Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)

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पथरी तोड़क व्हीट ग्रास एवं नींबू ज्यूस (Stone Breaker Wheatgrass and Lemon Juice)

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
08 अक्टूबर, 2018, +91 8561955619
सावधानी Caution: पथरी के इलाज के साथ कुछ परहेज बहुत जरूरी हैं। क्योंकि किडनी की पथरी में जितनी जरूरत इसके तत्काल इलाज की होती है, उतनी ही जरूरत कुछ खाद्यों/पेयों से परहेज की भी होती है। जिससे के पथरी बढ़े नहीं और दवाइयों के सेवन से धीरे-धीरे पथरी आसानी से घुल जाए। अत: पथरी से पीड़ित रोगी को निम्न परहेज करने जरूरी हैं:—

  • 1. बीज वाले खाद्य पदार्थों जैसे टमाटर, मिर्च आदि नहीं खाने चाहिये या बहुत कम खाने चाहिये।
  • 2. सोडियम की वजह से भी पथरी बढ़ती है। इसलिये नमक का प्रयोग ज्यादा न्यनतम करें और हाई सोडियम वाले खाद्य पदार्थ जैसे बादाम, मूंगफली आदि बिलकुल भी नहीं खायें।
  • 3. अंडा, मीट, मछली, पालक, चुकंदर, चॉकलेट, चाय, पालक, गैहूं का चौकर, स्ट्राबेरी आदि नहीं खायें तथा कोका कोला का सेवन नहीं करें।

गैहूं का जवारा अर्थात व्हीट ग्रास (Wheatgrasss) को पानी में अच्छी तरह उबाल कर, इसमें नींबू का रस मिक्स करके दिन में 2 बार खाली पेट इसका सेवन करने से गुर्दे से पथरी टूटकर बाहर निकल जायेगी। मूत्राशय कि पथरी के लिए तो यह अच्छा परिणामदायी पेय माना गया है। इसके अलावा इसका सेवन किडनी से जुड़ी अनेक बीमारियों को भी दूर करता है। इसके रस के सेवन से शारीरिक शक्ति तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति में अपार वृद्धि होती है। इसके विधिवत सेवन से कैंसर, हैपेटाइटिस, एलर्जी, चर्मरोग, अपच आदि अनेकों रोगों/तकलीफों से बचा जा सकता है।
  

गेहूँ के ज्वारे का रस: गेहूँ के ज्वारे से रस निकालते समय यह ध्यान रहे कि गेहूँ की पत्तियों में से नीचे का जड़ वाला सफेद हिस्सा काटकर फेंक दे। यह ध्यान रहे कि जिस ज्वारे से रस निकाला जाय उसकी ऊंचाई अधिकतम पांच से छः इंच ही हो। केवल हरे हिस्से का ही रस सेवन करना विशेष लाभकारी होता है। रस निकालने के पहले ज्वारे को अच्छ से धो लेना चाहिये।
उपरोक्त पेय के साथ में हमारे द्वारा अनेक महत्वपूर्ण ऑर्गेनिक जड़ी-बूटियों से निर्मित Stone Dissolvent Powder (पथरी घोलक पाउडर) भी रोगियों को पीने को दिया जाता है। इन दोनों के सेवन से एक से दो महिने में 90 फीसदी से अधिक रोगियों को किडनी की पथरी से मुक्ति मिल जाती है। यद्यपि बहुत बड़ी, सख्त/कठोर, विकृत आकार (Distorted Shape/Size) की पथरी के मामलों में समय अधिक लग सकता है। पथरी के पेशाब नली में फंस जाने सहित कुछ अत्यधिक पीड़ादायक आपवादिक मामलों में रोगी को सर्जरी करवाने की जरूरी भी पड़ सकती है।
नोट: किसी भी रोगी को खुद अपना इलाज करने का खतरा नहीं उठाना चाहिये। क्योंकि पथरी के आकार (Shape/Size) के अनुसार उचित दवाई एवं दवाई की सही मात्रा का निर्धारण अनुभवी चिकित्सक ही कर सकता है।

यदि आप किसी लाइलाज समझी जाने वाली तकलीफ के कारण लम्बे समय से बीमार या अस्वस्थ या परेशान हैं तो निरामय उपचार हेतु आपके निकट के किसी आयुर्वेद और, या होम्योपैथी के डॉक्टर से सम्पर्क करें। साथ ही *अनेकानेक स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों की अधिक जानकारी और रोगियों के अनुभवों की जानकारी हेतु हमारी निम्न वेबसाइट पर विजिट/क्लिक करके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बने:*
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मक्का (Corn) : परम्परागत औषधीय उपयोग

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'1-परिचय (Introduction): मक्का की खेती करना या मक्का घर के पास खाली जगह पर उगाना बहुत सरल है। इसकी देखरेख अधिक नहीं करनी पड़ती है और इसकी उपज भी अच्छी होती है। मक्का के टिक्कड़ मोटी रोठियां बनती हैं। भारत के अनेक क्षेत्रों में आदिवासी तथा ग्रामीण लोग मक्के के रोटी, मक्के के पानिये और उड़द के आटे की भुजिया के साथ में भोजन में प्रयोग करते हैं। शुद्ध मक्का के आटे के या मक्का को बेसन या दूसरी दालों में मिलाकर अनेक तरह के पकौडे़ तथा दूसरे पकवान बनाये जाते हैं। पकने से पहले नर्म—नर्म ताजे मक्के के भुट्टे सेंककर खाने का आनंद तो अपने आप में अनौखा होता है। मक्के के सूखे दाने की खील भी बनाये जाते हैं। जिन्हें सिनेमा हालों में ऊंची कीमत पर बेचा जाता है। इन सबसे बढकर मक्का के अनेक औषधीय उपयोग भी हैं।

2-पोषक तत्व: भुट्टे के दानों में बहुत सारा मैग्नीशियम, आयरन, कॉपर, विटामिन ए, विटामिन बी 9, फोलिक एसिड, विटामिन सी और फॉस्फोरस पाया जाता है। जो स्वास्थ्य वर्धक है। अत: इसका सेवन करना चाहिये।
प्रत्येक 100 ग्राम मक्का में उपस्थित पोषक तत्व:
(Nutritional value of corn per 100 gm)
ऊर्जा         : 360 किलोजूल (86 किलोकैलोरी)
प्रोटीन        : 3.27 ग्राम
फाइबर       : 2 ग्राम
विटामिन A   : 9 μg
विटामिन B1 : 0.155 mg
विटामिन B2 : 0.055 mg
विटामिन B3 : 1.77 mg
विटामिन C   : 6.8 mg
आयरन       : 0.52 mg
मैग्नीशियम    : 37 mg
पोटेशियम    : 270 mg
जिंक         : 0.46 mg

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3-सामान्य गुण (Property): मक्का अत्यन्त रूक्षा (रूखा), कफ और पित्तनाशक, रुचि को बढ़ाने वाला, दस्तों को रोकने वाला होता है। वायु पैदा करने वाला (बढ़ाने वाला) होता है।

4-हानिकारक प्रभाव (Harmful Effects): मक्का पचने में गरिष्ठ अर्थात भारी है। अत: जिसका शरीर बलवान हो और जिसकी पाचन शक्ति तेज या अच्छी हो, वही इसको आसानी से पचा सकता है। कमजोर पाचन-शक्ति वालों के लिए मक्का हानिकारक है। यह शरीर की नसों को शिथिल करता है।

5-मक्का का तेल: मक्का का तेल भी निकाला/बनाया जा सकता है। जो बेहद स्वास्थ्यवर्धक है।

6-तेल को निकालने की विधि: ताजी नर्म-दूधिया मक्का के दाने पीसकर कांच की शीशी में भरकर खुली हुई शीशी धूप में रख दें। कुछ दिनों में शीशी में से दूध सूखकर उड़ जाएगा और तेल मात्र शीशी में शेष रह जाएगा। इस तेल को छानकर दूसरी साफ शीशी में भरकर सुरक्षित रख लें और इस तेल से मालिश किया करें। इस तेल की कमजोर बच्चों के पैरों पर मालिश करने से बच्चे के पैरों में शक्ति आती है और बच्चा जल्दी चलने लगता है। 1 चम्मच तेल में शर्बत मिलाकर पीने से शारीरिक बल भी बढ़ता है।

7-भुट्टे के रेशों का ड्रिंक बनाने की विधि और रेशों के लाभ:
(1) एक गिलास पानी को उबलने के लिये रख दें। पानी उबलने के बाद, इसमें भुट्टे के रेशों को डालकर 15 मिनट तक और उबालें। गुनगुना होने पर इसमे चुटकी भर काला नमक और नींबू निचोड़कर पियें।
(2) काच के बर्तन में एक गिलास साफ पानी में भुट्टे के रेशे डालकर दिनभर के लिये धूप में रख दे। शाम को इस पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर पियें।
(3) भुट्टे के रेशों का ड्रिंक किडनी को हेल्दी रखने और कई बीमारियों से बचाने में हेल्पफुल होता है।
(4) भुट्टे के बालों/रेशों में भी कई हेल्दी न्यूट्रिएंट्स होते हैं जो अनेक बीमारियों से बचाव में मददगार होते हैं। जो अनेक बीमारियों से लड़ने में सहायता करते हैं।
(5) संक्रमण से सुरक्षा: इनका सेवन ब्लैडर/मूत्राशय में इंफेक्शन पैदा करने वाले माइक्रोब्स को मारते हैं। अत: मूत्राशय के संक्रमण की संभावना न्यूनतम हो जाती है।
(6) भुट्टे के रेशों से बना ड्रिंक फैट बर्निंग प्रोसेस को तेज करता है।
इससे मोटापे से बचाव होता है।
(7) पथरी के उपचार में सिल्क को पानी में उबालकर बनाये गये काढ़े का प्रयोग होता है।
(8) मक्के के बाल (Corn Silk) का उपयोग पथरी रोगों की चिकित्सा मे होता है। पथरी से बचाव के लिए रात भर सिल्क को पानी मे भिगोकर सुबह सिल्क हटाकर पानी पीने से लाभ होता है।

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8-मक्का का विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases): पेट एवं पाचन: मक्का मनुष्य के पाचन तंत्र को मजबूती प्रदान करता है। जिससे भोजन अच्छे से पचता है और भूख भी अच्छी लगती है। मक्का में पेट यानि आमाशय को ताकत देने का बहुत अच्छा गुण पाया जाता है। अत: यदि गेहूँ के आटे के स्थान पर मक्के के आटे का प्रयोग करें तो यह लीवर के लिये अधिक लाभकारी है। यह प्रचूर मात्रा में रेशे से भरा हुआ है इसलिये इसे खाने से पेट का डायजेशन/चाचन अच्छा रहता है। मक्का कब्ज को दूर करता है। कब्ज से कौन राहत नहीं पाना चाहता? मक्का/कॉर्न में जो फाइबर होता है, वह मलाशय या कोलन/पेट में जमे हुए खाद्य पदार्थों को निकालने में सहायता कर कब्ज के कष्ट से राहत दिलाता है। अत: मक्का के सेवन से कब्ज, बवासीर और पेट के कैंसर के होने की संभावना कम हो जाती है। भुट्टे के रेशे और रेशों से बने ड्रिंक में मौजूद फाइबर भी पाचन क्रिया को बेहतरीन रखते हैं। मक्का का भुट्टा खाने से मुंह के अंदर अधिक लार बनने लगती है, जिससे पंचान तंत्र सही हो जाता है।


9-शक्तिवर्धक: मक्का खाने से शरीर को काफी लाभ मिलता है। इसे मक्का आमाशय को मजबूत बनता है। मक्का खून को बढ़ाने वाला (रक्त-वर्धक) होता है।

10-खांसी, कुकर-खांसी और जुकाम: मक्का के भुट्टे को जलाकर उसकी राख पीस लें, इसमें स्वादानुसार सेंधानमक मिला लें, फिर रोजाना 4 बार चौथाई चम्मच लेकर गर्म पानी से फंकी लें। इसके सेवन से खांसी, कुकर-खांसी और जुकाम में लाभ मिलता है।

11-पेशाब में जलन होना: ताजा मक्का के भुट्टे को पानी में उबालकर उस पानी को छानकर मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन और गुर्दों की कमजोरी दूर होती है।

12-यक्ष्मा (टी.बी.): टी.बी. के रोग से पीड़ित व्यक्ति को मक्का की रोटी खिलाने से आराम मिलता है।

13-पथरी: पथरी के उपचार के लिये मक्का के अनेक उपयोग हैं—

(1) भुट्टे के बाल का उपयोग पथरी से बचाव के लिए किया जाता है। अगर भुट्टे के बाल को रात भर पानी मे भिगो दें और सुबह  मक्का के सारे बाल हटाकर उस पानी को पी लें। इससे लाभ मिलता है।
(2) मक्का के भुट्टे और जौ को जलाकर राख कर लें। दोनों को अलग-अलग पीसकर अलग-अलग शीशियों में भरकर रख लें। उन शीशियों में से दो चम्मच मक्का की राख और दो चम्मच जौ की राख को एक कप पानी में घोल लें, फिर छानकर इस पानी को पी लें। ऐसा करने से पथरी गल जाती है और पेशाब खुलकर आता है।
(3) मक्के को तथा जौ को अलग-अलग जलाकर भस्म (राख) बनाकर पीस लें तथा अलग-अलग बर्तन में रखें। रोजाना सुबह मक्के का 2 चम्मच भस्म (राख) 1 कप पानी में मिलाकर पीयें तथा शाम को जौ का भस्म (राख) 2 चम्मच एक कप पानी में मिलाकर पीने से पथरी ठीक हो जाती है।

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14-उल्टी: मक्का के भुट्टे में से दाने निकालकर उन्हें जलाकर राख कर लें, फिर इस राख को आधा ग्राम लेकर शहद के साथ चाटें। इससे कै (उल्टी) आना तुंरत ही बन्द होती है।

15-काली/सूखी खांसी: मक्का के बीज निकाले हुए भुट्टे को जलाकर राख कर लें। इसके 1-2 ग्राम राख को शहद के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से काली खांसी दूर हो जाती है।

16-खांसी:
(1) मक्का को जलाकर उसकी राख को इकट्ठा कर लें, फिर इसमें लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में पिसा हुआ कोयला और कालानमक मिलाकर रख दें। इसे शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से कालीखांसी और कुकुर खांसी भी दूर हो जाती है। 
(2) मक्का के भुट्टे को जलाकर उसकी राख को पीस लें। इसमें थोड़ा-सा सेंधानमक मिला दें। इसके आधा-आधा चम्मच चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन करने से खांसी में लाभ मिलता है।
(3) गुल्ली के दाने निकालने के बाद जो बीच का हिस्सा बचे, उसको सुखाकर जला लें और राख बना लें। इस राख को प्रतिदिन गुनगुने पानी के साथ फांकने से खांसी का इलाज होता है। खांसी कैसी भी हो यह चूर्ण लाभ देता ही है। यहां तक कि कूकर खांसी में भी बड़ी राहत मिलती है।

17-जुकाम: मक्के के भुट्टे को पूरी तरह से जलाकर उसकी राख बना लें, फिर इसमें स्वाद के अनुसार सेंधानमक मिलाकर रोजाना 4 बार फंकी लें। इससे जुकाम ठीक हो जाता है। इसके अलावा जब भुट्टे खाएं तो गुल्ली के दानों को खाने के बाद जो भुट्टे का बीच का भाग बचता है, उसे फेंकें नहीं, बल्कि उसे बीच में से तोड़ लें और उसे सूंघें। इससे जुकाम में बड़ा फायदा मिलता है। इसके बाद में भी फेंकें नहीं, बल्कि इसे जानवर को खाने के लिए डाल सकते हैं।

18-मूत्ररोग:
(1) लगभग 30 ग्राम मक्का के सुनहरी बालों को 250 ग्राम पानी में उबालें और जब 60 ग्राम रह जाये तो छानकर ठंडा करके पी लें, इससे पेशाब खुलकर आता है। अगर ताजे भुट्टे को छिलके सहित पानी में उबाल लें और फिर उस पानी को छानकर मिसरी मिलाकर पी लें। तो इसे पीने से पेशाब की जलन धीरे-धीरे दूर हो जाती है।
(2) ताजा मक्का के भुट्टे को पानी में उबालकर उस पानी को छानकर मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन व गुर्दों की कमजोरी हो जाती है।

19-गुर्दे के रोग: मक्के के भुट्टे के 20 ग्राम बालों को 200 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें। जब 100 मिलीलीटर पानी ही शेष बचे तब छानकर पीने से गुर्दे के रोग ठीक हो जाते हैं।

20-प्रदर रोग: मक्का की छूंछ/डंठल की राख शहद के साथ सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है।

21-मोटापा कम करे: भुट्टे के बालों/रेशों के सेवन से कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) कंट्रोल में रहता है और मोटापा भी कम होता है। इसलिए यह दिल की बीमारियों से भी रक्षा करता है।

22-दिल की कमजोरी: मक्का के दाने निकली हुई भुट्टे की डण्डी (भुट्टे का बीच का भाग) को जलाकर इसकी राख को पीसकर रख लें। इसके आधा ग्राम चूर्ण को ताजा मक्खन के साथ खाने से दिल की कमजोरी दूर होती है। मक्का के भुट्टों के रेशों का ड्रिंक शुगर और कोलेस्ट्रोल लेवल को कण्ट्रोल करता है, इससे हार्ट की समस्या से बचाव होता है। भुट्टा दिल की बीमारी को भी दूर करने में सहायक है, क्योंकि इसमें विटामिन सी, कैरोटिनॉइड और बायोफ्लेवनॉइड पाया जाता है। यह कोलेस्ट्रॉल लेवल को बढ़ने से बचाता है और शरीर में खून के प्रवाह को भी बढ़ाता है।

23-हड्डियां मजबूत: भुट्टे में विटामिन A, B और E, मिनरल्स और कैल्शियम काफी मात्रा में पाये जाते हैं। मक्का में जिन्क, फॉस्फोरस, मैग्नेशियम और आयरन होता है, जो हड्डियों को मजबूती प्रदान करने में अहम् भूमिका निभाते हैं। जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। यहाँ तक कि मक्का का सेवन गठिया या अर्थराइटिस जैसे रोगों के होने की संभावना को भी कम करता है।

24-दृष्टि वर्धक: मक्का में बीटा-कैरोटीन होता है, जो विटामिन ए के उत्पादन में सहायता करता है। यह आँख संबंधी समस्याओं को कम करता और दृश्य-शक्ति को उन्नत करता है। साथ ही बढ़ती उम्र में होने वाली रतौंधी या मैक्युलर डीजनरेशन (Macular Degeneration* =जिसका परिणाम दृष्टि में धुंधलापन होता है। यह अंधापन पैदा कर सकता) की संभावना को कम करता है।
*A degenerative condition affecting the central part of the retina (the macula) and resulting in distortion or loss of central vision. It occurs especially in older adults, in which case it is called age-related macular degeneration.-एक degenerative स्थिति रेटिना (मैक्यूला) के केंद्रीय हिस्से को प्रभावित करता है और जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय दृष्टि के विरूपण या नुकसान होता है। यह विशेष रूप से पुराने वयस्कों में होता है, इस मामले में इसे आयु से संबंधित मैकुलर अपघटन कहा जाता है।

25-एनर्जी: मक्का एनर्जी प्रदान करता है। कार्बोहाइड्रेड एनर्जी का स्रोत होता है। मक्का/कॉर्न में कार्बोहाइड्रेड प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो शरीर को भरपूर मात्रा में एनर्जी तो देता ही है साथ ही पेट को देर तक भरा हुआ रखता है। भुट्टे के तेल को पीने से शरीर शक्तिशाली होता है। हर रोज एक चम्मच तेल को चीनी के बने शर्बत में मिलाकर पीने से बल बढ़ता है।

26-कोलेस्ट्रॉल फाइटर: भुट्टे को एक बेहतरीन कोलेस्ट्रॉल फाइटर माना जाता है, जो दिल के मरीजों के लिए बहुत अच्छा है। यह कोलेस्ट्रॉल लेवल को बढने से बचाता/रोकता है और शरीर में खून के फ्लो/बहाव को भी बढाता है। यह खून की नलियों में कोलेस्ट्रोल जमा होने से रोकता है। साथ ही यह धमनियों में जमें कॉलेस्ट्रॉल को बाहर निकाल देता है।

27-बच्चों के लिये: बच्चों के विकास के लिए भुट्टा बहुत फायदेमंद माना जाता है। भुट्टे के तेल से बच्चों की मालिश की जाती है।

28-कैंसर फाईटर: भुट्टे को सेंकने या पकाने के बाद इसके 50 प्रतिशत एंटी-ऑक्सीडेंट्स गुण बढ़ जाते हैं। ये बढती उम्र को रोकते हैं और यह कैंसर से लड़ने में मदद करता है। पके हुए भुट्टे में फेरूलिक एसिड होता है जो कि कैंसर जैसी बीमारी में लड़ने में बहुत मददगार होता है। इसके अलावा भुट्टे में मिनरल्स और विटामिन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।

29-गर्भावस्था में उपयोगी: मक्का का सेवन प्रेगनेंसी/गर्भावस्था में भी बहुत लाभदायक होता है। मक्का में जो विटामिन बी9 और फॉलिक एसिड होता है, वह गर्भवती महिलाओं के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। मक्का एक ऐसा हेल्दी स्नैक्स/नाश्ता है, जो वजन को कंट्रोल करने के साथ-साथ आपको स्वस्थ/हेल्दी और फिट एण्ड फाइन बनाता है। इसलिये गर्भवती महिलाओं को इसे अपने आहार में अवश्य शामिल करना चाहिये। इसमें फोलिक एसिड पाया जाता है। जिसकी कमी से होने वाला बच्चा अंडरवेट हो सकता है और कई अन्य बीमारियों से पीड़ित भी हो सकता है। अत: मक्का का सेवन इन तकलीफों से प्रतिरक्षा करता है। बच्चों के विकास के लिए मक्का या ताजा भुट्टा बहुत फायदेमंद माना जाता है।

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30-एनीमिया-रक्ताल्पता (Anemia): (रक्ताल्पता=रक्त की ऑक्सीजन वाहन की क्षमता में कमी हो जाना जो रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्‍या अथवा हीमोग्लोबिन की मात्रा में सामान्य से नीचे कमी हो जाने पर होती है) एनीमिया रोग आयरन के कमी के कारण होता है। मक्का में आयरन खूब होता है जो खून की कमी को दूर करता है। मक्का का भुट्टा आयरन का एक अच्छा स्रोत है। अगर मक्का-भुट्टे को दैनिक आहार में शामिल किया जायेगा तो इससे आयरन की कमी पूरी होने लगेगी और एनीमिया रोग से बचाव भी होगा। भुट्टा हमारे शरीर में खून की कमी को पूरी करता है। इससे हमारा खून भी साफ हो जाता है, जिससे हमारे शरीर का रंग भी साफ हो जाता है।

31-खून जमने में सहायता: विटामिन की अधिकता के कारण मक्का रक्त के जमने की क्षमता को बढ़ाता है। इससे चोट लगने पर खून कम बहता है।

32-डायबीटीज: भुट्टे के रेशे खून में इन्सुलिन की मात्रा को संतुलित रखते हैं, जिससे डायबीटीज कंट्रोल में रहता है| यह ब्लड में सुगर लेवल मेन्टेन रखता है। इसके कारण डायबिटीज से बचाव होता है।

33-चर्मरोग: मक्का में कैरोटिन होता है जो कि त्वचा के लिये बहुत फायदेमंद होता है। इसलिये मक्का दाद, खाज, खुजली आदि चर्म रोगों के लिये बहुत अच्छी दवा है। खुजली के लिए भी भुट्टे का स्टॉर्च (Starch=मांडी) प्रयोग किया जाता है। वहीं इसके सौंदर्य लाभ भी कुछ कम नहीं है।

34-त्वचा निखारे: बढ़ती हुई उम्र के कारण झुर्रियों का पड़ना और खूबसूरती में कमी आना यह समस्या सभी को बहुत परेशान करती है। इस समस्या से बचने के लिए भुट्टा ज़रूर खाएं, क्योंकि इसमें विटामिन ए, विटामिन सी और एंटी ऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं, जो झुर्रियों को आने से रोककर त्वचा को निखार प्रदान करते हैं। मक्का के स्टार्च के प्रयोग से त्वचा खूबसूरत और चिकनी बन जाती है।

35-दांत: सबसे पहली बात तो यह है कि बड़ों के साथ-साथ बच्चों को भी भुट्टे अवश्य खिलाने चाहिए, इससे उनके दांत मजबूत होते हैं।

36-सांस: गुल्ली के दाने निकालने के बाद जो बीच का हिस्सा बचे, उसको सुखाकर जला लें और राख बना लें। सांस के रोगों में यह बड़ा कारगर इलाज है।

37-कैसी भी खांसी: गुल्ली के दाने निकालने के बाद जो बीच का हिस्सा बचे, उसको सुखाकर जला लें और राख बना लें। इस राख को प्रतिदिन गुनगुने पानी के साथ फांकने से खांसी का इलाज होता है। खांसी कैसी भी हो यह चूर्ण लाभ देता ही है। यहां तक कि कूकर खांसी में भी बड़ी राहत मिलती है।

38-बाल: नियमित भुट्टा खाने से बाल झड़ने की समस्या खत्म हो जाती है, क्योंकि भुट्टा में काफी मात्रा में विटामिन ई तत्व मिलता है जो बालों को जड़ से मजबूत बना देता है। जिन लोगों के बालों की समस्या रहती है-जैसे बालों का झड़ना, असमय सफेद बाल आना, उनको हफ्ते में एक बार भुट्टे का सेवन जरूर करना चाहिए। भुट्ठा बालों को संपूर्ण आजादी देता है, जिससे बाल काले मजबूत और घने हो जाते हैं।

39-पढ़ाई में एकाग्रता: सभी विद्यार्थियों को हफ्ते में कम से कम एक बार भुट्टा/मक्का जरूर खाना चाहिए। क्योंकि भुट्टे में मौजूद प्रोटीन पढ़ाई में एकाग्रता को बढ़ाते हैं। इससे दिमाग भी तरोताजा रहता है। यह पढ़ने की शक्ति को भी बढ़ाता है।

40-गुर्दा एवं गुर्दे की पथरी: मक्का के भुट्टे के रेशे किडनी में जमा हुए टॉक्सिन्स और नाइट्रेट (Toxins and Nitrate) को बाहर निकाल देते हैं, जिससे किडनी स्टोन होने का खतरा समाप्त हो जाता है। यह बॉडी Toxins (विषाक्त पदार्थों) निकालकर किडनी को स्वस्थ रखता है। किडनी स्टोन के खतरे से बचाता है। मक्के के रेशों/बालों (Corn Silks) का उपयोग पथरी रोगों की चिकित्सा में होता है। पथरी से बचाव के लिये रात भर रेशों को पानी मे भिगोकर सुबह रेशे हटाकर पानी पीने से लाभ होता है। पथरी के उपचार में रेशों को पानी में उबालकर बनाये गये काढ़े का प्रयोग भी किया जाता है।

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भूई आंवला (Phyllanthus Niruri or Chanca Piedra): हेपेटाईटिस, लीवर सिरोसिस, किडनी संक्रमण, हाई बीपी, पथरी सहित अनेक रोगों की एक महान औषधि

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-85619-55619

बरसात के दिनों में बहुतायत में जंगल में उगने वाला पौधा 'भूई आंवला' अनेक रोग नाशक एक महा औषधि है। (Bhui Amla is a Multi-disease curable Great medicine) दु:ख का विषय है कि अज्ञानतावश किसानों द्वारा इसे नष्ट कर दिया जाता है। खोद कर फैं क दिया जाता है।



जबकि भूई आंवला का किसी योग्य डॉक्टर की देखरेख में, उचित मात्रा में, निर्धारत समय तक सेवन करने पर बहुत सी लाइलाज/असाध्य (Incurable) समझी जाने वाली बीमारियों से मुक्ति पायी जा सकती है। लेकिन भूई आंवला ताजा, शुद्ध और 100 फीसदी आॅर्गेनिक होगा तो ही सही तथा वांछित परिणाम मिल पायेंगे।

फसलों में कीटनाशक तथा कैमीकलयुक्त खाद का उपयोग करने के कारण खेतों में पैदा होने वाले भूई आंवला के गुण कम, प्रदूषित या समाप्त हो सकते हैं। भूई आंवला की आॅर्गेनिक खेती करने पर तुलनात्मक रूप से किसान को बहुत कम उत्पादन मिलता है। यही मूल वजह है कि शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला की कीमत कई गुणी बढ जाती है, लेकिन आॅर्गेनिक खेती करने पर इसकी गुणवत्ता 100 फीसदी अक्षुण्ण अर्थात बरकरार (Quality intact) रहती है।

शुद्ध, आॅर्गेनिक तथा ताजा भूई आंवला/आमला पाउडर का किसी भी रूप में सेवन करने पर श्रेृष्ठ तथा जल्दी परिणाम मिलते हैं। जिसकी पुष्टि मेरे निजी अनुभव के साथ-साथ अनेक समर्पित चिकित्सकों ने भी की है।

आमतौर पर बरसात के मौसम में भूई आंवला खेतों में बहुतायत में पाया जाता है, लेकिन खेती में खरपतवार नाशक दवाईयों के बेरोकटोक उपयोग के कारण यह अमूल्य औषधि लगातार नष्ट होती जा रही है। इसी वजह से हमारे द्वारा शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला प्राप्त करने के लिये सीमित मात्रा में इसकी आॅर्गेनिक खेती की जा रही है। जिससे हम अपने रोगियों को शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला पाउडर उपलब्ध करवाने में समर्थ और सफल हो पाये हैं। अनेक बार किन्हीं गम्भीर रोगियों के उपचार हेतु बहुत जरूरी होने पर कुछ मित्र चिकित्सकों को भी अत्यल्प मात्रा (Minimal quantity) में ताजा और शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला पाउडर उपलब्ध करवाने की कोशिश की जाती रही थी। आने वाले दिनों में इसका उत्पादन बढाये जाने की उम्मीद है। अभी तक के अनुभवों के अनुसार शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला निम्न तकलीफों/बीमारियों में कारगर सिद्ध हुआ है:-

1-अद्भुत दर्द निवारक/Wonderful Painkillers:
शोध प्रमाणित करते हैं कि वास्तव में भूई आंवला पौधे की जड़ें शक्तिशाली दर्द अवरुद्ध/दर्द निवारण करने वाले एजेंट्स हैं जो मॉर्फिन से 3 गुना अधिक शक्तिशाली हैं। अत: इसे किसी भी प्रकार के दर्द के निवारण के लिये उपयोग किया जा सकता है। यही वजह है कि शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला जिद्दी और लाइलाज गठिया, आमवात और जोड़ों के दर्द से मुक्ति दिलाने में उपयोगी सिद्ध हुआ है।

2-गुर्दे और पित्ताशय की पथरी ब्रेकर या पथरी विनाशक (Kidney and gallbladder stone Breaker or Destroyer):
भूई आमला के इसी पथरी विनाशक अद्भुत गुण के कारण इसे Stone Breaker/स्टोन ब्रेकर नाम से भी जाना जाता है। हमारा अपना अनुभव है कि कुछ अन्य ताजा एवं 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों के साथ इसका नियमित उपयोग करने से पथरी टूटकर/गलकर आराम से निकल जाती है। (A study in German showed that people with gallstones that were given Stone Breaker for 2 weeks were completely healed of gallstones 94% of the time… amazing!)

3-प्रतिरक्षा प्रणाली वर्धक और एंटीऑक्सिडेंट-प्रतिउपचायक:
भूई आंवला हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ा देता है (Boosts up our Immune System), एंटीऑक्सिडेंट-प्रतिउपचायक (Antioxidant) का काम करता है। साथ ही यह यह एक अच्छा रोगाणुरोधक एजेंट भी (It’s a good antimicrobial agent too) है। इन सब गुणों के कारण एक स्वस्थ व्यक्ति द्वारा भी भूई आंवला का नियमित सेवन करने से उसकी रोगों से लड़ने की ताकत बढ जाती है। यही वजह है कि इसके सेवन से रोगी में हेपेटाइटिस, एचआईवी-पॉजेटिव, लीवर सिरोसिस, संक्रमित लीवर, संक्रमित किडनी जैसे रोगों से लड़ने की ताकत कई गुणा बढोतरी हो जाती है।

4-श्रृेष्ठ डीटॉक्स (Superior Detox):
भूई आंवला को श्रृेष्ठतम डीटॉक्स के नाम से भी जाना जाता है। जिसे आम बोलचाल में हम गुर्दे, यकृत, आंतों सहित शरीर की आंतरिक सफाई करने वाली श्रृेष्ठ दवाई कह सकते हैं। यही वजह है कि यह हेपेटाइटिस, गैस्ट्रिक अल्सर, फैटी लीवर, मूत्रपथ संक्रमण, एचआईवी आदि से लड़कर, इन्हें स्वस्थ करने में मदद करता है।

5-रक्तचाप और रक्त शर्करा को कम करता है (Bhui Amla/Anvla Lowers Blood Pressure and also may help in Lowering Blood Sugar Levels):
भूई आंवला का सेवन करने से उच्च रक्तचाप कम होकर हाई ब्लड प्रेशर और रक्त में शर्करा के कम होने से मधुमेह/डायबिटीज रोग से मुक्ति मिलती है।

6-लीवर एवं गुर्दा संरक्षक (Liver and Kidney Protector or Guard): 
साधारण भाषा में भूई आंवला को लीवर एवं किडनी का संरक्षक और सुरक्षा गार्ड भी कहा जा सकता है। क्योंकि यह एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट (Powerful Antioxidant तथा रोगाणुरोधक एजेंट (Antimicrobial Agent) होने के साथ-साथ, इसमें शक्तिशाली उपचारक गुण (Powerful Healing Qualities) भी हैं। यही वजह है कि यह मूत्रपथ, जिगर/यकृत और गुर्दों की सफाई करने में सक्षम होता है। अध्ययनों से पता चलता है कि भूई आंवला शराब के सेवन से क्षतिग्रस्त होने वाले यकृतों को पुनर्जीवित करता है और फैटी लीवर की बीमारी से पीड़ित लोगों को भी मदद करता है। यह मूत्र पथ के संक्रमण को खत्म करने में मदद करता है। 

(Studies show that Bhui aamla revitalize livers damaged by alcohol intake. Bui Amla have powerful healing qualities including detoxing, liver cleansing, breakdown of gallbladder and kidney stones, it’s a powerful antioxidant, great for pain, great for hepatitis and HIV, and it’s a good antimicrobial agent too.) इस प्रकार बिना किसी बीमारी के भी यदि भूई आंवला का सेवन किया जाये तो सम्पूर्ण पाचन संस्थान और मूत्र संस्थान स्वस्थ बना रह सकता है। लीवर और किडनी में संक्रमण होने पर भूई आंवला पाउडर अमृत समान उपयोगी है।

[नोट: किसी भी तबलीफ की अनदेखी नहीं करें और तुरंत किसी नजदीकतम डॉक्टर से सम्पर्क करें। स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिक जानकारी हेतु: http://www.healthcarefriend.in पर विजिट/क्लिक करें।]


7-अन्य: उपरोक्त के अलावा भी भूई आंवला का सेवन करने से अनेकानेक बीमारियों का इलाज किया जा सकता है।

सम्पर्क सूत्र:
Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
Health Care Friend and Marital Dispute Consultant
(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ),
Mobile & WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM)
Mob. No. नि:शुल्क स्वास्थ्य परामर्श चाहने वालों के लिये सार्वजनिक है।
इस पर फालतू सामग्री भेजने वालों को तुरंत ब्लॉक कर दिया जाता है।
पित्ताशय/गाल ब्लैडर/Gallbladder पथरी: होम्योपैथिक उपचार

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
पित्त, पित्ताशय, पित्त, पित्त पथरी और आयुर्वेदिक उपचार के बारे में 'पित्ताशय/गाल ब्लैडर/Gallbladder पथरी: आयुर्वेदिक उपचार' शीर्षक पूर्व प्रकाशित लेख में जानकारी दी जा चुकी है। पित्ताशय की पथरी के उपचार में आयुर्वेद के साथ-साथ होम्योपैथी की दवाईयों (Medicines) से भी आश्चर्यजनक परिणाम मिलते हैं। अत: जनहित में पित्ताशय की पथरी के होम्योपैथिक उपचार हेतु स्वास्थ्य जनजागरण हेतु संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है। कृपया इसे पढकर खुद अपना इलाज करने का रिस्क नहीं लें।



सबसे पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि होम्योपैथी के मूल सिद्धान्त के अनुसार, होम्योपैथी में किसी भी रोग की कोई सुनिश्चित दवाई नहीं होती है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि दो रोगियों की एक जैसी बीमारी के लिये अलग-अलग दवाई दी जा सकती है और एक ही दवाई से एक या एकाधिक रोगियों के अनेक रोगों को ठीक किया जा सकता है। इसकी मूल वजह यह है कि होम्योपैथी में रोग का नहीं, बल्कि रोगी का इलाज किया जाता है। रोगी के लक्षणों के अनुसार दवाई का चयन/सिलेक्शन करके रोगी की सभी मानसिक एवं शारीरिक बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार पित्ताशय की पथरी से पीड़ित रोगियों के प्रमुख लक्षणों के अनुसार प्रस्तुत मुख्य-मुख्य होम्योपैथिक दवाईयों को उनके नाम के साथ लिखे गये लक्षणों से मिलान करके उपयोग में लाया जाता है। लेकिन याद रहे किसी भी रोग के इलाज के लिये किसी भी होम्योपैथिक दवाई के लक्षणों का मिलान कर लेनाभर पर्याप्त नहीं होता है। रोग निदान के लिये रोगी की प्रतिरोधक शक्ति, स्वभाव, नशे-खाने-पीने-सोने-टेंशन की आदतें आदि सम्पूर्ण लक्षणों को जानने के बाद ही होम्योपैथिक दवाई की उचित शक्ति और मात्रा का निर्धारण किया जा सकता है। यह कार्य कोई अनुभवी होम्योपैथ ही कर सकता है।

1. लाइकोपोडियम (Lycopodium): लक्षण-पेट के ऊपरी और दाहिने हिस्से में ऐसा दर्द होना जो तेलयुक्त पदार्थ खाने से बढ़ना। रोगी को बार-बार मलत्याग की इच्छा होती है। उसके पेशाब में ईंट के चूरे के समान लाल रंग के बारीक कण निकलते हैं। सामान्यत: रोगी पेट का साफ नहीं होना।

2. बर्बेरिस वल्गेरिस (Berberis Vulgaris): लक्षण-लीवर के नीचे स्थित पित्ताशय से दर्द शुरू होकर पेट के निचले हिस्से या पाँव तक पहुँच जाता है। दर्द वाले स्थान पर दबाने और हरकत करने अर्थात हल-चल करने से दर्द का बढ़ जाता है। दर्द से राहत पाने के लिये रोगी दाहिनी ओर झुकता हुआ देखा जा सकता है। बार-बार पेशाब करने की इच्छा के साथ-साथ पेशाब में पीले या चमकदार लाल रंग के चूरे के बारीक कण निकलते हैं। पेशाब कर लेने के बाद भी रोगी को ऐसा महसूस होना, जैसे मूत्राशय में कुछ पेशाब शेष रह गया हो।

3. कल्केरिया कार्बोनिका (Calcarea Carbonica): लक्षण-यह दवाई मोटे और थुलथुले लोगों के लिये अधिक उपयुक्त है। पित्ताशय में तीव्र दर्द होना। खट्टी डकारें आना और खट्टे पित्त की उलटी भी होना। अधिक पसीना आना। सिर में अत्यधिक पसीना आना, लेकिन रोगी को ठंडी हवा सहन न होना। जबकि खाने-पीने में गरम पदार्थ अच्छे नहीं लगना और ठंण्डे पदाथों की चाहत। इसके अलावा अंडा, पेंसिल, चाक, नींबू, खड़िया आदि खाने की विशेष चाहत/इच्छा।

4. नक्स वोमिका (Nux Vomica): नोट: रोगियों के शरीर में आधुनिक चिकित्सा या आयुर्वेद की दवाईयों के शेष रहे प्रभाव/दुष्प्रभावों को नष्ट करने के लिये सामान्यत: इस दवा का उपयोग किया जाता है। लक्षण-अनियमित दिनचर्या वाले तुनक-मिजाज (Short Tempered) लोगों, जिनके खाने, पीने, जागने और सोने का कोई निश्चित समय तय नहीं होता। उन्हें यह दवाई उपयोगी होती है। ऐसा लगता है जैसे पित्ताशय की पथरी, पित्त-नली में कहीं अटक गयी है। जिसका बार-बार दर्द उठ रहा है। भूख कम लगना। कभी कब्ज होना तो कभी पतले दस्त हो जाना। बार-बार मलत्याग की इच्छा होना, लेकिन जाने पर मलत्याग न होना या बहुत ही कम मलत्याग होना। मलत्याग के लिये बैठने पर ऐसा लगना जैसे थोड़ा और-थोड़ा और मलत्याग होगा, लेकिन मलत्याग होता नहीं है। यही लक्षण पेशाब के समय भी हो सकता है। अनेक बार पेशाब बूंद-बूंद करके आता है। पेशाब में खून आना। खांसने से पेशाब निकल जाना।

5. चियोनैंथस वर्जिनिका (Chionanthus Virginica): लक्षण-आंखों की श्लेष्मा झिल्ली में पीलापन। जीभ पर पीली परत जमना। मुंह सूखा होना, किन्तु फिर भी पानी पीने के बाद भी सूखेपन के अनुभव में राहत नहीं। पेट में ऐसा दर्द होना जो पित्ताशय से मूत्राशय तक बढ़ा हुआ मालूम होता है। रोगी को पीलिया हो सकता है। सलेटी रंग का मलत्याग। पेशाब गाढ़े पीले रंग का आना। त्वचा में पीलापन/पिलांसा सा दिखना।

6. चेलिडोनियम मेजस (Chelidonium Majus): लक्षण-पीठ के पीछे की ओर दाहिने कन्धे की तरफ जो अस्थि-फलक है, उसके नीचे लगातार दर्द होते रहना। रोगी को भूख न रहे या कम लगे, जी मिचलाये और पित्त की उल्टी हो। पित्त की पथरी जब पित्ताशय छोटी-सी नलिकाओं में फंस जाती है, तो इससे भयंकर पीड़ा होती है। चेलिडोनियम इस रुकावट को खोल देती है और पित्त-पथरी निकल जाती है। विशेष लक्षण पीड़ित व्यक्ति ठंडा पानी नहीं पीना चाहता सकता। लेकिन गर्मागर्म पानी या पेय हो तो उसे सुहाता है। वह खाली पेट नहीं रह सकता। कुछ न कुछ खाने को अवश्य चाहिये।

उपरोक्त के अलावा रोगी के लक्षणों के अनुसार चाइना (China), फॉस्फोरस (Phosphorus), मेन्था पिपेरिटा (Mentha Piperita), कार्डुअस मेरिएनस (Carduus Marianus), कोलेस्टेरीनम (Cholesterinum) इत्यादि का भी उपयोग किया जा सकता है।

उपरोक्त के अलावा होम्योपैथी की छोटी बहन के नाम से जानी जाने वाली बॉयोकेमिक दवाईयां (जिन्हें 12 साल्ट के नाम से जाना जाता है) भी लक्षणानुसार पित्ताशय की पथरी के इलाज में महत्वूपर्ण साबित हो सकती हैं।
नोट:
1-यहां प्रस्तुत सामग्री के आधार पर, बिना किसी डॉक्टर की सलाह के खुद ही, अपना उपचार करना उचित नहीं है।
2-यदि उक्त सामग्री आपको उपयोगी लगे तो इसे जनहित में अपने जान-पहचान वाले लोगों के साथ साझा किया जा सकता है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
स्वाथ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार
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Jaipur, Rajasthan 03 दिसम्बर, 2017
पित्ताशय/गाल ब्लैडर/Gallbladder पथरी: आयुर्वेदिक उपचार

वर्तमान में पित्ताशय (Gallbladder) या पित्त (Bile) की थैली में पथरी (Stone) बनने की समस्या तेजी से बढती जा रही है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Modern Medical Science) के 100 फीसदी डॉक्टर पित्त पथरी का एक मात्र इलाज आॅपरेशन ही बतलाते हैं। जबकि आयुर्वेद और होम्योपैथी की मदद से अधिकतर मामलों में पित्त पथरी की तकलीफ से बिना ऑपरेशन (Without Operation) के भी मुक्ति पायी जा सकती है।

पित्ताशय/पित्त की थैली/गाल ब्लैडर/Gallbladder क्या है?
शरीर में नाशपाती के आकार का थैलीनुमा यह अंग लीवर (Lever) के नीचे पाया जाता है। सामान्यतः इसका कार्य पित्त को संग्रहित/इकट्ठा करना एवं उसे गाढ़ा करना है। आम धारणा के विपरीत पित्ताशय स्वयं पित्त नहीं बनाता है। अर्थात पिताशय पित्त का निर्माण नहीं करता है।




क्या होता है पित्त?
पित्त एक पाचक (Digestive) रस है जो कि लीवर द्वारा बनाया जाता है। मुख्यत: पित्ताशय में इस जमा पित्त का उपयोग छोटी आंत में फैटी अर्थात वसायुक्त खाद्य पदार्थों को तोड़ने और उनको पचाने के लिए होता है।

पित्त का स्वरूप:
शहद या शक्कर की गाढी चाशनी का जो तरल रूप होता है, पित्ताशय/पित्त की थैली में जमा पित्त की ऐसी ही कल्पना करके, पित्त के स्वरूप को समझा जा सकता है।

पित्त के पित्त पथरी में परिवर्तित होने के कारण:
निम्न प्रमुख कारणों से पित्त कठोर, सूखा या सख्त स्वरूप धारण करने पर पित्त पथरी में परिवर्तित हो जाता है:-

1. कॉलेस्ट्रॉल: पित्त की पथरियों के बनने पीछे शरीर में बढे हुए कॉलेस्ट्रॉल की प्रमुख भूमिका होती है। यही वजह है कि जांच करने पर पित्त की पथरी में 50 से 95 फीसदी कॉलेस्ट्रॉल पदार्थ पाया जाता है।
2. अनियमित भोजन: समय पर भोजन नहीं करने के कारण, भोजन को पचाने के लिये जमा पित्त से पित्ताशय लंबे समय तक भरा रहता है। जिसका समय पर और नियमित उपयोग नहीं होते रहने के कारण संग्रहित पित्त का, पित्त की थैली या पित्ताशय में जमाव शुरू हो जाता है, जो धीरे-धीरे कठोर होता जाता है और अन्त में पथरी का रूप धारण कर लेता है।
3. आन्तरिक संक्रमण (Internal Infection): किसी आन्तरिक संक्रमण/इंफेक्शन के कारण पित्त, जिसे पाचक रस भी कहा जाता है, वह अधिक गाढा हो जाता हैं। कालांतर में यही संग्रहित गाढा पित्त, पित्त की पथरी का रूप धारण कर लेता है।
4. मोटापा (Obesity): मोटापे से ग्रस्त लोगों के पित्त में कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होने के कारण, पित्ताशय में संग्रहित पित्त रस के सूखने की सम्भावना अधिक होती है। इस कारण मोटे लोगों में और विशेषकर मोटी महिलाओं में पित्त की पथरी बनने की संभावना अधिक होती है।
5. कम उम्र में अधिक प्रजनन और ​गर्भ निरोधक गोली: औरतों में कम उम्र में ही अधिक बच्चे जनने के कारण और, या अधिक समय तक एलोपैथिक गर्भ-निरोधक गोलियां खाने के कारण भी पित्ताशय में पथरी बनती देखी गयी है। अथवा इन हालातों में औरतों के पित्ताशय में पथरी बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
6. अन्य कारण: डायबिटीज (मधुमेह), तेजी से वजन घटना या घटाना, डायटिंग-अधिक भूखा रहना, आनुवांशिक खून संबंधी बीमारियाँ और कुछ भौगोलिक एवं जलवायू परिस्थितियाँ।

पित्त पथरी के प्रमुख लक्षण:
1. पित्ताशय में पथरी होने पर भी बहुत से मामलों में जीवनपर्यन्त किसी प्रकार के लक्षण प्रकट नहीं होते हैं।
2. पित्ताशय में सूजन आ जाती है। जिसके कारण पीड़ित व्यक्ति को बिना कोई कारण हल्का या कभी-कभी तेज बुखार रहने लगता है।
3. रोगी को अपना यकृत एवं पित्ताशय बढा हुआ अनुभव होता है। जिसे छूने पर पित्ताशय के स्थान पर उदर में दाईं तरफ दर्द होता है। साथ ही पित्ताशय में बिना छुए भी दर्द होता रहता है।
4. पित्ताशय में पित्त इकठ्ठा हो जाने के कारण, पित्तविसर्जन नली में, पथरी के कारण रुकावट आ जाती है। जिसके कारण पीलिया हो जाता है। अकसर पीलियाग्रस्त लोगों को पित्त पथरी होने की सम्भावना बनी रहती है।
5. जी मिचलाता रहता है। रोगी बार-बार उलटी/वोमिट (Vomit) करना चाहता है, लेकिन उसे उलटी होती नहीं है। इस कारण वह भूख होने पर भी भोजन करने से कतराता रहता है।

पित्ताशय की पथरी का उपचार:
भ्रांति के कारण तुरंत आॅपरेशन: पित्ताशय की पथरी के बारे में यह भ्रांति फैली या जानबूझकर फैलाई हुई है कि एक बार पित्ताशय में पथरी बनना शुरू हो गया या पथरी बन गयी तो उसका कोई इलाज ही नहीं है। इसलिये पिताशय का आॅपरेशन ही एक मात्र उपचार है। इस भ्रांति के कारण अधिकतर रोगी तुरंत आॅपरेशन करवा लेते हैं और फिर जीवनभर भुगतते रहते हैं। इसका मूल कारण है-आयुर्वेद और होम्योपैथी जैसी कारगर चिकित्सा पद्धतियों के प्रति केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय का सौतेला रवैया। जिसके चलते आयुर्वेद और होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धतियों की विशेषताओं का पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं हो पाता है और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के निष्कर्षों को ही अन्तिम सत्य मान लिया जाता है। जबकि कोई भी चिकित्सा पद्धति सम्पूर्ण नहीं है।
आयुर्वेदिक उपचार:
1. गुडहल (Hibiscus): गुडहल के फूलों का शुद्ध और आॅर्गेनिक पाउडर 1 चम्मच/टी स्पून (पथरी की अवस्था और आकार के अनुसार उचित मात्रा में) रात को सोते समय खाना खाने के कम से कम एक डेढ़ घंटा बाद गुनगुने पानी के साथ फंकी लेेते रहें। इसका स्वाद हलका कड़वा होता है। यद्यपि बुहत अधिक कड़वा भी नहीं होता है। अत: इसके कड़वे स्वाद को सहने के लिये अपने आप को तैयार रखें। इसके सेवन के बाद कुछ भी खाना पीना नहीं है। पाउडर लेने के बाद सीने में अचानक बहुत तेज़ दर्द हो सकता है। जैसे हार्ट अटैक आ जायेगा। यह दर्द पथरी टूटने का हो सकता है। इसके प्रयोग के दौरान पालक, टमाटर, चुकंदर, भिंडी का सेवन न करें। अगर पित्त की पथरी बड़ी है तो पथरी गलने/पिघलने या टूटते समय दर्द भी हो सकता है। इसलिये अपने स्वैच्छिक निर्णय से ही आप इसका प्रयोग को करें।

2. गुडहल फूल पाउडर की उपलब्धता: गुडहल के फूलों का पाउडर बहुत आसानी से पंसारी (आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी-दवा विक्रेता) के यहां मिल जाता है। यद्यपि गुडहल का शुद्ध और आॅर्गेनिक फूल पाउडर मिलना अंसभव नहीं, लेकिन बहुत मुश्किल अवश्य है। जयपुर स्थित हमारे निरोगधाम पर लगे गुडहल के पेड़ों में खिलने वाले फूलों से 100 प्रतिशत शुद्ध आर्गेनिक गुडहल फूल का पाउडर तैयार किया जाता है। जिसे केवल हमारे द्वारा उपचारित रोगियों के लिये ही दिया जाता है। शुद्ध आर्गेनिक गुडहल फूल का पाउडर ट्रेडिंग/व्यापार के लिये उपलब्ध नहीं है।

3. नाशपाती का जूस (Pear Juice): नाशपाती में मौजूद पैक्टिन (Pectene), कॉलेस्ट्रॉल (Cholesterol) को बनने और जमने से रोकता है। अत: एक गिलास गुनगुने पानी में, एक गिलास नाशपाती का जूस और दो चम्मच शहद (Honey) मिलाकर पीएं। इस जूस को एक दिन में तीन बार पीना चाहिए। इसका लगातार सेवन करने से पित्ताशय की थैली की पथरी पिघलकर निकल जाती है। इसके अलावा भी नाशपाती के बहुत से फायदे हैं।
4. सेब का जूस+सिरका (Apple Juice+Vinegar): वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि सेब में पित्त की पथरी को गलाने का प्राकृतिक गुण होता है। यद्यपि अनुभव यह प्रमाणित करते हैं कि सेब के जूस को सेब के सिरका के साथ लेने पर यह ज्यादा असरकारी होता है। सेब में मौजूद प्राकृतिक मैलिक एसिड (Mallic Acid) पथरी को प्राकृतिक तरीके से पिघलाने में मदद करता है तथा सेब का सिरका लीवर में कॉलेस्ट्रॉल (Cholesterol) नहीं बनने देता, जो पित्ताशय में पथरी बनने के लिए जिम्मेदार होता है। सेब जूस+सिरका का यह घोल न केवल पथरी को पिघलाता है, बल्कि साथ ही साथ पथरी को दुबारा बनने से भी रोकता है और पथरी के दर्द से भी राहत प्रदान करता है। अत: एक गिलास सेब के जूस में, एक चम्मच सेब का सिरका मिलाकर, इस घोल को ठीक नहीं होने तक नियमित रूप से दिनभर में दो बार पीना चाहिये।

5. पुदीना (Mint) का काढा या पुदीने की चाय: आयुर्वेद में पुदीना को पाचन के लिए सबसे अच्छी घरेलू औषधि (Home Remedy) माना जाता है जो पित्त वाहिका तथा पाचन से संबंधित अन्य रसों के निर्माण में सहयोगी बनकर उन्हें बढ़ाता है। पुदीना में तारपीन (Terpenes) विद्यमान होता है जो कि पथरी को प्राकृतिक तरीके से गलाने में सहायक माना जाता है। इसी वजह से पुदीने की पत्तियों से बनी चाय गॉल ब्लैडर पथरी को पिघलाने में सहायक हो सकती है। अत: एक गिलाश पानी को गरम करें, इसमें ताजी या सूखी पुदीने के पत्तियों को उबालें। अर्थात काढा बनायें। हल्का गुनगुना रहने पर पानी को छानकर इसमें एक चम्मच शहद मिलाएं और इसे चाय की भांति पियें। इस काढे/चाय को दिन में दो बार पिया जा सकता है।

6. जांच: आयुर्वेदिक इलाज करवायें तो प्रत्येक 45 दिन बाद पथरी की वास्तविक स्थिति को जानने के लिये अल्ट्रासाउण्ड/Ultrasound जांच करवाते रहना जरूरी है। अगर उपरोक्त में से किसी भी उपचार से पित्ताशय में सूखा पित्त, फिर से पिघल जाये तो आॅपरेशन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी!

नोट:
1-यहां प्रस्तुत सामग्री के आधार पर, बिना किसी डॉक्टर की सलाह के खुद ही, अपना उपचार करना उचित नहीं है।
2-लेख काफी लम्बा हो गया है। अत: पित्ताशय की थैली के होम्यापैथिक उपचार के बारे में अलग से उपयोगी सामग्री प्रस्तुत की जायेगी।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
स्वाथ्य रक्षक सखा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
HCF&MDC (Health Care Friend and Marital Dispute Consultant)
हेल्थ वाट्सएप: 8561955619
मोबाईन नम्बर: 9875066111
02 दिसम्बर, 2017
*जोड़ों के दर्द और गठिया का दुश्मन यूरिक एसिड लेबल कैसे कम करें?*
*लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'*

यदि अपने आसपास नजर डालते हैं तो हमें पता चलता है कि उम्र बढने के साथ-साथ अनेक लोगों के जोड़ों में दर्द होना शुरू हो जाता है। जबकि कुछ को तो युवावस्था में ही स्थानीय कारणों जैसे जलवायु, खानपान की आदतों और व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण जोड़ों में दर्द होना शुरू हो जाता है। सामान्यत: रक्त में यूरिक एसिड लेबल (Uric Acid Label) बढने पर, जोड़ों पर/में यूरिक एसिड जमा/एकत्रित होने लगता है। शरीर में प्यूरिन (Purine) नामक रासायनिक यौगिक के टूटने के कारण यूरिक एसिड बनता रहता है। प्यूरिन खाने-पीने की चीजों में पाया जाता है। विशेष रूप से जब मनुष्य प्यूरिन युक्त पदार्थों को खाता है तो लीवर (Liver) खाये हुए पदार्थों को पचाने के लिए प्यूरिन को तोड़ने लगता है और उसमें से कचरा अर्थात निरर्थक पदार्थ (Waste Product-अपशिष्ट पदार्थ) को मूत्र के जरिये यूरिक एसिड के रूप में किडनी के द्वारा शरीर से बाहर निकाल देता है। किसी कारण से जब यही निरर्थक पदार्थ या अपशिष्ट पदार्थ यूरिक एसिड साथ शरीर से पूरी तरह बाहर ना निकलकर, शरीर के अंदर ही एकत्रित/जमा होने लगता है और एक क्रिस्टल (Crystal) की तरह बन/जम जाता है। ऐसी स्थिति में शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढ जाता है। इसी यूरिक एसिड के जमा होने के कारण ही अनेक लोगों को किडनी स्टोन भी बनने लगता है। इस समस्या से ग्रस्त अधिकतर लोगों को हाथ-पैरों की उंगलियों, हथेलियों, कोहनी, कंधा, घुटने आदि छोटे-बड़े जोड़ों में दर्द होता देखा जा सकता है।


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यदि शुरूआत में ही इसका सही से इलाज नहीं किया जाये तो पीड़ित व्यक्ति के लिये चलना-फिरना, उठना-बैठना और नैतिक कार्य करना/निपटाना तक मुश्किल हो जाता है। रक्त में यूरिक एसिड का स्तर बढते जाने पर पीड़ित व्यक्ति को गठिया (Gout/Arthritis) होने का खतरा बढ जाता है। जिससे पीड़ित व्यक्ति अकसर मजबूर होकर दर्द-निवारक दवाईयों के सहारे जीवित रहते हैं। जबकि इस तकलीफ को कैमीकलयुक्त दर्द निवार​क दवाओं के जरिये ठीक नहीं किया जा सकता। दर्द निवारक दवाओं के अधिक सेवन के कारण पीड़ित व्यक्ति के गुर्दे खराब होने का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है।

अत: बढते यूरिक एसिड को शुरूआती अवस्था में ही नियंत्रित करना बहुत जरूरी होता है। जिसके लिए समय-समय पर रक्त में यूरिक एसिड लेबल (Uric Acid Label) जांच करवाते रहना चाहिए। यूरिक ऐसिड बढने के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द से मुक्ति के लिये कुछ आसान से घरेलु उपाय बताये जा रहे हैं:-

*नोट: इन उपायों में से किसी को भी आजमाने से पहले डॉक्टर से परामर्श अवश्य किया जाना चाहिये।*

*1. गुनगुना पानी:* रोगी को रोजाना दिनभर में 3 से 4 लीटर गुनगुना पानी थोड़ा-थोड़ा करके पीना चाहिए। ऐसा करने से यूरिक एसिड सहित, शरीर में जमा/पड़े हुए सभी दूषित पदार्थ आसानी से बाहर निकलने लगते हैं।
*2. आॅर्गेनिक ब​थुआ के पत्तों का रस:* सुबह खाली पेट शुद्ध आॅर्गेनिक बथुआ के पत्तों का रस या शुद्ध आॅर्गेनिक बथुआ पाउडर (रोगी तथा रोग की स्थिति के अनुसार मात्रा) रोगी को पिलायें। इसके दो घंटे बाद तक न कुछ खायें और न हीं कुछ पियें। बथुए की सब्जी भी लाभकारी है।
*3. अख़रोट+एलोवेरा/घृतकुमारी+आंवला:* यूरिक एसिड को कंट्रोल करने के लिए रोजाना खाली पेट अख़रोट खाना चाहिये और एलोवेरा/घृतकुमारी रस में आंवले का रस मिलाकर पीना लाभकारी है।
*4. अलसी+अजवाइन:* भोजन के बाद एक चम्मच भुने हुए शुद्ध आॅर्गेनिक अलसी के बीज और, या शुद्ध आॅर्गेनिक अजवायन भोजन के बाद खाने से यूरिक एसिड लेबल कम होता है।
*5. अश्वगंधा+शहद:* एक चम्मच शुद्ध आॅर्गेनिक अश्वगंधा+एक चम्मच शुद्ध आॅर्गेनिक शहद+एक गिलास गुनगुना दूध रोगी को पिलायें। *लेकिन गर्मियों में अश्वगंधा की मात्रा कम प्रयोग करें।* या रात को सोने से पहले अश्वगंधा चूर्ण को शहद के साथ खिलाकर हल्का गर्म दूध रोगी को पीना चाहिये।
*6. एलोवेरा ज्यूस+आंवले का रस:* शुद्ध आॅर्गेनिक एलोवेरा ज्यूस और शुद्ध आॅर्गेनिक आंवले का रस मिलाकर पीने से भी आराम मिलता है।
*7. नारियल पानी:* नारियल का पानी पीने से और, या नींबू का रस गर्म पानी में डालकर पीने से मूत्र के जरिये यूरिक एसिड बाहर निकल जाता है।
*8. सेब का सिरका:* एक गिलास गुनगुने पानी में 2-3 चम्मच सेब का सिरका मिलाकर पीने से भी आराम मिलता है और यूरिक एसिड का दर्द कम होता है।
*9. बेकिंग सोडा:* एक गिलास पानी में एक चम्मच बेकिंग सोडा मिलाकर पीने से भी क्रिस्टल टूट कर घुल जाते हैं और पेशाब के जरिये निकल जाते हैं।
10. नींबू+शहद की चाय का सेवन भी उपयोगी और लाभ दायक है।

*-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, आॅल लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा। परामर्श समय: सुबह 10 से सायं 10 बजे के बीच। वाट्सएप नम्बर: 85-619-55-619, 14.10.2017*

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NOTE: यहां पर सभी लेखों में लिखी गयी दवाईयों का विवरण जनहित में स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में जागरूकता के लिए लिखा गया है। पाठक कृपया स्वयं अपना इलाज करने का खतरा मोल नहीं लें। कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें। [Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your Doctor.] हमारे 95 फीसदी रोगियों को व्यक्तिगत रूप से हम से आकर मिलने की जरूरत नहीं पड़ती। यद्यपि रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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दाम्पत्य-Conjugal दाल दालचीनी दालें दिमांग दिल दीर्घायु दु:खी दुर्गंध दुर्बलता दुष्प्रभाव दुष्प्रभावरहित दूध दूध वृद्धि दूधी दूधी-Milk Hedge दृष्टिदोष दो मन द्रोणपुष्पी द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes धड़कन धनिया बीज धनिया-Coriander धमासा धात धातु धातु पतन धार्मिक धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं? धैर्यहीन नज़ला नपुंसक नपुंसकता नाइट्रिक एसिड नाक नाखून नागबला नागरमोथा नाडी हिंगु नाड़ी हिंगु (डिकामाली) नामर्दी नारकीय पीड़ा नारियल नाश्ता निमोनिया निम्न रक्तचाप निम्बू नियासिन निराश निरोगधाम निर्गुण्डी निर्गुन्डी निष्कपट स्नेह निष्ठा निसोरा नींद नींबू नींबू-Lemon नीम-azadirachta indica नुस्खे नुस्खे-Tips नेगड़ नेत्र रोग नेुचरल नैतिक नॉर्मल डिलेवरी नोनिया नौसादर न्युमोनिया-Pneumonia न्यूरॉन्स पक्षघात पंचकर्म पढ़ने में मन लगेगा पंतजलि पत्तागोभी-CABBAGE पत्थर फोड़ी पत्थरचट्टा पत्नी पथरी पदार्थ पनीर पपीता पपीता-CARICA PAPPYA पमाड परदेशी लांगड़ी परम्परागत चिकित्सा परहेज पराठा परामर्श परिस्थिति पवाड़ पवाँर पाइल्स पाक-कला पाचक पाचन पाचनतंत्र पाचनशक्ति पाठक संख्या 16 लाख पार पाठक संख्या पंद्रह लाख पायरिया 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