लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 80-90 फीसदी महिलाएं प्रसव के बाद अकसर शिकायत करती हैं कि प्रसव के बाद खांसते, छींकते और हसंते हुए उनका पेशाब निकल जाता है। शहरी, सुशिक्षित महिलाएं भी बड़ी संख्या में इस समस्या का सामना करती हैं। यौन शिक्षा के अभाव और संकोच के चलते औरतें इस समस्या को आसानी से जाहिर नहीं कर पाती हैं। यदि घर की बड़ी औरतों को बताती भी हैं, तो उनको यही जवाब मिलता है, 'यह तो प्रसव के बाद सभी स्त्रियों को होता है।' जिसे यौनांगों का स्वाभाविक ढीलापन मानकर स्वीकार लिया जाता है। कुछ महिलाएं जो चिकित्सकों के पास जाती हैं, उन्हें कैगल जैसी अनेक प्रकार की यौगिक अभ्यास क्रियाओं के बाद भी जब आराम नहीं मिलता है तो औरतें इसे अपनी नीयति मानकर जीवनभर भोगती रहती हैं। जबकि यह असाध्य और लाइलाज समस्या नहीं है।
सबसे पहले इस समस्या के मूल कारणों को समझने की जरूरत है। गर्भावस्था के दौरान कैमीकलयुक्त दवाईयों का लगातार सेवन करने, शारीरिक श्रम से बचने, आसानी से पच नहीं सकने वाले अधिक पौष्टिक एवं गरिष्ठ भोजन/खुराक खाने और आराम फरमाने के कारण गर्भवती महिलाओं के प्रजनन अंगों में अस्वाभाविक कठोरता आ जाती है। जबकि सर्वज्ञात तथ्य है कि प्रसव के समय प्रजनन अंगों में लचीलापन-प्रसव को स्वाभाविक, सुगम, सामान्य और सुरक्षित बनाता है। उक्त कारणों से प्रजनन अंगों में कठोरता आ जाने के कारण बच्चे को जन्म देने के लिये प्राकृतिक प्रसव सम्भव नहीं हो पाता है।
अत: बाहरी दबाव या शल्यक्रियाओं या दवाईयों का सहारा लिया जाता है। जिससे प्रजनन अंगों पर अस्वाभाविक दबाव-खिंचाव पड़ता है। जिससे यौनांगों की कोमल कोशिकाएं, शिराएं और मांसपेशियां घायल-इंजर्ड हो जाती हैं। जो सामान्यत: फिर से आसानी से स्वस्थ नहीं हो पाती हैं, क्योंकि बच्चे के जन्म के बाद इन तकलीफों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। इस कारण घायल प्रस्तूता को जरूरी चिकित्सा या दवाईयां उपलब्ध नहीं करवायी जाती हैं। बल्कि अनेक लोग दशमूलारिष्ट जैसे आयुर्वेदिक सीरप का सेवन करने की सलाह देते हैं। जिससे गर्भाशय की सफाई की आशा तो की जाती है, लेकिन इस कारण पहले से घायल प्रजनन अंगों के तंतुओं, शिराओं और मांसपेशियों को क्षति-हानि होने की सम्भावना बढ जाती है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि अनेक महिलाओं के साथ प्रसव के कुछ सप्ताह बाद ही दर्दनाक सम्भोग क्रिया भी शुरू हो जाती है। अकुशल चिकित्सक से गर्भपात करवाना और लगातार गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन भी यौनांगों को अस्वस्थ बनाने सहित अनेक यौन तथा शारीरिक विकृतियों के कारण हो सकते हैं।
इन सब कारणों से महिलाओं के गर्भाशय, आंतों और मूत्राशय को सहारा देने वाले तंतु, शिरा और मांसपेशियां स्थायी रूप से अधिक लचीले-ढीले हो जाते हैं। शिशु को जन्म देने से पहले से ही श्रोणि प्रदेश की मांसपेशियां और अधिक फैल गई होती हैं। प्रसव के दौरान बाहरी अस्वाभाविक दबावों, क्रियाओं और प्रसवोपरान्त जल्दी संभोग करने के कारण, इनमें स्थायी कमजोरी, शिक्षिलिता और ढीलापन आ जाता है।
उपरोक्त कारणों से पीड़ित स्त्रियों के लिये मूत्राशय के नीचे की मांसपेशियों और मूत्र अवरोधिनी मांसपेशियों को भींचना मुश्किल हो जाता है। जिसके चलते पेशाब करते हुए पेशाब को नियंत्रित करने में परेशानी होती देखी जा सकती है।
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केवल इतना ही नहीं, बल्कि खांसते, छींकते, हसंते हुए और अनेक बाद तेजी से दौड़ने या हिलने-डुलने पर भी कमजोर यौनांगों से पीड़ित अनेक महिलाओं को कुछ बूंद पेशाब निकल जाता है। यही नहीं भारी सामान को उठाते समय भी पेशाब का रिसाव हो सकता है। यह रिसाव केवल कुछ बूंदों का ही हो या फिर इतना अधिक हो कि कपड़े गीले हो जाएं।
उपरोक्त के अलावा सबसे बड़ी तकलीफ यह होती है कि प्रजनन अंगों की मांसपेशियों, शिराओं और तंतुओं के ढीले हो जाने के कारण, ऐसी स्त्रियों के पतियों को सेक्स में कोई आनन्द नहीं आता है और वे अपनी पत्नी की अनदेखी करने लगते हैं। यौनांगों के ढीलेपन के लिये, ऐसे पुरुष मूर्खतापूर्वक अपनी पत्नी को कोसते रहते हैं। जबकि इसमें ऐसी स्त्रियों की कोई गलती नहीं होती है। बल्कि देखा जाये तो सारी गलतियां उनके पतियों की होती हैं, क्योंकि भारतीय समाज में पति ही, स्त्री की समस्त प्रकार की देखभाल के लिये जिम्मेदार होते हैं। यद्यपि गहराई में जाकर देखा जाये तो यौनशिक्षा का अभाव और सेक्स विषय को गंदा तथा गोपनीय बनाये रखने वाली भारतीय संस्कृति, साहित्य तथा धर्मग्रंथ ही इसे लिये सम्पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं।
सावधानी, समाधान और उपचार
सावधानी: प्रसव के दौरान साफ-सुथरा, संयमित और सुपाच्य भोजन। पर्याप्त और नियमित शारीरिक श्रम। शान्त, तनावमुक्त, सहयोगात्मक और सकारात्मक पारिवारिक माहौल। कैमीकल्सयुक्त दवाईयों का शून्य या न्यूनतम सेवन। सबसे महत्वूपर्ण-किसी वरिष्ठ होम्योपैथ की देखरेख में प्रसव को बिना सिजेरियन स्वाभाविक रूप से सरल, सुगम, सामान्य, पीड़ा रहित और सुरक्षित बनाने वाली सुरक्षित तथा दुष्प्रभाव रहित दवाईयों का दूसरे महिने से ही नियमित सेवन किया जाये।
समाधान : प्रत्येक नवदम्पत्ति को उचित और योग्य दाम्पत्य सलाहकार-विशेषज्ञ से मिलकर निसंकोच यौन-प्रसव ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जिससे दीर्घकाल तक उनका दाम्पत्य जीवन सुखद, सरस, स्वस्थ और सफल बना रहे। इच्छुक दम्पत्तियों को हमारी ओर से यह सेवा उपल्ब्ध करवाई जाती है।
उपचार : उचित सावधानी के अभाव में जिन महिलाओं के प्रजनन अंगों में ढीलापन, शिथिलता और कमजोरी आ चुकी है, उन्हें किसी योग्य आयुर्वेद या होम्योपैथ विशेषज्ञ से सलाह लेकर धैर्यपूर्वक स्वस्थ होने तक उचित और लगातार चिकित्सा लेनी चाहिये। मेरे अनुभव में 70-80 फीसदी महिलाओं के प्रजनन अंगों में 60 फीसदी से अधिक कसावट आ जाती है। अपने आप पेशाब निकलने और संभोग में ढीलेपन की समस्या से एक सीमा तक छुटकारा मिल सकता है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक
मोबाईल और वाट्सएप नम्बर : 9875066111/04052017