रेमी प्रोटीन प्रोटीन का कार्य प्रोटीन के स्रोत प्रोस्टेट प्रोस्‍टेट कैंसर प्रोस्टेट ग्रंथि प्रोस्टेट ग्रन्थि प्लीहा प्लूरिसी-Pleurisy प्लेटलेट्स फंगल फटन फफूंद-Fungi फरास फल फाइबर फिटकरी फुंसी-Pimples फूलगोभी-CAULIFLOWER फेंफड़े फेरम फॉस फैट फैटी लीवर फोटोफोबिया फोड़ा फोड़े-Boils फोरप्ले फोलिक एसिड फ्लू फ्लू-Flu फ्लेक्स सीड्स बकायन बकुल बड़ी हरड़ बथुआ बथुआ पाउडर बथुआ-White Goose Foot बदबू बंध्यापन बबूल-ACACIA बरसाती बीमारियाँ बरसाती बीमारियां बलगम बलवृद्धि बला बलात्कार बवासीर बहरापन बहुनिया बहुमूत्रता- बांझपन बादाम-Almonds बादाम. बाल बाल झड़ना बाल झडऩा-Hair Falling बिना सिजेरियन मां बनें बिवाई बीजबंद बीड़ी बीमारियों के अनुसार औषधियां बीमारी बील बुखार बूंद-बूंद पेशाब बेल बेली बैक्टीरिया बॉयोकैमी ब्र​ह्मदण्डी ब्रेस्ट ग्रोथ ब्लड प्रेशर ब्लैक मेलिंग ब्लॉकेज भगंदर भगंदर-Fistula-in-ano भगनासा भगन्दर भगोष्ठ भड़भांड़ भय भविष्य भस्मक रोग भावनात्मक भुई आंवला-Phyllanthus Niruri भूई आमला भूई आंवला भूख भूख बढ़ाने भूत-प्रेत भूमि भूमि आंवला भोजनलीवर मकोय मकोय-Soleanum nigrum मक्का मक्का के भुट्टे मंजीठ मटर-PEA मंद दृष्टि मंदाग्नि मदार मधुमेह मधुमेह-Diabetes मन्दाग्नि-Dyspepsia मरुआ मरोड़ मर्द मर्दाना मलाशय मलेरिया मलेरिया (Malaria) मवाद मसाले मस्तिष्क मस्से मस्से-WARTS महंगा इलाज महत्वपूर्ण लेख महाबला माइग्रेन माईग्रेन माईंड सैट माजूफल मानवव्यवहार मानसिक मानसिक लक्षण मानसिक-Mental मानिसक तनाव-Mental Stress मायोपिया मासिक मासिक-धर्म मासिकधर्म मासिकस्राव माहवारी मिनरल मिर्गी मिर्च-Chili मीठा खाने की आदत मुख मैथुन-ओरल सेक्स-Oral Sex मुख्य लक्षण मुधमेह मुलहठी मुलेठी मुहाँसे मूँगफली मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders मूत्र मूत्र असंयमितता मूत्र में जलन-Burning in Urine मूत्ररोग मूत्राशय मूत्रेन्द्रिय मूर्च्छा (Unconsciousness) मूली मूली कर रस मृत्यु मृत्युदण्ड मेथी मेथी दाना मेंहदी मैथुन मोगरा (Mogra) मोटापा मोटापा-Obesity मोतियाबिंद मौत मौलसिरी मौसमी बीमारियां यकृत यकृत प्लीहा यकृत वृद्धि-Liver Growth यकृत-लीवर-जिगर-Lever यूपेटोरियम परफोलियेटम यूरिक एसिड लेबल योग विज्ञापन योन योन संतुष्टि योनि योनि ढीली योनि शिथिल योनि शूल-Vaginal Colic योनि संकोचन योनिद्वारा योनिभ्रंश योनी योनी संकोचन यौन यौन आनंद यौन उत्तेजक पिल्स (sexual stimulant pills) यौन क्षमता यौन दौर्बल्य यौन शक्तिवर्धक यौन शिक्षा यौन समस्याएं यौनतृप्ति यौनशक्ति यौनशिक्षा यौनसुख यौनानंद यौनि रक्त प्रदर (Blood Pradar) रक्त रोहिड़ा-TECOMELLA UNDULATA रक्तचाप रक्तपित्त रक्तशोधक रक्ताल्पता रक्ताल्पता (एनीमिया)-Anemia रस-juices रातरानी Night Blooming Jasmine/Cestrum nocturnum रामबाण रामबाण औषधियाँ-Panacea Medicines रुक्षांश रूढिवादी रूसी रूसी मोटापा रेचक रेठु रोग प्रतिरोधक रोबोट सेक्स रोमांस लकवा लक्षण लक्ष्मी लंच लसोड़ा लस्सी लहसुन लहसुन-Garlic लाइलाज लाइलाज का इलाज लाक्षणिक इलाज लाक्षणिक जानकारी लाभ लिंग लिंग प्रवेश लिसोड़ा लीकोरिया लीवर लीवर सिरोसिस लीवर-Liver लू-hot wind लैंगिक लोनिया लौकी लौंग की चाय ल्युकोरिया ल्यूकोरिया ल्यूज योनी वजन वज़न वजन कम वजन बढाएं-Weight Increase वन तुलसी वन/जंगली तुलसी वनौषधियाँ वमन वमन विकृति-Vomiting Distortion वसा वात वात श्लैष्मिक ज्वर वात-Rheumatism वायरल वायरल फीवर वायरल बुखार-Viral Fever वासना विचारतंत्र विटामिन विधारा वियाग्रा-Viagra वियोग विरह वेदना विलायती नीम विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध विवाहेत्तर सम्बंध विश्वास विष विष हरनी विषखपरा वीर्य वीर्य वृद्धि वीर्यपात वृक्कों (गुर्दों) में पथरी-Renal (Kidney) Stone वृक्ष वैज्ञानिक वैधानिक वैवाहिक जीवन वैवाहिक जीवन-Marital वैवाहिक रिश्ते वैश्यावृति व्याकुल व्यायाम व्रण शंखपुष्पी शरपुंखा शराब शरीफा-सीताफल-Custard apple शर्करा शलगम-Beets शल्यक्रिया शहद शहद-Honey शारीरिक शारीरिक रिश्ते शिथिलता शीघ्र पतन शीघ्रपतन शीस शुक्राणु शुक्राणु-Sperm शुक्राणू शुगर शोक शोथ शोध श्योनाक श्रेष्ठतर श्वास श्वांस श्वेत प्रदर श्वेत प्रदर-Leucorrhea श्वेतप्रदर षड़यंत्र संकुचन संकोच संक्रमण संक्रमित संक्रामक संखाहुली सगतरा संतरा-Orange संतान संतुष्टि सत्यानाशी सदा सुहागन सदाफूली सदाबहार सदाबहार चूर्ण सनबर्न सफ़ेद दाग सफेद पानी सफेद मूसली सब्जि सब्जी संभालू संभोग समर्पण-Dedication सरकार को सुझाव सरफोंका सरहटी सर्दी सर्दी-जुकाम सर्पक्षी सर्पविष सलाद संवाद संवेदना सहदेई सहदेवी सहानभूति साइटिका साइटिका-Sciatica साइड इफेक्ट्स साबूदाना-Sago सायटिका सिगरेट सिजेरियन सिर दर्द सिर वेदना सिरका सिरदर्द सिरोसिस सी-सेक्शन सीजर डिलेवरी सुगर सुदर्शन सुहागा सूखा रोग सूजन सेक्स सेक्स उत्तेजक दवा सेक्स परामर्श-Sex Counseling सेक्स पार्टनर सेक्स पावर सेक्स समस्या सेक्स हार्मोन सेक्‍स-Sex सेंधा नमक सेब सेमल-Bombax Ceiba सेल्स सोजन-सूजन सोंठ सोना पाठा सोयाबीन सोयाबीन (Soyabean) सोयाबीन-Soyabean सोराइसिस सोरियासिस-Psoriasis सौंठ सौंदर्य सौंदर्य-Beauty सौन्दर्य सौंफ सौंफ की चाय सौंफ-Fennel स्किन स्खलन स्तन स्तन वृद्धि स्तनपान स्तम्भन स्त्री स्त्रीत्व स्त्रैण स्पर्श स्मृति-लोप स्वप्न दोष स्वप्नदोष स्वप्नदोष-Night Fall स्वभाव स्वभावगत स्वरभंग स्वर्णक्षीरी स्वस्थ स्वास्थ्य स्वास्थ्य परामर्श स्वास्थ्य रक्षक सखा हजारदानी हड़जोड़ हड्डी हड्डी में दर्द हड्डी संक्रमण हड्डीतोड़ ज्वर हड्डीतोड़ बुखार हरड़ हरसिंगार हरी दूब-CREEPING CYNODAN हरीतकी हर्टबर्न हस्तमैथुन हस्तमैथुन-Masturbation हाई बीपी हाथ-पैर नहीं कटवायें हारसिंगार हालात हिचकी हिचकी-Hiccup हिमोग्लोबिन-hemoglobin हिस्टीरिया हिस्टीरिया-Hysteria हींग हीनतर हुरहुर हुलहुल हृदय हृदय-Heart हेपेटाइटिस हेपेटाईटिस हेल्थ टिप्स-Health-Tips हेल्थ बुलेटिन हैजा हैपीनेस-Happiness हैल्थ होम केयर टिप्स-Home Care Tips होम्यापैथ होम्योपैथ होम्योपैथिक होम्योपैथिक इलाज होम्योपैथिक उपचार होम्योपैथी होम्योपैथी-Homeopathy