Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)

Health Care Friend and Marital Dispute Consultant

(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार)

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85619-55619 (10 AM to 10 PM)

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स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।

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आंतरिक एवं बाहरी ताकत हेतु मूंग की दाल के पोष्टिक लड्डू

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
परामर्श-8561955619 (10AM-10PM)

वर्तमान समय में जबकि लोगों को प्रकृति प्रदत्त शुद्ध आॅक्सीजन तक से महरूम होना पड़ रहा है। अधिकतर लोग विभिन्न प्रकार के नशों करने के आदी हो चुके हैं। सब्जी, फल और अनाज भी अस्वास्थ्यकर उर्वरकों तथा जहरीले कीट नाशसकों के बेजा उपयोग से पैदा किये जा रहे हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि के कारण, उन्हें पाने की लालसा एवं प्रतिस्पर्धा अपने आप में अनेक बीमारियों का कारण है। कार्यालयीन कार्यों का दबाव और अति आवश्यक संसाधनों की अप्राप्ति एवं अभाव लोगों में मानसिक तनाव एवं अवसाद को जन्म देते हैं। शारीरिक श्रम के प्रति हेय दृष्टिकोंण तथा खेलकूद के लिये समय नहीं निकालना भी अनेक बीमारियों को निमंत्रण देना है।



इन हालातों में अधिकतर लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति लगातार कमजोरी होती जा रही है। जिसके चलते स्त्रियों और पुरुषों को अनेकों प्रकार की आंतरिक एवं बाहरी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। जिनमें कब्ज, एलर्जी, माईग्रेन, बवासीर, भगंदर, रक्तचाप, मधुमेह, गुदाभ्रंश, अस्थमा, योनिभ्रंश, प्रमेह, प्रदर, आमवात, गठिया, चर्मरोग, एक्जीमा, कमजोर प्रजजन, शुक्राणुओं की कमी, बंध्यापन, नपुंसकता आदि प्रमुख तकलीफें होती देखी जाती हैं। जिनका सही समय पर शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों तथा अमृत तुल्य होम्योपैथिक दवाइयों से उपचार किया जाये तो प्रारम्भ में ही रोगमुक्ति एवं आरोग्य संभव है। अन्यथा कालांतर में उक्त सभी तकलीफें शरीर में अपनी जड़ जमा लेती हैं और पीड़ित व्यक्ति को पल-पल व्यथित जीवन जीने को विवश कर देती हैं।

मेरे लम्बे अनुभव में मैंने पाया है कि अधिकतर लोगों की पाचनक्रिया ठीक नहीं होती है। इस कारण उनको अधिकतर औषधियां काम ही नहीं करती हैं। जो लोग गुटका, तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी, जर्दा, शराब आदि का सेवन करते हैं, उन्हें होम्योपैथिक दवाइयां वांछित परिणाम नहीं दे पाती हैं। इसके अलावा अनेक लोगों को बार-बार डॉक्टर बदलने की बीमारी भी होती है। ऐसे लोगों को धैर्य एवं विश्वासपूर्वक उपचार लेना रास नहीं आता। अत: वे जीवनभर भुगतते रहते हैं।

इस सबके बावजूद भी व्यक्ति को निराश नहीं होना चाहिये। अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग बने रहना जरूरी है। कम से कम सर्दी के मौसम में बलवर्धक ताकत के मूंग की दाल के लड्डू बनाकर अवश्य प्रतिवर्ष खाने चाहिये। जिससे स्वस्थ शरीर में साल भर की ऊर्जा संचित हो सके। जिन लोगों का पेट खराब रहता है, उन्हें ताकत के लड्डूओं का सेवन शुरू करने से पहले कम से कम 10 दिन दूध में उबालकर मुनक्का/दाख सेवन करनी चाहिये। उसके बाद हल्का जुलाब लें। इसके 4-5 दिन बाद लड्डओं का सेवन शुरू करें। मूंग की दाल के लड्डूओं की सामग्री प्रस्तुत है। श्रृेष्ठ परिणाम हेतु यथासंभव शुद्ध, ताजा और आॅर्गेनिक औषधि/सामग्री का ही उपयोग करें। लेकिन अधिकतर लोगों की यही सबसे बड़ी समस्या है। मेरे यहां पर भी समस्त सामग्री आॅर्गेनिक उपलब्ध नहीं हैं। रोगियों को उपलब्ध करवाने हेतु मेरी ओर से कुछ औषधियां आॅर्गेनिक रीति से पैदा/संग्रहित की जा रही हैं, जबकि शेष ताजा एवं विश्वसनीय स्रोतों से मंगवाई जाती हैं। जो तुलनात्मक रूप से बहुत मंहगी होती हैं।

मूंग की दाल के लड्डूओं की सामग्री।

01. मूंग की धुली दाल 1 किलो।
02. शुद्ध देशी घी 1 किलो।
03. शुद्ध देशी बूरा/रवा 1.250 किलो।
04. बला 10 ग्राम।
05. अतिबला 10 ग्राम।
06. महाबला 10 ग्राम।
07. लाजवंती 10 ग्राम।
08. लोंग 5 ग्राम।
09. दालचीनी बाहरी बकल 10 ग्राम।
10. इलायची 10 ग्राम।
11. काली मूसली 10 ग्राम।
12. मुलैठी जड़ 10 ग्राम।
13. दक्षिणी गोखरू बीज 30 ग्राम।
14. शुद्ध सफेद मूसली 20 ग्राम।
15. शुद्ध शतावरी 30 ग्राम।
16. शुद्ध सेमल मूसली 30 ग्राम।
17. शुद्ध शोधित कौंच के बीज 100 ग्राम।
18. किसमिश 100 ग्राम।
19. काजू टुकड़ी 100 ग्राम।
20. कागजी बादाम की गिरी 100 ग्राम।
21. उटंगन के बीज 10 ग्राम।
22. शुद्ध वंशलोचन 10 ग्राम।
23. बबूल की फली 10 ग्राम।
24. बबूल का गोंद 10 ग्राम।
25. पिस्ता 10 ग्राम।

नोट: किसी कारण से उक्त सामग्री कम ज्यादा हो तो ध्यान रखें कि क्रम 04 से 25 तक की कुल सामग्री 500 ग्राम से 700 ग्राम तक होनी चाहिये।

नोट: उक्त लड्डू किसी दक्ष व्यक्ति/हलवाई से बनवाये जा सकते हैं। क्योंकि दाल को धीमी-धीमी आंच पर सिकाई करने के बाद उसमें सभी सामग्री का अलग-अलग बनाया गया पाउडर मिलाया जाकर लड्डू बनाये जाते हैं। अत: बेहतर यही होगा कि किसी अनुभवी व्यक्ति का सहयोग लिया जावे।

सेवन: सुबह खाली पेट 100 ग्राम से 250 ग्राम तक। अपनी पचानक्रिया के अनुसार।

लाभ: उक्त लड्डू उपरोक्त सभी बीमारियों, शारीरिक एवं मानसिक कमजोरी, प्रजनन क्षमता, यौन क्षमता आदि में आश्चर्यजनक रूप से परिणाम देते हैं। बशर्ते कोई पुरानी बीमारी नहीं हो। यदि बीमारी हो तो पहले उसका उपचार जरूरी है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', 14.11.2018

>>>>> नोट: किसी भी पुरानी या लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी से पीड़ित लोगों को, अपनी बीमारी को अपनी नियति मानकर निराश या हताश (Frustrated or Depressed) होने की जरूरत नहीं है। देशी जड़ी बूटियों और होम्योपैथी में इलाज संभव है। अपने आपपास के किसी अनुभवी डॉक्टर से सम्पर्क किया जा सकता है। देशभर में अनेकानेक अनुभवी तथा योग्य होम्योपैथ/आयुर्वेद के डॉक्टर उपलब्ध हैं।

>>>>> *हां अनेकानेक स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों की जानकारी और रोगियों के अनुभवों की जानकारी हेतु मेरी निम्न वेबसाइट/Facebook Page पर विजिट/क्लिक कर सकते हैं:-*


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हेल्थ बुलेटिन (स्वास्थ्य परामर्श) भाग-3 (Health Bulletin-3)

समस्या: मेरी उम्र 38 साल, लम्बाई 5 फिट 4 इंच और वजन 85 किलो है। मैं दो बच्चों का पिता हूं। मुझे विवाहपूर्व से ही शीघ्रपतन की समस्या है। इस कारण पत्नी को संतुष्ट नहीं कर पाता हूं। इस कारण हमारे बीच किसी न किसी बात पर लगातार तकरार होती ही रहती है। जबकि सभी प्रकार की समस्याओं की जड़ शीघ्रपतन है। इस वजह से हम एक साथ रहकर भी दुश्मनों की भांति रहते हैं। महिनों तक हमारे बीच बीतचीत तक नहीं होती है। कृपया कोई पक्का इलाज बतायें। एक्सवाईजेड त्रिवेदी, गोरखपुर, उप्र।



परामर्श: त्रिवेदी जी सबसे पहले तो आप यह समझ लें कि आपकी समस्या कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिससे आप अकेले जूझ रहे हैं, बल्कि एक अध्ययन के अनुसार भारत में 30 फीसदी लोगों का दाम्पत्य तकरीबन इसी तरह का है। आप और आप जैसी तकलीफ से जूछ रहे दम्पत्तियों के हितार्थ मैं आपको कुछ सुझाव लिख रहा हूं:-
(1) पहली बात झगड़ा करना या बातचीत बंद कर देना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या को बढाना है। आपको अपने वैवाहिक सम्बन्धों की पुनर्स्थापना हेतु तुरंत किसी अनुभवी तथा विश्वास योग्य दाम्पत्य विवाद सलाहकार (Marital Dispute Consultant) से सम्पर्क करना चाहिये।
(2) दूसरी बात दाम्पत्य विवाद सलाहकार से सम्पर्क करने के बाद उनकी सलाह का अनुसरण करें। जब तक आपको दाम्पत्य विवाद सलाहकार का परामर्श नहीं मिल पाता है, आप मेरी वेब साइट स्वास्थ्य रक्षक सखा (Health Care Friend) पर 'शीघ्रपतन' (Early Ejaculation) शीर्षक से प्रकाशित मेरे लेख को पढें और अपने पाचन संस्थान का उपचार करवायें। उसके बाद ही उपचार की सोचें। क्योंकि जब तक आपका पाचन संस्थान ठीक नहीं होगा, आपकी किसी भी बीमारी का आसानी से उपचार सम्भव नहीं है। जिसके लिये आप किसी स्थानीय डॉक्टर से सम्पर्क करें। या इस पोस्ट के अंत में लिखे मेरे हेल्थ वाट्सएप पर सम्पर्क करें।
(3) तीसरी बात उपचार होने तक आप त्रिफला का सेवन कर सकते हैं। लेकिन बाजारू त्रिफला नहीं लें, बल्कि थोड़ा सा श्रम खुद करें। 100 ग्राम बड़ी हरड़, 200 ग्राम बहेड़ा, 400 आंवला लें। तीनों ताजा हों। अर्थात पुराने सड़े-गले नहीं हों। तीनों को अच्छे से कूट-पीसकर कपड़छन करके पाउडर बना लें। इस सब में 200 ग्राम काले नमक का पाउडर बनाकर मिला लें। सभी को मिश्रित करके किसी एयर टाईट डब्बे में भरकर सुरक्षित रख लें। इसमें से प्रतिदिन शाम को दो टी-स्पून (Teaspoon) पाउडर शाम को आधा गिलास पानी में भिगो दें। सुबह आधा गिलास पानी और मिलायें। फिर धीमी आंच पर पकावें। जब पानी आधा रह जाये तो सुबह खाली पेट गुनगुना-गुनगुना (Lukewarm) नियमित रूप से लगातार एक से तीन महिने तक या पाचन संस्थान ठीक होने तक पियें। खाली पेट चाय और दूध का सेवन भूलकर भी नहीं करें।
(4) जब आपकी पाचन क्रिया नियमित हो जाये तो शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच का विधिवत शोधित किया हुआ पाउडर, शुद्ध आॅर्गेनिक अश्वगंधा पाउडर, शुद्ध सफेद मूसली पाउडर तीनों को कपड़छन करके समान मात्रा में मिला लें, इन तीनों के बराबर मात्रा में मिश्री पाउडर मिला लें। रात्रि सोते समय करीब 5 ग्राम पाउडर की फक्की लेकर 150 से 500 मिलीलीटर तक, अपनी क्षमतानुसार गुनगुना-गुनगुना (Lukewarm) दूध नियमित रूप से  पियें।
(5) पूरी तरह से स्वस्थ होने तक किसी भी प्रकार का नशा और मांसाहार नहीं करें। नियमित रूप से समय पर स्वास्थ्यवर्धक भोजन लें।

चेतावनी: यहां पर जनहित में स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में जागरूकता के लिए दवाईयों का विवरण लिखा गया है। पाठक कृपया स्वयं अपना इलाज करने का खतरा नहीं उठायें। कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें। [Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your Doctor.]

नोट/Note: अपने स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे हेल्थ वाट्सएप No.: 8561955619 पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे उचित समाधान प्राप्त करें। On Line-Health Care Friend and Marital Dispute Consultant-Dr. PL Meena, Health WhatsApp No. 8561955619

----------------------------देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये गये हैं। जो बेशक कुछ मंहगे अवश्य हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों को "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है और चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम लगातार जारी है। तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज चाहने वाले माफ करें।—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-14.03.2018.
शीघ्रपतन नाशक सात घरेलु ​नुस्खे!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
'शीघ्रपतन' शीर्षक से 30 नवम्बर, 2017 को लिखे लेख में निम्न विषयों की जानकारी दी जा चुकी है:-
  • 1. शीघ्रपतन से कितने पुरुष परेशान रहते हैं?
  • 2. शीघ्रपतन किसे कहते हैं?
  • 3. वीर्य स्खलन की समय सीमा क्या होनी चाहिये?
  • 4. स्त्री की योन तृप्ति क्या है?
  • 5. सम्भोग को समान भोग बताना कितना सही?
  • 6. शीघ्रपतन का गर्भधारण से सम्बन्ध?
  • 7. शीघ्रपतन दाम्पत्य बिखराव का कारण!
  • 8. शीघ्रपतन के कारण।
शीघ्रपतन नाशक घरेलु ​नुस्खों के बारे में बताने से पूर्व पाठकों के लिये उक्त लेख को पढना उचित रहेगा। अत: जिन पाठकों ने उक्त लेख नहीं पढा, वे हमारी वेबसाइट 'स्वास्थ्य रक्षक सखा' (www.healthcarefriend.in) पर जाकर या यहां क्लिक करके या निम्न लिंक पर जाकर इसे पढ सकते हैं। (http://www.healthcarefriend.in/2017/11/blog-post_30.html)




शीघ्रपतन नाशक घरेलु ​नुस्खे पढने से पहले यह जानना उचित होगा कि पूर्वोक्त 'शीघ्रपतन' शीर्षक से लिखित लेख में बताये गये शीघ्रपतन के 20 कारणों के अलावा पेट की गड़बड़ी भी 'शीघ्रपतन' एक बड़ा शारीरिक कारण होता है। अत: किसी योग्य चिकित्सक से 'शीघ्रपतन' का उपचार/परामर्श लेते समय अपने पेट की तकलीफों को कभी नहीं छुपायें। निम्न नुस्खों का इस्तेमाल करने से पहले अपने पेट की तकलीफों का उपचार अवश्य करवा लें। अन्यथा बताये गये परिणाम नहीं मिलेंगे।

शीघ्रपतन नाशक घरेलु ​नुस्खों की जानकारी प्रदान करने से पहले यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि इन नुस्खों में बतायी गयी औषधियों की सामग्री का उपयोग करने से पहले किसी अनुभवी चिकित्सक का परामर्श लेना जरूरी होगा। क्योंकि दवाई की मात्रा का सही-सही निर्धारण हर एक पुरुष की आयु, यौन क्षमता/समस्या, शारीरिक एवं मानसिक लक्षणों आदि के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसके अलावा बताये गये नुस्खों में जिन आयुर्वेदिक औषधियों का उल्लेख किया गया है, यदि वे सभी शुद्ध, आॅर्गेनिक, ताजा, छाया शुष्क होंगी और जरूरत के अनुसार मात्रा में निधारित समय तक सेवन की जायेंगी तो ही वांछित परिणाम मिलेंगे।

शीघ्रपतन नाशक सात घरेलु ​नुस्खे!

1. गिलोय+बड़ा गोखरू+आंवला पाउडर: गिलोय, बड़ा गोखरू और आंवला बराबर मात्रा में लेकर कूट, पीस और कपड़छन करके पाउडर बना लें। इसका एक चम्मच चूर्ण प्रतिदिन मिश्री और घी के साथ सेवन करने से संभोग शक्ति तथा स्तम्भन शक्ति मजबूत होती है। इन तीनों औषधियों के अलावा कुछ अन्य औषधियों के मिश्रण सहित यौन शक्तिवर्धक एवं शीघ्रपतन नाशक यह पाउडर जरूरत के अनुसार हमारी ओर से रोगियों को दिया जाता है।
2. अलसी और वंशलोचन (अधिकतर पंसारी नकली वंशलोचन बेचते हैं, क्योंकि शुद्ध वंशलोचन बहुत मंहगा आता है) समान मात्रा में लेकर कूट, पीस और कपड़छन करके पाउडर बना लें। इसे गिलोय के रस तथा शहद के साथ हफ्ते-दस दिन से एक माह तक सेवन करें। इससे वीर्य गाढ़ा होकर यौन शक्ति एवं स्तम्भन शक्ति बढती है।
3. शोधित कौंच (निर्धारित रीति से कौंच को दूध में शोधित करके ही उपयोग किया जाना चाहिये) के बीज, शतावरी, बड़ा गोखरू, तालमखाना, अतिबला और नागबला को एक साथ मिलाकर कूट, पीस और कपड़छन करके पाउडर बना लें। इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ रोजाना सेवन करने से स्तम्भन शक्ति बढती है और शीघ्रपतन के रोग में लाभ होता है। रात को संभोग क्रिया करने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से संभोग क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होती है। वीर्य का पतलापन, यौन-दुर्बलता और युवकों में विवाह के बाद शीघ्रपतन होना जैसे रोगों में इसका सेवन बहुत ही लाभकारी रहता है। ज्यादातर लोग कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक सेक्स की पॉवर बरकरार रखने के लिए किया जाता है। स्थायी यौन क्षमता बढाने के लिये कौंच के शोधित कौंच बीज पाउडर (कोई साईड इफैक्ट नहीं) विदेशी वियाग्रा (अनेक साईड इफैट) से भी 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है, चाहे लिंग की कमजोरी/शिथिलता/ढीलापन, वीर्य पतला, नपुंसकता या शीघ्रपतन कुछ भी समस्या हो सभी का स्थायी इलाज है-शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच बीज का शोधित पाउडर। जयपुर स्थित हमारे निरोगधाम पर आॅर्गेनिक रीति से सफेद और काले कौंच की छोटे स्तर पर खेती की जा रही है। जिनका उपयोग रोगियों को दी जाने वाली दवाईयों में किया जा रहा है। व्यापार के लिये कौंच उपलब्ध नहीं है।
4. निर्धारित रीति से शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच के बीज के शोधित पाउडर के साथ शुद्ध सफेदमूसली और नागौरी अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर कूट, पीस और कपड़छन करके पाउडर बना लें। इस पाउडर की 1 चम्मच मात्रा सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से पुरुषों की सभी प्रकार की यौन-समस्याओं को दूर किया जा सकता है। हर प्रकार की शारीरिक कमजोरी दूर करने की ताकत इन कौंच के बीजों में होती है। आकार के अनुसार कौंच के बीज दो प्रकार के होते हैं-छोटे और बड़े। छोटे कौंच स्त्रियों की बीमारियों में अधिक उपयोगी होते हैं। जो योनि दोष, ब्रण, कुष्ठ दूर करते है और रक्तविकार नाशक हैं।
5. देशी बबूल की छाया शुष्क कच्ची पत्तियां, छाया शुष्क कच्ची फलियां और शुद्ध गोंद को बराबर मात्रा में मिलाकर कूट, पीस और कपड़छन करके पाउडर बना लें। इनमें इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर हवाबंद बोतल में रख लें। इस पाउडर को नियमित रूप से 2 महीने तक 2-2 चम्मच दूध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है। शीघ्रपतन से मुक्ति मिलती है और स्तम्भन शक्ति बढ़ती है। इसके अलावा यह स्वप्नदोष में भी बहुत लाभकारी है।
6. यदि शुद्ध आॅर्गेनिक मेथी के कुछ दाने रोज सेवन किये जाएं तो पुरुषों की मानसिक यौन सक्रियता बढ़ती है। इसके सेवन से पुरुषों में होने वाली लिंग उत्थान की समस्या हल हो सकती है। मेथी टेस्टोस्टेरोन हार्मोन में बढोतरी करके अन्य यौन समस्याओं को भी ठीक करने में मदद करती है। रात को सोते समय आधा चम्मच पिसा हुआ शुद्ध मेथी दाना पाउडर तथा आधा चम्मच धनिया पाउडर मिलाकर गर्म दूध के साथ नियमित रूप से एक महीने तक सेवन करने से पुरुषों की यौन शक्ति में बढ़ोतरी होती है। ब्रिसबेन स्थित आणविक चिकित्सा केंद्र के अनुसंधानकर्ताओं का दावा है कि भारत में सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली मेथी पुरुषों की कामेच्छाओं को काफी अच्छे स्तर तक बढ़ाने में सक्षम है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार मेथी के बीज में पाया जाने वाला सैपोनीन पुरुषों में पाए जाने वाले टेस्टोस्टेरॉन हॉरमोन में उत्तेजना पैदा करता है।
7. जायफल का पाउडर एक चौथाई चम्मच, सुबह-शाम शहद के साथ खायें और इसका तेल सरसों के तेल में मिलाकर शिश्न (लिंग) पर मलें। इससे नपुंसकता और शीघ्रपतन का रोग समाप्त हो जाता है।

नोट: याद रहे वर्तमान में फसल में बढोतरी के मकसद से अधिकतर किसान खाद, खरपतवार नाशक दवाई, कीटनाशक जहर इत्यादि का जमकर उपयोग करते हैं। जिसके चलते फसलों में रोगनाशक प्राकृतिक औषधीय तत्व गड़बड़ा जाते हैं या कम या नष्ट हो जाते हैं। जिसका एक मात्र समाधान है-आॅर्गेनिक खेती जो तुलनात्मक रूप से बहुत मंहगी पड़ती है और उत्पादन कम होता है। लेकिन मानवता को रोगमुक्त करना है तो आॅर्गेनिक खेती समय की मांग है। इस दिशा में हमारी ओर से बहुत छोटे स्तर पर प्रयास जारी हैं। ऐसी स्थिति में होम्योपैथिक दवाईयों का सेवन करना अधिक सुरक्षित और परिणामदायी सिद्ध होता है। इस बारे में अगले लेख में जानकारी दी जायेगी।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', HCF&MDC
(Health Care Friend and Marital Dispute Consultant)
स्वाथ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार
Health WhatsApp हेल्थ वाट्सएप: 8561955619
Mobile No. मोबाईन नम्बर: 9875066111 (10AM to 10PM)
Jaipur, Rajasthan, 07 दिसम्बर, 2017, 08.14AM
निरोगधाम पर 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच

हमारा मकसद है रोगियों का आरोग्य अर्थात रोगमुक्ति। यह तब ही सम्भव है, जबकि उनको सही, शुद्ध और ताजा दवाईयां उपलब्ध हों। वर्तमान में बड़े-बड़े नाम वाले बाबाओं तक की औषधियां निर्धारित मानदण्डों पर खरी नहीं उतर रही हैं। ऐसे में रोगी करें भी तो करें क्या?

ऐसे में हम कम से कम हमारे सम्पर्क में आने वाले रोगियों को तो 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियां उपलब्ध करवाने की कौशिश कर रहे हैं। इस दिशा में हमने छोटी सी शुरूआत की है। हमने हमारे फॉर्म पर कुछ अति महत्वपूर्ण औषधियों की खेती शुरू की है। जिनमें यौन रोगों के निवारण तथा यौन क्षमता बढाने के लिये सुप्र​षिद्ध——कौंच——नामक औषधि भी शामिल है। पिछले वर्ष भी हमने 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच की खेती की थी। कौंच के पाउडर से अकल्पनीय परिणाम सामने आये हैं। यद्यपि हम रोगियों की जरूरत पूरी करने में असफल रहे। इस कारण इस बार हमने पिछले साल की तुलना में 100 गुणा अधिक कौंच के पौधे लगाये हैं। कौंच के पौधों का रोपण वर्षाकाल के शुरू होने से बहुत पहले ही कर दिया था। अत: अब बेल छोड़ रहे हैं। जिनके ओरिजनल चित्र प्रस्तुत हैं।

कौंच सहित महत्वपूर्ण औषधियों की पैदावार करना इस कारण भी जरूरी हो गया, क्योंकि बाजार में सड़ी—गली और अनुपयोगी औषधियां मिलती हैं। जिनसे सही परिणाम नहीं ​मिलने पर आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों का विश्वास टूटता है और उपचार करने वाला चिकित्सक बदनाम होते हैं। साथ ही रोगी के धन का भी अपव्यय होता है। रोगी का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिये हमारा लेख—''कौंच : सड़ी-गली-पुरानी अनुपयोगी आयुर्वेदिक औषधियां!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश''' पढा जा सकता है।

यहां पर हमारे फॉर्म पर रोपे गये कौंच की बेलों के नवीनतम 11 जनू, 2017 के चित्र प्रस्तुत हैं।

कौंच के बारे में भी संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है:

कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते हैं। इसकी पत्तियों, बीजों व शाखाओं का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है। ज्यादातर कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक यौन—शक्ति बरकरार रखने के लिए किया जता है। आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि कौंच के बीज अमेरिका की प्रसिद्ध सेक्स शक्ति वर्धक दवा वियग्रा से भी 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली होते है। मेरा अपना अनुभव है कि 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच को सही तरीके से शोधन करके अन्य 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक दवाईयों के साथ सेवन करने से निम्न तकलीफों में अकल्पनीय परिणाम मिलते हैं:
1 लिंग की कमजोरी।
लिंग की नसों की कमजोरी
2 वीर्य का पतलापन।
3 नपुंसकता/नामर्दी।
4 शीघ्रपतन/शीघ्रस्खलन।
5 उत्तेजना में कमी।
6 बदन दर्द/गठिया दर्द।
7 पेट/गैस की तकलीफे।
8 मधुमेह/डायबिटीज।
9 पुराना बुखार।
10 बदन में सूजन।
11 गैस की समस्या।
12 श्वेत प्रदर/ल्यूकोरिया।
13 मासिकधर्म की तकलीफें।
14 स्तन वृद्धि।
15 खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव।
16 शारीरिक बलवृद्धि।
17 वजन बढ़ाना।
18 पुरानी खांसी।
19 उदर कृमि नष्ट।
20 शुक्राणुओं की कमी।
इत्यादि।
नोट: हमें खेद है कि हमारे पास उपलब्ध सौ फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों की उपलब्धता में कमी के कारण हम, हम से सम्पर्क करने वाले सभी आयुर्वेद प्रेक्टिशनर्स को औषधियां उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। क्योंकि हमारी पहली प्राथमिकता हम से सम्पर्क करने वाले रोगियों का उपचार करना है।
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*कौंच : सड़ी-गली-पुरानी अनुपयोगी आयुर्वेदिक औषधियां!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'*

आयुर्वेद के बारे में यह कहने वाले लोग बहुत सारे हैं कि-
  • *आयुर्वेद की दवाईयां कोई असर ही नहीं करती?*
  • या
  • *आयुर्वेद से कोई फायदा ही नहीं होता?*
  • या
  • *मैंने आयुर्वेदिक दवाईयां भी लेकर देख ली, कुछ नहीं हुआ।*
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जहां एक ओर आयुर्वेद के प्रति लोगों में गहरी आस्था है, वहीं आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से असन्तुष्ट लोगों की संख्या भी कम नहीं है। लोगों का आयुर्वेद से मोहभंग होता दिखना दु:खद और चिन्ताजनक है। जिसके अनेक कारण हो सकते हैं। जिनकी पड़ताल करने की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी भारत सरकार और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से जुड़े लोगों की है।
*मैं भी आयुर्वेद के प्रति गहरी आस्था और विश्वास रखने वालों में शामिल हूं। अत: इस बारे में अपना अनुभव बांटना जरूरी समझता हूं।*
मैं आयुर्वेदिक दवाईयों की उपलब्धता के लिये जयपुर के प्रतिष्ठित त्रिपोलिया बाजार से अनेक औषधियां लेकर आता रहता हूं। जिन औषधियों के बीज दवाई के रूप में उपयोग करने होते हैं। उनको उपयोग में लाने से पहले मैं अंकुरित करके देखता हूं। जो बीज अंकुरित नहीं होते वे सड़े-गले और पुराने होते हैं। अत: ऐसे बीजों को मैं फेंक देता हूं।

पिछले दिनों मुझे कौंच के पाउडर की जरूरत थी। अत: बाजार से पाउडर खरीदने के बजाय मैंने कौंच खरीदना उचित समझा। मैं सफेद और काले दोनों प्रकार के कौंच के बीज खरीद कर लाया। सफेद बीजों का अंकुरण तो बेहद उत्साहवर्द्धक रहा, लेकिन 250 ग्राम काले कौंच के बीजों में से एक भी बीज अंकुरित नहीं हुआ! यदि मैं कौंच का पाउडर लाया होता तो मुझे कभी पता नहीं चलता कि कौंच का पाउडर उपयोगी है या अनुपयोगी?

इस उदाहरण से पाठकों को समझ में आ जाना चाहिये कि पंसारी अर्थात् दवा विक्रेता पुरानी और सड़ी-गली औषधियों को बेचकर आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेदिक उपचार में आस्था तथा विश्वास रखने वालों के प्रति कितना बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं। सबसे दु:खद इसे रोकने के लिये सरकारी ऐजेंसी कुछ नहीं कर रही हैं।

अत: आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को कोसने के बजाय, आयुर्वेद के उपचार के असफल होने के मूल कारणों को खोजकर दूर करना बहुत जरूरी है। इस दिशा में हमारी ओर से छोटा सा प्रयास किया गया है। हमने अनेक दर्जन आयुर्वेदिक औषधियों को हमारे फार्म पर उगा रखा है। जिनसे उम्मीद से भी अधिक सुखद परिणाम सामने आ रहे हैं। दवाईयां तत्काल असर कर रही हैं। आने वाले एक साल में कौंच की एक क्विंटल से अधिक पैदावार होने की सम्भावना है। इस बार भी हमने सफेद कौंच की शुद्ध पैदावार प्राप्त की हैं।

*सरकार को सुझाव*
मेरा सुझाव है कि भारत सरकार को इस दिशा में ध्यान देकर ऐसा कानून बनाने की जरूरत है, जिससे आयुर्वेद की सड़ी-गली-पुरानी औषधियां बेचना दण्डनीय अपराध हो।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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By अभिषेक बहुगुणा | 1 December 2015

इस का वानस्पतिक नाम मुकुना प्रूरिएंस है और यह फाबेसी परिवार का पौधा है. बात हो रही है कौंच की जो भारत के लोकप्रिय औषधीय पौधों में से एक है. यह भारत के मैदानी इलाकों में झाडि़यों के रूप में फैली हुई होती है. इस झाड़ीय पौधे की पत्तियां नीचे की ओर झुकी होती हैं. इस के भूरे रेशमी डंठल 6.3 से 11.3 सेंटीमीटर लंबे होते हैं. इस में झुके हुए गहरे बैगनी रंग के फूलों के गुच्छे निकलते हैं, जिस में करीब 6 से 30 तक फूल होते हैं. इस पौधे में सेम जैसी फलियां लगती हैं. कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते हैं. इस की पत्तियों, बीजों व शाखाओं का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है. ज्यादातर कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक सेक्स की कूवत बरकरार रखने के लिए किया जता है.

जिन खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है, उन के लिए भी कौंच का इस्तेमाल मुफीद होता है. इस के बीजों के इस्तेमाल से याद रखने की कूवत बढ़ती है. वजन बढ़ाने में भी कौंच का इस्तेमाल कारगर साबित होता है. इस के अलावा गैस, दस्त, खांसी, गठिया दर्द, मधुमेह, टीबी व मासिकधर्म की तकलीफों के इलाज के लिए भी कौंच के बीजों का इस्तेमाल किया जाता है.

कौंच के बीजों में निम्न रोगों को दूर करने की कूवत होती है:
  1. * दर्द व पेट की तकलीफें * मधुमेह
  2. * बुखार * खांसी, * सूजन
  3. * गुर्दे की पत्थरी * गैस की समस्या
  4. * नपुंसकता * नसों की कमजोरी
1. यौन संबंधी परेशानियां : कौंच को कपिकच्छू और कैवांच वगैरह नामों से भी जाना जाता है. आयुर्वेद में इसे यौन कूवत बढ़ाने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. सेक्स कूवत बढ़ाने के लिए इस के बीज बेहद कारगर होते हैं. कौंच का इस्तेमाल मर्दों व औरतों की हमबिस्तरी की ख्वाहिश में इजाफा करता है. यह नपुंसकता दूर करने में मदद करती है.
2. कौंच के बीजों का इस्तेमाल : कौंच के बीजों का इस्तेमाल करने के लिए उन को दूध या पानी में उबाल कर उन के ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए. इस के बाद बीजों को सुखा कर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए. इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा को मिश्री व दूध में मिला कर रोज सुबहशाम इस्तेमाल करने से मर्दों के अंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है. कौंच के बीजों के साथ सफेदमूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के सुबहशाम 1 चम्मच मात्रा दूध के साथ लेने से मर्दों की तमाम सेक्स संबंधी दिक्कतों को दूर किया जा सकता है. कौंच के बीजों के साथ शतावरी, गोखरू, तालमखाना, अतिबला और नागबला को एक साथ बराबर मात्रा में मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के इस चूर्ण को मिश्री मिला कर 2-2 चम्मच चूर्ण सुबह और शाम के वक्त दूध के साथ रोज लेने से मर्द के अंग की कूवत बढ़ती है. सोने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को कुनकुने दूध के साथ लेने से जिस्मानी संबंध बेहतर होते हैं.

दाम्पत्य सुख को समझने और भोगने के इच्छुक हर एक स्त्री और पुरुष को पढने योग्य अति महत्वपूर्ण और उपयोगी जानकारी प्रदान करने वाला एक पढने योग्य आलेख!-"अतृप्त दाम्पत्य कारण एवं निवारण!"

10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना व बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंधा, जायफल व रुद्रंतीफल, 20-20 ग्राम सफेदमूसली, कौंच के बीज व त्रिफला और 15-15 ग्राम त्रिकुट व गोखरू को एकसाथ मिला कर चूर्ण बना लें. इस के बाद इस मिश्रण को 16 गुना पानी में मिला कर उबालने पर जब पानी सूख जाए तो उस में 10 ग्राम भांगरे का रस मिला कर दोबारा उबालें और जब मिश्रण गाढ़ा हो जाए तो इसे आंच से उतारें और ठंडा कर के कपड़े से अच्छी तरह मसल कर छान लें और सुखा कर व पीस कर चूर्ण बनाएं. इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसंतकुसूमार रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग मिलाएं. इस मिश्रण की आधा ग्राम मात्रा शहद के साथ मिला कर सुबहशाम चाट कर उस के बाद दूध पीना बेहद फायदेमंद होता है. इस औषधि के सेवन से मर्द के बल में इजाफा होता है. इस औषधि को लेने के दौरान तेज मिर्चमसाले वाली, तली हुई व खट्टी चीजें नहीं खानी चाहिए.

कौंच के बीजों के साथ उड़द, गेहूं, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में ले कर बारीक पीस कर दूध मिला कर आटे की तरह गूंध कर इस की छोटीछोटी पूडि़यां बना कर गाय के घी में तलें. इन पूडि़यों को दूध के साथ खाने से भी काफी फायदा होता है. 100-100 ग्राम कौंच के बीज, शतावरी, उड़द, खजूर, मुनक्का, दाख व सिंघाड़ा को मोटा पीस कर 1 लीटर दूध व 1 लीटर पानी मिला कर हलकी आग में पकाएं. गाढ़ा होने पर आंच से उतारें और ठंडा होने पर छानें. इस में 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिलाएं. इस मिश्रण की 50 ग्राम मात्रा में शहद मिला कर रोजाना सुबहशाम खाने से बल बढ़ता है.

कौंच के अन्य लाभ: कौंच तनाव और चिंता को दूर करती है. यह खासतौर पर यौन ग्रंथियों को मजबूती प्रदान करती है. यह तंत्रिकातंत्र के लिए एक खास पोषक तत्त्व के रूप में काम करती है.

तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियां : कौंच तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियों के लिए एक खास दवा के रूप में इस्तेमाल की जाती है. यह पार्किसंस रोग में भी इस्तेमाल की जाती है.

कोलेस्ट्राल और ब्लडशुगर : कौंच कोलेस्ट्राल कम करने की एक खास दवा है, साथ ही यह ब्लडशुगर के स्तर को सही करने के लिए फायदेमंद दवा है. इस के अलावा यह एक मानसिक टानिक के रूप में भी कारगर होती है.
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  1. * कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम दूध के साथ लेने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और वीर्य की कमी होना जैसे रोग जल्दी दूर हो जाते हैं।
  2. * मूसली के लगभग 10 ग्राम चूर्ण को 250 ग्राम गाय के दूध में मिलाकर अच्छी तरह से उबालकर किसी मिट्टी के बर्तन में रख दें। इस दूध में रोजाना सुबह और शाम पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और संभोग क्रिया की इच्छा न करना, वीर्य की कमी होना आदि रोगों में बहुत लाभ मिलता है।
  3. * कौंच को कपिकच्छू और कैवांच आदि के नामों से भी जाना जाता है। संभोग करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए इसके बीज बहुत लाभकारी रहते हैं। इसके बीजों का सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है, संभोग करने की इच्छा तेज होती है और शीघ्रपतन रोग में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग करने के लिए बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनके ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को सुखाकर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के साथ दूध में मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है।
  4. * एक किलो इमली के बीजों को तीन-चार दिनों तक पानी में भीगे पड़े रहने दें। इसके पश्चात उन बीजों को पानी से निकालकर और छिलके उतारकर ठीक तरह से पीस लें। इसमें इससे दो गुना पुराने गुड़ को मिलाकर इसे आटे की तरह गूंथ लें। फिर इसकी बेर के बराबर गोलियां बना लें। सेक्स क्रिया करने के दो घंटे पहले इसे दूध के साथ इस्तेमाल करें। इस तरह का उपाय सेक्स करने की ताकत को और अधिक मजबूत बनाता है।
  5. * शतावरी, गोखरू, तालमखाना, कौंच के बीज, अतिबला और नागबला को एक साथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ रोजाना सेवन करने से स्तंभन शक्ति तेज होती है और शीघ्रपतन के रोग में लाभ होता है। रात को संभोग क्रिया करने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से संभोग क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होती है। वीर्य का पतला होना, यौन-दुर्बलता और विवाह के बाद शीघ्रपतन होना जैसे रोगों में इसका सेवन बहुत लाभकारी रहता है।
  6. * मोचरस, कौंच के बीज, शतावरी, तालमखाना को 100-100 ग्राम की मात्रा में लेकर लगभग 400 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से बुढ़ापे में भी संभोग क्रिया का पूरा मजा लिया जा सकता है। इस योग को लगभग 2-3 महीने तक सेवन करना लाभकारी रहता है।
  7. * लगभग 6 चम्मच अदरक का रस, 8 चम्मच सफेद प्याज का रस, 2 चम्मच देशी घी और 4 चम्मच शहद को एक साथ मिलाकर किसी साफ कांच के बर्तन में रख लें। इस योग को रोजाना 4 चम्मच की मात्रा में सुबह खाली पेट सेवन करना चाहिए। इसको लगातार 2 महीने तक सेवन करने से स्नायविक दुर्बलता, शिथिलता, लिंग का ढीलापन, कमजोरी आदि दूर हो जाते हैं।
  8. * बबूल की कच्ची पत्तियां, कच्ची फलियां और गोंद को बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें और इनमें इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी डिब्बे आदि में रख लें। इस चूर्ण को नियमित रूप से 2 महीने तक 2-2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है। इसके अलावा यह योग शीघ्रपतन और स्वप्नदोष जैसै रोगों में बहुत लाभकारी रहता है।
  9. * सफेद मूसली के चूर्ण और मुलहठी के चूर्ण को बराबर की मात्रा में मिला लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम शुद्ध घी के साथ मिलाकर चाट लें और ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस योग को नियमित सेवन करने से धातु वृद्धि होती है, नपुंसकता दूर होती है और शरीर पुष्ट और शक्तिशाली बनता है।
  10. * 10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना और बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंध, जायफल और रूदन्तीफल, 20-20 ग्राम सफेद मूसली, कौंच के बीज और त्रिफला तथा 15-15 ग्राम त्रिकटु, गोखरू को एक साथ जौकुट करके चूर्ण बना लें। इसके बाद इस मिश्रण के चूर्ण को लगभग 16 गुना पानी में मिलाकर उबालने के लिए रख दें। उबलने पर जब पानी जल जाए तो इसमें 10 ग्राम भांगरे का रस मिलाकर दुबारा से उबाल लें। जब यह पानी गाढ़ा सा हो जाए तो इसे उतारकर ठंडा करके कपड़े से अच्छी तरह मसलकर छान लें और सुखाकर तथा पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसन्तकुसूमाकर रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग को मिला लें। इस औषधि को आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम चाटकर ऊपर से गर्म दूध पी लें। 
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MONDAY, 22 AUGUST 2016
कपिकच्छू/कौंच/केवांछ (Cowhage) : 
कपिकच्छुभृंश वृष्या मधुरा बृंहणी गुरुः।
तिक्ता वातहरी बल्या कफपिस्रानाशिनी।।
तद्विजं वातशमन स्मृतं वाजीकरं परम्।।भा. प्र.।।
➡ कपिकच्छू/कौंच/केवांछ (Cowhage) :
सामान्य नाम 
लैटिन नाम : mucuna pruricus 
अंग्रेजी : cowhage.
हिन्दी : कौच ,केवांछ।
मराठी : कुहिलेवे बीज।
गुजरती : कवचाना बीज ।
बंगला : आलाकुशी ।

➡ कपिकच्छू/कौंच/केवांछ का सामान्य परिचय :
कौंच लता जाति की वनस्पति है । जो सूक्ष्म में रोमो से युक्त होती । यह वर्षांत में उत्पन्न होती है यह गांव के बाहर बागों एवं जंगलों में किसी झाड़ी या वृक्ष पर फैली हुई होती है इसका पत्र विषम एवं सेम के पत्तों के समान प्रत्येक पत्र दंड पर 3 की संख्या में होते हैं पुष्पा नीलाभ है रक्त वर्ण के या श्वेत वर्ण के जूतों में होते हैं । इसकी फली 2 से 3 इंच लम्बी 1/2इंच चौड़ी तथा इसके दोनों ओर के अग्रभाग एक दूसरे के विपरीत दिशा में मोटे होते हैं। यह भूरे रंग की सूक्ष्म सघन व मजबूत रोमो से आवृत होती है। यह रोम शरीर में लगने पर अति तीव्र खुजली के साथ दाह एवं शोथ उत्पन्न हो जाता है। बीज प्रत्येक फली में 5 से 6 काले चमकीले रंग के बीज होते है। www.allayurvedic.org
कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते हैं. इसकी पत्तियों, बीजों व शाखाओं का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है. ज्यादातर कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक सेक्स की पॉवर बरकरार रखने के लिए किया जता है। कौंच के बीज वियग्रा से भी 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली होते है, चाहे लिंग कमजोर, वीर्य पतला, नपुंसकता या शीघ्रपतन हो सभी का रामबाण उपाय कौंच है।
जिन खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता?है, उन के लिए भी कौंच का इस्तेमाल मुफीद होता है. इस के बीजों के इस्तेमाल से याद रखने की कूवत बढ़ती है. वजन बढ़ाने में भी कौंच का इस्तेमाल कारगर साबित होता है. इस के अलावा गैस, दस्त, खांसी, गठिया दर्द, मधुमेह, टीबी व मासिकधर्म की तकलीफों के इलाज के लिए भी कौंच के बीजों का इस्तेमाल किया जाता है.
➡ कौंच के बीजों में निम्न रोगों को दूर करने की कूवत होती है :
दर्द
पेट की तकलीफें
मधुमेह
बुखार
खांसी
सूजन
गुर्दे की पत्थरी
गैस की समस्या
नपुंसकता
लिंग और नसों की कमजोरी
यौन संबंधी परेशानियां
कौंच को कपिकच्छू और कैवांच वगैरह नामों से भी जाना जाता है. आयुर्वेद में इसे यौन कूवत बढ़ाने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. सेक्स कूवत बढ़ाने के लिए इस के बीज बेहद कारगर होते हैं. कौंच का इस्तेमाल मर्दों व औरतों की हमबिस्तरी की ख्वाहिश में इजाफा करता है. यह नपुंसकता दूर करने में मदद करती है। www.allayurvedic.org
रासायनिक संगठन : इसमें राल, टेनिन,वसा एवम मैगनीज रहता है।
गुण : गुरु ,स्निग्ध।
रस : मधुर , तिक्त।
वीर्य : उष्ण । 
विपाक : मधुर ।
➡ कपिकच्छू/कौंच/केवांछ का विभिन्न रोगों में प्रयोग :
कौंच के बीज पोस्टिक उत्तेजक वाजीकरण एवं वातशामक होते हैं केंचुए को निकालने के लिए इसके रोमो को वृत मधु या गुड़ के साथ गोली बनाकर खिलाते है। इसके पश्चात विरेचक औषधि अवश्य देते हैं जिससे केंचुए निकल जाते है।
केवांच के पत्ते को कालीमिर्च के साथ पीसकर पिलाने से उदर कृमि नष्ट होते है। धातु पुष्टि के लिए बीज चोरों ने तालमखाने के चूर्ण को मिश्री मिलाकर ताजे दूध के साथ देते हैं, इसकी जड़ों को मुख में रखकर चूसने से शीघ्रपतन नहीं होता हैं। बीज चूर्ण व गोक्षुर चूर्ण दोनों समान भाग लेकर ठंड के साथ मिलाकर दूध से लेने से यह है, धातु पुष्ट करता हैं।
तीव्र ज्वर में मूल चूर्ण को शहद यहां गर्म जल से देने से दाह शांत होता है एवं ज्वार कम होता है। इसके जड़ का स्वरस या क्वाथ स्नायु दौर्बल्य अंगघात, अर्दित आदि वात रोग में लाभ करता है। www.allayurvedic.org
कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा शीघ्रपतन के देसी इलाज के लिए कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। फिर एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम एक कप दूध के साथ लेने से शीघ्रपतन और वीर्य की कमी जैसे रोग दूर हो जाते हैं।
कपिकच्छू/कौंच/केवांछ का उपयोगी भाग (प्रयोज्य अंग) : बीज, मूल एवं पत्र ।
बीज चूर्ण सेवन मात्रा : 2 से 6 ग्राम तथा रोम 250 मि. ग्राम की मात्रा में। मूल क्वाथ 5 से 10 तोला ।
आयुर्वेदीक स्टोर पर उपलब्ध विशिष्ठ योग : वानरी गुटिका, माषवलादि पाचन आदि ।
➡ कौंच के बीजों का इस्तेमाल : कौंच के बीजों का इस्तेमाल करने के लिए उन को दूध या पानी में उबाल कर उन के ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए. इस के बाद बीजों को सुखा कर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए. इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा को मिश्री व दूध में मिला कर रोज सुबहशाम इस्तेमाल करने से मर्दों के अंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है. कौंच के बीजों के साथ सफेदमूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के सुबह-शाम 1 चम्मच मात्रा दूध के साथ लेने से मर्दों की तमाम सेक्स संबंधी दिक्कतों को दूर किया जा सकता है. कौंच के बीजों के साथ शतावरी, गोखरू, तालमखाना, अतिबला और नागबला को एकसाथ बराबर मात्रा में मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के इस चूर्ण को मिश्री मिला कर 2-2 चम्मच चूर्ण सुबह और शाम के वक्त दूध के साथ रोज लेने से मर्द के अंग की कूवत बढ़ती है. सोने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को कुनकुने दूध के साथ लेने से जिस्मानी संबंध बेहतर होते हैं।

कौंच के बीजों के साथ उड़द, गेहूं, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में ले कर बारीक पीस कर दूध मिला कर आटे की तरह गूंध कर इस की छोटीछोटी पूडि़यां बना कर गाय के घी में तलें. इन पूडि़यों को दूध के साथ खाने से भी काफी फायदा होता है. 100-100 ग्राम कौंच के बीज, शतावरी, उड़द, खजूर, मुनक्का, दाख व सिंघाड़ा को मोटा पीस कर 1 लीटर दूध व 1 लीटर पानी मिला कर हलकी आग में पकाएं. गाढ़ा होने पर आंच से उतारें और ठंडा होने पर छानें. इस में 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिलाएं. इस मिश्रण की 50 ग्राम मात्रा में शहद मिला कर रोजाना सुबहशाम खाने से बल बढ़ता है। 

10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना व बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंधा, जायफल व रुद्रंतीफल, 20-20 ग्राम सफेदमूसली, कौंच के बीज व त्रिफला और 15-15 ग्राम त्रिकुट व गोखरू को एकसाथ मिला कर चूर्ण बना लें. इस के बाद इस मिश्रण को 16 गुना पानी में मिला कर उबालने पर जब पानी सूख जाए तो उस में 10 ग्राम भांगरे का रस मिला कर दोबारा उबालें और जब मिश्रण गाढ़ा हो जाए तो इसे आंच से उतारें और ठंडा कर के कपड़े से अच्छी तरह मसल कर छान लें और सुखा कर व पीस कर चूर्ण बनाएं. इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसंतकुसूमार रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग मिलाएं. इस मिश्रण की आधा ग्राम मात्रा शहद के साथ मिला कर सुबहशाम चाट कर उस के बाद दूध पीना बेहद फायदेमंद होता है. इस औषधि के सेवन से मर्द के बल में इजाफा होता है. इस औषधि को लेने के दौरान तेज मिर्चमसाले वाली, तली हुई व खट्टी चीजें नहीं खानी चाहिए।
➡ कौंच के अन्य लाभ : 
कौंच तनाव और चिंता को दूर करती है. यह खासतौर पर यौन ग्रंथियों को मजबूती प्रदान करती है. यह तंत्रिकातंत्र के लिए एक खास पोषक तत्त्व के रूप में काम करती है।
तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियां : कौंच तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियों के लिए एक खास दवा के रूप में इस्तेमाल की जाती है. यह पार्किसंस रोग में भी इस्तेमाल की जाती है।
कोलेस्ट्राल और ब्लडशुगर : कौंच कोलेस्ट्राल कम करने की एक खास दवा है, साथ ही यह ब्लडशुगर के स्तर को सही करने के लिए फायदेमंद दवा है. इस के अलावा यह एक मानसिक टानिक के रूप में भी कारगर होती है।
http://www.allayurvedic.org/2016/08/Kaunch-ke-bij-ke-adbhut-fayde.html
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सभी यौन समस्याओं का रामबाण उपाय है कौंच के बीज … जानिए इसके अन्य लाभ
August 25, 2016

चाहे लिंग कमजोर हो या वीर्य पतला हो पतला या फिर नपुंसकता या शीघ्रपतन हो ….सभी यौन समस्याओं का रामबाण उपाय है कौंच के बीज … जानिए इसके अन्य फायदे

आयुर्वेद में कौंच के बीज औषधीय गुणों से भरपूर मने गए हैं।ज्यादातर कौंच के बीज का और और इसके पौधे के अन्य अंगों का इस्तेमाल लंबे समय तक सेक्स की इच्छा को बरकरार रखने के लिए किया जता है। जिन खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है, उनके लिए भी कौंच का इस्तेमाल बेहद लाभकारी होता है। इस के बीजों के इस्तेमाल से याद रखने की क्षमता भी बढ़ती है। वजन बढ़ाने के लिए भी कौंच का इस्तेमाल कारगर साबित होता है। इस के अलावा गैस,  दस्त, खांसी, गठिया का दर्द, मधुमेह, टीबी व मासिक धर्म की समस्याओं के उपचार के लिए भी कौंच के बीजों का इस्तेमाल किया जाता है। आइये जानते हैं इसके अन्य लाभों को।

जानिये क्या हैं कौंच के बीज के गुण : कौंच पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक, भारी, वातनाशक, मधुर, बलदायक और कफ, पित्त तथा रुधिरविकार नाशक होता है। इसके बीज वात नाशक और अत्यंत वाजीकारक होते हैं। कौंच प्रजनन अंगों के लिए सबसे अच्छा टॉनिक और कामोत्तेजक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

कैसे करें कौंच के बीजों का इस्तेमाल… जानिए
शीघ्रपतन की समस्या दूर करे : कौंच के बीजों को दूध या पानी में उबाल कर उनके ऊपर का छिलका उतार लें। अब बीजों को सुखा कर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा को मिश्री व दूध में मिला कर रोज सुबह और शाम खाने से मर्दों के अंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है।

नपुंसकता दोष दूर करे: कौंच के बीजों के साथ सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिला कर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का सुबहशाम दूध के साथ 1 चम्मच लेने से मर्दों की सही यौन संबंधी परेशानियां दूर हो जाती है।

संभोग शक्ति बढ़ाये: कौंच के बीजों के साथ तालमखाना, शतावरी, गोखरू, अतिबला और नागबला को एक साथ बराबर मात्रा में मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण में मिश्री मिलाकर दूध के साथ 2-2 चम्मच चूर्ण सुबह और शाम लेने से मर्द के यौन अंग की शक्ति बढती है। सोने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को कुनकुने दूध के साथ लेने से जिस्मानी संबंध बेहतर होते हैं।

वीर्य गाढ़ा करे: कौंच के बीजों के साथ उड़द, गेहूं, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में मिला कर बारीक पीस कर इसमें दूध मिला कर आटे की तरह गूंध लें। इस की छोटी-छोटी पूडि़यां बना कर गाय के घी में तल लें। इन पूडि़यों को दूध के साथ खाने से भी वीर्य गाढ़ा करने में काफी फायदा होता है।

कौंच के अन्य लाभ :
तनाव दूर करे: कौंच के बीज तनाव और चिंता को दूर करने में बेहद सफल औषधि का काम करते हैं।

कोलेस्ट्राल और ब्लडशुगर: कौंच कोलेस्ट्राल कम करने के लिए एक सफल दवा है। साथ ही यह ब्लडशुगर के स्तर को नियंत्रित करने के लिए फायदेमंद दवा है।
स्रोत : http://ayursudha.in/?p=1211
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कौंच
Saturday, 3 October 2015
परिचय : कौंच की बेल होती है और यह भारत के गर्म स्थानों पर अधिक पाई जाती है। यह एक प्रकार की जंगली औषधि है। कौंच की बेल जून-जुलाई के महीने में पैदा होकर सितम्बर-नवम्बर में फूलती है। इसकी बेल झाड़ियों और पेड़ों पर फैलती है। इसके पत्ते 6 से 9 इंच लंबे व 3 पत्तों में होते हैं। इसके फूल एक से डेढ इंच लंबे, नीले या बैंगनी रंग के होते हैं। इसकी फली 2 से 4 इंच लंबी और लगभग आधी इंच चौड़ी होती है। फलिया गुच्छों में लगती है जिस पर सुनहरे व बारीक रोंए होते हैं। इसकी फली के रोंए त्वचा पर लगने से तेज खुजली होती है जिसे खुजलाने से जलन पैदा होती है। इसके फली के अन्दर बीज होते हैं और इसका छिलका सख्त होता है। इसके बीजों को ही औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार: कौंच की गिरी स्वाद में कड़वी,मीठी, तीखी, गर्म और मन व मस्तिष्क को शांत करने वाली होती है। इसका फल मीठा होता है। यह धातु को बढ़ाने वाला, बलदायक, पाचनशक्ति को बढ़ाने वाला, वात, पित्त, कफ और खून की खराबी को दूर करने वाला होता है। इसमें यौन रोग को दूर करने की शक्ति होती है। यह दर्द, कमजोरी, पेशाब की बीमारी,दिल की बीमारी, गर्भाशय की कमजोरी, आंखों की रोशनी, वात रोग, चेहरे की सुन्दरता, प्रदर रोग, प्रसूता रोग आदि में भी गुणकारी है। इसे महिला या पुरुष आराम से खा सकते हैं।

यूनानी चिकित्सकों के अनुसार: कौंच की गिरी तीसरे दर्जे की गर्म होती है। यह विरेचक, सेक्स पावर को बढ़ाता है। बिच्छू के जहर पर भी यह फायदेमंद होता है। बवासीर के रोगी को यह हानिकारक होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार: कौंच के बीजों का रासायनिक विश्लेषणों से पता चला है कि कौंच में विभिन्न प्रकार की विटामिन्स होते हैं।

कौंच में पाए जाने वाले तत्त्व व मात्रा: तत्त्वमात्रा प्रोटीन 25.03 प्रतिशत आर्द्रता 9.1 प्रतिशतरेशा 6.75 प्रतिशत खनिज 3.95 प्रतिशत फास्फोरसथोड़ी मात्रा में कैल्शियम थोड़ी मात्रा में लौहा थोड़ी मात्रा में मैंगनीज थोड़ी मात्रा में गंधक थोड़ी मात्रा मेंग्लुटाथायोन थोड़ी मात्रा में ग्लुकोसाइड थोड़ी मात्रा मेंलेसिथिन थोडी मात्रा में निकोटिन थोडी मात्रा मेंगैलिक ऐसिड थोड़ी मात्रा में।

विभिन्न भाषाओं में कौंच के नाम :
संस्कृत   कपिकच्छु, आत्मगुप्ता।
हिन्दी        केवांच, कौंच।
अंग्रेजी        काउहैज प्लांट।
बंगाली        आलंकुषी।
मराठी        कुहिलीवे बीज।
गुजरती   कोंचा।
तैलगी        पिप्ली अडूगु।
लैटिन        म्युकना प्रुरिटा।

मात्रा : कौंच के बीजों का चूर्ण 3 से 6 ग्राम और जड़ का काढ़ा 50-100 मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है।

विभिन्न रोगों में उपचार :
1. बिच्छू का डंक: मिट्टी के तेल या पानी में कौंच के बीज की गिरी को घिसकर डंक वाले स्थान पर लगाने से बिच्छू का जहर उतर जाता है।
2. घाव: कौंच के पत्तों को पीसकर घाव पर लेप करने से और पट्टी बांधने से घाव ठीक होता है।
3. लिंग का ढीलापन: कौंच की जड़ को अपने पेशाब में घिसकर लिंग पर लेप करने से लिंगा का ढीलापन दूर होता है।
4. श्वेत प्रदर: कौंच के बीजों की गिरी का आधा चम्मच चूर्ण एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने लाभ श्वेत प्रदर रोग में लाभ मिलता है।
5. मूत्र रोग: कौंच के बीजों की गिरी का आधा चम्मच चूर्ण एक कप पानी के साथ दिन में 2 बार खाने से मूत्र रोग ठीक होता है।
6. बांझपन: कौंच के बीजों की गिरी और जड़ का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार कुछ सप्ताह तक सेवन करने से बांझपन दूर होता है।
7. बुखार: यदि कोई रोगी तेज बुखार से पीड़ित हो तो कौंच की जड़ का काढ़ा 1-1 कप की मात्रा में दिन में 2 से 3 बार पिलाएं। इससे बुखार में जल्दी आराम मिलता है।
8. नपुंसकता: कौंच के बीजों का चूर्ण, तालमखाना व मिश्री बराबर मात्रा में लेकर 3 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन दूध के साथ खाने से नपुंसकता दूर होती है।कौंच के बीजों की गिरी और तालमखाने के बीज 25-25 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 50 ग्राम मिश्री मिलाकर प्रतिदिन 2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ खाने से नपुंसकता दूर होती है।
9. जलोदर (पेट में पानी भरना): कौंच की जड़ को पीसकर लेप बनाकर कलाई पर बांधने से जलोदर रोग ठीक होता है और पेट का दर्द भी शांत होता है।
10. गिल्टी (ट्यूमर) : कौंच के बीजों को पानी में पीसकर दिन में 2 से 3 बार गिल्टी पर लेप करने से गिल्टी ठीक होती है।
11. वात रोग : कौंच के बीजों का खीर बनाकर खाने से वात रोग दूर होता है।
12. योनि का फैल जाना: कौंच की जड़ का काढ़ा बनाकर कुछ दिनों तक योनि को धोने से योनि सिकुड़ जाती है।

13. बेहोशी : कौंच की सूखी फली को बेहोश व्यक्ति के शरीर पर रगड़ने से बेहोशी दूर होती है। बेहोशी दूर होने पर गाय के घी से रोगी के शरीर की मालिश करें। इससे कौंच का जहर उतर जाता है।
14. उपदंश: कौंच के बीजों को पानी में पीसकर दिन में 2 से 3 बार लेप करने से उपदंश रोग ठीक होता है।
15. श्वास या दमा रोग: शहद व अदरक का रस 1-1 चम्मच और कौंच के बीजों की गिरी आधी चम्मच। इन सभी को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें और इसका सेवन सुबह-शाम करें। इससे दमा रोग में आराम मिलता है।
16. शरीर को शक्तिशाली बनाना: कौंच के बीज और गोखरू के चूर्ण को मिश्री के साथ मिलाकर दूध के साथ पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ती है।कौंच के बीज और जड़ को समान मात्रा में लेकर इनको पीसकर चूर्ण बना लें और इसमें बराबर मात्रा में चीनी मिलाकर एक शीशी में भरकर रख लें। यह चूर्ण 10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन दूध के साथ लेने से शारीरिक शक्ति बढ़ती है।
स्रोत : http://gkworldak.blogspot.in/2015/10/blog-post.html
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वियग्रा से भी 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली कौंच के बीज – Mardana Shakti kaunch seeds sey
कपिकच्छू/कौंच/केवांछ (Cowhage) :
कपिकच्छुभृंश वृष्या मधुरा बृंहणी गुरुः।
तिक्ता वातहरी बल्या कफपिस्रानाशिनी।।
तद्विजं वातशमन स्मृतं वाजीकरं परम्।। भा. प्र.।।

कपिकच्छू/कौंच/केवांछ (Cowhage) : सामान्य नाम : कौंच को कपिकच्छू और कैवांच वगैरह नामों से भी जाना जाता है. आयुर्वेद में इसे यौन कूवत बढ़ाने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. सेक्स कूवत बढ़ाने के लिए इस के बीज बेहद कारगर होते हैं. कौंच का इस्तेमाल मर्दों व औरतों की हमबिस्तरी की ख्वाहिश में इजाफा करता है. यह नपुंसकता दूर करने में मदद करती है।

रासायनिक संगठन : इसमें राल, टेनिन,वसा एवम मैगनीज रहता है।

गुण : गुरु ,स्निग्ध।
रस : मधुर , तिक्त।
वीर्य : उष्ण ।
विपाक : मधुर ।

1. कौंच के बीज पोस्टिक उत्तेजक वाजीकरण एवं वातशामक होते हैं केंचुए को निकालने के लिए इसके रोमो को वृत मधु या गुड़ के साथ गोली बनाकर खिलाते है। इसके पश्चात विरेचक औषधि अवश्य देते हैं जिससे केंचुए निकल जाते है।
2. केवांच के पत्ते को कालीमिर्च के साथ पीसकर पिलाने से उदर कृमि नष्ट होते है। धातु पुष्टि के लिए बीज चोरों ने तालमखाने के चूर्ण को मिश्री मिलाकर ताजे दूध के साथ देते हैं इसकी जड़ों को मुख में रखकर चूसने से शीघ्रपतन नहीं होता हैं। बीज चूर्ण व गोक्षुर चूर्ण दोनों समान भाग लेकर ठंड के साथ मिलाकर दूध से लेने से यह है धातु पुष्ट करता हैं।
3. तीव्र ज्वर में मूल चूर्ण को शहद यहां गर्म जल से देने से दाह शांत होता है एवं ज्वार कम होता है। इसके जड़ का स्वरस या क्वाथ स्नायु दौर्बल्य अंगघात ,अर्दित आदि वात रोग में लाभ करता है।
4. कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा शीघ्रपतन के देसी इलाज के लिए कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। फिर एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम एक कप दूध के साथ लेने से शीघ्रपतन और वीर्य की कमी जैसे रोग दूर हो जाते हैं।

कपिकच्छू/कौंच/केवांछ का उपयोगी भाग (प्रयोज्य अंग) : बीज, मूल एवं पत्र ।
बीज चूर्ण सेवन मात्रा : 2 से 6 ग्राम तथा रोम 250 मि. ग्राम की मात्रा में। मूल क्वाथ 5 से 10 तोला ।
आयुर्वेदीक स्टोर पर उपलब्ध विशिष्ठ योग : वानरी गुटिका, माषवलादि पाचन आदि ।

कौंच के बीजों का इस्तेमाल करने के लिए उन को दूध या पानी में उबाल कर उन के ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए. इस के बाद बीजों को सुखा कर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए. इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा को मिश्री व दूध में मिला कर रोज सुबहशाम इस्तेमाल करने से मर्दों के अंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है. कौंच के बीजों के साथ सफेदमूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के सुबहशाम 1 चम्मच मात्रा दूध के साथ लेने से मर्दों की तमाम सेक्स संबंधी दिक्कतों को दूर किया जा सकता है. कौंच के बीजों के साथ शतावरी, गोखरू, तालमखाना, अतिबला और नागबला को एकसाथ बराबर मात्रा में मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के इस चूर्ण को मिश्री मिला कर 2-2 चम्मच चूर्ण सुबह और शाम के वक्त दूध के साथ रोज लेने से मर्द के अंग की कूवत बढ़ती है. सोने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को कुनकुने दूध के साथ लेने से जिस्मानी संबंध बेहतर होते हैं।
कौंच के बीजों के साथ उड़द, गेहूं, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में ले कर बारीक पीस कर दूध मिला कर आटे की तरह गूंध कर इस की छोटीछोटी पूडि़यां बना कर गाय के घी में तलें. इन पूडि़यों को दूध के साथ खाने से भी काफी फायदा होता है. 100-100 ग्राम कौंच के बीज, शतावरी, उड़द, खजूर, मुनक्का, दाख व सिंघाड़ा को मोटा पीस कर 1 लीटर दूध व 1 लीटर पानी मिला कर हलकी आग में पकाएं. गाढ़ा होने पर आंच से उतारें और ठंडा होने पर छानें. इस में 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिलाएं. इस मिश्रण की 50 ग्राम मात्रा में शहद मिला कर रोजाना सुबहशाम खाने से बल बढ़ता है।
10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना व बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंधा, जायफल व रुद्रंतीफल, 20-20 ग्राम सफेदमूसली, कौंच के बीज व त्रिफला और 15-15 ग्राम त्रिकुट व गोखरू को एकसाथ मिला कर चूर्ण बना लें. इस के बाद इस मिश्रण को 16 गुना पानी में मिला कर उबालने पर जब पानी सूख जाए तो उस में 10 ग्राम भांगरे का रस मिला कर दोबारा उबालें और जब मिश्रण गाढ़ा हो जाए तो इसे आंच से उतारें और ठंडा कर के कपड़े से अच्छी तरह मसल कर छान लें और सुखा कर व पीस कर चूर्ण बनाएं. इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसंतकुसूमार रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग मिलाएं. इस मिश्रण की आधा ग्राम मात्रा शहद के साथ मिला कर सुबहशाम चाट कर उस के बाद दूध पीना बेहद फायदेमंद होता है. इस औषधि के सेवन से मर्द के बल में इजाफा होता है. इस औषधि को लेने के दौरान तेज मिर्चमसाले वाली, तली हुई व खट्टी चीजें नहीं खानी चाहिए।
कौंच के अन्य लाभ :
कौंच तनाव और चिंता को दूर करती है. यह खासतौर पर यौन ग्रंथियों को मजबूती प्रदान करती है. यह तंत्रिकातंत्र के लिए एक खास पोषक तत्त्व के रूप में काम करती है।
तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियां : कौंच तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियों के लिए एक खास दवा के रूप में इस्तेमाल की जाती है. यह पार्किसंस रोग में भी इस्तेमाल की जाती है।
कोलेस्ट्राल और ब्लडशुगर : कौंच कोलेस्ट्राल कम करने की एक खास दवा है, साथ ही यह ब्लडशुगर के स्तर को सही करने के लिए फायदेमंद दवा है. इस के अलावा यह एक मानसिक टानिक के रूप में भी कारगर होती है।
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स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रहने वाली स्त्रियां श्वेत प्रदर से पीड़ित रहती है। यौन स्वच्छंदता, अधिक सहवास व अश्लील बातों में संलग्न रहने वाली अधिकांश स्त्रियां श्वेत प्रदर का शिकार बनती है। श्वेत प्रदर से योनि से सफेद रंग का स्त्राव होता है। स्त्राव की अधिकता से आंतरिक वस्त्र खराब हो जाते हैं।

श्वेत प्रदर याने ल्यूकोरिया महिलाओं में होने वाली आम बीमारी है। यह रोग नारी की तंदुरुस्ती का परम शत्रु है। आयुर्वेदिक मतानुसार कफ़ दोष के प्रकुपित होने पर यह रोग जन्म लेता है।

श्वेत प्रदर (Leucorrhea) क्या? क्यों? और उपचार!
जानने योग्य मुख्य बातें :

  • 1. श्वेत प्रदर वास्तव में एक बीमारी न होकर किसी अन्य योनिगत गर्भाशयगत बीमारी का बाहरी लक्षण है या सामान्यतः प्रजनन अंगों में सूजन का प्रमाण है। प्रदर दो प्रकार का होता है। एक सफेद पानी जाना और दूसरा योनि मार्ग से माहवारी के रूप में अत्यधिक-अधिक दिनों तक (4-5 दिन से ज्यादा) या बार-बार रक्त स्राव होना, जिसे रक्तप्रदर कहते हैं।
  • 2. इसे महिलाएँ अत्यंत सामान्य रूप से लेकर ध्यान नहीं देती, छुपा लेती हैं। जिससे कभी-कभी गर्भाशयगत कैंसर होने की भी संभावना रहती है।
  • 3. शुरू में ही ध्यान देकर चिकित्सा की जाए तो बहुत जल्दी रोगिणी ठीक हो सकती है, किन्तु इसकी उपेक्षा करने पर या विलम्ब से चिकित्सा शुरू करने पर यह रोग गंभीर या असाध्य भी हो सकता है।
  • 4. अधिकांश मामलों में यह देखने में आया है कि इस बीमारी को योग्य चिकित्सक से इलाज कराने के बजाए लोग नीम हकीमों के पास जाना पसंद करते हैं। जिसके कारण भी रोग बढ जाता या असाध्य हो जाता है।
  • 5. आयुर्वेद में काश्यप संहिता में वर्णित कौमार भृत्य (बालरोग) के अंतर्गत बीस प्रकार की योनिगत व्याधियों का वर्णन किया गया है, जिसमें से 'पिच्छिला योनि' नामक रोग के लक्षण पूर्णतः ल्यूकोरिया से मिलते हैं।
  • 6. चिकित्सा से ज्यादा जरूरी सफाई : स्फटिका या फिटकरी को तवे पर गर्म कर पीसकर रखें, इससे सुबह शाम योनि स्थल की सफाई करें। फिटकरी एक श्रेष्ठ जीवाणु नाशक सस्ती औषधि है, जो सर्वसुलभ है।
>>>>>>>>ल्यूकोरिया (सफेद पानी या श्वेत प्रदर या Vaginal Discharge या Leucorrhea,) महिलाओं में होने वाली एक आम शिकायत है। ल्यूकोरिया (Vaginal Discharge) के लक्षणों को नजरअंदाज करने से यह गंभीर बीमारी का रूप ले लेती है। यह रोग हर उम्र की महिलाएं (कुंवारी या शादीशुदा) को हो सकता है। कई बार शर्म की वजह से ल्यूकोरिया से ग्रस्त लड़कियां या महिलाएं इसे किसी को बताती नहीं हैं। जिसकी वजह से यह रोग और बढ़ जाता है। सामान्यत: ल्यूकोरिया बहुत ज्यादा पोषण की कमी और ताकत से ज्यादा थकाने वाले कामों की वजह से होता है। पर कई बार ये दिमागी परेशानी से भी हो सकता है। हालांकि श्वेत प्रदर को पोषण की कमी को दूर कर, अपनी लाइफ स्टाइल को सुधार कर काबू पाया जा सकता है। आइए जानते हैं इसके लक्षण और इलाज के बारे में-
क्या है ल्यूकोरिया (श्वेत प्रदर या Vaginal White Discharge) : दरअसल योनि मार्ग (Vagina) में लैकटोबेसिल्स नामक तत्व के कारण एक हल्का पारदर्शी पानी सरीखा गीलापन बना रहता है। लैकटोबेसिल्स का काम योनि मार्ग अथवा Vagina के पानी की अम्लता को एक संतुलित स्थिति में बनाए रखना होता है। इसी अम्लता की वजह से योनि मार्ग में हानिकारक जीवाणुओं की वृद्धि नहीं हो पाती है, लेकिन कई वजहों से Vagina में सफेद पानी का स्राव बढ़ जाता है। इस स्थिति को ल्यूकोरिया (श्वेत प्रदर या Vaginal Discharge) और आम भाषा में सफेद पानी कहा जाता है।
सफेद पानी (ल्यूकोरिया या Vaginal Discharge) का निकलना कई मामलों में बढ़ सकता है। जैसे कि लड़कियों में मासिक चक्र शुरू होने के बाद, मासिक चक्र के पहले, दो मासिक चक्र के बीच के दिनों में, सेक्सुअली उत्तेजना के समय या इसके बाद, गर्भावस्था में, कॉपर टी. या मल्टीलोड गर्भ-निरोधक लगा होने पर।
ल्यूकोरिया या Vaginal Discharge के लक्षण : जब सफेद पानी (Vaginal Discharge) अधिक गाढ़ा, मटमैला और लालिमा लिए हुए हो, इसमें चिपचिपापन और बदबू आनी शुरू हो जाए तो यह बीमारी की गंभीरता की ओर इशारा करती है। इसमें रोगी के हाथ पैर, पिंडलियां, घुटनों और पैर की हड्डियों में काफी दर्द होता है, हाथ-पैरों में जलन, सिर दर्द, स्मरण शक्ति में कमी या चक्कर आना, शरीर में कमजोरी, पेड़ू में भारीपन, कमर दर्द, शरीर टूटना, कैल्शियम की कमी, खून की कमी, चेहरे का पीला पडऩा, आंखों का काला होना, चेहरा धंस जाना भूख न लगना, चिड़चिड़ापन, किसी काम में मन न लगना, सिर के बालों को अधिक मात्रा में गिरना, आंखों की रोशनी का कम होना, कब्जियत बना रहना, बार-बार मूत्र आना, योनि (Vagina) का गीला रहना, योनि में खुजली या जलन होना, योनिगंध, योनिशूल आदि होना ल्यूकोरिया के लक्षण होते हैं। कई बार Vaginal Discharge से योनिद्वार में जख्म हो जाता है, इसके अलावा चरपराहट और जलन भी होने लगती है।

श्वेत प्रदर या Vaginal Discharge के कारण : कई बार महिलाओं की लाइफ स्टाईल भी ल्यूकोरिया की वजह बनती है। देखा गया है कि आलस्य भरी जीवनशैली, मांस, मछली, अंडा, शराब, चाय, काफी जैसी उत्तेजक और चटपटे खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन, कामोत्तेजक और अश्लील साहित्य, अधिक सेक्स करना, एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर होना, मासिक धर्म की अनियमितता, छोटी उम्र में गर्भ धारण या बार-बार गर्भपात होना आदि से ल्यूकोरिया हो सकता है। इसके अलावा भीतरी योनि में फोड़ा, फुन्सी या रसूली का होना अथवा ट्राइकोमोनास वेजाइनल या फंगस भी इसका कारण हो सकता है।

ल्यूकोरिया का आसान इलाज : मेरा निजी अनुभव है कि कमोबेश (More or Less) सभी महिलाओं में प्रदर रोग पाया जाता है। मेरे पास कुल काल्स में से 90% प्रदर के बारे में ही होते हैं। यह बीमारी महिलाओं के शरीर को बेहद कमजोर कर देती है और अनेक अन्य बीमारियों को पैदा कर देती है। जैसे त्वचा में रूखापन, गालों में गड्ढे, कमर दर्द, सेक्स में अरुचि, घुटनों में दर्द, पाचन में गड़बड़ी, चिड़चिड़ापन आदि। इसका एक बेहद सरल इलाज है।

इलाज : कौंच जिसमें कैल्शियम, फास्फोरस, लौह तत्व, प्रोटीन, गंधक और गेलिक एसिड (Gallic Acid) पाया जाता है। यद्यपि सबसे बड़ी समस्या है कौंच के पाउडर में और बीजों में मिलावट या ताजा नहीं मिलना। फिर भी आप घर पर ही उपचार करना चाहें तो कौंच के बीज लीजिये। उनको शोधित करके उनका पावडर बना लीजिये। बस इसी पावडर को ठीक नहीं होने तक सुबह शाम 2-2 ग्राम में दूध या पानी से निगल लीजिये। अधिकतर स्त्रियों को इससे लाभ मिलता है। प्रदर से रोगमुक्त होने के बाद रोज 3 महीने तक अश्वगंधा का 3 ग्राम पावडर पानी से निगल लिया जाये तो शरीर की सारी खोई हुई ताकत वापस आ जायेगी।


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Request : Due to the high number of patients, you may have to wait. Please patiently collaborate.--Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'-9875066111

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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(Tribulus Terrestris) 14 फरवरी Abutilon Indicum Aerva Lanat Allergy Aloevera Juice Alternanthera Sessilis Alum Aluminum Amaranthus spinosus Ammonium chloride Appetite Argemone Mexicana Ash-coloured Fleabane Bael Ban Tulasi Bauhinia purpurea Bernini’s Cinema Bitter Gourd Black night shade Blumea Lacera Bone Infection Borax BPH Calories Calories Chart Cancer Care Carrots Castor beans Chanca Piedra Cheese Chemotherapy Chenopodium Album Chikungunya Cholesterol Cleome viscosa Clerodendrum Phlomidis Clitoria Ternatea Colocynth Colpoptosis Constipation Convolvulus Pluricaulis Corn Creak Crotalaria Bburhia Croton Bonplandianum Croton Sparsiflorus Cumin Date Palm Dengue Depression Diabetes digestion Disorders Divorce Dog Mustard Dronapushpi Dysentery Early Ejaculation Emblic Myrobalan Extramarital Relation Extremely Intolerance Fatty liver Femininity FENUGREEK Fenugreek Seeds Ferrum Phosphoricum Fever Fissure Fistula Folic Acid Gallbladder Gardenia Gummifera Garlic Ginger Gooseberry Gourd Groundnut-peanut Guava Hainampfer Hair Falling Headaches Health Health Care Friend Health Consultation Health Links Health Tips Heliotropium Eeuropaeum Hemorrhoids Hepatitis Hibiscus Homeopathic Homeopathy Homoeopath Honey How to get pregnant? Immunity Impotence IMPOTENCY Incurable indigestion Jaundice Juice Juice of Berries LAND CALTROPS Lemon Leucas Aspera Leucas Cephalotes Leucorrhea Lever Liver Liver Cirrhosis Liver fibrosis Low Blood Pressure Marital Dispute Consultant Masturbation Mental Mexican Daisy Mexican Poppy Migraine Migraines Myopia Neurons Night Jasmine Nutgrass Nutmeg Nutsedge Obesity Omega 3 Oroxylum indicum Painkillers Periquito Sessil Phyllanthus Niruri Piles Portulaca Oleracea Post Effect Pregnancy Safe-Guard Pregnancy Safeguard Pregnancy-Safe-Guard Premature Ejaculation Prostate Gland Protein Purple Nutsedge Raan Tulas Radish Rectal Collapse Rectal Prolapse rectum collapse Saffron Senna occidentalis Separation Sex Sexual Power Sickness Side Effects side effects less Side-Effects Spermatorrhoea Sperms Spiny Amaranth Stone Stone Breaker Sword fruit tree TECOMA STANS Thermometer Tickweed Tips Treatment of Incurable Tribulus Terrestris Tridax Procumbens Umbrella Sedge Unquenchable Conjugal Uterine Prolapse vaginal Creaks Vaginal Prolapse Viral Vitamins Vitex Negundo Wart Wheatgrass White Discharge Yellow Spider Flower अंकुरित अनाज अंकुरित गेहूं-Wheat germ अंकुरित भोजन-Sprouts अखरोट अंगूर-Grapes अचूक चमत्कारिक चूर्ण अजवाइन अजवायन अजीर्ण-Indigestion अंडकोष अडूसा (वासा)-Adhatoda Vasika-Malabar nut अण्डी अतिबला अतिसार अतिसार-Diarrhea अतृप्त अतृप्त दाम्पत्य अत्यंत असहिष्णुता अदरक अदरख अंधश्रृद्धा अध्ययन अनिद्रा अपच अपराजिता अपराधबोध अफरा अफीम अमरूद अमृता अम्लपित्त-Pyrosis अरंडी अरणी अरण्ड अरण्डी अरलू अरुचि अरुचि-Anorexia-Distaste अर्जुन अर्थराइटिस अर्द्धसिरशूल अर्श अर्श रोग-बवासीर-Hemorrhoids-Piles अलसी अल्टरनेथेरा सेसिलिस अल्सर अल्सर-Ulcers अवसाद अवसाद-Depression अश्मःभेदः अश्वगंधा अश्वगंधा-Winter Cherry असंतुष्ट असफल असर नहीं असली अस्थमा अस्थमा-दमा-Asthma आइरन आक आकड़ा आघात आत्महत्या आंत्र कृमि आंत्रकृमि-Helminth आंत्रिक ज्वर-टायफाइड-Typhoid fever आदिवासी आधाशीशी आधासीसी आंधीझाड़ा-ओंगा-अपामार्ग-Prickly Chalf flower आमला आमवात आमाशय आयुर्वेद आयुर्वेदिक आयुर्वेदिक उपचार आयुर्वेदिक औषधियां आयुर्वेदिक सीरप-Ayurvedic Syrup आयुर्वेदिक-Ayurvedic आरोग्य आँव आंव आंवला आंवला जूस आंवला रस आशावादी-Optimistic आसन आसान प्रसव-Easy Delivery आहार चार्ट आहार-Food आॅपरेशन आॅर्गेनिक आॅर्गेनिक कौंच इच्छा-शक्ति इन्द्रायण इन्फ्लुएंजा इमर्जेंसी में होम्योपैथी इमली-Tamarind Tree इम्युनिटी इलाज इलाज का कुल कितना खर्चा इलायची उच्च रक्तचाप उच्च रक्तचाप-High Blood Pressure-Hypertension उत्तेजक उत्तेजना उदर शूल-Abdominal Haul उदासी उन्माद-Mania उपवास उम्र उल्टी ऊर्जा एक्जिमा एक्यूप्रेशर एग्जिमा एजिंग-Aging एंटी ऑक्सीडेंट्स एंटी-ओक्सिडेंट एंटीऑक्सीडेंट एण्टी-आॅक्सीडेंट एनजाइना एनीमिया एमिनो एसिड एरंड एलर्जी एलर्जी-Allergy एलोवेरा एलोवेरा जूस एल्यूमीनियम ऐंठन ऐलोपैथ ऐसीडिटी ऑर्गेनिक ओमेगा 3 के स्रोत ओमेगा-3 ओर्गेनिक औषध-Drug औषधि सूची-Drug List औषधियों के नुकसान-Loss of drugs कचनार कचनार-Bauhinia Purpurea कटुपर्णी कड़वाहट कंडोम कद्दू कनेर कपास-COTTON कपिकच्छू कपूरीजड़ी कफ कब्ज कब्ज़ कब्ज-कोष्ठबद्धता-Constipation कब्ज. 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दाम्पत्य-Conjugal दाल दालचीनी दालें दिमांग दिल दीर्घायु दु:खी दुर्गंध दुर्बलता दुष्प्रभाव दुष्प्रभावरहित दूध दूध वृद्धि दूधी दूधी-Milk Hedge दृष्टिदोष दो मन द्रोणपुष्पी द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes धड़कन धनिया बीज धनिया-Coriander धमासा धात धातु धातु पतन धार्मिक धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं? धैर्यहीन नज़ला नपुंसक नपुंसकता नाइट्रिक एसिड नाक नाखून नागबला नागरमोथा नाडी हिंगु नाड़ी हिंगु (डिकामाली) नामर्दी नारकीय पीड़ा नारियल नाश्ता निमोनिया निम्न रक्तचाप निम्बू नियासिन निराश निरोगधाम निर्गुण्डी निर्गुन्डी निष्कपट स्नेह निष्ठा निसोरा नींद नींबू नींबू-Lemon नीम-azadirachta indica नुस्खे नुस्खे-Tips नेगड़ नेत्र रोग नेुचरल नैतिक नॉर्मल डिलेवरी नोनिया नौसादर न्युमोनिया-Pneumonia न्यूरॉन्स पक्षघात पंचकर्म पढ़ने में मन लगेगा पंतजलि पत्तागोभी-CABBAGE पत्थर फोड़ी पत्थरचट्टा पत्नी पथरी पदार्थ पनीर पपीता पपीता-CARICA PAPPYA पमाड परदेशी लांगड़ी परम्परागत चिकित्सा परहेज पराठा परामर्श परिस्थिति पवाड़ पवाँर पाइल्स पाक-कला पाचक पाचन पाचनतंत्र पाचनशक्ति पाठक संख्या 16 लाख पार पाठक संख्या पंद्रह लाख पायरिया पारदर्शिता पारिजात पालक पालक-Spinach पित्त पित्ताशय पित्ती पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne पिरामिड पीलिया पीलिया-Jaundice पीलिया-कामला-Jaundice पुआड़ पुदीना पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava पुरुष पुंसत्व पेचिश पेट के कीड़े पेट दर्द पेट में गैस पेट रोग पेड़ पेद दर्द पेरिकिटो सेसिल पेशाब पेशाब में रुकावट पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy पोष्टिक लड्डू पौधे पौरुष पौरुष ग्रंथि पौष्टिक रागी रोटी प्याज-Onion प्यास प्रजनन प्रतिरक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिरोधक प्रतिरोधक-Resistance प्रदर प्रमेह प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery प्रसव प्रसव सुरक्षा चक्र प्रसव-पीड़ा प्रसूति प्राणायाम प्रेग्नेंसी-Pregnancy प्रेम प्रेमरस प्रेमिका प्रेमी प्रोटीन प्रोटीन का कार्य प्रोटीन के स्रोत प्रोस्टेट प्रोस्‍टेट कैंसर प्रोस्टेट ग्रंथि प्रोस्टेट ग्रन्थि प्लीहा प्लूरिसी-Pleurisy प्लेटलेट्स फंगल फटन फफूंद-Fungi फरास फल फाइबर फिटकरी फुंसी-Pimples फूलगोभी-CAULIFLOWER फेंफड़े फेरम फॉस फैट फैटी लीवर फोटोफोबिया फोड़ा फोड़े-Boils फोरप्ले फोलिक एसिड फ्लू फ्लू-Flu फ्लेक्स सीड्स बकायन बकुल बड़ी हरड़ बथुआ बथुआ पाउडर बथुआ-White Goose Foot 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